शनिवार, 30 मई 2026

सरकारी उपेक्षा से हिंदी पत्रकारिता की गिरती साख



आम आदमी की बुलंद आवाज है हिंदी पत्रकारिता। सरकार के कामकाज को उजागर करती है हिंदी पत्रकारिता। इसके बावजूद दोयम दर्जे की बन चुकी है। कौन है इसका जिम्मेदार?


- जितेन्द्र बच्चन

क्रांतिकारियों का सर्वोत्तम हथियार रही है हिन्दी पत्रकारिता। सरकार और जनता के बीच इससे बेहतर और कोई सेतु काम नहीं करता। आज भी देश में सबसे अधिक हिंदी भाषा में ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और न्यूज चैनल भी सबसे ज्यादा हैं। जन सरोकार से जुड़ी, किसान, मजदूर, शिक्षित वर्ग और आम आदमी की बुलंद आवाज है हिंदी पत्रकारिता। इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता की वह धमक अब नहीं रही जो अंग्रेजी पट्टी के अखबारों या मैग्जींस की दिखती है। इसका मुख्य कारण है सरकारी उपेक्षा! आज अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बन चुकी है और अब तो दिन-प्रतिदिन इसकी साख भी गिरती जा रही है।

हिंदी पत्रकारिता करने वाले 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर दूसरी भाषाओं को खूब कोसते हैं, लेकिन यही कोसने वाले लोग हिंदी के पत्रकारों को नौकरी नहीं देना चाहते। हिंदी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार और सरकार बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी के एडीटरों के खाते में जाती है। अंग्रेजी पत्रकारिता के दम पर बड़े-बड़े मीडिया घराने सत्ता से नजदीकियां बनाकर मलाई काट रहे हैं। जबकि हिंदी के पत्रकारों को केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारी नजदीक भी नहीं फटकने देते। राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है। क्षेत्रीय और हिंदी के छोटे समाचार पत्रों को कम विज्ञापन या कम दरें मिलती हैं, जिससे उनका आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। इसी उपेक्षा के चलते हिंदी के तमाम पत्र-पत्रिकाएं बंद हो चुके हैं या फिर अंतिम सांसें ले रहे हैं।

छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले हिंदी पत्रकारों को नियमित वेतन, स्वास्थ्य बीमा या सरकारी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता। वे अक्सर स्थानीय प्रशासन और माफिया के निशाने पर होते हैं। कई राज्यों में हिंदी पत्रकारों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने में अत्यधिक नौकरशाही का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें प्रेस सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। हिंदी पत्रकारों को अक्सर सरकारी विभागों से डेटा या आधिकारिक जानकारी प्राप्त करने में उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। सरकार की इस उदासीनता के कारण जमीनी स्तर की सच्ची खबरें कई बार मुख्यधारा से गायब हो जाती हैं और मीडिया संस्थानों या पत्रकारों को अपना खर्च निकालने के लिए प्रायोजित खबरों पर मजबूर होना पड़ता है।

किसी सार्वजनिक बड़े मंच पर जब किसी पत्रकार को स्थान देना होगा या संवाद में हिस्सा लेना होता है तो अंग्रेजी वाले साहब को अहमियत दी जाती है। बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी का अच्छा ज्ञान है। उनका अनुभव बोलता है लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के नाते सरकारी अधिकारी उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उनको महत्व देने के बजाय उनका माखौल उड़ाया जाता है। हिंदी पत्रकारिता करने वालों को दलाल और चापलूस तब बताया जाता है। कितनी अजीब विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता आज अनाथ जैसी हालत में है। इसकी वकालत करने वाले को कम पढ़ा-लिखा समझा जाता है।

हिंदी चैनलों और हिंदी समाचार पत्र–पत्रिकाओं की बदौलत कई राजनेता, व्यापारी व अभिनेता आसमान छू रहे हैं। ताकतवर बने हुए हैं, लेकिन जब क्रेडिट देने की बात आती है तो हिंदी पत्रकारों को भूलकर अंग्रेजी के चैनलों व अखबारों की पूजा की जाती है। और अब तो हिंदी पत्रकारिता के आगे विश्वसनीयता का संकट भी खड़ा हो चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़-सी आ गई है। अंग्रेजी वाली ब्रेकिंग न्यूज (सबसे पहले खबर) की बराबरी करने की अंधी दौड़ में ‘सच’ पीछे छूट जाता है। सनसनीखेज बनाने की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना ही खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसकी साख को लगातार नुकसान पहुंच रहा है। व्यावसायिक दबावों और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आज हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।

अधिकतर मीडिया घरानों ने पत्रकारिता को लाभ कमाने वाला एक व्यवसाय बना दिया है। राजनीतिक हित साधने लगे हैं। टीआरपी और ज्यादा क्लिक्स पाने के लिए गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर अंग्रेजी वालों की तरह सनसनीखेज और सतही खबरों को अधिक महत्व देने लगे हैं। इसके चलते कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगती। सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के उपयोग का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। वेब पत्रकारिता की भाषा व्याकरण, वर्तनी और हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट करने लगी है। ऐसे में जहां हिंदी पत्रकारिता को मौजूदा नई चुनौतियों का विश्लेषण करने की जरूरत है, वही सरकार को भी हिंदी पत्रकारिता को पूर्ण अहमियत देनी होगी। तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो उसकी जरूरत ही नहीं अधिकार भी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

शनिवार, 9 मई 2026

 बंगाल में शुभेंदु सरकार, जनमानस की बढ़ी उम्मीद

- जितेन्द्र बच्चन


शुभेंदु सरकार से जनता को अब उम्मीद है कि बंगाल में डर का माहौल खत्म होगा और राज्य भरोसे व विकास के दौर की ओर बढ़ेगा।




पश्चिम बंगाल के लिए शनिवार का दिन एक ऐतिहासिक सुबह लेकर आया। कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शुभेंदु अधिकारी ने राज्य में बीजेपी के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ‘दादा’ के आसीन होने के साथ ही ‘दीदी’ का 15 साल का शासन खात्मा हो गया। बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव! खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बदलाव की धुरी में रहे और आज भव्य समारोह का हिस्सा भी बने। उनके साथ शपथ ग्रहण समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई दिग्गज नेता शामिल हुए।

‘सोनार बांग्ला’ के नारों से पूरा वतावरण गूंज उठा। यह नारा उस समय भी बुलंद हुआ था जब विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की 207 सीटों पर प्रचंड जीत दर्ज की थी। टीएमसी में कभी नंबर दो की हैसियत रखने वाले शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक को हरा दिया। नतीजतन तृणमूल कांग्रेस महज 80 सीटों पर सिमटकर रह गई और आज उसके 15 साल के शासन का भी खात्मा हो गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में झालमुड़ी क्या खाया, बंगालियों का प्रिय भोजन मछली-भात भी पीछे हो गया। चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी और गुस्सा अब साफ दिख रहा है। कई लोग खुलकर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है, “ अभिषेक बनर्जी ने अपने घमंडी व्यवहार से पार्टी को 'खत्म' कर दिया।“

कहें भी क्यों न, ममता बनर्जी को जहां आज अपनी साख बचाने तक की चिंता बढ़ गई है, वहीं राजनीतिक सक्रियता और आक्रामक तेवरों के कारण पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की आंखों का तारा बने शुभेंदु मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनके शपथ ग्रहण से पहले पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट वाले घर के बाहर सीआरपीएफ तैनात कर दी गई। कहीं वह कोई नया नाटक (विरोध) न खड़ा कर दें। लाचार, बेबस और एक असहाय महिला की तरह अपने ही घर में कैद! सियासत और सत्ता का अजीब खेल है!

याद करिए, ममता बनर्जी की सरकार में केंद्रीय अधिकारी भी उनके खिलाफ कार्यवाही करने में हिचकिचाते थे। दीदी के बिना एक पत्ता नहीं हिलता था। जबकि राज्य में लगातार अपराध बढ़ रहा था। कानून की धज्जियां उड़ाई जाती रहीं। घुसपैठियों की पौबारह थी। घर हो बाहर, यौन हिंसा और गुंडागर्दी चरम पर पहुंच गई। बलात्कार, हत्या और शोषण से लोग कराह रहे थे। आरजी कर कांड की चीख से तो पूरा देश सन्न रह गया। क्या-क्या नहीं हुआ पश्चिम बंगाल में! विकास का पहिया थम-सा गया।

लेकिन ममता दीदी अपनी ही बात करती रहीं। उनका एक ही एजेंडा था- बीजेपी को हरहाल में रोकना! वह भूल गईं कि सत्ता में बने रहने की उनकी हठधर्मिता एक दिन उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। वहीं हुआ, बीजेपी ने जनभावना और जनमानस को जगाकर दीदी के पूरी तरह खिलाफ कर दिया। लोगों ने ममता सरकार को नकार दिया। दीदी की न कुर्सी बची और न सरकार। अभिषेक बनर्जी की हकीकत भी सबके सामने आने लगी। टीएमसी सरकार खत्म हो गई। शनिवार को महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जनता जर्नादन को अब उनसे उम्मीद है कि बंगाल में डर का माहौल खत्म होगा और राज्य भरोसे व विकास के दौर की ओर बढ़ेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

नफ़रत की राजनीति, मुद्दों पर बात क्यों नहीं?

नफ़रत की राजनीति, मुद्दों पर बात क्यों नहीं?

जितेंद्र बच्चन



बिहार में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके बाद 2026 में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार शुरू होगा। बिहार में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) की सरकार है, जबकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और तमिलनाडु में DMK की सरकार है। जैसे-जैसे चुनाव पास आ रहे हैं, इन तीनों राज्यों के नेताओं के सुर बदल गए हैं। कल तक जो पार्टियां विकसित राज्यों, मजबूत भारत, संस्कृति और मूल्यों की बात करती थीं, वे अब धर्म और जाति को लेकर जहर उगल रही हैं। अपना वोट बैंक बचाने के चक्कर में सारा फोकस हिंदू-मुस्लिम मुद्दों पर आ गया है। मां, बहन और बेटियों तक के साथ बदसलूकी हो रही है। कितनी गंदी पॉलिटिक्स है! ज़रा सोचिए, इस माहौल में जो लोग जीतकर सत्ता में आएंगे, वे हमारा क्या भला करेंगे? आरोप-प्रत्यारोप की इस लड़ाई में कोई किसी से कम नहीं दिखना चाहता। हर नेता खुद को बेगुनाह बताता है, फिर भी उनकी जुबान पर काबू नहीं है।


हम कभी इंडिया के प्रोग्रेसिव वर्ल्ड लीडर होने की बड़ाई करते थे, लेकिन अब हम पावर के लिए नफरत फैलाने में अजेय हैं। आपकी जाति या धर्म कुछ भी हो, उन्हें वोट देना बहुत अच्छा है, वरना वे आपको एक मिनट में देशद्रोही कह देंगे! ऐसा लगता है कि उन्हें डेमोक्रेसी की कोई चिंता नहीं है; वे सिर्फ वोट के लिए आपका इस्तेमाल करना चाहते हैं। ऐसे बयान, भाषण और बातचीत आम हो गई हैं। क्या तुष्टिकरण बनाम पोलराइजेशन की पॉलिटिक्स हो रही है? लोगों और ज़मीन से जुड़े मुद्दे गायब हो रहे हैं। चाहे मोदी हों या राहुल गांधी, BJP हो या कांग्रेस, या दूसरी पार्टियां, कोई भी गरीबी, बीमारी, करप्शन, बेरोजगारी और महंगाई पर बात नहीं करता। चाहे रूलिंग पार्टी हो या अपोजिशन, सबकी एक ही पॉलिसी है: "हिंदू और मुसलमानों का डर दिखाकर अपना वोट बैंक सुरक्षित करो!"


हजारों घुसपैठिए, रोहिंग्या, वक्फ बोर्ड, और भी बहुत कुछ! वे पिछली सरकारों पर रोते रहते हैं। कोई उनसे पूछे, अगर आपको सब कुछ पता है, तो आप इसे खत्म क्यों नहीं करते? अब सरकार आपकी है, एडमिनिस्ट्रेशन आपका है, तो एक्शन क्यों नहीं होता? लेकिन कोई पूछता नहीं, और कोई एक्शन नहीं होगा, क्योंकि अगर सब ठीक रहा तो पॉलिटिक्स कैसे चलेगी? हर पार्टी या ग्रुप एक ही बात बताता है: हमारा पिछड़ापन, इलाके में डेवलपमेंट की कमी, सड़कों की कमी, और करप्शन पर कंट्रोल की कमी, ये सब पिछली सरकार (चाहे कांग्रेस हो, BJP हो, या कोई और पार्टी) की वजह से है। यह एक अच्छा बहाना है। लेकिन वे अपने अंदर झाँककर भी नहीं देखते कि अब आप पावर में हैं। तो करप्शन अपनी हद तक क्यों पहुँच रहा है? सारे कानूनी सुधारों के बावजूद बहन-बेटियाँ असुरक्षित क्यों हैं? सब कुछ ऑनलाइन होने के बावजूद ब्यूरोक्रेसी में रिश्वतखोरी क्यों बढ़ रही है?


असल में, सबका मकसद एक ही है! अगर लोग धर्म से डरेंगे तो वे उन्हें वोट देंगे, और उनकी सरकार बनना तय है। लेकिन सवाल यह उठता है कि वे कब तक हिंदू-मुसलमानों का डर दिखाकर वोट बटोरते रहेंगे? कब तक वे धर्मों को खतरे में दिखाकर जनता को बेवकूफ बनाते रहेंगे? एक तरफ वे पढ़े-लिखे समाज का नारा लगाते हैं, तो दूसरी तरफ पुरानी सोच वाली बातें करते हैं। वे नफरत की दुकान खोलते हैं और समाज को डराने की कोशिश करते हैं। यह नफरत से भरा पॉलिटिकल धंधा कब तक चलेगा? जवाब साफ है: जब तक हम, आपकी तरह, उनके कस्टमर बने रहेंगे। पॉलिटिक्स के रखवालों! हमें डराकर धोखा मत दो! सत्ता के लिए डेमोक्रेसी का रास्ता अपनाओ, जनता तुम्हारी बहुत इज्ज़त करेगी।

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं।)

 


गुरुवार, 19 जून 2025

 कुशल चिकित्सक बनने के लिए इच्छाशक्ति जरूरी

एक कुशल डॉक्टर होने के साथ-साथ अच्छे व्यक्तित्व के धनी और सामजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना गाजियाबाद के डॉ. एम. के. सिंह की पहचान है। इन्हीं कई मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र बच्चन ने बुधवार, 18 जून 2025 को फ्लोरेंस अस्पताल के डायरेक्टर चेंबर में उनसे बातचीत की। आप भी जानिए उनकी खूबियां-

डॉक्टर को मरीज ही नहीं भगवान समझते, समाज भी इन्हें ईश्वर का ही दर्जा देता है। हमारे आसपास ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब डॉक्टर ने मरीज को नई जिंदगी दी हो। एक डॉक्टर मरीज को ठीक करने के लिए दिन-रात एक कर देता है। गाजियाबाद के डॉ. एम. के. सिंह उन्हीं में से एक हैं। एक कुशल चिकित्सक होने के साथ-साथ अच्छे व्यक्तित्व के धनी और सामजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना आपकी पहचान है। इन्हीं कई मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र बच्चन ने बुधवार, 18 जून 2025 को फ्लोरेंस अस्पताल के डायरेक्टर चेंबर में डॉ. एम. के. सिंह से बातचीत की। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश:
आप डॉक्टर ही क्यों बने?
हमारी शुरू से ही सेवाभाव की भावना रही। डिग्री लेकर डॉक्टर तो कोई भी बन सकता है लेकिन एक अच्छा चिकित्सक आप तभी बन सकते हैं जब अंदर से इच्छाशक्ति हो। आप को तो पता है, कोविड के समय में कई डॉक्टरों ने अपना क्लीनिक तक बंद कर दिया था। कोविड के मरीज को हाथ लगाना तो दूर, उनसे बात तक नहीं करते थे। जबकि हम 25 से 30 मरीज रोजाना देखते थे। कुछेक तो ऐसे मरीज होते थे जिनके उपचार के साथ-साथ उनके परिवार के लिए राशन-पानी की भी व्यवस्था हमने की है। एक डॉक्टर कभी रिटायर नहीं होता।
क्या एक मरीज के प्रति दवा से ज्यादा डाक्टर का व्यवहार उसे स्वस्थ करने में सहायक होता है?
जी, जाहिर-सी बात है। एक डॉक्टर को अपने मरीज की अच्छी देखभाल करना बहुत ज़रूरी है। यह केवल मरीजों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह डॉक्टरी पेशे का एक नैतिक दायित्व भी है। इसलिए हर डाक्टर को मरीजों के साथ सहानुभूति और सम्मान से पेश आना चाहिए।
बरसात का मौसम गया है। ऐसे में संक्रमण ज्यादा होता है। क्या सलाह देंगे?
बरसात का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है, वहीं स्वास्थ्य संबंधी कई चुनौतियां लेकर भी आता है। इस मौसम में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, लेप्टोस्पाइरोसिस, टाइफाइड, हैजा, वायरल बुखार, हेपेटाइटिस , इन्फ्लूएंजा (फ्लू) आदि से लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस मौसम में साफ-सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिए। नमी से बचाव करें। लेकिन खुद से किसी बीमारी का निदान करें और ओवर--काउंटर दवा लेने से भी बचें। अगर आपको किसी भी लक्षण का अनुभव होता है, तो तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लें।
तब भी बीमारियां हैं कि पीछा नहीं छोड़ती! आखिर क्या कारण है?
इसका एक मुख्य कारण है हमारी बदलती जीवनशैली। हम शारीरिक गतिविधियों से दूर होते जा रहे हैं। हमारे खानपान की आदतें ठीक नहीं हैं। व्यायाम कभी नहीं करते हैं। किसी किसी प्रकार का तनाव होता है और कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं। मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और कैंसर जैसी बीमारियां आजकल सामान्य होती जा रही हैं।
आखिर हम इन बीमारियों से कैसे बच सकते हैं?
इन बीमारियों से बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि आप हमेशा हर मामले में जागरूक रहें। स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर, जैसे कि संतुलित आहार लेना, नियमित रूप से व्यायाम करना और तनाव से दूर रहना। नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच करवाएं और किसी भी बीमारी के लक्षणों को अनदेखा करें।
आजकल लोग मोबाइल से भी बीमार हो जा रहे हैं। क्या सलाह देंगे?
हर 15 मिनट में मोबाइल देखने से ब्रेक लें। मोबाइल का प्रयोग करते समय अपनी पीठ सीधी रखें और आंखों के स्तर पर मॉनिटर रखें। बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) के बजाय, कूल्हे और कमर का अनुपात देखें, यह जोखिम कारकों को समझने में मदद करता है। वजन कम करें। व्यायाम करना दिनचर्या में शामिल करें। गर्दन और पीठ दर्द से बचने के लिए मोबाइल का उपयोग करते समय गर्दन को हमेशा सीधा रखें, बीच-बीच में ब्रेक लें और सोने के लिए सही तकिया का उपयोग करें।
आप फ्लोरेंस अस्पताल संचालित करते हैं। सरकार या गाजियाबाद जिला प्रशासन से कोई शिकायत है आपको?
नहीं। हमारा मानना है कि अगर आप अच्छा और सही काम कर रहे हैं तो सरकार कभी किसी को डिस्टर्व नहीं करती। फ्लोरेंस अस्पताल स्वास्थ्य से जुड़े सभी नियम-कानून का पालन करता है। हर मानक के तहत हमारा काम होता है।
एक आखिरी सवाल! पिछले दिनों आपके अस्पताल कोएक्सीलेंस अवार्ड्स 2025’ से नवाजा गया। कैसा महसूस करते हैं, आप?
देश की प्रतिष्ठित संस्थासमाज कल्याण फेडरेशन ऑफ इंडियाने यह सम्मान दिया है। हमारे लिए सम्मानित होना गौरव की बात है। चिकित्सक या अस्पताल कोई भी हो, इस तरह के सम्मान से मनोबल बढ़ता है। उन्हें और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है। यह अवसर जीवन में बार-बार नहीं आता। हमारे लिए यह एक यादगार क्षण था।एक्सीलेंस अवार्ड्स 2025’ जैसा सम्मान पाकर हम अभिभूत हैं।