बुधवार, 3 जुलाई 2013

आत्महत्या के मामले में जबलपुर अव्वल



एक भयावह सच! एक अनचाही और अनपेक्षति मौत! हंसते-खेलते जीवन का त्रासद अंत। चौंकाने वाले आंकड़े और आंकड़ों से उठती चीख! जबलपुर में साल भर में 572 लोगों ने खत्म कर ली जिंदगी। 63 फीसदी का इजाफा! क्यों बढ़ रही है यहां खुद को खत्म करने की खौफनाक प्रवृत्ति?


जितेन्द्र बच्चन
-ओमती थाना के चौथा पुल स्थित माता गुजरी महाविद्यालय के छात्रावास में बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा जेसिका केल्स ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। इसी थाने के होटल अरिहंत में ठहरी युवती मनीषा दास (31) ने आत्महत्या कर लिया।
-मझौली थाना क्षेत्र में एक महिला ने दांत दर्द से निजात पाने के लिए आत्मदाह कर लिया।
-गढ़ा थाना क्षेत्र के बदनपुर निवासी महारानी लक्ष्मी कन्याशाला की 12वीं की छात्रा गायत्री कोल (17) ने खुद पर कैरोसिन डालकर आग लगा ली।
-साइंस कॉलेज के चौकीदार ने फांसी लगाकर जान दे दी।
-केंद्रीय कारागार जबलपुर में एक कैदी ने चादर को फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली।

ये घटनाएं रोंगटे खड़ी करने वाली हैं। फांसी, जहर, आग और भी न जाने क्या-क्या नए-पुराने तरीके जबलपुर में मौत को गले लगाने के लिए आजमाएं जा रहे हैं। खुदकुशी की खबरों की जिले में बाढ़-सी आ गई है। कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब कहीं न कहीं से आत्महत्या की खबर न मिलती हो। शहर ही नहीं, गांव और कस्बों में भी लोग अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली है। देश के 53 प्रमुख शहरों में आत्महत्या के मामले में जबलपुर सबसे आगे है। वर्ष 2012 में यहां 572 लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। जबकि 2011 में 351 लोगों ने आत्महत्या की थी। यानी 63 फीसदी का इजाफा। कारण आर्थिक तंगी, बीमारी, कर्ज का बढ़ता बोझ, एकल परिवार और हताशा है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन ये घटनाएं सोचने को मजबूर करती हैं कि कहीं हमारा सामाजिक ताना-बाना बिखर तो नहीं गया? क्या इनके लिए उम्मीद की छोटी-सी लौ भी नहीं बची थी कि इतने लोगों ने जिंदगी से इस तरह मुंह मोड़ लिया?

दरअसल, जीवन के बदले तौर-तरीकों ने भी बच्चों और युवाओं में सहनशीलता कम कर दी है। अभिभावकों ने कहीं जाने से रोका या कभी पैसे देने से इंकार कर दिया या फिर उनकी किसी मांग को पूरा करने में असमर्थता जताई, तो अक्सर ऐसे बच्चे गुस्से में आत्महत्या जैसे भयानक कदम उठा लेते हैं। इस मामले में प्रेमी भी पीछे नहीं रहते। प्रेमी या प्रेमिका ने ठुकरा दिया या धोखा दिया, तो इसका समाधान अक्सर वे जीवन से मुंह मोड़ने में ही पाते हैं। सोचने की बात तो यह है कि आत्महत्या एक इंसान की नहीं होती, बल्कि उसके साथ जुड़े परिवार की भी होती है जो जीते जी मर जाते हैं। मौत को गले लगाने से कोई समस्या नहीं सुलझती, बल्कि अचानक कुदरत का नियम तोड़ने से हो सकता है कि आप और आपका परिवार पहले से अधिक अंजानी और अजीब समस्याओं के भवरजाल में उलझ जाए। जरूरत है सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझते महिलाओं और बच्चों को एक सही दिशा की। क्योंकि कानून बनाना ही काफी नहीं, संवेदनशीलता का होना भी जरूरी है। 
विलुप्त हो रही सहनशक्ति
भारतीय मानस पहले इतना कमजोर कभी नहीं था, जितना अब दिखाई पड़ रहा है। कम सुविधा व सीमति संसाधन में भी संतोष और सुख से रहने का गुण इस देश की संस्कृति में रचा-बसा है। इसका सबसे बड़ा आधार हमारी आध्यात्मिकता रही है। आम भारतीय की सोच ईश्वर में विश्वास कर हर परिस्थिति में हिम्मत और धैर्य रखने की है। जैसे-जैसे लक्जरी ने जरूरतों का रूप धारण करना आरंभ किया है। आर्थिक उदारीकरण और टेक्नोलॉजी ने चारों दिशाओं में पंख पसारे हैं, वैसे-वैसे तेजी से एकसाथ सब कुछ हासिल करने की लालसा भी तीव्रतर हुई है। साधन और सुविधा पर सबका समान हक है, मगर उस हक को पाने में क्यों कुछ लोगों को सबकुछ दांव पर लगा देना पड़ता है और क्यों कुछ लोगों के लिए वह मात्र इशारों पर हाजिर है? जीवन स्तर की यह असमानता ही सोच और व्यक्तित्व को कुंठित बना रही है। जबकि सोच की दिशा यह होनी चाहिए कि मेहनत और लगन से सबकुछ हासिल करना संभव है, बशर्ते धैर्य बना रहे। लेकिन विडंबना यह है कि समय के साथ सहनशिक्त और समझदारी विलुप्त हो रही है। 
बेमानी लगते हैं नाते-रिश्ते
बदलते दौर में टीवी-संस्कृति ने परस्पर संवाद को कमतर किया है। परिणामस्वरूप माता-पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं बचा है। यह स्थिति दोनों तरफ है। आज का किशोर और युवा भी व्यस्तता से त्रस्त है। कंप्यूटर-टीवी ने खेल संस्कृति को डसा है। आउटडोर गेम्स के नाम पर बस क्रि केट बचा है। टीम भवना विकिसत करने वाले, शरीर में स्फूर्ति प्रदान करने वाले और खुशी-उत्साह बढ़ाने वाले खेल अब विलुप्त हो रहे हैं। यही वजह है कि न बाहरी रिश्तों में सुकून है न घर के रिश्तों में शांति। दोस्ती और संबंधों का सुगठित ताना-बाना अब उलझता नजर आ रहा है। कल तक जो संबल और सहारा हुआ करते थे, वे आज बोझ और बेमानी लगने लगे हैं।
अपने आपमें सिमटते युवा
देश की युवा शक्ति आज के हांफते-भागते दौर में अस्त-व्यस्त और त्रस्त है या फिर अपनी ही दुनिया में मस्त है। आत्मकेंद्रित युवा अपने सिवा किसी को देख ही नहीं रहा है। जब उसे पता ही नहीं है कि दुनिया में उससे अधिक दुखी और लाचार भी हैं, तो वह अपने दुख-तकलीफों को ही बहुत बड़ा मान लेता है। घर आने पर कोई उससे यह पूछने वाला नहीं है कि उसके भीतर क्या चल रहा है। हर कोई टीवी की तरह   अपनी दिनचर्या निर्धारित करने में लगा है। किसे फुरसत है अपने ही आसपास टूटते-बिखरते अपने ही घर के युवाओं को जानने-समझने की। उनकी भावनात्मक जरूरतों और वैचारिक दिशाओं की जांच-पड़ताल करने की? ऐसे में एक दिन जब वह आत्मघाती कदम उठा लेता है, तो पता चलता है कि ऊपर से शांत और समझदार दिखने वाला युवा भीतर कितना आंधी-तूफान लिए जी रहा था। वास्तव में माता-पिता को समय के साथ बदलना होगा। कब तक सारी की सारी अपेक्षाएं संतान से ही की जाती रहेंगी। ढेर सारे सामाजिक दबाव, सारी जिम्मेदारियां उसी की क्यों? सारे समझौते वही क्यों करें? दबाव की इस स्थिति को मां-बाप, निकट के रिश्तेदार और मित्र ही अगर चाहें, तो बड़ी कुशलता से निपटा सकते हैं।
जिंदगी से बड़ी कोई तकलीफ नहीं
समाधान कहीं और से नहीं हमारे ही भीतर से आएगा। खुद को खत्म कर देने की बात जब आती है, तो दूसरों को दोष देने में थोड़ा संकोच होता है। वास्तव में हम स्वयं ही हमारे लिए जिम्मेदार होते हैं। कोई भी दु:ख या तकलीफ जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा दौर आता है जब सबकुछ समाप्त-सा लगने लगता है, लेकिन इसका यही तो सार नहीं कि खुद ही खत्म हो जाएं। हर आत्महत्या करने वाले को एक बार, सिर्फ एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या उसकी जिंदगी सिर्फ उसी की है? इस जिंदगी पर कितने लोगों का कितना-कितना अधिकार है? क्या वह जानता है कि उसकी मौत के बाद उसका परिवार कितनी-कितनी बार मरेगा? जिस पर इतने सारे लोगों का हक है, उसे खत्म करने का हमें कोई हक नहीं है। वैसे भी रोशनी की एक महीन लकीर जब अंधेरे को चीर सकती है। एक तिनका डूबते का सहारा बन सकता है और एक आशा भरी मुस्कान निराशा के दलदल से बाहर निकाल सकती है, तो फिर भला मौत को वक्त से पहले क्यों बुलाया जाए? जिंदगी परीक्षा लेती है तो उसे लेने दीजिए, हौसलों से आप हर बाजी जीतने का दम रखते हैं, यह विश्वास हर मन में होना चाहिए।
10 हजार 861 किसानों ने लगाया मौत को गले
भाजपा के आठ साल के शासन में 10 हजार 861 से अधिक किसानों ने की खुदकुशी। देश के किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्य प्रदेश चौथे नंबर पर पहुंच गया है। किसी भी सरकार के लिए इससे अधिक शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता है कि उसके नागरिक राज्य की नीतियों के कारण आत्महत्या को मजबूर हों। मध्य प्रदेश की सरकार ‘थोथा चना बाजे घना’ की तर्ज पर राज कर रही है। राज्य अब दूसरा विदर्भ बनने के कगार पर है। मुख्य वजह किसानों की आर्थिक तंगी, कर्ज का बढ़ता बोझ और परिवार है। रोजगार के सीमित साधन,बढ़ती महंगाई,घटती आय लोगों का सुख-चैन छीन रहे हैं। ऐसे में बढ़ती महत्वकांक्षाएं, पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों के निर्वहन पर भारी साबित हो रही है। ये तमाम हालात व्यक्ति को तनाव व अवासादग्रस्त बनाते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में हर रोज 18 लोग आत्मघाती कदम उठा कर मौत को गले लगा रहे हैं। बीते साढेÞ चार माह में 2541 लोगों ने आत्महत्याएं की हैं, जिनमें 205 किसान व 95 खेतिहर मजदूर हैं। राज्य विधानसभा के मौजूदा पावस सत्र में कांग्रेस विधायक राम निवास रावत के सवाल के जवाब में गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने समाज की इस हकीकत का बयान करते हुए कहा कि एक मार्च 2012 से 15 जुलाई तक राज्य में 2541 लोगों ने आत्महत्याएं की हैं। इस तरह 135 दिनों में हर रोज औसतन 18 लोगों ने मौत को गले लगाया है। गृहमंत्री के जवाब के मुताबिक, इस अवधि में सागर जिले में सबसे ज्यादा 172 लोगों ने मौत को गले लगाया। दूसरे स्थान पर इंदौर है, जहां 158 लोगों ने जान दी। सतना में 153, भापाल में 130 और जबलपुर में 113 आत्महत्या के प्रकरण सामने आए हैं।
खतरनाक रूप से बढ़ रही इस नकारात्मकता ने अचानक सभी को चिंता में डाल दिया है। आखिर क्यों बढ़ रही है खुद को खत्म करने की यह खौफनाक प्रवृत्ति? क्यों होती जा रही है स्थिति विकराल? किसानों के मामले में समस्याएं बेहद स्पष्ट लेकिन ढेर सारी हैं। यूं तो परेशानी और पीड़ा की वजह गरीबी अपने आप में एक अहम वजह है, लेकिन आए दिन किसानों को फसल चौपट होने से लेकर कर्ज न चुका पाने जैसी भीषण दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कभी योजनाओं के नाम पर सरकारी छल-कपट के शिकार होते हैं किसान, तो कभी अनाज के खरीद-बिबिक्री में हुए घोटालों के कारण व्यथित होते हैं। ऐसे में उन्हें एक ही रास्ता आसान लगता है- मौत का।
मध्य प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रु पये का कर्ज है। वहीं प्रदेश में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या 32,11,000 है। म.प्र. के कर्जदार किसानों में 23 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि है और 4 हेक्टेयर भूमि वाले कृषकों पर 23,456 रु पये कर्ज चढ़ा हुआ है। कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश के 50 फीसदी से अधिक किसानों पर संस्थागत कर्ज चढ़ा हुआ है। किसानों के कर्ज का यह प्रतिशत सरकारी आंकड़ों के अनुसार है, जबकि किसान नाते-रिश्तेदारों, व्यवसायिक साहूकारों, व्यापारियों और नौकरीपेशा से भी कर्ज लेते हैं। इस आधार पर राज्य के 80 से 90 फीसदी किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि समर्थन मूल्य मूल उत्पादन की औसत लागत से 50 फीसदी अधिक होना चाहिए। प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के किसानों से 50 हजार रुपये कर्ज माफी का वादा किया था, लेकिन प्रदेश सरकार ने उसे भुला दिया। यदि समय रहते खेती-किसान दोनों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं और बढेंÞगी और मध्य प्रदेश भी विदर्भ की तरह मुंह ताकता रह जाएगा।

खुदकुशी पर सियासत नहीं होनी चाहिए 
आत्महत्या किसी की भी हो, तकलीफदेह होती है। यह एक प्रदेश की समस्या नहीं है। जापान, कोरिया सहित देश के अन्य प्रांतों में भी इस तरह की घटनाएं होती हैं। कुछ राज्यों में तो इसके आंकडेÞ यहां से ज्यादा हैं। इस विषय को राजनीतिक रूप देने की कोशिश की जा रही है, जो ठीक नहीं है। आत्महत्या के कारण मनोवैज्ञानिक होते हैं। उन्हें दूर करने के प्रयत्न किए जाएंगे।
-शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री

मुख्य कारण पारिवारिक कलह
जबलपुर में इधर हुई अधिकतर आत्महत्याओं की खास वजह पारिवारिक कलह रही है। दरअसल, संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। पति-पत्नी के बीच विवाद होने पर उनमें बीच-बचाव करने वाला कोई नहीं होता। कलह बढ़ते ही लोग खुदकुशी करने तक के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरा कारण एकल परिवार है, जिसके चलते लोग खुदकुशी करने को मजबूर हो जाते हैं।
-हरिनारायणचारी मिश्र, पुलिस अधीक्षक, जबलपुर

बुधवार, 19 जून 2013

मिली खाक में मोहब्बत


महविश ने मोहब्बत क्या की, जमाना दुश्मन बन गया। शौहर को गोलियों से भून डाला। ससुर को पेड़ से लटका कर मार डाला। जेठ जिंदा जल गया। सितम पर सितम होता रहा उस पर। कोई सामने नहीं आया। न परिवार, न समाज और न ही सरकार! आखिर प्यार करने की सजा कब तक भूगतेगी महविश? समाज के ठेकेदार उसे कब तक देते रहेंगे मोहब्बत की सजा? पहले कटघरे में परिवार और खाप पंचायत थी। अब पुलिस है!



जितेन्द्र बच्चन
उत्तर प्रदेश पुलिस का एक और कारनामा! बुलंदशहर कोतवाली के इंस्पेक्टर पर लगा महविश और उसके परिवार को आत्मदाह करने के लिए उकसाने का आरोप! वाकया 12 जून 2013 का है। शौहर के कातिलों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रही महविश और उसके परिवार के सात सदस्यों ने पुलिस की मौजूदगी में मिट्टी का तेल छिड़ककर आत्मदाह करने की कोशिश की। महविश का जेठ यूसुफ 98 फीसदी जल गया। बाकी के सदस्य बचा लिए गए, लेकिन यूसुफ को डॉक्टर नहीं बचा पाए। दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में 14 जून को उसकी मौत हो गई। महविश और उसके परिवार का आरोप है कि थाना कोतवाली (देहात) बुलंदशहर के इंस्पेक्टर आरबी यादव ने परिजनों को धमकाते हुए महविश पर ही पति की हत्या का आरोप लगाया। यह इल्जाम महविश और उसके परिजन सह नहीं पाए। न्याय पाने की उम्मीद टूट गई, तो सामूहिक रूप से मौत को गले लगाना ही अच्छा समझा। इस पर इंस्पेक्टर को तरस नहीं आया। उसने यूसुफ को माचिस देते हुए कहा, ‘लो, लगा लो आग। तुम लोगों के मरने से ही पुलिस और सरकार को राहत मिलेगी।’

बड़ी दर्दनाक दास्तां है महविश की। करीब 11 साल की उम्र में पड़ोस के लड़के अब्दुल हकीम से दिल लगा बैठी। नादान थी, अल्हड़ बाला। उसे क्या पता था कि उसकी मोहब्बत का एक रोज यह जमाना दुश्मन बन जाएगा। छठीं में पढ़ती थी महविश और हकीम 8वीं क्लाश में था। प्यार का ढाई अक्षर कब उनके दिल में अंकुरित हो गया, पता ही नहीं चला। मन ही मन चाहने लगे दोनों एक-दूसरे को। कोई ऐसा लम्हा नहीं था जब महविश ने हकीम को महसूस न किया हो। एक रोज दिल की बात होंठों पर आ गई। महविश ने अपनी चाहत का इजहार कर दिया। हकीम ने भी धीरे से उसके अधरों को छूकर कबूल कर लिया। दोनों का इश्क परवान चढ़ने लगा, लेकिन महविश के वालिदानों को यह रिश्ता किसी कीमत पर मंजूर नहीं था। अम्मी ने तालीम बंद करवाकर बेटी को घर में कैद कर दिया। तब महविश आठवीं में थी। उसके इश्क पर पहरा बिठा दिया गया और प्यार पर तमाम बंदिशें लगाई जाने लगीं।

हकीम उन दिनों बुलंदशहर के एक इंटर कॉलेज में दाखिला ले चुका था। दोनों का मिलना-जुलना बंद हो गया। करीब पांच साल गुजर गए, लेकिन उनके दिलों की धड़कन एक-दूसरे के लिए जारी थी। अम्मी को भनक लगी, तो उनकी सलाह पर महविश की खाला के लड़के के साथ वालिदानों ने उसका रिश्ता पक्का कर दिया। महविश को तब पता चला, जब गली-मोहल्ले में भी शादी के कार्ड बंटने लगे। उसकी पेशानी पर बल पड़ गए। भवे तन गई, यह तो जोर-जर्बदस्ती है! हकीम से मिलने के लिए छटपटाने लगी महविश। शादी से चंद दिनों पहले 28 अक्टूबर 2010 की रात दो बजे बड़ी मुश्किल से उससे मिलने का मौका मिला। हकीम ने महविश को देखते ही अपनी बाहों में समेट लिया, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता महविश। मैं अपनी जान दे दूंगा या फिर तुम्हें कत्ल कर दूंगा।’ महविश का आंखें भर आर्इं, ‘नहीं हकीम, मोहब्बत में खून-कत्ल कायर करते हैं। चलो, यहां से कहीं दूर चलते हैं। हम अपना एक नया आशियाना बसाएंगे।’

और 29 अक्टूबर की रात साढ़े आठ बजे महविश और हकीम घर-गांव छोड़कर भाग गए। दोनों अलीगढ़ पहुंचे। वहां हकीम का एक दोस्त रहता था। उसकी मदद से 7 नवंबर, 2010 को दोनों ने अलीगढ़ में कोर्ट मैरिज कर ली। इसके बाद 15-20 रोज वहीं रहे, फिर रोजी-रोजगार की तलाश में मेरठ चले गए। वहां तालपुरी के एक मोहल्ले में 11 नवंबर को काजी ने महविश और हकीम का निकाह करवा दिया। अब सामाजिक तौर पर भी उन्हें पति-पत्नी की तरह जिंदगी गुजारने की इजाजत मिल गई थी। जिंदगी हसीन हो उठी, लेकिन नौकरी-चाकरी न मिलने के कारण परेशानी अभी कम न हुई थी। मेरठ में थोड़े दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद फरवरी 2011 में दोनों दिल्ली चले गए। वहां सीलमपुर इलाके में किराए पर एक छोटा-सा कमरा लेकर रहने लगे। पास में जो जमा-पूंजी थी, वह पहले ही खर्च हो चुकी थी। दो जून की रोटी के जुगाड़ में हकीम ने अपनी मोटरसाइकिल भी बेच दी। उसके बाद 100 रुपये रोजाना पर आॅटो चलाना शुरू किया।

उधर अड़ौली गांव में महविश की हकीकत का पता परिजनों को चला, तो पैरों तले से जमीन सरक गई। दोनों के घरवाले एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। 31 अक्टूबर को महविश की बारात आनी थी। नाते-रिश्तेदारों से घर भरने लगा। जाति-विरादरी के लोगों का भी आना-जाना बढ़ गया। अंत में शादी की भीड़ ने पंचायत का रुख अख्तियार कर लिया। महविश के घरवालों ने हकीम के परिवार पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। हकीम और उसके परिजनों के खिलाफ महविश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस हकीम को कुत्ते की तरह खोजने लगी। परेशान होकर महविश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली। उच्च न्यायालय ने बुलंदशहर पुलिस को महविश, उसके पति और परिवार को सुरक्षा देने का आदेश दिया, लेकिन पुलिस ने हाईकोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं की और इन दोनों को थाना कोतवाली से भगा दिया। इससे महविश के परिजनों के हौसले बुलंद हो गए। अड़ौली गांव के दो दर्जन लोगों ने पंचायत कर हकीम के पिता मोहम्मद लतीफ को पेड़ से उलटा लटका दिया और उन्हें खूब मारा-पीटा। उनकी मौत हो गई। इसके बाद खाप पंचायत ने फरमान जारी कर दिया कि हकीम को जो भी गोली से मारेगा, उसे 50 हजार रुपये का नकद इनाम दिया जाएगा। तब भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि पेड़ से लटकाने व मार-पीट के कारण हुई लतीफ की मौत को साधरण मौत बताकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

21 जुलाई, 2011 को महविश ने एक बेटी को जन्म दिया। उसका नाम मनतशा है। इसी दौरान हकीम के एक दोस्त ने उसे पहाड़गंज के एक एनजीओ ‘लव कमांडो’ के चेयरमैन संजय सचदेव से मिलवाया। महविश ने उन्हें सारी कहानी बताकर मदद की फरियाद की। सचदेव ने बुलंदशहर के तत्कालीन एसएसपी राजेश कुमार राठौर से बात की। राठौर ने थाना कोतवाली (देहात) पुलिस को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने का सख्त आदेश दिया। साथ ही खाप पंचायत के फरमान से लड़ने के लिए उस समय चल रहे अभीनेता आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ के पांचवें एपिसोड में महविश की कहानी बताकर उसकी सुरक्षा की मांग की गई।

14 जुलाई, 2012 को महविश बुलंदशहर के पुलिस अधीक्षक (देहात) विजय गौतम से मिली और शौहर तथा परिवार की सुरक्षा के लिए गुहार लगाई। महविश इसी दौरान दोबारा मां बनने वाली थी। पुलिस ने उसके साथ सहानुभूति दिखाई। हकीम को भी यकीन हो गया कि अब परिस्थितियां बदलेंगी। वह 18 जुलाई को महविश को लेकर घर (भाटगढ़ी) लौट आया। उस समय तक हकीम कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियरिंग का कोर्स कर दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा था, इसलिए महविश को घर छोड़कर वह फिर दिल्ली चला गया। बाद में नवंबर 2012 में आया।

22 नवंबर की शाम चार बजे महविश के सिर में दर्द हो रहा था। हकीम उसे घर के पास ही एक डॉक्टर के यहां ले गया। वहां से दवा लेकर दोनों जैसे ही बाहर निकले, आधा दर्जन लोगों ने हकीम को घेरकर उस पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। उसकी मौके पर ही मौत हो गई। महविश कुछ नहीं कर सकी। जिसे इतना चाहा, उसे अपने ही परिवार को लोग भून डालेंगे, उसने सपने में भी नहीं सोचा था। पुलिस ने भी कोई सुनवाई नहीं की। अपनी और हकीम की सुरक्षा के लिए वह कुल 48 अर्जियां दे चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अंत में हकीम की हत्या कर दी गई। महविश की तहरीर पर थाना कोतवाली (देहात) के तत्कालीन कोतवाल राकेश कुमार ने हत्या के इस मामले को पांच आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाकर घटना की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गुलाब सिंह को दी। उनके निर्देश पर दो टीमें बनाई गर्इं और पुलिस ने तीन आरोपियों गुल्लू, आसिफ और सरवर को गिरफ्तार कर लिया।

आॅनर किलिंग के इस मामले की गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ी। नेताओं और महिला संगठनों की महविश की ससुराल में आने-जाने का दौर शुरू हो गया। दो अभिनेताओं ने आर्थिक मदद देने की घोषणा की। कुछ बड़े नेता जो झोझा समाज से ताल्लुक रखते हैं, वे भी सहानुभूति जताने लगे। मुख्यमंत्री की ओर से पांच लाख रुपये की मदद दी गई। साथ ही कुछ अन्य मदद की घोषणा महविश के बच्चों के भविष्य को देखते हुए की गई। यह अलग बात है कि वक्त के साथ वे सारी घोषणाएं भी ठंडे बस्ते में चली गर्इं। सरकार ने महविश को आवास, गैस एजेंसी, सरकारी पट्टे की जमीन और उसके परिवार की सुरक्षा के लिए हथियार के लाइसेंस देने की घोषणा भी की थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। पुलिस जरूर जांच करने के नाम पर परेशान करती रहती है। ताजा घटनाक्रम भी उसी का एक हिस्सा है।

9 जून, 2013 को महविश के शौहर अब्दुल हकीम के कथित हत्यारोपी गुल्लू की मां ने अपनी आठ साल की बेटी की पिटाई को लेकर थाना कोतवाली देहात में महविश, उसके जेठ यूसुफ समेत 6 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। यूसुफ को पता चला, तो उसने 12 मई को एसपी (सिटी) से मुलाकात कर थाना कोतवाली (देहात) के इंस्पेक्टर आरबी यादव की उनसे शिकायत की, ‘कोतवाल यादव आरोपियों के साथ मिलकर जबरन एक साजिश रच रहे हैं...।’ एसपी ने इंस्पेक्टर यादव को बुलाकर इस मामले में झाड़ लगाई। महविश के मुताबिक, एसपी की फटकार से इंस्पेक्टर यादव का पारा आसमान छूने लगा। वह पुलिस बल के साथ महविश के घर जा धमके। वहां उन्होंने काफी गाली-गलौज की। साथ आए पुलिसकर्मियों का गुस्सा उनसे भी ज्यादा नजर आ रहा था। धमकाते हुए कहा,‘पुलिस से उलझने की कोशिश मत करो, वरना दो-चार ऐसे मामले लाद (फर्जी मामले में फंसा) दूंगा कि जमानत के लिए तरस जाओगे। पूरा परिवार जेल में सड़ता नजर आएगा।’ महविश पुलिसवालों का फरेब सुनकर सन्न रह गई। यूसुफ ने हाथ जोड़कर कहा, ‘देखिए साहब, हमें धमकाने की कोशिश मत करिए। आप लोग भी कानून से ऊपर नहीं हैं। हमें न्याय नहीं मिलेगा तो हम आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन सितम पर सितम अब नहीं सहेंगे।’

इंस्पेक्टर यादव तिलमिला उठे। बताया जाता है, उन्होंने जीप से माचिस निकाली और यूसुफ के ऊपर फेंकते हुए कहा, ‘जान देना इतना आसान नहीं है। ये लो माचिस, लगा लो आग! है हिम्मत... मर जाओगे तो जान छूटेगी।’ और वे चले गए, लेकिन महविश और उसके परिवार को खुदकुशी के लिए उकसा गया। थोड़ी देर बाद ही महविश और उसके परिवार के सात अन्य लोगों ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाल लिया। यूसुफ के हाथ में माचिस थी, उसने खुद को आग के हवाले कर दिया। वह धू-धूकर जलने लगा। पूरे गांव में हड़कंप मच गया। महविश और उसकी बेटियों को बड़ी मुश्किल से बचाया गया, लेकिन यूसुफ 98 फीसदी जल चुका है। वह दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। पहले हकीम और अब यूसुफ की इस हालत पर महविश और उसका पूरा परिवार दहशत में है। महविश ने कोतवाल आरबी यादव को बर्खास्तग करने और एक स्थानीय नेता अमजद अली गुड्डू के खिलाफ इस मामले में कार्रवाई रकने की मांग की है।
वहीं, भटगढ़ी में एक बार फिर से अधिकारियों और नेताओं के आने-जाने का दौर शुरू हो गया है। ठीक वैसा ही नजारा बनता जा रहा है, जैसा साढ़े छह महीना पहले हाकिम की हत्या के बाद बना था। इधर जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ रहा है, मीडिया की मौजूदगी भी बढ़ती जा रही है। 14 जून, 2013 को पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय साहनी और एएसपी वैभव कृष्ण भटगढ़ी पहुंचे और पीड़ित परिवार से मिले। पुलिस अधिकारियों ने महविश से मुलाकात कर उसे भरोसा दिलाया कि पुलिस उनके साथ कुछ भी गलत नहीं होने देगी।

जारी है जिंदगी की जद्दोजहद
मेरे शौहर हकीम की हत्या का कारण हम दोनों की विरादरी रही है। मैं बुलंदशहर की झोझा विरादरी से ताल्लुक रखती हूं मेरे पति की विरादरी अल्वी (फकीर) है। मुस्लिम समाज में अल्वी विरादरी को झोझा विरादरी से कमतर आंका जाता है। चूंकि मैं झोझा विरादरी से ताल्लुक रखती थी और अल्वी विरादरी के लड़के के साथ भागकर निकाह कर लिया था, इसलिए मेरे पति को मौत के घाट उतार दिया गया। मेरा प्यार जरूर छीन लिया गया, लेकिन उसी प्यार के सहारे मैं अपनी दोनों बेटियों मनतशा और जोया के साथ जिंदगी जीने की जद्दोजहद कर रही हूं। गांव भटगढ़ी में कोई स्कूल नहीं है। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर मैं अपना खर्च चलाती हूं और बच्चों को शिक्षित भी कर रही हूं। यदि मुझे न्याय नहीं मिला, तो मैं प्रदेश सरकार द्वारा प्रदान की गई आर्थिक मदद लौटाने पर विचार कर सकती हूं।
-महविश (अब्दुल हकीम की बेवा)

एसएसपी से मांगी रिपोर्ट
मुझे घटना की जानकारी मिल गई है। एसएसपी से तत्काल रिपोर्ट मांगी गई है। देहात कोतवाली प्र•ाारी के आचरण की जांच की जाएगी और दोषी पाए जाने पर निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी।
-भवेश कुमार सिंह, आईजी, मेरठ जोन

परिजनों पर दर्ज होगा मामला?
घटनाक्रम के अुनसार इंस्पेक्टर आरबी यादव हत्यारोपी की शिकायत के एक मामले की जांच-पड़ताल करने महविश के घर गए, तो महविश और उसके जेठ यूसुफ ने इंस्पेक्टर से उल्टे अभद्रता की और इसके बाद परिवार के लोगों ने आत्मदाह करने की कोशिश की। इस पूरे प्रकरण की जांच चल रही है। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए चाहे आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज करना पड़े या फिर अंटेप्ट-टू-सुसाइड की रिपोर्ट लिखनी पड़े।
-गुलाब सिंह, एसएसपी, बुलंदशहर

गुरुवार, 6 जून 2013

भैया राजा को उम्रकैद


बुंदेलखंड का बाहुबली और इलाके में आतंक का पर्याय रहे रतनगढ़ी के भैया राजा पर 38 से ज्यादा संगीन आरोप हैं! उनमें से एक फैशन डिजाइनर वसुंधरा हत्याकांड में अदालत ने पवई के पूर्व विधायक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कौन है भैया राजा? क्या है उसके पापों की काली कहानी?


नब्बे के दशक में बुंदेलखंड में अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा की तूती बोलती थी। उन दिनों वह पवई विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहा था। चुनाव चिह्न हाथी था। भैया ने नारा दिया था- ‘मोहर लगेगी हाथी पर, नहीं तो गोली चलेगी छाती पर! लाश मिलेगी घाटी पर!’ बड़े-बड़े तुर्रम खां भैया राजा के नाम से कांपते थे। जिसने की हुक्मअदूली, उसे खिला दिया जिंदा मगरमच्छों को। चुनाव में जीत हुई। अकूत धन-संपदा के मालिक तो हैं ही, विधायक बनते ही इलाके में सरकार भी अपनी चलने लगी। पुलिस दारोगा की बात छोड़िए, केंद्र और राज्य के मंत्रियों में दम नहीं होता था कि भैया राजा के मुंह से निकली बात को पलट दें। कर्नल हो कैप्टन, हर कोई उसके खिलाफ जाने में सौ बार सोचता। रियासत नहीं रही तो क्या हुआ, राजाओं और नवाबों वाला रुतबा तो बरकरार ही था। उनकी हैसियत की समाजवादी पार्टी के मुखिया भी कायल रहे। 1993 में पवई (जिला पन्ना) से भैया राजा सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और विजयी रहे। उनकी पत्नी आशा रानी सिंह छतरपुर जिले के बिजावर विधासभा सीट से भाजपा की विधायक हैं, लेकिन कानून और अदालत के आगे किसी की नहीं चलती। कहावत भी है, देर से ही सही पर अत्याचार का अंत जरूर होता है। 30 मई को छतरपुर जिला के नवम अपर सत्र न्यायाधीश संजीव कालगांवकर ने इस बाहुबली और पूर्व विधायक भैया राजा को वसुंधरा हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। छतरपुर जिले के गहरवार में बनी भैया राजा की रतनगढ़ी हवेली में अब सन्नाटा पसर चुका है और परिजन मायूस हैं।

भैया राजा पर फैशन डिजाइनर व अपनी ही नातिन वसुंधरा का यौन-शोषण और उसकी हत्या करने का आरोप था। पुलिस ने इस मामले में कुल 36 गवाह अदालत में पेश किए। अदालत ने अपने 124 पृष्ठों के फैसले में भैया राजा, भूपेंद्र सिंह उर्फ हल्के, राम किशन उर्फ छोटू लोधी, अभमन्यु उर्फ अब्बू और पंकज शुक्ला उर्फ मरतंड शुक्ला को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद के साथ पांच-पांच सौ रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। जबकि इसी मामले की एक अन्य आरोपी रोहणी शुक्ला उर्फ रंपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
वसुंधरा उर्फ निशि बुंदेला (20) उन दिनों भोपाल में रहकर फैशन डिजायनिंग की पढ़ाई पूरी कर रही थी। भैया राजा के रिश्ते में वह उसकी भाजी लगती थी। उसी लिहाज से जब भी भैया राजा भोपाल जाते, वसुंधरा से जरूर मिलते। ऐसे में ही कहते हैं कि एक रोज उनकी नजर उस पर खराब हो गई। उसने वसुंधरा को तरह-तरह के उपहार आदि देकर उसे जल्द ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कभी-कभी छुट्टियों में अब वसुंधरा भी भैया राजा की छतरपुर वाली हवेली में आने लगी थी। मौका देखकर एक रोज वह शैतान बन गया। उसने अपनी भाजी को ही खराब कर डाला। न उम्र की परवाह की और न ही मान-मर्यादा के बारे में सोचा। भाजी के साथ भैया राजा के अवैध संबंधों का सिलसिला चल पड़ा। जब भी मौका मिलता, वह दबोच लेते। बेचारी लाज-भयवश किसी से कुछ कह नहीं पा रही थी। इसका भी भैया राजा ने बहुत फायदा उठाया। होश तब उड़ गए, जब एक रोज पता चला कि वसुंधरा गर्भवती है।

भैया राजा ने वसुंधरा से अबॉर्शन कराने को कहा, तो वह तिलमिला उठी, ‘कभी नहीं! तुमने जो पाप किया है, उसे अब मैं पूरी दुनिया के सामने लाकर रहुंगी। तुम्हारी यह झूठी आन-बान और शान मैं मिट्टी में मिला दूंगी। मैं तुम्हें समाज के सामने नंगा कर दूंगी।’ वसुंधरा का गुस्सा देखकर भैया राजा के पैरों तले से जमीन सरक गई। वह समझ गया कि अगर अभी इसका इलाज नहीं किया गया, तो वह वाकई बदनाम हो जाएगा। उसने जबरन वसुंधरा का गर्भवती करवा दिया, फिर उसकी हत्या की साजिश रचनी शुरू कर दी। भैया राजा के इस खूनी खेल में भूपेंद्र उर्फ हल्के, पंकज शुक्ला, राम किशन उर्फ छोटू, रंपी उर्फ रोहिणी और अ•िामन्यु शामिल थे। भूपेंद्र, अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा का जीप चालक था। रोहिणी भैया राजा के दत्तक पुत्र राम अवतार की बेटी है और वसुंधरा की सहेली थी। पंकज शुक्ला रोहिणी का पति है और अभिमन्यु भाई।
वसुंधरा को भैया राजा के इस संगीन षड्यंत्र की भनक तक नहीं लगी। योजना के अनुसार 10 दिसंबर, 2009 को रोहिणी भोपाल गई। वसुंधरा को फोन कर शॉपिंग करने के बहाने 10 नंबर मार्केट में बुलाया। वहां कुछ देर दोनों सहेलियां बाजार में घूमती-फिरती रहीं, फिर उसे बहला-फुसलाकर रोहिणी छतरपुर ले आई। यहां से वसुंधरा को रतनगढ़ी कोठी में पहुंचा दिया गया। पर कटे पंक्षी को फड़फड़ाते देखकर भैया राजा के होंठों पर मुस्कान फैल गई। उसके एक इशारे पर ड्राइवर भूपेंद्र ने उन्हीं की पिस्टल से वसुंधरा को गोली मार दी। बेचारी तड़पकर ठंडी पड़ गई, फिर सभी ने मिलकर वसुंधरा की रक्तरंजित लाश जीप में डाली और ठिकाने लगाने के लिए रात के अंधेरे में निकल पड़े।

11 दिसंबर की सुबह थाना मिसरोद पुलिस को किसी ने फोन कर सूचना दी कि गुदरी घाट स्थित रतन सिंह रोड के किनारे झाड़ियों के पास एक युवती का शव पड़ा है। पुलिस ने उसे बरामद कर शिनाख्त करवाई, तो हड़कंप मच गया। वह लाश निशि उर्फ वसुंधरा की थी। पुलिस की सूचना पर वसुंधरा के पिता मृगेंन्द्र सिंह और मां भारती भी आ गए, लेकिन यह कत्ल किसने और कहां किया? कातिल कौन है? उसका मकसद क्या था आदि के संबंध में पुलिस को कोई सुराग नहीं लगा। सभी हैरान-परेशान थे। पोस्टमार्टम के बाद वसुंधरा के अंतिम संस्कार के समय भी उसकी मां भारती इसी उधेड़बुन में लगी रही कि कातिल का चेहरा कैसे बेनकाब हो। उन्हें रोती-विलखती देखकर रोहिणी के भाई अभिमन्यु से नहीं रहा गया। उसने उनके कान में बता दिया कि भूपेंद्र ने अपने आका के कहने पर वसुंधरा को गोली मारी थी। इतना सुबूत बहुत था। पुलिस ने गहन छानबीन के बाद 20 दिसंबर को भैया राजा और इस कत्ल की साजिश में शामिल अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद वसुंधरा हत्या कांड का राज फाश होते देर नहीं लगी।

भैया राजा और अन्य आरोपियों ने लाख कोशिश की, लेकिन जमानत नहीं हुई। भैया राजा ने हाई कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया, तब भी सीखचों से बाहर नहीं आ सका। दरअसल, भैया राजा के गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। उस पर तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह के भतीजे सिद्धार्थ राव की हत्या करने का भी आरोप है। इस घटना को नैनीताल में अकबर अहमद डम्पी के बंगले में अंजाम दिया गया था। भैया राजा इस मामले में कई साल उत्तर प्रदेश की जेल में बंद भी रहा। उसी दौरान एमपी की सुंदर लाल पटवा सरकार ने भैया राजा की झील को नेस्तनाबूद कर दिया था। बताया जाता है कि भैया राजा अपने दुश्मनों को अपनी झील में फेंक देता था। उसमें मगरमच्छ पाल रखे थे, जो मिनटों में जिंदा आदमी की हड्डियां तक चट कर जाते थे। इसी वजह से तत्कालीन सुंदर लाल पटवा सरकार को उसकी झील को नेस्तनाबूद करना पड़ा था। इसके बाद मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती बनीं, तो उनके आदेश पर भी भैया राजा की झील और बंगले पर पुलिस अधिकारियों ने बड़ी कार्रवाई की थी। अपराध के आरोपों के मामले में भैया राजा की पत्नी और भाजपा विधायक आशा रानी सिंह भी पीछे नहीं हैं। उन पर अपनी नौकरानी तिज्जी बाई को मई 2007 में आत्महत्या के लिए विवश करने का आरोप है, जिसके चलते वह महीनों जेल में भी बंद रही हैं। अब जमानत पर हैं।

लेकिन भैया राजा एक ऐसा शातिर रहा है, जिसे गिरफ्तार करने में बड़े-बड़े पुलिस अफसर भी कांप जाते थे। दर्जनों अपराधों का इल्जाम है उस पर, किंतु कोई टीआई अपने थाने में उसकी फोटो गुंडा लिस्ट में लगाने की हिम्मत नहीं कर सका था। इसी मामले की विवेचना में लगे टीआई भूपेंद्र सिंह का अब तबादला हो चुका है, तब भी वह अदालत में भैया राजा के खिलाफ कुछ खास नहीं बोले। 18 मार्च 2010 को इस मामले की चार्जशीट पुलिस ने अदालत में पेश की थी। घटना के करीब चार साल बाद अदालत ने मामले का अब फैसला सुनाते हुए कहा है कि भैया राजा ने छतरपुर जिला स्थित रतनगढ़ी में वसुंधरा की हत्या की साजिश रची थी। उसकी लाश ठिकाने लगाने के लिए एक बोलेरो जीप का इस्तेमाल किया गया था। जीप से न केवल वसुंधरा के कानों के टाप्स बरामद हुए बल्किउसकी सीट के नीचे से कई और भी सुबूत मिले हैं। इस मामले के सभी आरोपियों को दोषसिद्ध होने के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है।

रतनगढ़ी हवेली में पसरा सन्नाटा
30 मई को अदालत का फैसला आने के बाद भैया राजा की रतनगढ़ी वाली हवेली में सन्नाटा पसर गया। जबकि छतरपुर अदालत परिसर छावनी में तब्दील हो चुका था। सुरक्षा-व्यवस्था के मद्देनजर यहां तीन सीएसपी और पांच थाना प्र•ाारियों के अलावा सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। फैसला सुनने के बाद विधायक आशा रानी सिंह बहुत मयूस दिखीं। बेटी रश्मि, दीप्ति और कंचन ने उन्हें सहारा दे रखा था। मां और तीनों बेटियों की आंखें भर आई थीं। दोनों बेटे भी अदालत में मौजूद थे, लेकिन सभी के चेहरे उतरे हुए थे। उप संचालक अभियोजन राजेश रायकवार ने बताया कि अभियोजन पक्ष इस मामले में आरोपी रंपी उर्फ रोहिणी को सजा दिलाने के लिए भी हाई कोर्ट में अपील करेगा।

उसके पाप की सजा कम
वसुंधरा के पिता मृगेंद्र सिंह का कहना है कि भैया राजा की साजिश ये थी कि वसुंधरा की लाश कलियासोत में फेंक दी जाए, ताकि उसकी शिनाख्त न हो सके। लेकिन आरोपी रास्ता •ाूल गए और सुबह होने के फेर में वे गुडारी घाट के पास झाड़ियों में लाश फेंक गए। वहीं मां भारती ने बताया कि हत्या से ठीक पांच दिन पहले उन्हें पता चला था कि भैया राजा मेरी बेटी का देह-शोषण करता रहा है। एक बार इंदौर ले जाकर उसका गर्भवती भी करवाया था, फिर जब उसे डर लगने लगा कि वसुंधरा उसे बेनकाब कर देगी, तो बदनामी के डर से भैया राजा ने उसकी हत्या करवा दी। उसने जो पाप किया है, उसके लिए उम्रकैद की सजा बहुत कम है।
-जितेन्द्र बच्चन

शनिवार, 1 जून 2013

                             शातिर हसीना

साउथ की मशहूर अदाकारा ने जिस्म को बनाया तरक्की का जरिया। एक साल में देश को लगा चुकी है कई सौ करोड़ का चूना। उसकी मादक अदाओं पर लिव-इन पार्टनर भी झाड़ता था रोब। लाल बत्ती लगी गाड़ी में बैठकर खुद को बताता था आईएएस। आलीशान कारों का जखीरा और 81 महंगी घड़ियां बरामद। कौन है यह अय्याश अभिनेत्री? क्या है उसके फरेब का फन?


एक हसीना, तो दूसरा शैतान! एक हीरोइन, तो दूसरा ठगी का कप्तान! एक के पास दिलकश अंदाज, तो दूसरा सबसे बड़ा दगाबाज़! बस फिर क्या था मिल बैठे दो यार और बन गई जोड़ी 420! इनके चक्कर में जो भी आया, बर्बाद ही हुआ! बात हो रही है साउथ की हीरोइन लीना मारिया और उसके बॉयफ्रेंड बालाजी उर्फ चंद्रशेखर रेड्डी की। फाइव स्टार में रहना बालाजी का शौक था, तो करोड़ों की गाड़ियों में घूमना लीना का शौक! यही शौक दोनों को करीब ले आई, क्योंकि शौक बड़ी चीज है... और बड़ी चीजें दोनों बुरी चीजों से पूरी कर रहे थे। एक छलावा, तो दूसरी मायाजाल। एक फरेबी, तो दूसरी धोखेबाज। एक अपनी बातों से लूट लेता, तो दूसरी अपनी अदाओं से। दोनों ने दिमाग और हुस्न का ऐसा खतरनाक कॉकटेल तैयार किया कि लोग अपनी मर्जी से इनकी झोली में करोड़ों डालते चले गए। दोनों ने मिलकर आधे साउथ इंडिया के न मालूम कितने अमीरों को गरीबी के मुहाने पर पहुंचा दिया।

पुलिस के मुताबिक बेंगलुरु में बालाजी के खिलाफ जालसाजी और ठगी के कई मामले दर्ज हैं। वह सरकारी अधिकारी बनकर कई लोगों को अपने जाल में फंसाकर उन्हें लूट चुका है। बालाजी बड़े ही शातिराना तरीके से लोगों को अपना शिकार बनाता था। आईएएस या बड़ा सरकारी अफसर बनकर  लोगों से मिलता और फिर किसी सरकारी प्लान का सपना दिखाकर उसे एक बैंक अकाउंट नंबर देता। जब उसका शिकार उस बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर देता, तो वह अकाउंट से पैसे निकालकर वहां से रफ्फूचक्कर हो जाता। एक बार जेल भी जा चुका है, लेकिन तब भी बालाजी नहीं सुधरा। बस अपना ठिकाना बदल लेता। चेन्नई में बालाजी की मुलाकात दुबई से आई लीना मारिया पॉल से हुई। महंगी गाड़ियों में घूमना, महंगे कपड़े पहनना और फाइव स्टार रहन-सहन जल्दी ही मारिया को बालाजी के करीब ले आई। दोनों में प्यार हो गया। चेन्नई में मारिया को बालाजी की मदद से कई फिल्मों में हीरोइन का लीड रोल मिला और वह देखते ही देखते टॉलीवुड में मशहूर हो गई। साथ वक्त गुजारने के दौरान ही मारिया को पता चला कि बालाजी की सारी कमाई का जरिया धोखाधड़ी है। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला बालाजी खुद को आईएएस अफसर बताकर नए-नए प्रोजेक्ट पास कराने को लेकर आम बिजनेसमैन से पैसे लेता या फिर बैंक से लोन। पैसा हाथ आते ही वह गायब हो जाता। बाद में इस काम के लिए उसने मारिया को अपना पार्टनर बना लिया और उसकी मदद से चेन्नई की केनरा बैंक से 19 करोड़ 47 लाख की जालसाजी की और चेन्नई छोड़कर दोनों दिल्ली आ गए।

लीना मारिया पॉल (25) मूलत: कोच्चि केरल की रहने वाली है और बीडीएस से स्नातक है यानी दांतों का डॉक्टर बनने की पढ़ाई पूरी कर रखी है। लीना के पिता इंजीनियर हैं और पूरे परिवार के साथ दुबई में ही रहते हैं। लीना दुबई में ही पली-बढ़ी और 2011 में शिक्षा पूरी करने के बाद चेन्नई आ गई। यहां  हुस्न और जिस्म की बदौलत पहले मॉडलिंग शुरू की, फिर बालाजी ने उसे हीरोइन बनवा दिया। इसके बाद तो खूबसूरत जिस्म को जरिया बनाकर वह कामयाबी की बुलंदी छूने लगी। मलयालम और तमिल के कई बड़े बैनरों की फिल्मों में उसे अच्छा पैसा मिला। ‘थाउजैंड्स इन गोवा’, ‘कोबरा’ और ‘रेड चिलीज’ उसकी प्रमुख फिल्में हैं। मलयालम कॉमेडी फिल्म ‘हसबैंड्स इव गोवा’ भी हिट रही है। साउथ में उसके चाहने वालों की एक बड़ी तादाद है। वहां हिट होने के बाद लीना ने हिंदी फिल्मों में किस्मत आजमाना शुरू किया। बॉलीवुड स्टार जॉन अब्राहम की प्रोडक्शन कंपनी की एक हिंदी ़फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में लीना को साइन कर लिया गया। यह फिल्म शीघ्र ही रिजीज होने वाली है, लेकिन इसके बाद लीना की किस्मत ने साथ नहीं दिया। अपने महंगे शौक पूरे करने के लिए उसने बालाजी के माध्यम से ‘समझौता’ करना शुरू कर दिया।

बेंगलुरु निवासी बालाजी रंगीनमिजाज और अपराधी प्रवृति का बताया जाता है। लोगों को ठगना उसका पेशा रहा है। लाखों की काली कमाई करने के लिए खुद को आईएएस अधिकारी बताता था। कई बार किसी बड़े अधिकारी को प्रभावित करने के लिए खुद को कभी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि का पोता बताता, तो कभी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पुत्र निखिल गौड़ा का नजदीकी दोस्त। लीना ने भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बालाजी के साथ मिलकर ठगी करनी शुरू कर दी। वह बकरा तलाशता और लीना उसका शिकार कर लेती। ईश्वर ने हुश्न और जिस्म दिया ही है। उसकी एक अदा पर लाखों रुपये निछावर करने वालों की कमी नहीं है। कभी मुंबई, कभी चेन्नई, तो कभी दिल्ली में दोनों की रात रंगीन होने लगी। फिल्म अभिनेत्री से लीना ‘लेडी नटवार लाल’ बन गई।

सूत्रों के मुताबिक, बालाजी और लीना अब लाखों से करोड़ों कमाने के चक्कर में थे। योजना के तहत बालाजी ने चेन्नई के एक फाइव स्टार होटल में केनारा बैंक के एक बड़े अधिकारी से मुलाकात की। उसके साथ अदाकारा लीना भी थी। उसे देखकर अधिकारी के मुंह में पानी आ गया। बालाजी ने उससे खुद को आईएस अफसर बताया   था। लीना हीरोइन थी, उन दोनों से अधिकारी को प्रभावित होते देर नहीं लगी। उसी समय अगली मीटिंग कहां और कब होनी है, तय हो गई। बालाजी ने मौके का लाभ उठाते हुए जाली दस्तावेज के आधार पर एक फर्म खोलने का बड़ा प्रोजेक्ट पेश कर दिया और केनरा बैंक के उस अधिकारी से 30 करोड़ों रुपये लोन देने की गुजारिश की। इस मिशन में लीना ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जहां, जब और जैसे जरूरत पड़ी, उसे बैंक के बड़े अधिकारियों के पास जाने में गुरेज नहीं रहा। नतीजतन केनरा बैंक ने अगले सप्ताह ही 19 करोड़ 47 लाख रुपये का लोन बालाजी के नाम पास कर दिया। इससे पहले लीना और बालाजी मिलकर कुछ अन्य लोगों को भी कई करोड़ का चूना लगा चुके हैं। ऐसे में अब चेन्नई में ज्यादा दिन रहना उनके लिए खतरे से खाली नहीं था। दोनों दिल्ली भाग आए। भूल गए कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। जुर्म करने वाला कभी नहीं बचता। चेन्नई केनरा बैंक को इस बीच पता चला कि बालाजी कोई आईएएस अफसर नहीं बल्कि एक जालसाज है। लीना के साथ मिलकर उसने बैंक को ठगा है, तो अधिकारी सन्न रह गए। 12 मार्च 2013 को लीना और बालाजी उर्फ चंद्रशेखर रेड्डी के खिलाफ चेन्नई थाना कोतवाली में धारा 420 (धोखाधड़ी), 120 बी (आपराधिक साजिश) और 406 (विश्वासघात) के तहत मामला दर्ज करा दिया गया। पुलिस दो महीने तक बालाजी और लीना की तलाश करती रही। इस बीच इसी मामले में एक बैंक मैनेजर को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ की गई, तो फरेब का रहस्य और गहराने लगा। मई, 2013 के प्रथम सप्ताह में पता चला कि लीना अपने बॉयफ्रेंड के साथ दिल्ली के एक फार्म हाउस में छिपकर रह रही है। चेन्नई पुलिस ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त नीरज कुमार से संपर्क किया। उन्होंने डीसीपी (साउथ) भोला शंकर जायसवाल को मामले में कार्रवाई करने का आदेश दिया। मामला बड़ा और करोड़ों के घोटाले से जुड़ा था, इसलिए क्राइम ब्रांच के तेज-तर्रार अफसरों की एक टीम बनाई गई।

27 मई की शाम क्राइम ब्रांच की टीम को पता चला कि लीना साउथ दिल्ली के असोला स्थित खारी फार्महाउस में रहती है। बालाजी भी वहीं मौजूद है। पुलिस ने रात में ही फार्म हाउस पर छापा मारा, लेकिन लीना वहां नहीं थी। पता चला कि वह अपनी अगली पार्टी के लिए वसंत विहार के एक शॉपिंग मॉल में शॉपिंग करने गई है। इस बीच डीसीपी के मुताबिक, बालाजी पुलिस को देखते ही अपनी लैंड क्रूजर कार से फरार हो गया। उसकी गाड़ी पर महाराष्ट्र के रजिस्ट्रेशन नंबर की प्लेट लगी थी। फार्महाउस असोला गांव के महेंद्र सिंह का है। आरोपियों ने साढ़े चार लाख रुपये महीने के किराए पर लिया हुआ था। दोनों यहां करीब एक महीने से नौ लग्जरी गाड़ियों के बेड़े के साथ रह रहे थे। फार्म हाउस के अंदर खड़ी आधा दर्जन से ज्यादा लग्ज़री गाड़ियों को देखकर पुलिस की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। आधा दर्जन बाउंसर भी वहां तैनात थे। चार निजी सुरक्षार्मियों को गिरफ्तार कर उनके पास से चार हथियार बरामद किए गए हैं, जिनका हरियाणा और जम्मू से लिया गया अखिल भारतीय लाइसेंस था, लेकिन दिल्ली लाइसेंसिंग शाखा से अनुमोदित नहीं था। फतेहपुर बेरी थाना पुलिस शस्त्र अधिनियम के तहत यह मामला दर्ज कर जांच कर रही है। इसके बाद पुलिस ने वसंत विहार के एक शॉपिंग मॉल से लीना को गिरफ्तार कर लिया।

डीसीपी जायसवाल के मुताबिक, बालाजी के खिलाफ चेन्नई में चीटिंग के दो मामले दर्ज हैं। केनरा बैंक से 19 करोड़ रुपये की चीटिंग की गई है। दूसरे केस में बालाजी ने खुद को आईएएस अफसर बताकर लीना की मदद से कुछ लोगों के साथ 76 लाख रु पये ठग लिए हैं। दोनों मामलों में चेन्नई पुलिस की सेंट्रल क्र ाइम ब्रांच उनकी तलाश कर रही थी, जबकि वे 12 मई से फार्म हाउस में छिपे हुए थे। चेन्नई पुलिस 29 मई को ट्रांजिट रिमांड पर लीना को चेन्नई ले गई। बालाजी की तलाश की जा रही है। दोनों आरोपियों के खिलाफ चेन्नई में एक सौ ठगी के मामले दर्ज हैं। यहां दिल्ली में लीना जिस फार्म हाउस में रह रही थी, वहां से 9 महंगी कारें लैंड क्रूजर, लैंड रोवर, बीएमडब्ल्यू, रॉल्स रॉयस, हमर, एस्टन मार्टिन, जीटीआर, आॅडी और 81 महंगी कलाई घड़ियां भी बरामद हुई हैं। ये महंगी कारें करोड़ों की हैं। पुलिस अब यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर इतनी महंगी गाड़ियों का मालिक कौन है? लीना के पास कहां से आई? कुछ गाड़ियों पर लाल बत्ती और राज्यसभा का स्टिकर भी लगा हुआ है। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि कहीं लाल बत्ती और स्टिकर का मिसयूज तो नहीं हो रहा था या फिर वह गाड़ी सचमुच किसी सांसद की है?

अय्याशी देखकर पुलिस भी हैरान
टॉप मॉडल और एक्ट्रेस लीना पॉल की हरकतों से पता चलता है कि उसका बस चलता, तो वह ताजमहल खरीद लेती। लीना और उसके लिव इन पार्टनर बालाजी उर्फ चंद्रशेखर रेड्डी की कहानी बंटी और बबली से एकदम मिलती-जुलती है। दोनों ने 20 करोड़ रु पये से भी ज्यादा की रकम बैंकों व अन्य लोगों से ठग लिए। इनकी अय्याशी देखकर पुलिस अधिकारी भी अचंभित रह गए। दरअसल, जब भी किसी को ठगना होता था तो खुद को आईएएस बताने वाला बालाजी लीना की सुंदरता और अपनी वाकपटुता का इस्तेमाल करता था। बालाजी लोगों से खुद को आईएएस अधिकारी बताता था और लालबत्ती लगी गाड़ी से चलता था। कई पुलिसकर्मी उसे सलाम करते थे। इतना ही नहीं, कई लोगों को वह खुद का परिचय मंत्री टीआर बालू और करुणाकर रेड्डी के पुत्र के रूप में   देता था। झूठ के बल पर वह बाकायदा हवाई प्रोजेक्ट तैयार करता था और लोगों से उस प्रोजेक्ट में पैसे लगवाता। लीना उसके हर मामले में साथ देती थी। बालाजी ने बंगलुरु  में अपने मकान मालिक से भी एक करोड़ रुपये ठगे हैं। इनके पास से जो महंगी विदेशी कारें बरामद हुई हैं, उनका प्रयोग भी ये लोगों को ठगने में ही करते थे।
-जितेन्द्र बच्चन

सोमवार, 27 मई 2013

गाजियाबाद का दिल दहला देने वाला सामूहिक हत्याकांड

किसकी साजिश कौन सूत्रधार?

22 साल के युवक ने एक ही परिवार के सात लोगों को मार डाला! हो सकता है कि यह घटना उसी ने की हो, लेकिन पुलिस, एसटीएफ और उनके तमाम विशेषज्ञों ने मिलकर इस मामले के खुलासे की जो कहानी बताई, वह किसी के गले नहीं उतर रही है। आखिर किसने रची साजिश? कौन है असली सूत्रधार और किसे बचा रही है पुलिस?

एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या से पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गई। बेरहम कातिल ने माता-पिता के साथ बेटे-बहू और पोते-पोतियों को भी नहीं छोड़ा। घर के भीतर जो भी मिला, बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार दिया। घटना 21 मई, 2013 की है। गाजियाबाद के सतीश चंद्र गोयल थाना कोतवाली स्थित नई बस्ती के रहने वाले थे। परिवार में पत्नी मंजू (62), पुत्र सचिन (40), बहू रेखा (38) और उसके तीन बच्चों- मेघा (13), नेहा (10) और अमन (7) को लेकर कुल सात लोग थे। सतीश को किडनी की समस्या थी। डॉक्टर की सलाह पर कंपाउंडर रोज उन्हें इंसुलिन का इंजेक्शन लगाने आता था, लेकिन 22 मई की सुबह करीब 8 बजे वह आया, तो उसके होश उड़ गए। दरवाजा खुला हुआ था और घर के अंदर खून ही खून ही फैला था। ऊपर-नीचे पूरे परिवार की रक्तरंजित लाशें पड़ी थीं। कंपाउंडर ने पड़ोसियों को बताया, फिर मामले की सूचना पुलिस को दी गई। शहर में कोहराम मच गया। एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या से पुलिस महकमे के भी हाथ-पैर फूल आए। थाना कोतवाली पुलिस और एसएसपी नितिन तिवारी मौके पर आ पहुंचे। पुलिस के स्पेशल आॅपरेशन ग्रुप और क्र ाइम टीम ने जांच-पड़ताल शुरू कर दी। दो शव घर की प्रथम मंजिल और बाकी पांच शव दूसरी मंजिल पर पड़े थे।
सतीश गोयल बताशेवाला उर्फ गैंडा (65) तीन भाई थे। उनका आढ़त का पुश्तैनी काम था। तीनों भाई साझे में रहते थे। बाद में सतीश दोनों भाइयों से अलग हो गए। अनाज मंडी गाजियाबाद में खल-चूरी का थोक व्यवसाय शुरू कर दिया, फिर करीब 15 साल पहले उन्होंने प्रॉपर्टी के काम में हाथ आजमाया, तो देखते ही देखते शहर के बड़े बिल्डरों में उनकी गिनती होने लगी। उन्होंने नई बस्ती, घंटाघर और पुराने शहर में तमाम प्रॉपर्टियों की खरीद-फरोख्त की। कुछ विवादित प्रॉपर्टी को लेकर उनका लोगों से विवाद भी हुआ, लेकिन सतीश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लाखों से करोड़ों में खेलने का क्रम जारी रहा। इधर कुछ दिनों से सतीश का स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। किडनी का आॅपरेशन कराना था। उसके लिए एक करोड़ रुपये घर में रखे थे। इसके अलावा ज्वेलरी भी अच्छी-खासी थी। ऊपर-नीचे घर का सारा सामान बिखरा हुआ था। पुलिस ने अनुमान लगाया कि हो सकता है कि लूटपाट की इरादे से इस घटना को अंजाम दिया गया है।

सतीश गोयल के मकान के आगे की सड़क महज 10 फुट चौड़ी है। नजदीक ही चोपड़ा मेडिकल स्टोर है। एक-दूसरे के मकानों की छतें आपस में सटी हुई हैं। कहीं भी आवाज हो और सामने वाले को पता न चले, इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन पुलिस पूछताछ में किसी पड़ोसी ने कोई खास जानकारी नहीं दी। सभी का यही कहना था कि आमतौर पर सतीश गोयल और सचिन रात साढ़े 10 बजे तक दुकान से घर लौट आते थे, लेकिन उस रात सतीश और सचिन दोनों पौने नौ बजे ही आ गए थे। 22 मई को पड़ोसी के यहां शादी थी। उसके यहां डीजे बज रहा था। ऐसे में गोयल परिवार के लोग चीखे-चिल्लाए भी होंगे, तो उनकी आवाज सुनाई नहीं पड़ी। नौकरों के बारे में पूछने पर पता चला कि सतीश गोयल ने अपने पुराने कार चालक राहुल को नौकरी से निकाल दिया है। इस बीच पुलिस टीम को मौके पर जांच में जूते के कुछ निशान मिले, जो आठ नंबर के थे। वह छुरा भी मिल गया, जिससे कत्ल किया गया था। जूते के नंबर और खंजर पर मिले फिंगर प्रिंट्स के आधार पर पुलिस का पूरा शक राहुल पर आकर टिक गया।

12वीं पास राहुल वर्मा (22) थाना कोतवाली (नगर) गाजियाबाद के मोहल्ला बजरिया का रहने वाला है। दो छोटे भाई हैं, लेकिन घरवालों से मनमुटाव के कारण इन दिनों राहुल इंदिरापुरम में अपने कजन के साथ रह रहा था। राहुल के दादा उत्तर प्रदेश पुलिस में दारोगा रहे। पुलिस ने राहुल की खोजबीन में कई जगह दबिश दी, लेकिन उसका सुराग नहीं मिला। इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह गाजियाबाद आए। पीड़ित परिवार से मिले। इससे राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई। एसएसपी नितिन तिवारी और उनके मताहतों को आईजी ने सख्त निर्देश दिए। 23 मई को मुखबिर से पता चला कि राहुल ने अभी 10-12 दिन पहले ही एक महंगा मोबाइल फोन खरीद कर अपनी गर्लफ्रेंड को गिफ्ट किया है। पुलिस ने उस युवती को एक घंटे बाद हिरासत में ले लिया, तभी राहुल का युवती के मोबाइल पर फोन आ गया। लोकेशन मिलते ही स्पेशल आॅपरेशन ग्रुप और क्राइम टीम ने राहुल को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, राहुल इंटर पास करने के बाद दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में एनिमेशन का कोर्स कर रहा था। इस बीच उसे नशे की लत पड़ गई। वह आवारागर्दी करने लगा। नहीं सुधरा, तो माता-पिता ने बेटे को घर से निकाल दिया। राहुल भटक गया। उसकी एक युवती से दोस्ती हो गई, फिर दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे। राहुल के खर्चे बढ़ गए। प्रेमिका के शौक और खर्चे पूरे करने की उधेड़बुन में एक रोज राहुल की मुलाकात सतीश गोयल के ड्राइवर मोनू से हुई। मोनू की सिफारिश पर सतीश ने राहुल को भी अपने यहां पांच हजार की मासिक तनख्वाह पर कार चालक रख लिया। उन्हें क्या पता था कि वह आस्तीन का सांप निकलेगा। घटना से करीब 12 दिन पहले राहुल ने सतीश गोयल के घर से साढ़े चार लाख रुपये चुरा लिए। उसमें से एक लाख रुपये राहुल ने अपने दोस्त जुगनू जैकब को दे दिए। बाकी जो बचा, उसमें प्रेमिका को मोबाइल गिफ्ट किया और कई दिन दोस्त-यारों के साथ शराब-शबाब की मौज-मस्ती में डूबा रहा। उसकी हरकतों से तंग आकर गोयल को इस बात का पता चलते देर नहीं लगी कि रुपये की चोरी राहुल ने ही की है। उन्होंने उसे नौकरी से निकाल दिया। राहुल अब पूरी तरह से सड़क पर आ चुका था। बेरोजगार होते ही गर्लफ्रेंड भी कन्नी काटने लगी। इस सब का जिम्मेदार राहुल सतीश गोयल को मानने लगा।

उनके प्रति उसकी नफरत बढ़ने लगी। वह जानता था कि गोयल करोड़पति है। कब कितना पैसा कहां से आ-जा रहा है, यह भी पता था। राहुल ने लूट की साजिश रचनी शुरू कर दी। दो-तीन दोस्तों से भी इस सिलसिले में बात की। प्रशांत नामक मित्र को अपनी साजिश में शामिल होने को भी कहा। राहुल के अनुसार, उसका इरादा किसी को कत्ल करना नहीं था। सोचा था, घर में घुसेगा और किसी एक बच्चे को चाकू की नोक पर लेकर मोटी रकम हासिल कर लेगा। पुलिस के अनुसार, 20 मई को उसने मालीवाड़ा से 100 रु पये का छुरा और एक रस्सी खरीदा, फिर 21 मई की रात करीब साढ़े सात बजे गोयल के घर के पीछे बनी सीढ़ियों से एक दूसरे मकान की छत पर जा पहुंचा। वहां से दो-तीन छतों से होता हुआ सतीश गोयल की छत पर आ गया। यहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। राहुल ने उन्हीं के पास बैठकर दो सिगरेट पी। बच्चे खेलकर चले गए, तो राहुल मुंह पर गमछा बांधकर करीब 10 फीट ऊंची छत से रस्सी के सहारे नीचे प्रथम तल पर कूद पड़ा। उसके पैर में फैक्चर हो गया। मुंह से गमछा भी खुल गया। इस बीच पुलिस के अनुसार, धड़ाम की आवाज सुनकर मेघा ने राहुल को देख लिया। पहचाने जाने के डर से वह घबरा गया। उसने मेघा के पेट में छुरा घोंप दिया, फिर उसका गला रेतकर कत्ल कर डाला। बच्ची की आवाज सुनकर उसकी मां रेखा आई, तो राहुल ने उसे भी लपककर छुरे से गोद डाला। दो लोगों की हत्या करने के बाद राहुल को लगा कि पैर में चोट लगने के कारण वह वापस छत के रास्ते नहीं लौट सकता, इसलिए उसे मेन गेट से ही निकलना होगा।

ऐसे में उसका पकड़ा जाना तय है। राहुल के इरादे और खूंखार हो गए। वह नीचे आया और सतीश के बेटे सचिन को सामने देखते ही उसके पेट में छुरा घोंप दिया। वह जमीन पर गिर पड़ा, राहुल ने उसका गला रेत दिया। सतीश और उनकी पत्नी मंजू ने यह मंजर देखा, तो सदमे से बेहोश हो गए। सचिन ने बेहोशी की हालत में ही सतीश और मंजू का भी गला रेत दिया। अब मासूम अमन और नेहा बचे थे। खून-खराबा देख दोनों रोने लगे। राहुल ने उन दोनों की भी बड़ी बेरहमी से गला रेतकर हत्या कर दी। पास के मकान में डीजे बज रहा था, जिसमें पूरे परिवार की चीख-पुकार दबकर रह गई।
पुलिस के मुताबिक, हत्याओं के बाद राहुल ने अलमारी खोली और उसमें रखी जूलरी और 10 हजार रुपये चुरा लिए। जिस लॉकर में एक करोड़ की नकदी रखी थी, उसे तोड़ नहीं पाया। परेशान होकर राहुल मेन गेट से निकल गया, लेकिन पुलिस, एसटीएफ और उनके तमाम विशेषज्ञों ने मिलकर इस मामले का यह जो खुलासा किया है, वह किसी के गले नहीं उतर रही है। एसएसपी ने आरोपी के पास से खून से सने कपड़े व लूटे गए जेवर और नकदी बरामद करने का भी दावा किया है, लेकिन पुलिस की इस कहानी में कई पेंच हैं, जिससे कई सवाल खड़े होते हैं। 21-22 साल का एक दुबला-पतला लड़का सात लोगों की हत्या भला कैसे कर सकता है? वह भी जख्मी-टूटे पैर के बाद तो कतई नहीं? जरूर इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश है। कौन है असली सूत्रधार? किसे बचा रही है पुलिस?

सीबीआई जांच की मांग
सतीश गोयल की पुत्री शैली और दामाद सचिन का कहना है कि इस हत्याकांड में राहुल के अलावा भी कुछ लोग शामिल हैं, लेकिन पुलिस की कार्रवाई से लग रहा है कि वह किसी को बचाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें राहुल की कमीज और गमछा दिखाया। उस पर खून के थोड़े से निशान हैं और दोनों कपड़े सही-सलामत हैं। ऐसा कैसे हो सकता है? उसने सात लोगों को कत्ल कर डाला और उसकी कमीज के बटन तक नहीं टूटे और न जेब फटी? यहां तक कि खून से भी कमीज पूरी तरह नहीं रंगी? शैली ने एक और सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पुलिस कत्ल का जो समय बता रही है, वह भी गलत है। रात्रि 8.39 बजे मेरी अपने भाई सचिन से दो मिनट मोबाइल फोन पर बात हुई है। वहीं, भाजपा (गाजियाबाद) के उपाध्यक्ष अजय शर्मा ने मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।

विरोध के चलते मुख्यमंत्री नहीं आए

26 मई को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का गाजियाबाद आने का प्रोग्राम था। यहां और गौतमबुद्धनगर के करीब आठ हजार छात्र-छात्राओं को लैपटॉप वितरित करना था। इसके अलावा जीडीए के करीब चार हजार करोड़ की लागत के विकास कार्यों का लोकार्पण व शिलान्यास भी करना है, लेकिन गोयल परिवार हत्याकांड को लेकर व्यापारियों और राजनीतिक दलों के तीखे विरोध के चलते मुख्यमंत्री का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। जिलाधिकारी (गाजियाबाद) एसवीएस रंगा राव के अनुसार अब मुख्यमंत्री शायद 3 जून को गाजियाबाद आएंगे।
थाना प्रभारी निलंबित
कोतवाली थाना प्रभारी लालू सिंह मौर्य को निलंबित कर दिया गया है। सतीश गोयल ने पुलिस से कुछ दिन पहले सुरक्षा मांगी थी, लेकिन इंस्पेक्टर मौर्य ने उन्हें सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई थी। मामले की जांच-पड़ताल की जा रही है।    
-भावेश कुमार, आईजी (मेरठ जोन)

दो दिन की रिमांड में उगले कई राज
पुलिस ने आरोपी राहुल वर्मा को दो दिन (24-25 मई) की रिमांड पर लेकर पूछताछ की, तो कई और सनसनीखेज जानकारियां दी हैं। उसके बयान के आधार पर इस मामले में तीन और लोगों जुगनू जैकब, मोनू और प्रशांत का नाम सामने आया है। जुगनू शातिर अपराधी है। वह 2008 में मुरादनगर में हुई करीब 20 लाख की लूट में जेल भी जा चुका है। पुलिस ने उसे 24 मई 2013 को कोटगांव फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया। वह गाजियाबाद के मोहल्ला आर्यनगर का निवासी है। राहुल का दोस्त है। राहुल ने जब सतीश गोयल के घर से साढ़े चार लाख रुपये चुराए थे, तो उसमें से एक लाख रुपये उसने जुगनू को दे दिए थे। पुलिस जुगनू के साथ-साथ मोनू से भी पूछताछ कर रही है। 25 मई को प्रशांत भी पकड़ में आ गया। राहुल की साजिश का इन तीनों को पता था, लेकिन प्रशांत का कहना है कि वह राहुल की साजिश में शामिल नहीं है।
-नितिन तिवारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक
-जितेंद्र बच्चन

बुधवार, 22 मई 2013

                           किले में सेंध!

सोनिया-राहुल के गढ़ में वरुण गांधी की दस्तक।भाजपा में वरु ण का कद बढ़ा। पार्टी ने तय की उनके लिए बड़ी भूमिका। खासकर युवाओं को पार्टी से जोड़ने की है कोशिश। खास फोकस है उत्तर प्रदेश, क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।


जितेंद्र बच्चन
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, सीटों की संख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में नए-नए राजनीतिक समीकरण उभरने लगे हैं। भाजपा की रणनीति बड़े चेहरों को मैदान में उतारने की है। उसी कड़ी में वरुण गांधी अगला लोकसभा चुनाव सुलतानपुर से लड़ने की तैयारी में हैं। इसके संकेत पहले से भी मिलते रहे हैं, लेकिन 16 मई को वरुण ने सुलतानपुर के खुर्शीद क्लब मैदान में स्वाभिमान रैली कर के अपने चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत कर दी। भाजपा ‘अपने गांधी’ के लिए बड़ी भूमिका तय कर चुकी है। खासतौर पर वरुण के जरिए युवाओं को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, तभी तो रैली में पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने वरुण को युवा हृदय सम्राट बताया। उत्तर प्रदेश पर पार्टी का खास फोकस रहा, क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।
वरुण की उम्मीदवारी से राजनीतिक हलचल तेज :
परिवार के दूसरे खेमे के राहुल गांधी के अमेठी से सटी सुलतानपुर सीट से वरुण की उम्मीदवारी ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। यह तय माना जा रहा है कि सुलतानपुर, अमेठी, रायबरेली में गांधी परिवार की त्रिमूर्ति (वरु ण-राहुल-सोनिया) की मौजूदगी की राजनीतिक गूंज दूर तक सुनी जाएगी। 16 मई को शहर के खुर्शीद क्लब में हुई भाजपा की स्वाभिमान रैली में भारी भीड़ जुटी। आसपास के कई जिलों के लोग वरु ण को देखने-सुनने पहुंचे। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी सहित प्रदेश के तमाम पदाधिकारी, नेता और अनेक विधायक वरुण का हौसला बढ़ाने और अपना चेहरा दिखाने की होड़ में लगे रहे। वरु ण ने अपने भाषण में अमेठी, रायबरेली या फिर सोनिया गांधी का जिक्र करने से परहेज किया। हालांकि भाषण की शुरुआत उसी अंदाज में की जैसे परिवार के अन्य सदस्य ‘अमेठी या रायबरेली को अपना बताने के लिए’ करते रहे हैं। वरुण ने कहा, ‘अपने घर आया हूं। यहां के लोगों ने हमेशा मेरे पिता का हाथ थामे रखा।’ इस उल्लेख के साथ वरु ण काफी भावुक हो गए। उन्होंने कहा, ‘मेरा परिवार कुछ महीनों से काफी दु:खी है। 19 मार्च को मेरे बेटी पैदा हुई थी। परिवार में बेहद खुशी थी, लेकिन 19 अप्रैल को वह गुजर गई। जो माता-पिता हैं वे इस दर्द को समझ सकते हैं। लोगों को लगता है कि जो मंच पर बैठते हैं। मुकुट पहनते हैं। वे बहुत सुखी और ऐशोआराम से हैं पर उनके भी दु:ख हैं।’ ये सब बताते हुए भावुक वरु ण कुछ पल को ठहर गए। सामने जोश में उमड़ती भीड़ के बीच भी सन्नाटा पसर गया, लेकिन जब उन्होंने कहा कि यहां के हजारों बच्चे भी तो मेरे बच्चे हैं, तो अगले ही क्षण उनके लिए तालियां बजाते हुए लोगों ने नारे बुलंद करने शुरू कर दिए।
भाजपा में वरु ण को पहली बार तरजीह :
भौगोलिक व जातिगत समीकरणों के आधार पर देखें, तो तीनों लोकसभा सीटों सुलतानपुर, अमेठी और रायबरेली में काफी समानता है। 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में इन तीनों जगहों पर कांग्रेस का पत्ता लगभग साफ हो चुका है। इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं और भाजपा वरु ण को पहली बार तरजीह दे रही है। पार्टी में उनका कद बढ़ा है। वहीं, विरोधी खेमों में रहते हुए भी गांधी परिवार के सदस्य अब तक चुनाव प्रचार में एक-दूसरे के क्षेत्रों में जाने से परहेज करते रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में यह परंपरा टूटेगी? दरअसल, वरुण का सुलतानपुर से चुनाव लड़ने का फैसला अचानक नहीं है। वे पिछले साढेÞ तीन साल से इसकी तैयारी कर रहे हैं। 20 दिसंबर, 2009 को उन्होंने सुलतानपुर में एक बड़ी सभा कर पहली बार इसका संकेत दिया था। इस सभा की सफलता के लिए उनके प्रतिनिधियों ने यहां महीनों मशक्कत की थी। तब वरु ण ने सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ‘हम बचपन से सुलतानपुर-अमेठी के विषय में सुनते-जानते रहे हैं। मेरे पिता संजय गांधी को यहां के लोगों ने बहुत प्यार दिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार मैं यहां आया था, तब जल्दी-जल्दी आने का वादा किया था, लेकिन नहीं आया तो इसकी वजह थी कि मैं अपने को पूरी तरह तैयार करना चाहता था। अब तैयार हूं।’
राजनीतिक कर्मभूमि :
वरुण गांधी पिछली बार पीलीभीत से सांसद चुने गए थे और अच्छे बहुमत से जीते थे, लेकिन चुने जाने के चंद महीनों के भीतर ही उन्होंने सुलतानपुर में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। शायद इस क्षेत्र को वे अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाना चाहते हैं। इसीलिए दिल्ली में रहते हुए भी वह सुलतानपुर के लोगों से संपर्क बढ़ाते रहे हैं। मेल-मुलाकात में सुलतानपुर के लोगों को प्राथमिकता दी है। पिछले कुछ महीनों में इस काम में और तेजी आई है। अपने प्रतिनिधियों और सर्वेक्षण एजंसियों के जरिए उन्होंने सुलतानपुर में संभावनाएं टटोलीं। अब  उनके स्टाफ के करीब डेढ़ दर्जन लोगों ने यहां डेरा डाल रखा है और पूरी तरह से चुनाव प्रचार में लग गए हैं। सुलतानपुर जिला मुख्यालय पर वरुण गांधी के नाम के पोस्टर और होर्डिंग लगा दिए गए हैं। स्टाफ वालों ने स्थानीय इकाई के नेताओं के साथ बराबर संपर्क बना रखा है। 16 मई की रैली में भी स्थानीय नेताओं की अच्छी खासी जमात मौजूद रही। इनमें एमएलसी डॉ. महेंद्र सिंह, विधायक उपेंद्र   तिवारी, विधायक सावित्री फूले, सीमा द्विवेदी, रामनाथ कोरी, रामपति त्रिपाठी, देवेंद्र सिंह चौहान, लक्ष्मण आचार्य, मोती सिंह, ओम प्रकाश पांडेय, डॉ. आरए वर्मा, नगर पालिका अध्यक्ष प्रवीण कुमार वर्मा, अर्जुन सिंह, विजय बहादुर पाठक, मनीष शुक्ला, जगजीत सिंह छंगू, अखिलेश जायसवाल, लोकसभा प्रत्याशी अमेठी प्रदीप सिंह, थौरी धीरज पांडेय, दिलीप पांडेय, श्रीप्रकाश सिंह, वीरेंद्र बहादुर सिंह, संजय सिंह सोमवंशी, जिला मीडिया प्रभारी विनय सिंह आदि शामिल रहे।   
विरासत के पीछे संघर्ष की पृष्ठभूमि :
सुलतानपुर के एक ओर अयोध्या है, तो दूसरी ओर अमेठी। वरुण ने 2009 के चुनाव में हिंदुत्व के मुद्दे को उभारने की कोशिश की थी। अयोध्या से इसकी संगत बैठती है। जबकि इसी जिले की अमेठी गांधी परिवार की उस विरासत का प्रतीक है, जहां से परिवार के रिश्तों की बुनियाद वरु ण के पिता दिवंगत संजय गांधी ने डाली थी। इस विरासत के पीछे वरु ण से पहले की पीढ़ी के संघर्ष की पृष्ठभूमि भी है। संजय गांधी ने 1977 में अमेठी से पहला चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में वे हार गए थे। 1980 में वे अमेठी से ही जीते, लेकिन जल्दी ही एक हवाई दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। इसके बाद संजय गांधी की पत्नी अमेठी में पति की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की इच्छुक थीं, लेकिन सास इंदिरा गांधी ने विधवा बहू मेनका गांधी के दावे को दरिकनार कर विमानन कंपनी की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अपने बडेÞ बेटे राजीव गांधी को अमेठी में उपचुनाव लड़ाया। वे 1981 का यह उपचुनाव आसानी से जीत भी गए। विद्रोह पर उतारू मेनका ने अपनी सास का घर छोड़ने के बाद अमेठी का रु ख कर लिया। 1984 के चुनाव में उन्होंने यहां आकर अपने जेठ राजीव गांधी को असफल चुनौती दी थी। पराजय की पीड़ा इतनी गहरी थी कि मेनका फिर कभी सुलतानपुर-अमेठी नहीं आर्इं।
आक्रमण की धार तेज : ढाई दशक बाद मेनका के बेटे वरु ण ने 2009 में भी सुलतानपुर के उसी खुर्शीद क्लब में सभा की, जहां उनकी मां मेनका ने अपने परिवार को चुनौती देते हुए पहली सभा की थी। अपने परिवार से नाराज मेनका के स्वर और आरोप बेहद तीखे हुआ करते थे, लेकिन वरु ण ने पिछली बार जब यहां सभा की थी, तो वे संतुलित और संयमति थे। इसके बावजूद राहुल-सोनिया का नाम लिए बिना उन पर कटाक्ष करने से नहीं चूके, ‘वीआईपी इलाकों में वैसे विकास कार्य नहीं हुए हैं जैसे होने चाहिए थे। प्रतिनिधि जनता के सेवक हैं और उनसे काम का हिसाब लिया जाना चाहिए।’ वरु ण अब सुलतानपुर से लडेंÞगे, तो आक्र मण की धार और तेज हो सकती है। वे अपनी मां द्वारा बीच में छोड़ी लड़ाई का अगला चरण शुरू कर रहे हैं। पड़ाव भले सुलतानपुर है, लेकिन निशाने पर अमेठी-रायबरेली है। पिछले लोकसभा चुनाव 2012 में सुलतानपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार की हैसियत से अमेठी के युवराज संजय सिंह जीते थे। आजकल पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। उनका मानना है कि कांग्रेसियों ने जान-बूझकर अमिता सिंह को हराया है। कांग्रेस व संजय सिंह के बीच पनपी इस खटास का फायदा भाजपा वरुण को सुलतानपुर लोकसभा क्षेत्र से उतार कर उठाना चाहती है।
अंधा कानून या वरुण की दबंगई? 
चार साल पहले 2009 के चुनाव में भाजपा नेता वरुण गांधी के एक भाषण ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया था। उन पर सात और आठ मार्च 2009 को पीलीभीत जिले के डालचंद और बरखेड़ा में भड़काऊ भाषण देने का केस दर्ज हुआ। कई दिनों तक वे सलाखों के पीछे भी रहे। अब चार साल बाद 33 साल के वरु ण गांधी बेदाग हैं। लेकिन कोर्ट में जो गवाह पलट गए थे, उन्हीं गवाहों ने एक स्टिंग आॅपरेशन में यू-टर्न लेते हुए खुलासा किया है कि कैसे केस का गला घोंटा गया और वरु ण सबूत के अभाव में बेदाग बरी हो गए।
कोर्ट में बेशक इस आरोप का कोई गवाह नहीं मिला कि वरु ण गांधी ने वाकई 2009 में डालचंद और बरखेड़ा में नफरत फैलाने वाला भाषण दिया, लेकिन स्टिंग आॅपरेशन में साफ हो चुका है कि न सिर्फ वरु ण ने जहर उगलने वाला भाषण दिया था, बल्किमुकदमे से बेदाग बचने के लिए पूरी न्याय प्रक्रि या को तोड़-मरोड़ डाला। वरु ण ने न्याय प्रक्रि या को इस हद तक प्रभावित किया कि इन दोनों केस   के अलावा दूसरे कुछ मामलों के सभी 88 गवाह मुकर गए। गवाहों के मुताबिक बयान बदलवाने में एसपी अमति वर्मा की अहम भूमिका रही। स्टिंग आॅपरेशन से यह भी जाहिर हुआ है कि खुद को बेदाग बचाने के लिए वरु ण ने यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हरवा दिया, ताकि समाजवादी पार्टी का नेता चुनाव जीत सके और केस से बचने में उनकी मदद कर सके। यह अंधा कानून है या फिर वरुण की दबंगई, जो साम-दाम-दंड-भेद तमाम हथकंडे अपनाकर केस से बेदाग बरी हो गया?
चरम पर है गुटबाजी



भाजपा ने 2014 का चुनाव जीतने के लिए एक खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। पूरे प्रदेश को पूर्वांचल, मध्य भाग, पश्चिम और बुंदेलखंड सहित कई हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से से पार्टी अपने कम-से-कम एक ऐसे चेहरे को लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहती है, जिसके नाम पर उस सीट पर तो वोट मिले ही, आस-पास की सीटों पर भी वे दूसरे भाजपा प्रत्याशियों को जिताने में मदद कर सकें। लेकिन 2014 के चुनाव के लिए भाजपा जहां एक ओर उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत लगा रही है, वहीं आपसी गुटबाजी पार्टी की पूरी कवायद पर पानी फेरने को तैयार बैठी है। राजनाथ सिंह की अगुवाई में घोषित कार्यकारिणी को एक धड़ा चाटुकारों की फौज, कमजोर व परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली करार दे रहा है। कार्यकारिणी में राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, लाल जी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह और प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार को पद मिलने से भी बहुत लोग नाराज हैं। प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के समय कार्यकारिणी में जो लोग शामिल थे, उनमें से अधिकांश को इस कार्यकारिणी में जगह नहीं मिली है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं है, जो थोड़ी-बहुत नाराजगी है, चुनाव से पहले वह ठीक हो जाएगी।’

                                क़ैदी का खत


सलाम! हम भी इंसान हैं और देशभक्त शहरी भी जो नापाक साजिशों के तहत दहशतगर्दी के आरोप में ज़बरदस्ती फंसाए गए बेकसूर हैं. आज हम लोग बेइन्तहां जुल्म से परेशान होकर आपस में आत्महत्या और उसकी जायज गुंजाइश के बारे में एक दूसरे से पूछने लगे हैं. हमारे खिलाफ़ होने वाली अमानवीयता (जो जेल अधिकारियों की आपराधिक मानसिकता के कारण है) ने हमें इस क़दर मायूस कर दिया है कि आत्महत्या ही आखिरी विकल्प लगने लगा है.
हममें से सभी को अपने-अपने घरों, बाजारों, खेतों से, राह चलते हुए गैर-कानूनी कैद कर अगवा करके, गैर कानूनी हिरासत में रखकर भयानक हिंसा के ज़रिए कहानियां गढ़कर लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव या फिर अन्य दूसरी जगहों से कई-कई दिन बाद गैरकानूनी सामानों के साथ गिरफ्तारियां दिखाकर लंबी-लंबी पुलिस हिरासत में लेकर सुबूत गढ़ने के बाद सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया. सुरक्षा के नाम पर हाई-सेक्योरिटी के नाम पर बने कमरों में ठूंसकर बेपनाह उत्पीड़न पहले भी किया गया और आज भी इरादतन साम्प्रदायिक तौर पर जारी है.
सीलन भरी अंधेरी, बेरोशनदान वाली आठ गुणे बारह की छोटी सी सेल में लगातार बंद रखा जाता, एक मिनट के लिए भी न खोला जाता. तेरह जून 2008 दिन शुक्रवार को जुल्म का नंगा नाच करते हुए हमें चमड़े के हंटरों और लाठियों से हमारे जिस्मों को फाड़ा और तोड़ा गया. पवित्र कुरान को अपवित्र किया गया, उसके पन्ने फाड़कर शौचालय में फेंका गया.
हमारे सारे कपड़े, चादर, किताबें जप्त कर ली गईं, बल्कि शुरु के ही दिनों में कपड़ों पर पाबन्दी लगा दी गई कि सिर्फ दो जोड़े कपड़े, एक लुंगी, एक तौलिया यहां तक की अण्डरवियर भी दो से ज्यादा रखने की इजाज़त न दी जाती थी. तंग होकर हमने लंबी भूख हड़ताल, खाने-पीने का मुकम्मल बाईकाट विरोध के बतौर किया. तब 27 जनवरी 2009 से आधा घंटा के लिए पत्थर की ऊंची दीवारों वाले इतने छोटे से बरामदे में खोला जाने लगा जिसमें से 12 बजे के बाद से ही धूप गायब हो जाती और हरियाली का तो नामों निशान तक नज़र नहीं आता.
दिसम्बर 2011 से बहुत दरख्वास्त करने पर एक घंटे के लिए खोला जाने लगा. पता होना चाहिए कि जेल के रजिस्टर में हमें बाकी कैदियों की तरह मैनुवल के लिहाज से खुला ही दिखाया जाता है, जबकि हम यहां लगातार बंद रखे जाते हैं. लगातार बंद रहने की वजह से यहां लोग बीमार रहने लगे हैं. जबकि कई तो डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं, याददाश्त प्रभावित हो चुकी है. और कईयों की आंखे कमजोर होने लगी हैं.
कई साल से ऊपर हो गए होंगे जेल मुआयना पर आने वाले मजिस्ट्रेट को हाई-सेक्योरिटी तशरीफ लाए हुए. बड़े अफसरान और ऑथोरिटीज को हाई सेक्योरिटी नहीं लाया जाता कि हम शिकायत न कर दें. हमारी दरख्वास्तें ऑथोरिटीज को नहीं फॉरवर्ड की जाती कि कहीं हमें इंसानी हुकूक देने को न कह दिया जाय. सुप्रीम कोर्ट की बकायदा हिदायत है कि किसी भी अण्टर ट्रायल को कैद कर तनहाई में न रखा जाय. सजायाफ्ता को भी सिर्फ तीन माह तनहाई में रखे जाने की गुंजाइश है. हमारे साथ गैरकानूनी, गैरइंसानी और आपराधिक बर्ताव क्यों रखा जाता है, जबकि हम साजिशन फंसाए गए बेकसूर नागरिक हैं.
साथियों ऐसे में अधिकारियों की तंग नजरी, बड़े ऑथोरिटीज तक पहुंच न हो पाने, मुक़दमों का जल्द फैसला न हो पाने और ज़रुरत की दवाओं के न मिल पाने की वजह ने बहुतों को बहुत मायूस कर दिया है. जिसकी वजह से कुंठा व बेचैनी से मजबूर होकर आत्महत्या के जायज़ होने या गुंजाइश होने का मसला अक्सर होने वाली बातचीत में मुझसे पूछा जाता है. साजिशों में फंसाए गए इन लोगों को कैसे समझाया जा सकता है. जबकि ये परेशान कैदी जब थोड़ी देर खुले में ताजा हवा या धूप खाने और बीमारियों के सही इलाज की दरख्वासत करते हैं कि सर ऐसे तो हम मर जाएंगे तो हंसी उड़ाते हुए कहा जाता है कि मर जाओ हमें क्या फर्क पड़ता है, सुसाइड कर लो. हम जवाब दे लेंगे और जहां चाहे शिकायत कर लो हमें फर्क नहीं पड़ता.
यहां के लोगों और खुद अपनी बेबसी देखकर, प्रशासन का रवैया देखकर दिल हिल जाता है. रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हम हिन्दोस्तान की जेल में हैं या अंग्रेजों की. हम किसी सेकूलर स्टेट में हैं या कम्यूनल स्टेट में. हम आपसे मदद के प्रार्थी हैं. हुकूमती सतह पर या बड़ी अदालतों और ऑथोरिटीज के ज़रिए इन्सानी हुकूक़ के खिलाफ़ हो रहे कार्यवाइयों पर लगाम लगाया जा सकता है. मेहरबानी करके नफ़रत की इस भट्टी में सिसकती, बिलखती इंसानियत को बचाने के खातिर देश की मज़बूती व तरक्की के खातिर हम बेबसों की तरफ ध्यान दीजिए. क्योंकि इंसाफ़ से मुल्क व हुकूमत को मज़बूती मिला करती है.
द्वारा-
मोहम्मद तारिक कासमी
कैदी हाई सेक्योरिटी,
सी ब्लाक जिला जेल
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
22 सितम्बर 2012
Mohd Kamran के फेसबुक वॉल से.

सोमवार, 22 अप्रैल 2013


हैवानियत

नन्हीं-सी जान और दो-दो शैतान! न दया आई, न ही दिल पसीजा। हैवानियत की सारी हदें पार कर गए दरिंदे। आंखों का पानी तो पहले ही मर चुका था, इंसानियत का भी कत्ल कर डाला! रही-सही कसर पुलिस ने बच्ची के बाप को दो हजार रुपये देने की पेशकश कर पूरी कर दी! लानत है ऐसी पुलिस पर, जो वर्दी को शर्मसार कर दे!


पांच साल की बच्ची के साथ हैवानियत! दहल उठी दिल्ली! सदमे में हैं देश के प्रधानमंत्री! कांप उठा मां का कलेजा। हिल गए लोग, लेकिन दुष्कर्मियों के न हाथ कांपे और न ही दिल पसीजा। बहते रहे आंसू, सिसकती रही मासूम। तब भी जालिमों को तरस नहीं आया, दबोच लिया भूखे भेड़िये की तरह। रौंद डाली सारी मासूमियत। तोड़ते रहे कहर। ढाते रहे सितम। लहूलुहान हो गई इंसानियत! बेहोश हो गई बच्ची! भूखी-प्यासी 40 घंटे बंद रखा कमरे में। हवा तक नहीं लगने दी बाहर की। उफ्! कितना दर्द बर्दाश्त किया होगा उसने। वह भी महज पांच साल की उम्र में। दो दिन बाद बड़ी मुश्किल से मां का सामना हुआ, तो खून से लथपथ थी मासूम। जिस्म का अंग-अंग जख्मी था उसका। पर, हाय री दिल्ली पुलिस, इस पर भी उसका रवैया हैरान करने वाला रहा। इस बात का एहसास होते ही कि मामला मीडिया में जा सकता है और फिर होगी हमारी छीछालेदर, बच्ची को दिल्ली के एक कोने में बने नगर निगम के अस्पताल में ले जाकर दाखिल करा दिया, ताकि पता न चले किसी को। एक पुलिसकर्मी ने लड़की के पिता को दो हजार रुपये देने की कोशिश की। उसका कहना था, ‘खर्चा-पानी दे रहा हूं। किसी से कुछ बताओगे, तो मुफ्त में बदनाम हो जाओगे। चुप रहने में ही बेहतरी है।’ पिता की आंखें भर आइं- ‘क्या तुम्हारी बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म करता, तब भी तुम मामला रफा-दफा करने की कोशिश करते?’ कितनी शूरमा है दिल्ली पुलिस! हैवानों के आगे घुटने टेक देती है, लेकिन पीड़ित से सौदा करने में कभी नहीं चूकती! इतना भी नहीं सोचा कि अगर पुलिस ही इंसाफ के दरवाजे पर ताला लगाकर बैठ जाएगी, तो कैसे बचेगी लोकतंत्र की इज्जत? बेदिल ही नहीं, बेदर्द भी है दिल्ली पुलिस।
वाकया 15 अप्रैल 2013 का है। पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर इलाके में मासूम गुड़िया का परिवार रहता है। पिता पेशे से बेलदार है और चाचा मेहनत-मजदूरी करता है। प्रथम तल पर किराए का कमरा ले रखा है। गरीबी में ही गुजर-बसर होता है। वारदात की शाम पांच साल की गुड़िया अपने दरवाजे पर खेल रही थी, तभी भूतल पर रहने वाला मनोज (22) आ गया। मासूम को देखते ही उसके दिमाग का शैतान नाचने लगा। वह बहला-फुसलाकर उसे अपने कमरे में ले आया। अगवा कर लिया बच्ची को। कमरे में उसका दोस्त प्रदीप भी था। दोनों ने गुड़िया के साथ दो दिन तक कई बार रेप किया। तब भी मन नहीं भरा, तो बच्ची के प्राइवेट पार्ट में दो मोमबत्तियां और सौ मिलीलीटर तेल की सीलबंद एक शीशी डाल दी। बेचारी दर्द से बिलबिला उठी, लेकिन हैवानों को उस पर तरस नहीं आया। बच्ची की छाती, होंठ और गालों पर दांत काटने के कई निशान हैं। गला दबाने और चाकू से गर्दन काटने की कोशिश भी की गई। बच्ची बेहोश हो गई। शैतानों ने सोचा, शायद बच्ची खत्म हो गई और दोनों आरोपी बाहर से दरवाजे पर ताला लगाकर फरार हो गए। गुड़िया के माता-पिता बेटी को खोज-खोजकर परेशान थे। पूरा दिन बीत गया। सारा गली-मोहल्ला छान मारा। समझ में नहीं आ रहा था कि नन्हीं-सी जान को धरती निगल गई या आसमान। रात करीब साढ़े आठ बजे बच्ची की मां थाना गांधीनगर पहुुंची। एसएचओ धर्मपाल सिंह और सब-इंस्पेक्टर महावीर सिंह, दोनों थाने में मौजूद थे। मां उनके आगे रोने लगी, ‘साहब! मेरी फूल-सी बच्ची न जाने कहां गायब हो गई। बहुत तलाश किया, लेकिन कुछ पता नहीं चल रहा है।’ पुलिस ने बड़ी हिकारत से एक नजर उसे देखा, फिर झिड़कते हुए कहा, ‘तो यहां क्यों चली आई? पुलिस कोई जादू की छड़ी है क्या कि घुमाया और लड़की मिल गई! जाओ, खुद ही तलाश करो।’ उसी समय गुड़िया के पिता और चाचा भी थाने आ पहुंचे। वे भी बार-बार पुलिसवालों से हाथ-पांव जोड़ते रहे। बड़ी मुश्किल से रात करीब 10 बजे थानेदार का दिल पसीजा। उसके आदेश पर अपहरण का मामला दर्ज कर लिया गया। घटना की तफ्तीश सब-इंस्पेक्टर महावीर सिंह को मिली, लेकिन महावीर ने मौके पर जाकर छानबीन करने की जरूरत नहीं समझी। उन्होंने परिजनों को बच्ची को तलाशने की हिदायत देकर घर भेज दिया। गोया एफआईआर लिख ली और तफ्तीश भूल गए। अगले रोज भी बच्ची का कुछ पता नहीं चला, न ही कोई पुलिस वाला पीड़ित परिवार के घर पूछताछ करने आया। मां-बाप बेटी को लेकर हलकान रहे। पूरी रात आंखों-आंखों में काट दी। तीसरे दिन भी मां का कलेजा बच्ची को लेकर कचोटता रहा, ‘न जाने कहां है गुड़िया? किस हाल में होगी हमारी बेटी?’ तभी पड़ोसी मनोज के कमरे से लड़की के रोने की आवाज सुनकर उसका कलेजा मुंह को आ लगा- ‘यह तो मेरी बेटी है!’ मां के सीने पर दोहत्थड़ बजने लगे। छाती-कपार पीटते हुए उसने सारा मोहल्ला इकट्ठा कर लिया। पिता ने फोन पर मामले की सूचना पुलिस को दी। तब भी सब-इंस्पेक्टर महावीर सिंह मौके पर नहीं गए। लोगों ने मनोज के कमरे का ताला तोड़ दिया। सामने गुड़िया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी। काटो तो खनू नहीं, सब के सब अवाक् रह   गए। मां-बाप की पीड़ा का पारावार न था। फूट-फूटकर रोने लगे परिजन। पुलिस को हालात से अवगत कराया गया। एसएचओ के निर्देश पर बच्ची को दिलशाद गार्डन स्थित स्वामी दयानंद अस्पताल में ले जाकर भर्ती करा दिया गया। यहां के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरएन बंसल ने बताया कि बच्ची की हालत बहुत नाजुक थी। उसकी तत्काल सर्जरी की गई। प्राइवेट पार्ट से मोमबत्तियों के टुकड़े और पेट में सौ मिलीलीटर तेल की एक शीशी निकली। बच्ची के पेट में भी संक्रमण पाया गया है। इस बीच दुष्कर्म की यह घटना जो ही सुनता, आक्रोश में मुट्ठी ताने विरोध करने दयानंद अस्पताल पहुंचने लगा। लोगों ने हंगामा और प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। ‘आप’ के तमाम कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर पुलिस के विरोध में नारे बुलंद करने लगे। करवां बढ़ता गया और विरोध भी। लोगों की मांग थी कि आरोपी को फौरन गिरफ्तार किया जाए और बच्ची को किसी बड़े अस्पताल में रेफर किया जाए, लेकिन पुलिस और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। 19 अप्रैल को जब मामला हाथ से निकलने लगा, तो दिल्ली सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ. एके वालिया, किरण वालिया और कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित बच्ची को देखने दयानंद अस्पताल पहुंचे। आक्रोशित लोगों ने इनका जमकर विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने किरण वालिया को गाड़ी से बाहर नहीं निकलने दिया। डॉ. वालिया और संदीप दीक्षित के साथ धक्का-मुक्की की गई। वहीं, अब तक इस मामले में दिल्ली पुलिस का चेहरा बेनकाब हो चुका था। प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच मौजूद इलाके के एसीपी बनी सिंह अहलावत दोषी पुलिसकर्मियों को बर्खास्त करने की मांग सुनकर तिलमिला उठे। उन्होंने प्रदर्शन कर रही ‘आम आदमी पार्टी’ की कार्यकर्ता बीनू रावत को दो झापड़ रसीद कर दिए। तब तो लोगों का गुस्सा और फूट पड़ा। थाना गांधीनगर से लेकर अस्पताल तक विरोध करने वाले सड़क पर उतर आए। डॉ. वालिया सहम गए। उनके आदेश पर तुरंत बच्ची को दयानंद अस्पताल से एम्स रेफर कर दिया गया। एम्स के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डीके शर्मा के अनुसार, दुष्कर्म पीड़ित बच्ची को तत्काल एबी-5 की पांचवीं मंजिल पर आईसीयू में शिफ्ट किया गया। इलाज के लिए डिपार्टमेंट आॅफ गायनकोलॉजी, पीडियाट्रिक सर्जरी, पीडियाट्रिक मेडिसन और डिपार्टमेंट आॅफ एनेस्थेसिया के चार डॉक्टरों की टीम बनाई गई। इस बीच लोगों के बढ़ते विरोध व आक्रोश को देख-सुनकर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के भी हाथ-पांव फूल आए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घटना पर हैरानी जताते हुए दिल्ली के उपराज्यपाल से बात की और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने पर जोर दिया। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी मामले की समीक्षा की। उसके बाद पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार को कुछ दिशा-निर्देश दिए। दिल्ली पुलिस मुख्यालय में हड़कंप मच गया। रात करीब आठ बजे पुलिस कमिश्नर के घर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक बैठक हुई, जिसमें विशेष पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) दीपक मिश्रा भी शामिल थे। रात लगभग नौ बजे मीटिंग समाप्त होने के पश्चात पुलिस मुख्यालय में पूर्वी दिल्ली के डीसीपी प्रभाकर ने पत्रकारों को बताया कि एसीपी बीएस अहलावत को दुर्व्यवहार के मामले में निलंबित कर दिया गया है। रेप केस में लापरवाही बरतने वाले थाना गांधीनगर के एसएचओ धर्मपाल सिंह और मामले के विवेचनाधिकरी  महावीर सिंह को सस्पेंड कर दिया गया है। साथ ही पीड़ित परिवार को दो हजार रुपये देने की कोशिश के मामले की जांच विजिलेंस शाखा को सौंप दी गई है। इसके अगले रोज 20 अप्रैल को दिल्ली पुलिस की टीम ने आरोपी मनोज (22) को बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित थाना करजा के चिकनौटा गांव में उसकी ससुराल से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी ने पुलिस पूछताछ में गुड़िया के साथ गुनाह करने का जुर्म कबूल कर लिया है। 22 अप्रैल 2013 को इस मामले के दूसरे आरोपी प्रदीप को भी पुलिस ने बिहार के लखीसराय से गिरफ्तार कर लिया। वह अपने मामा के घर बढ़ैया गांव में छिपा था। प्रदीप मूल रूप से दरभंगा बिहार का रहने वाला है। दोनों अब तिहाड़ जेल में हैं। लेकिन दुष्कर्म की इस घटना के विरोध में लोगों का विरोध जारी है। पुलिस मुख्यालय और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निवास पर लोगों का लगातार धरना-प्रदर्शन जारी था। उनकी मांग है, पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार इस्तीफा दें। भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने आरोपी को फांसी देने की मांग की है। इसके बावजूद अपराधियों के हौंसले बुलंद हैं। राजधानी में रेप की घटनाएं थमने का नाम ले रही हैं।

शातिर दिमाग है मुलजिम
आरोपी मनोज मूल रूप से ग्राम भरथुआ थाना औराई जिला मुजफ्फरपुर बिहार का रहने वाला है। उसके दो भाई और चार बहने हैं। मनोज के पिता बिंदेश्वर शाह दिल्ली के ओल्ड सीलमपुर इलाके में फ्रूट जूस की रेहड़ी लगाते हैं, जबकि मनोज एक फैक्ट्री में मजदूरी करता था। करीब साल भर पहले इसने गांव में लव मैरिज की थी। पत्नी गांव में ही रहती है। मनोज को इसके पहले भी वर्ष 2010 में थाना गांधीनगर पुलिस ने बिना इजाजत किसी के घर में घुसने के मामले में गिरफ्तार किया था। उस वक्त करीब सवा महीने वह जेल में रहा था। वह बहुत शातिर दिमाग है। मुजफ्फरपुर में भी मनोज के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज हैं। बेटे की हरकतों से तंग आकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। इसके बाद उसने पीड़ित के घर के पास किराए पर कमरा लिया था। घटना की शाम मनोज ने दोस्त प्रदीप के साथ अश्लील फिल्म देखी और  दोनों ने शराब भी पी थी। उसके बाद दोनों ने  मासूम के सथ रेप किया। दोनों आरोपियों ने पूछताछ में गुनाह कबूल कर लिया है।
प्रभाकर, डीसीपी, पूर्वी दिल्ली

तारीख बदली तकदीर नहीं
16 दिसंबर को दिल्ली में हुई दामिनी गैंगरेप की घटना से भी दिल्ली पुलिस ने कोई सबक नहीं सीखा। आपको याद होगा पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार साहब, आपने उस वक्त कहा था कि ‘हर कंप्लेंट पर कार्रवाई की जाएगी।’ दिल्ली के लोगों से वादे किए थे, सड़क पर पूरी फोर्स उतरेगी। बिस्तर से उठकर पुलिस अफसर सुरक्षा में लगेंगे। तारीख बदली, दिन बदले, लेकिन तकदीर नहीं बदली। पहले दामिनी शिकार बनी थी और अब गुड़िया! उस रोज 16 दिसंबर था और आज 15 अप्रैल। दरिंदगी की कहानी वही है और पुलिस कमिश्नर भी आप ही हैं। गुस्सा तो बहुत आएगा आपको यह पढ़कर कि आपकी पुलिस के निकम्मेपन की कहानी हम बता रहे हैं। क्या करें, हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जाता कमिश्नर साहब! न तो आपकी पुलिस ने उस घटना से कोई सबक लिया और न ही दिल्ली में जुर्म कम हुआ। उस पिता से क्या कहें कमिश्नर साहब, जिसकी बेटी के साथ रेप हुआ और पुलिस उसी पर मामले को दबाने का दबाव बनाती रही। छह घंटे तक मां को इस कोशिश में थाने में बिठाए रखा कि शायद अब भी मामला रफा-दफा हो जाए?

लापरवाही की हद कर दी
इस मामले पर केंद्र सरकार को सख्त कदम उठाना चाहिए। दिल्ली पुलिस महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अत्याचार पर रोक लगाने में अक्षम रही है। लापरवाही की हद कर दी है।
-ममता शर्मा, अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग

उच्चस्तरीय जांच की मांग
पीड़ित बच्ची के परिजनों ने पुलिस पर रिश्वत देने का जो आरोप लगाया है, वह अपने आपमें शर्मनाक है। इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।
-बरखा सिंह, अध्यक्ष, राज्य महिला आयोग
-जितेंद्र बच्चन

सोमवार, 15 अप्रैल 2013


हवालात की हकीकत

यूपी पुलिस की एक और काली करतूत! महिला पुलिस ने ही मासूम पर ढाया जुल्म! मांगा न्याय, मिली हवालात! भ्रष्ट पुलिस का अमानवीय चेहरा बेनकाब! पूरी रात आरोपी के परिजनों से होती रही सौदेबाजी! बात नहीं बनी, तो दबंग दारोगा ने पीड़ित बच्ची को ही हिरासत में ले लिया! क्या है हकीकत? बुलंदशहर से लौटकर खोजपरक रिपोर्ट...


      उत्तर प्रदेश पुलिस का घिनौना चेहरा! वर्दीधारी गुंडों की करतूत! क्र ाइम कंट्रोल के नाम पर बुलंदशहर पुलिस ने लगाया अखिलेश सरकार को पलीता! रोंगटे खड़े कर देने वाले दिल्ली के सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद भी पुलिस के रवैए में कोई सुधार नहीं आया है। रेप के कानून में कड़े प्रावधान के पश्चात भी पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझती है। बुलंदशहर में दलित बच्ची के साथ हुई घटना ने साबित कर दिया है कि समाज का कमजोर तबका आज भी सुरक्षा के साथ सम्मान का जीवन जीने को दूभर है। दस साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ था। उसकी हालत खराब थी। बेटी के साथ मां मामला दर्ज कराने थाना कोतवाली पहुंची, तो पहले पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं की। बाद में दोनों को रात भर कोतवाली में बिठाए रखा। इस बीच बच्ची का डॉक्टरी परीक्षण भी नहीं कराया। मुसीबत तब और बढ़ गई, जब बच्ची को महिला थाने भेज दिया। वहां भोर में महिला पुलिसकर्मियों ने लड़की के परिजनों को कुछ रुपये दिलाने की बात कहकर मामला दर्ज न कराने को कहा। तब भी पीड़ित पक्ष नहीं माना, तो उन्हें गालियां दी गईं और मासूम बच्ची को ही हवालात में डाल दिया।
 समाज और कानून को ठेंगा दिखाने वाला यह वाकाया 7 अप्रैल, 2013 का है। आठ अप्रैल की सुबह पुलिस की यह शर्मनाक करतूत जंगल में लगी आग की तरह फैलते देर नहीं लगी। शहर में बवाल मच गया। करतूत मीडिया की सुर्खियां बनने लगीं। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर के नेतृत्व वाली पीठ ने 10 अप्रैल को स्वत: इस मामले पर संज्ञान लेते हुए नाराजगी जताई और उप्र सरकार को नोटिस देकर पूछा है कि पुलिस दस वर्षीय लड़की को हिरासत में कैसे रख सकती है?
बुलंदशहर का मीरपुर गांव लोधी बहुल है। मुख्यालय से 22 किमी दूर और हाईवे से महज तीन किमी पूर्व में बसे इस गांव की आबादी करीब 1600 है। गांव में चार घर जाटवों के हैं, बाकी 146 घर लोध राजपूत के हैं। जाटवों में ही एक परिवार 47 वर्षीय रामलाल (परिवर्तित नाम) का है। दलित समुदाय के रामलाल की जिंदगी हमेशा दुश्वारियों और किल्लत से भरी रही। उसके दस बच्चे हैं। चार लड़के और छह लड़कियां। पत्नी का नाम इमरती देवी (परिवर्तित नाम) है। दो कमरों के एक घर में बड़ी मुश्किल से पूरे परिवार का गुजर-बसर होता है। खुद रामलाल किराने की एक दुकान पर 200 रुपये रोज की दिहाड़ी पर काम करता है। सबसे बड़ा बेटा मामचंद (परिवर्तित नाम) 25 साल का है। उसकी शादी हो चुकी है। मेहनत-मजदूरी करके घर-गृहस्थी में हाथ बंटाता है, लेकिन आजकल पीलिया से पीड़ित है। तमाम जगह की खाक छानते हुए जब हम पीड़ित लड़की के घर पहुंचे, तो बच्ची के कई नाते-रिश्तेदार मौजूद थे। दरवाजे पर दो पुलिसकर्मी पहरा दे रहे थे। उन्होंने मुझे तिरछी नजरों से घूरा- लो, एक और मीडिया वाले आ गए!
लड़की की मां और बहनों का रो-रोकर बुरा हाल था। थोड़ी देर पहले ही एक महिला डॉक्टर बच्ची को दवा आदि देकर गई थी। बच्ची एक कंबल ओढ़कर घर की कच्ची फर्श पर लेटी हुई थी और अब भी उसकी हालत ठीक नहीं थी। हमारे कैमरामैन को देखते ही घर की ड्योढ़ी पर बैठी कुछ महिलाओं की आंखें भर आर्इं। गोया न्याय मिलने की आस फिर से जाग उठी हो। जितने मुंह उतनी बात, ‘देखिए साहब जी, दबंगों ने इस बच्ची के साथ कितनी जोर-जबरदस्ती की है?’ मां के एक-एक आंसू दुष्कर्म और पुलिसिया अत्याचार की कहानी बता रहे थे। वैसे यह परिवार हमेशा से गांव के दबंगों के निशाने पर रहा है, लेकिन 7 अप्रैल की शाम करीब साढ़े छह बजे जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। बच्ची गांव में ही किराने की दुकान से कुछ सामान लेने गई थी। वहां से लौटते समय गांव के ही हरेंद्र लोध की नजर उस पर पड़ गई। लड़की के साथ छह साल की उसकी भतीजी भी थी। उसी ने कुछ देर बाद आकर इमरती देवी को बताया कि गांव का हरेंद्र लड़की को जबरन खींचकर खेतों में ले गया है। वहां भिटौर (उपलों का ढेर) की आड़ में उसके साथ गलत काम कर रहा है।
इमरती देवी का कलेजा मुंह को आ लगा। वह करीब-करीब दौड़ती हुई घर से बाहर निकली। खेतों के बीच पतली-सी सड़क पर उसकी मासूम बच्ची बेहोशी की हालत में पड़ी थी। उसके चेहरे और पूरे शरीर पर काटने और जख्म के निशान थे। बेटी की दुर्दशा देखकर मां का कलेजा कचोटने लगा। वह छाती-कपार पीटती हुई चीखने-चिल्लाने लगी। पास-पड़ोस के तमाम लोग जुट आए। जैसे-तैसे बेहोश बेटी को घर लाया गया। गांव के ही एक-दो लोगों ने मामले की खबर पुलिस को दी, लेकिन कोई नहीं आया। गुस्साए परिजनों ने पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।
इमरती देवी के अनुसार, गांव के कई राजपूतों ने उसका घर घेर लिया। दबंगों का कहना था कि लड़की की जो भी कीमत है, उसे लेकर मामला यहीं रफा-दफा कर दो। थाना-पुलिस करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट-कचेहरी में लड़की ने मुंह खोला, तो उसे पत्थरों से   मार-मारकर हम उसकी जान ले लेंगे, लेकिन परिजन साहस बटोरकर रात करीब 9 बजे पीड़ित बच्ची के साथ थाना कोतवाली पहुंच गए। इंस्पेक्टर कवींद्र नारायण मिश्र कोतवाली में मौजूद नहीं थे। सेकंड अफसर सीनियर सब इंस्पेक्टर पीआर शर्मा से इमरती ने घटना के बारे में बताया। उन्हें लिखित में आरोपी हरेंद्र के खिलाफ एक तहरीर भी दी, लेकिन पुलिस मामला दर्ज न कर बड़े (कोतवाल) साहब के आने की बात कर समय जाया करती रही। साहब को न आना था और न ही आए, क्योंकि इंस्पेक्टर मिश्र उस रोज अवकाश पर थे। इस बीच बताया जाता है कि शर्मा का आरोपी पक्ष से भी संपर्क बना रहा। उनका इरादा शायद दबंगों से कुछ रुपये-पैसे दिलवाकर समझौता करवाना था, इसलिए रेप का केस दर्ज न कर मामले को टालते रहे।
रात करीब तीन बजे एसएसआई शर्मा पीड़ित बच्ची को महिला थाना ले गए, जो थाना कोतवाली के बगल में ही है। महिला थानाध्यक्ष गयाश्री चौहान और सब इंस्पेक्टर सरिता द्विवेदी कार्यालय में मौजूद थीं। इमरती देवी ने उनसे भी दुष्कर्म का मामला दर्ज करने की फरियाद की, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इमरती देवी बताती हैं कि महिला थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें खूब गालियां दीं, फिर उनकी बेटी को दो झापड़ मारकर हवालात में ठूंस दिया। मैं वहीं लॉकअप के बाहर बैठी रही। रात पहाड़ बन गई, बड़ी मुश्किल से बीती। सुबह 8 अप्रैल को लोगों को पता चला तो महिला थाना और कोतवाली पर भीड़ बढ़ने लगी। इस बीच महिला पुलिसकर्मियों ने जल्दी से पीड़ित बच्ची को हवालात से बाहर निकाल दिया।
लेकिन तब तक मीडिया के माध्यम से मामले की भनक एसएसपी गुलाब सिंह और पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय कुमार साहनी को लग चुकी थी। ये दोनों अधिकारी थाना कोतवाली आ गए। उन्होंने माना कि मामला संगीन है और विक्टिम को किसी भी स्थिति में हवालात में बंद नहीं किया जा सकता। उनके आदेश पर थाना कोतवाली पुलिस ने हरेंद्र लोध के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कर बच्ची को मेडिकल के लिए हॉस्पिटल भेज दिया। इसके थोड़ी देर बाद पुलिस ने मीरपुर निवासी दो बच्चों के पिता आरोपी हरेंद्र को गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट और जान से मारने की धमकी का भी आरोप है, लेकिन खुद हरेंद्र ने पुलिस के सामने ही रेप करने की बात से इंकार किया है। उसका कहना है, ‘घटना की शाम बच्ची उसके खेत में टमाटर तोड़ रही थी। उसने मना किया और उसे पकड़कर दो थप्पड़ मारे और वहां से भगा दिया। इसके अलावा उसने और कुछ नहीं किया।’ लेकिन इमरती देवी उस शाम का वाकया याद आते ही कांप जाती हैं। वह रुंधे गले से बताती हैं, ‘दबंग कहते हैं कि वे मरद हैं। मन मचल गया, तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा। असली कसूर तो तुम लोगों का है। क्यों लड़की को अकेली घर से बाहर भेजती हो? एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी! हमारा घर जलाने और बेटी कोे मारने की धमकी दे रहे हैं दबंग। गांव की पंचायत भी उन्हीं के साथ है। हम पर बराबर मुकदमा वापस लेने का दबाव डाला जा रहा है।’
8 अप्रैल को जिलाधिकारी जीएस प्रियदर्शी ने मामले की विस्तृत जानकारी मांगी, तो शाम तक एसएसपी गुलाब सिंह ने मामले को ठंडा करने की नीयत से महिला थाना की दो सिपाही नीरू और सोनिया को निलंबित कर दिया। सोचा था मामला दब जाएगा, लेकिन लोगों का विरोध लगातार जारी रहा, तो महिला थानाध्यक्ष गयाश्री चौहान और वहीं की एक सब इंस्पेक्टर सरिता द्विवेदी को भी लाइन हाजिर कर दिया गया। इन सभी पर पीड़ित बच्ची को लॉकअप में बंद करने का आरोप है। एसएसपी के अनुसार, 9 अप्रैल को डॉक्टरी रिपोर्ट मिली। मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि नहीं हुई है। इस मामले की विवेचना क्षेत्राधिकारी (नगर) वैभव नारायण मिश्र कर रहे हैं। 10 अप्रैल को प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) अरुण कुमार ने बताया कि पुलिस अधीक्षक (नगर) की रिपोर्ट पर लड़की को हिरासत में रखने के मामले में महिला पुलिस थाना प्रभारी गयाश्री चौहान और उपनिरीक्षक सरिता द्विवेदी को निलंबित कर दिया गया है। साथ ही इस संबंध में अज्ञात पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा भी दर्ज किया गया है।  लेकिन अब इस मामले ने सियासी रंग लेना शुरू कर दिया है। राजनीतिक दल सक्रि य हो गए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता संतोष जाटव 10 अप्रैल को मीरपुर गांव पहुंचे और पीड़ित परिवार से पूछताछ की। उनके अलावा और भी नेताओं के गांव पहुंचने का दौर जारी है।

कोतवाली पुलिस पर कार्रवाई क्यों नहीं की?



आईपीएस अधिकारी व एसपी (सिटी) अजय कुमार साहनी दुष्कर्म व पुलिस के खिलाफ दर्ज मामले की जांच कर रहे हैं। उन्होंने माना कि थाना कोतवाली (नगर) के सीनियर सब इंस्पेक्टर पीआर शर्मा और कुछ अन्य पुलिसकर्मी भी जांच के दायरे में हैं। पेश है उनसे की गई बातचीत के मुख्य अंश:
दुष्कर्म का मामला होते हुए भी पुलिस ने तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की?
कार्रवाई तो की गई है। पुलिस ने 7 अप्रैल (घटना) की रात साढ़े 11 बजे ही इस मामले के आरोपी के खिलाफ दफा 376 और 306 के तहत मामला दर्ज कर थाना कोतवाली पुलिस ने जांच शुरू कर दी थी। अब इस मामले की विवेचना सीओ (क्षेत्राधिकारी) सिटी वैभव कृष्ण कर रहे हैं।
फिर मामला इतना बिगड़ कैसे गया? क्या कोतवाली पुलिस ने पीड़ित बच्ची को   हिरासत में रखने का आदेश दिया था?
     कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर कवींद्र नारायण मिश्र उस रोज अवकाश पर थे। एसएसआई पीआर शर्मा का कहना है कि उन्हें पेशबंदी के तहत फंसाया जा रहा है। मामले की जांच की जा रही है। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ जरूर कार्रवाई की जाएगी।
महिला थाना के अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। कहीं यह लीपापोती का प्रयास तो नहीं है?
    प्रारंभिक रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है। हमें पैथालॉजिकल रिपोर्ट का इंतजार है। वहीं, अब तक चार महिला पुलिसकर्मियों महिला थाना के एसओ गयाश्री चौहान, एसआई सरिता द्विवेदी और दो सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है।
पीड़ित बच्ची का अगर 7 अप्रैल की रात ही डॉक्टरी परीक्षण हो गया था, तो उसे परिजनों के हवाले क्यों नहीं किया गया? बच्ची को हिरासत (हवालात) में क्यों रखा गया?
   मामले की जांच की जा रही है। हम यह भी देख रहे हैं कि 8 अप्रैल की शाम तक बच्ची को महिला थाने में रखने का क्या औचित्य था? पीड़ित लड़की के बड़े भाई की तहरीर के आधार पर महिला पुलिस थाना के अज्ञात कर्मियों के खिलाफ भी बच्ची को हवालात में रखने का मामला दर्ज कर लिया गया है। शीघ्र ही आरोपी पुलिसकर्मियों के नाम उजागर हो जाएंगे।
पीड़ित परिवार को जान-माल का खतरा है?
पीड़ित परिवार की मांग पर दो पुलिस वाले तैनात किए गए हैं। साथ ही वे हमारी निगरानी में हैं।

बढ़ते अपराध के चलते हटाए गए डीजी


प्रदेश में हत्या, दुष्कर्म, लूट और डकैती की घटनाओं पर नजर डालें तो यूपी के प्रमुख शहर यानी राजधानी लखनऊ, कानपुर, मेरठ, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद, गोरखपुर और बरेली में ही पिछले एक साल में 1059 हत्याएं की गर्इं, 382 दुष्कर्म, 906 लूट की वारदात और 64 डकैतियां पड़ीं। लखनऊ में पिछले साल अप्रैल से अब तक 126 हत्याएं, 42 दुष्कर्म, 35 लूट और 4 डकैती की घटनाएं हो चुकी हैं। वहीं राजधानी से महज 80 किलोमीटर दूर कानपुर का हाल और भी बुरा है। पिछले साल अप्रैल से इस साल मार्च तक यहां 253 हत्याएं, 75 दुष्कर्म, 146 लूट और 10 डकैतियां पड़ीं। मेरठ भी अपराध के मामले में पुलिस के लिए बड़ी चुनौती साबित होता दिख रहा है। यहां अप्रैल 2012 से अब तक 211 हत्याएं, 62 बलात्कार, 246 लूट की घटनाएं और 22 डकैतियां पड़ चुकी हैं। अन्य शहरों की बात करें, तो आगरा में जहां 2012 में 70 हत्याएं, 32 दुष्कर्म, 230 लूट और 3 डकैती की घटनाएं हुर्इं। वहीं इस साल अब तक 28 हत्याएं, 13 दुष्कर्म, 40 लूट और तीन डकैतियां पड़ चुकी हैं। इलाहाबाद में 2012 में 102 हत्याएं, 49 दुष्कर्म, 47 लूट और 3 डकैती की घटनाएं हुर्इं। वहीं 2013 में अब तक तीन महीने में यहां 22 हत्याएं, 5 दुष्कर्म, 7 लूट की घटनाएं हो चुकी हैं। इसी तरह बरेली में 2012 में 84 हत्याएं, 48 दुष्कर्म, 68 डकैती और दो लूट की घटनाएं हुर्इं, जबकि 2013 में अब तक 12 हत्याएं, 6 दुष्कर्म, 12 लूट और तीन डकैती की घटनांए हो चुकी हैं। गोरखपुर में 2012 में 57 हत्याएं, 28 दुष्कर्म, 39 लूट और 7 डकैती की घटनाएं दर्ज की गर्इं, जबकि इस साल अभी तक 7 हत्याएं, 5 दुष्कर्म, 8 लूट और 6 डकैती यहां हो चुकी हैं। वहीं वाराणसी में 2012 में जनवरी से दिसंबर तक 21 हत्याएं हुर्इं, 9 दुष्कर्म, 14 लूट की घटनाएं हुर्इं, जबकि इस साल अब तक यहां 13 हत्याएं हो चुकी हैं, इनके अलावा 8 दुष्कर्म, 14 लूट और एक डकैती की घटना दर्ज हो चुकी है।
प्रदेश में बढ़ते अपराध के चलते राज्य सरकार ने पुलिस महानिदेशक अंबरीश चंद्र शर्मा को 12 अप्रैल की शाम हटा दिया। इनकी जगह पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नित बोर्ड के चेयरमैन देवराज नागर को राज्य का नया पुलिस महानिदेशक बनाया गया है। शर्मा को डीजी पीएसी पद की जिम्मेदारी सौपी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान


उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में लेने के बाद प्रदेश के एडीजी अरुण कुमार ने  इस बात की पुष्टि की है कि 10 अप्रैल की शाम दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं। इस मामले की जांच बुलंदशहर के  पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय कुमार साहनी को सौंपी गई है, लेकिन हैरानी इस बात की है कि थाने में आपराधिक कृत्य करने वाले पुलिसकर्मियों को पुलिस अभी चिन्हित तक नहीं कर पाई है। एसपी साहनी के अनुसार, थाना कोतवाली के एसएसआई पीआर शर्मा की तहरीर पर अज्ञात पुलिसवालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। लोगों का कहना है कि यह महज खानापूर्ति की जा रही है। क्योंकि 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में खुद का बचाव भी करना है।
महिला थाने के जिस हवालात में लड़की को रखा गया, उसके बारे में नई थाना प्रभारी पुष्पा शर्मा ने बताया कि यह हावालात के साथ-साथ सुरक्षा केबिन भी है। वहीं, इस बीच पीड़ित बालिका को हवालात में रखकर उत्पीड़न किए जाने के मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस एचके सेमा ने प्रदेश के मुख्य सचिव, डीजीपी, प्रमुख सचिव (गृह) और एसएसपी बुलंदशहर को नोटिस दी है। चेयरमैन ने इन अधिकारियों को एक माह का मौका देते हुए घटना और  की गई कार्रवाई के संदर्भ में आख्या मांगी है। लेकिन 12 अप्रैल को ‘हमवतन’ से फोन पर बातचीत करते हुए निलंबित महिला दारोगा ने जो कहा, उससे इस मामले में एक बड़ा मोड़ आ गया है। दंडित महिला पुलिसकर्मियों का कहना है कि असली मुलजिम कोई और है। उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है। निलंबित महिला सिपाहियों के अनुसार, दुष्कर्म पीड़ित बच्ची को कोतवाली के एसएसआई शर्मा के आदेश पर हवालात में डाला गया था। निलंबित एसओ गयाश्री चौहान और एसआई   सरिता द्विवेदी ने बताया कि 7 अप्रैल की रात उनकी नामौजूदगी में करीब साढ़े तीन बजे बच्ची को महिला थाने लाया गया। सुबह जब वह आई तो बच्ची को पूछताछ के लिए कोतवाली नगर बुलाया गया था। इसके बाद थानाध्यक्ष गयाश्री चौहान क्राइम मीटिंग में चली गई। उन्हें तो इस घटना के बारे में जानकारी ही नहीं है। बच्ची का मेडिकल रात साढ़े तीन बजे हो गया था। इसके बाद बच्ची को उसे परिजनों के हवाले कर दिया जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं किया गया। क्यों? एसआई सरिता द्विवेदी का कहना है कि जब वह 8 अप्रैल की सुबह थाने में आर्इं, तो उस समय बच्ची लॉकअप में नहीं थी। इसके बाद वह राउंड पर चली गई। उन्होंने सिपाही नीरू और सोनिया से बात की। दोनों ने बताया कि एसएसआई कोतवाली व एक दरोगा बच्ची को लेकर आए थे और उन्होंने ही कहा कि इसे हवालात में डाल दो, कहीं भाग न जाए। उन्हें कुछ पता नहीं था। अफसर के आदेश की नाफरमानी भी वह नहीं कर सकती थीं।

पंचायत ने सुनाया फरमान, दलितों में बढ़ी दहशत

15 अप्रैल को मीरपुर गांव में कथित दुष्कर्म मामले को लेकर पंचायत की गई। पंचों ने पीड़ित दलित परिवार को 40 हजार रुपये देते हुए मामले को  वापस लेने का दबाव बनाया। साथ ही पंचायत ने कहा है कि जब डॉक्टरी रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है, तो आरोपी हरेंद्र को पुलिस फौरन रिहा करे। इससे दलित परिवार की दहशत और बढ़ गई है। पीड़ित परिजनों का कहना है, ‘सर्वण हमें गांव से निकालने की साजिश रच रहे हैं।’
-जितेन्द्र बच्चन

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

जुर्म की रियासत

हर रोज यहां होता है 5 महिलाओं से बलात्कार! 10 लड़कियों से छेड़छाड़! दो कत्ल और 9 दूसरी वारदात! ये है आज की दिल्ली की दास्तान! सोनिया की रियासत! मनमोहन की राजधानी! यहां पास होता है संसद में कानून, फिर भी क्राइम पर नहीं है कंट्रोल! क्राइम कैपिटल बन चुकी है दिल्ली! क्योंकि यहां जुर्म है ज्यादा!