शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013
शनिवार, 14 सितंबर 2013
मोदी : मुकद्दर का सिकंदर
नरेंद्र दामोदर मोदी। गुजरात के मुख्यमंत्री पद से भाजपा के पीएम पद के दावेदार तक और 'मौत के सौदागर' से 'विकास पुरुष' वाली छवि गढ़ने तक, मोदी ने लंबा न सही, लेकिन दिलचस्प सफर जरूर तय किया है।
13 साल में सीएम की कुर्सी तक
शुरुआत से हिंदुत्व विचारधारा की ओर झुकाव रखने वाले 62 वर्षीय मोदी के बारे में उनके सहयोगियों का कहना है कि वह अपने लक्ष्यों से डिगना नहीं जानते। हर मुश्किल को मौके में बदलने की महारत उन्हें हासिल है। वह हिंदूवादी दक्षिणपंथी राजनीति में पहले प्रचारक बने और 13 साल के अंतराल में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। कमान मिली देश के सबसे विकसित राज्य की, हालांकि तब तक उन्हें किसी तरह का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं था।
'भुला देते हैं अपने मददगारों को'
इस लंबी सियासी पारी में उनकी जिंदगी को करीब से जानने वाले और आलोचक यह इल्जाम भी लगाते हैं कि मोदी उन लोगों को भुला बैठते हैं, जिनके सहारे सीढ़ी चढ़ते हैं। इनमें से एक लालकृष्ण आडवाणी हैं, जिन्होंने भाजपा के हीरो होने के वक्त मोदी को चमकाया, निखारा और उन्हें इस लायक बनाया कि अपने समकक्षों में खड़े होकर भी वह कतार से आगे दिखें। राजनीतिक विश्लेषक जीवीएल नरसिम्हा राव का कहना है, "वह दृढ़ता रखते हैं। ईमानदार और मेहनती हैं। वह समझौता नहीं करते, भले नतीजा कुछ हो। अस्थायी जीत के लिए मोदी खुद को नहीं बदलेंगे।"
पिता चलाते थे चाय की दुकान
मेहसाणा के एक मध्य परिवार में जन्मे मोदी के पिता दामोदरदास चाय की एक छोटी दुकान चलाते थे। उनका बेटा केतली में भरकर चाय स्टेशन में मुसाफिरों तक पहुंचाया करता था। मकान भी कोई खास नहीं था। जो उन्हें करीब से जानते हैं, बताते हैं कि वह स्कूल में औसत ही थे। लेकिन मोदी की मानें, तो वह समर्पित हिंदू रहे हैं, जिन्होंने चार दशकों तक नवरात्रि के दौरान हमेशा उपवास को चुना। जीवनी लिखने वाले निलंजन मुखोपध्याय का कहना है कि मोदी की उम्र काफी कम थी, जब उनकी शादी हो गई लेकिन गौना नहीं हुआ।
सीक्रेट रखी शादी की बात
उन्होंने अपनी शादी को हमेशा सीक्रेट रखा, वरना वह आरएसएस में प्रचारक न बन पाते। वह कई बार महीनों के लिए अपने घर गायब हो जाया करते थे। दूरदराज के इलाकों में रहते या फिर हिमालय की तरफ चले जाते। एक बार गीर के जंगलों में एक छोटे मंदिर में भी रहे। आखिरकार 1967 में उन्होंने परिवार से अलग होने का फैसला किया। वह 1971 की भारत-पाक जंग के बार औपचारिक रूप से आरएसएस में शामिल हुए थे। दिल्ली के आरएसएस दफ्तर में आए, तो उनकी दिनचर्या बड़ी कठिन थी। सवेरे 4 बजे जागना, वरिष्ठ सहयोगियों के लिए चार-नाश्ते का इंतजाम करना और पत्रों का जवाब देना। वह बर्तन भी मांजते और झाड़ू भी लगाते थे।
सोमवार, 26 अगस्त 2013
अध्यात्म और अनाचार
आसाराम के आश्रम में नाबालिग लड़की से दुष्कर्म! विवादित संत ने फिर किया एक बार अपनी हरकतों से देश को शर्मसार! अब पुलिस और कानून से छिपते फिर रहे हैं बाबा! संत समाज को लगा धक्का! देश में गुस्से की लहर। घटना से तमाम भक्त आहत! कई ने बताया साजिश! क्या है सच?
-जितेन्द्र बच्चन
सत्संग कर करोड़ों में खेलनेवाले 72 साल के आसाराम बापू पर इल्जाम और तोहमत कोई नई बात नहीं है। बापू और विवादों का चोली-दामन का साथ है, लेकिन इस बार उन पर जो आरोप लगे हैं, उसने अब तक दूसरे तमाम इल्जामों को पीछे छोड़ दिया है। आरोप है एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण का। उस लड़की के शोषण का, जो गई तो थी उनके गुरुकुल में शिक्षा, संस्कार और दीक्षा की आस लेकर, लेकिन लड़की की मानें तो आसाराम ने न सिर्फ उसे निराश किया, बल्किअकेले में उसके साथ ज्यादती तक कर डाली। छिंदवाड़ा के गुरुकुल में पढ़ाई कर चुकी लड़की के माता-पिता ने इस सिलिसले में जो रिपोर्ट लिखाई है, वह बेहद संगीन है। लड़की के घरवालों को आश्रम की वार्डन ने 8 अगस्त को फोन कर बताया था कि उनकी बेटी की तबियत बिगड़ गई है और बापू ने दूर से ही मंत्र फूंककर उनकी बेटी को फिलहाल ठीक कर दिया है, लेकिन चूंकि उस पर भूत-प्रेत का साया है, उसे पूरी तरह ठीक होने के लिए बापू को अनुष्ठान करना होगा। लड़की के घरवाले बेटी को लेकर घर आ गए। बाद में अनुष्ठान के लिए बाबा से मिलने की कोशिश की, तो उन्हें बताया गया कि बाबा 14 अगस्त 2013 को जोधपुर के आश्रम में मिलेंगे। लड़की के माता-पिता अनुष्ठान के लिए बेटी को लेकर वहां पहुंच गए। वहां बापू ने उनके ठहरने का इंतजाम करवा दिया और 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के दिन अनुष्ठान के बहाने उनकी बेटी के साथ उसी आश्रम में यौन शोषण किया। लड़की ने जब विरोध किया, तो बाबा ने उसका मुंह बंद कर दिया और जान से मारने की धमकी दी।
शिकायत के मुताबिक, लड़की डर गई थी। पूरा परिवार जब घर लौटा, तो 17 अगस्त को लड़की ने अपने घरवालों से सारी बात बताई। माता-पिता पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा। जानकारी करने पर पता चला कि 18 से 20 अगस्त तक दिल्ली के रामलीला मैदान में बापू शिविर कर रहे हैं। पीड़ित परिवार दिल्ली आकर मध्य जिला के थाना कमला मार्केट पुलिस से मिला। पुलिस भी हैरान रह गई। लड़की का मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत बयान कराया। उसमें भी पीड़िता ने आसाराम बापू पर जोर-जबरदस्ती करने की बात कही। इसके बाद लड़की का मेडिकल कराया गया। यौन शोषण की पुष्टि होते ही पुलिस ने आसाराम बापू के खिलाफ रेप (दफा- 376), छेड़खानी (दफा-354), धमकी देने (दफा- 509) और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट यानी पोस्को की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद आगे की कार्रवाई के लिए मामला जोधपुर पुलिस को भेज दिया।
1941 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पैदा हुए आसाराम हरपालानी के पिता कोयला और लकड़ी बेचते थे। बाद में विभाजन के समय यह परिवार पाकिस्तान से गुजरात आ गया। यहां आसाराम हरपालानी को करीब 10 एकड़ उपजाऊ जमीन मिली, जिसमें उन्होंने अपना पहला आश्रम बनाया। इसके बाद जल्द ही आसाराम ने अपना सरनेम हरपालानी की जगह बापू कर लिया। आश्रम के प्रवक्ता मनीष बगाड़िया के अनुसार, आज दुनिया भर में आसाराम के पास 425 आश्रम, 1,400 समिति, 17,000 बाल संस्कार केंद्र और 50 गुरुकुल हैं। उनका दावा है कि भारत और विदेश में आसाराम बापू के पांच करोड़ से अधिक अनुयायी हैं। क्योंकि हिंदू परंपरा में संत होना समाज की अच्छाईयों से भी ऊपर होना माना जाता है, लेकिन जब एक संत पर ही बार-बार विवादों के बादल घिरने लगें, तो संत की शुचिता पर सवाल खड़े होना लाजमी है। आसाराम बापू पर यौन शोषण का आरोप असल में उन पर जड़ चुके सिलिसलेवार आरोपों की नई कड़ी है। सबसे सनसनीखेज मामला जुलाई 2008 में सामने आया था, जब आसाराम के अहमदाबाद आश्रम में पढ़ने वाले दो मासूम बच्चों दिनेश वाघेला (11) और अभिषेक वाघेला (10) की लाश आश्रम के साथ से ही बहने वाली साबरमती नदी में मिली थी। इस रहस्यमयी मौत के बाद बच्चों के घरवालों ने इस घटना का जिम्मेदार आश्रम को ठहराया था और मामले की जांच कर रही पुलिस ने भी अपने हलफनामे में आश्रम में चलने वाले काले जादू और दूसरी रहस्यमयी कारस्तानियों का खुलासा किया था।
मौत का यह हंगामा थमा भी नहीं था कि मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में आसाराम के आश्रम स्कूल में साढ़े चार साल के बच्चे रामकृष्ण यादव की लाश मिली। एकदम से हड़कंप मच गया, फिर अगले ही दिन आश्रम के बाथरूम में एक और बच्चे की रहस्यमयी हालत में मौत हो गई। दिसंबर 2009 में आसाराम बापू पर उन्हीं के एक पूर्व भक्त राजू चंडोक ने अपनी हत्या की कोशिश करने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। राजू रात में मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे, तभी दो लोगों ने हत्या के इरादे से उन पर गोली चला दी थी। इस मामले में गुजरात पुलिस ने आसाराम को नामजद किया है। राजू चंडोक का कहना है कि आसाराम बापू के आश्रम में अध्यात्म की आड़ में महिलाओं का यौन शोषण किया जाता है।
संसार को मोह-माया से मुक्त होने का प्रवचन देने वाले विवादित संत आसाराम बापू जमीन विवादों में भी उलझे हुए हैं। इन पर रतलाम में करीब 100 एकड़ जमीन कब्जा करने का मामला दर्ज है। घटना 2001 की है। मंगलया मंदिर के पास आसाराम के योग वेदांत समिति ने 11 दिन के लिए एक जमीन ली थी, लेकिन उसके बाद भी समिति ने जमीन खाली नहीं की। करीब 700 करोड़ रुपये की यह जमीन जयंत विटामिन्स लिमिटेड की है। इस जमीन के मामले में आसाराम, उनके बेटे नारायण सार्इं और कुछ अन्य लोगों को अरोपी बनाया गया है। इसके अलावा राजौरी गार्डन दिल्ली की बुजुर्ग महिला सुदर्शन कुमारी ने भी आसाराम आश्रम की दिल्ली इकाई पर आरोप लगाया है कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए उसके घर की एक मंजिल आश्रम की प्रापर्टी बना दी गई।
इस तरह कभी संत आसाराम के दामन पर दाग लगा, तो कभी उनकी जुबान ने ही उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया। बाबा कई बार कुछ ऐसा बोलते रहे हैं कि विवाद खड़ा हो जाता है। दिल्ली निर्भया दुष्कर्म मामले को लेकर जब दिल्ली समेत पूरा देश बेजार था, तो 7 जनवरी 2013 को आसाराम ने ऐसा ऊटपटांग बयान दिया कि पूरे देश के लोग सन्न रह गए। बाबा का कहना था कि अगर दामिनी लड़कों को भैया कह देती और छोड़ने की बात करती तो बच सकती थी। आसाराम बापू की इस बात ने पूरे देश के लोगों की भावनाओं को आहत किया। उनके बयान पर कोहराम मच गया, तो अपने बचाव में आसाराम मीडिया पर ही तोहमत जड़ने लगे कि उनकी बात को गलत तरीके से रखा गया है। 10 अप्रैल 2012 को इंदौर में एक प्रवचन के दौरान आसारान ने अपना आपा खोकर अपने ही एक सेवादार को अपशब्द कहे। उसे पागल कहा और कपड़े उतारकर शिविर से बाहर भगाने का आदेश दे दिया।
9 अक्टूबर 2011 को दिल्ली में यमुना के किनारे एक ध्यान शिविर के दौरान बड़बोले बाबा ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में कहा कि राहुल गांधी कम बुद्धि वाले बबलू हैं। 27 जून 2011 को आसाराम ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था कि गांधी को देश छोड़कर चले जाना चाहिए था। पिछली होली के दौरान जब महाराष्ट्र का एक बड़ा इलाका भीषण सूखे की चपेट में था, उस वक्त सूरत में भक्तों के साथ होली खेली और हजारों लीटर पानी बर्बाद किया। विरोध हुआ, तो उन्होंने महाराष्ट्र में भी डंके की चोट पर होली खेली।
ताजा मामले में आसाराम के प्रवक्ता सुनील वानखेड़े का दावा है कि 15 अगस्त को बापू जोधपुर में नहीं थे। यह बापू को बदनाम करने की कोशिश है। सब विरोधियों की चाल है। खुद आसाराम बापू ने भी कहा कि जिस रात यह वारदात हुई, उस रात वह आश्रम में नहीं थे। जबकि जोधपुर के जिस फार्म हाउस में यह घटना हुई, उसके मालिक रणजीत देवड़ा ने पूछताछ में बताया कि 15 अगस्त को आसाराम बापू वहीं थे और पीड़ित बच्ची अपने माता-पिता के साथ यहां आई थी। यह खबर आते ही आसाराम बापू अपने बयान से बदल गए। उन्होंने कहा, ‘मैं घटना के दिन आश्रम में मौजूद था, लेकिन लड़की को कुछ लोगों ने भटका दिया है। भगवान बुद्ध पर भी ऐसे आरोप लगे थे, पर सच्चाई सामने आ जाएगी। अगर वे मुझे सलाखों के पीछे डालें, तो मैं हंसते हुए जेल जाना चाहता हूं। मैं जेल को वैकुंठ जैसा मानता हूं।’
आसाराम ने यह तो मान लिया कि घटना के रोज वह आश्रम में मौजूद थे, लेकिन आगे जो उन्होंने कहा वह धर्मनिषिद्ध है। अनाचार है। आसाराम जेल को वैकुंठ बताते हैं। इसका मतलब, जेल में जितने कैदी है, उन्हें किसी गुनाह की सजा नहीं मिली है? संत तो सत्य के प्रतीक होते हैं। उन्हें जांच से कैसी आंच? अगर आसाराम बापू निर्दोष हैं, तो उन्हें इस तरह के ऊल-जुलूल उदाहरण देने की क्या जरूरत है? उन्हें खुद पुलिस अधिकारी को बुलाकर अपनी सफाई पेश करनी चाहिए थी। इस देश की करोड़ों जनता बाबा के साथ होती, लेकिन वे तो लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं। ताजा जानकारी के मुताबिक बापू मध्य प्रदेश में कहीं शरण लिए हुए हैं, फिर कौन सच है कौन झूठ, कैसे होगा इसका फैसला?
अध्यात्म की आड़ में अनाचार का खेल खेलने वाले बाबा को लेकर पूरे देश में गुस्से की लहर है। 22 अगस्त को आरोपी आसाराम बापू के खिलाफ राजस्थान और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में प्रदर्शन हुए। वाराणासी और जोधपुर में बाबा के पुतले फूंके गए। दिल्ली, कोटा, और कानपुर में उनके फोटो पर जूते-चप्पलों की माला पहनाई गई। 23 अगस्त को यह मामला राज्यसभा में उठाया गया। कांग्रेस सांसद प्रभा ठाकुर ने उमा भारती के उस बयान पर भी आपत्ति जताई, जिसमें आसाराम के दुष्कर्म मामले को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी से जोड़ा गया है। वहीं, 23 अगस्त को दिल्ली में बाबा के दर्जनों भक्तों ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर आसाराम के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद करने की मांग की।
इस बीच पुलिस कमिश्नर बीजू जॉर्ज जोसेफ, जोधपुर के डीसीपी (वेस्ट) अजयपाल लांबा और इस मामले के जांच अधिकारी एसीपी चंचल मिश्रा पीड़ित लड़की को लेकर मड़ाई के उस फार्म हाउस पर गए, जहां की घटना बताई गई है। पुलिस आसाराम के खिलाफ सुबूत इकट्ठे करने में लगी है। महिला आयोग के दखल देने पर एसआईटी भी मामले की जांच कर रही है। छिंदवाड़ा में गुरुकुल की वार्डन से भी इस मामले में पूछताछ की गई है। पुलिस का कसता शिकंजा देखकर अहमदाबाद के अपने आश्रम से आसाराम गायब हो गए हैं। आश्रम के मीडिया कॉर्डिनेटर का कहना है कि उन्हें बाबा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वह एकांतवास में चले गए हैं, लेकिन आसाराम बापू यह भूल रहे हैं कि काननू से बड़ा कोई नहीं होता। जोधपुर पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। आज नहीं तो कल बाबा को अदालत के कटघरे में खड़ा होना ही होगा। क्योंकि उन पर जो आरोप हैं, वे बेहद संगीन हैं और सभी धाराएं गैर जमानती हैं।
अनुष्ठान की आड़ में आघात
मैं मूलत: शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश की रहने वाली हूं। हाल में छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) स्थित आसाराम बापू के गुरुकुल में रह रही थी। 6 अगस्त 2013 को मेरी तबीयत खराब हो गई। 8 अगस्त को मेरे माता-पिता को सूचना दी गई। वे छिंदवाड़ा आ गए। उन्हें बताया गया कि तबीयत थोड़ी ठीक है, लेकिन झाड़-फूंक की जरूरत है। यह काम बापू खुद करेंगे। वे अभी जोधपुर में हैं, इसलिए आप जोधपुर चले जाएं। 15 अगस्त को हम लोग जोधपुर पहुंचे। आसाराम ने मेरे माता-पिता से कहा कि मुझे आश्रम में छोड़ दें। अनुष्ठान की जरूरत है। उसी रात आसाराम मुझे अलग कमरे में ले गए और मेरे साथ गलत काम किया, फिर जान से मारने की धमकी देकर मुझे अगले दिन छिंदवाड़ा जाने को कहा। मैं बहुत डरी हुई थी। छिंदवाड़ा न जाकर माता-पिता के साथ शाहजहांपुर चली गई। वहां सारी बात मां से बताई। उन्होंने पिता से पूरा वाकया बताया। पिताजी ने बाबा के बारे में पता किया। ज्ञात हुआ कि दिल्ली के रामलीला मैदान में 18 से 20 अगस्त के बीच सत्संग होने वाला है। हम लोग दिल्ली गए, लेकिन हमें बापू से मिलने नहीं दिया गया। परेशान होकर हम 19 अगस्त को थाना कमला मार्केट पुलिस के पास पहुंचे। मेरे साथ आसाराम ने ही गलत काम किया है। अनुष्ठान की आंड़ में आघात पहुंचाया गया है। चाहें तो कोई भी जांच करा ली जाए। (पीड़ित किशोरी का बयान)
हमले के डर से भूमिगत हुआ परिवार
25 अगस्त, 2013 को शाहजहांपुर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी से मिली जानकारी के अनुसार, विवादित संत आसाराम बापू पर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली लड़की का पूरा परिवार हमले के डर से भूमिगत हो चुका है। पीड़ित परिवार को भीय है कि उनके घर पर बाबा के समर्थक हमला कर सकते हैं। चांदापुर रोड स्थित आसाराम आश्रम की देखभाल करने वाले इस कट्टर अनुयायी की बेटी के साथ ऐसा हुआ होगा, यह बाबा के किसी भक्त ने कभी नहीं सोचा था। वे हतप्रभ हैं। वहीं, आश्रम में मौजूद कुछ लोगों का कहना है कि यह सब बापू को बदनाम करने की साजिश है। इससे पहले भी उन्हें बदनाम कराया गया, अब फिर वही दोहराया जा रहा है। यहां तक कि मीडिया को भी खरीद लिया गया है।
और भी कई बाबा हो चुके हैं नंगे
इस तरह के विवादों में आने वाले आसाराम बापू पहले आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं। कई नामी बाबाओं पर सेक्स सहित कई गंभीर आरोप पहले भी लग चुके हैं।
स्वामी प्रतिभानंद
प्रतिभानंद पर दीपक भारद्वाज मर्डर केस में शामिल होने का आरोप है। दीपक की उनके उनके दिल्ली के फार्महाउस में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस केस में एक के बाद एक खुलासे होने के बाद स्वामी प्रतिभानंद शक के दायरे में आए और पुलिस ने जहां-तहां उनकी तलाश करनी शुरू कर दी। प्रतिभानंद महाराष्ट्र के बीड जिले का रहने वाला है। दिल्ली पुलिस ने उसके बारे में जानकारी देने वाले को एक लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी।
स्वामी नित्यानंद
इसके खिलाफ कई संगीन आरोप हैं और ढेर सारे मुकदमें चल रहे हैं। दुष्कर्म और गैर कानूनी काम करने के कुछेक मामलों में नित्यानंद जेल की हवा भी खा चुका है। नित्यानंद का एक सेक्स स्कैंडल का वीडियो भी लीक हुआ था, जिसने उस पर लोगों के शक को यकीन में बदल दिया। नित्यानंद पर इल्जाम है कि वह आश्रम के हर सदस्य से एक करारनामे पर दस्तखत करवाता था। इस करारनामे के अनुसार, वह जब जी चाहे और जिससे जी चाहे, सेक्स संबंध बनाने को स्वतंत्र है। इस आरोप के बाद नित्यानंद की खूब निंदा हुई।
इच्छाधारी बाबा भीमानंद
इच्छाधारी बाबा पर सेक्स रैकेट चलाने और मर्डर कराने का आरोप है। करीब 500 लड़कियों को अपने गिरोह में काम करने को मजबूर करने का उस पर इल्जाम है। इन लड़कियों में छात्राएं, एयर होस्टेस और कई गृहणियां शामिल थीं। खुद को इच्छाधारी बताने वाले इस बाबा ने सेक्स रैकेट से ही करीब 25 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित की। इसके अलावा भी इसके कई कारनामे उसकी एक डायरी से उजागर हो चुके हैं। आजकल जेल में है।
रामदेव
रामदेव पर अपने ही गुरु को मारने के आरोप लगे, लेकिन कोई ठोस सबूत न होने की वजह से रामदेव पर पुलिस का शिकंजा नहीं कस पाया। हालांकि, इस मामले में राकेश नाम का एक व्यक्ति सामने आया था, जिसका आरोप था कि रामदेव ने ही गुरु की हत्या करने के बाद उनके शव के छोटे-छोटे टुकड़े कर नदी में बहा दिए थे। साथ ही रामदेव पर कई सारे भूमि विवाद भी चल रहे हैं। रामदेव की आय को लेकर भी कई सारे विवाद लगे और इन्हें एक बाबा न कहकर एक बिजनेसमैन कहा गया।
निर्मल बाबा
निर्मल बाबा लोगों के दुख दूर करने के काफी चटपटे उपाय बताया करते हैं। अपनी अनोखी अदाओं के कारण ही निर्मल बाबा विवादों में घिर चुके हैं। गोलगप्पे, चटनी, समोसे और चाऊमीन से निर्मल बाबा हर परेशानी का हल कर दिया करते हैं। अब इसे क्या कहा जा सकता है, परोपकार या ढोंग? निर्मल बाबा के समागमों में आने वाले हर दर्शनार्थी को दो हजार रुपये से भी ज्यादा की राशि देनी पड़ती है। इस तरह देखा जाए तो निर्मल बाबा प्रतिमाह करीब सात करोड़ रु पये महज दर्शन शुल्क लेते हैं। ये परोपकार है या कारोबार? निर्मल बाबा के खिलाफ कई अलग-अलग थानों में शिकायत की गई है, जिसकी जांच चल रही है। साथ ही इसकी वजह से बाबा के कारोबार में गिरावट भी आई है।
गुरमीत राम रहीम सिंह
सितंबर, 2008 में सिरसा (हरियाणा) के डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह पर डेरे की एक साध्वी ने दुष्कर्म के आरोप लगाए। प्रमुख ने सारे इल्जाम बेबुनियाद बताए। बाद में मामले में सीबीआई के स्पेशल जज एके वर्मा की अदालत ने दफा 376 (रेप), 506 (आपराधिक धमकी) और 509 (महिला की मर्यादा को अपमानित करने वाली भावभंगिमा बनाना या बातें कहना) के तहत आरोप तय किए, तो सभी हैरान रह गए।
सुधांशुजी महाराज
सुधांशु महाराज पर फर्जी रसीदें देकर चंदा लेने का आरोप लगा था। एक तरफ तो सुधांशु जी महाराज अध्यात्म की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर धोखाधड़ी से अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं। उप पर विश्व जागृति मिशन आश्रम के नाम पर धोखाधड़ी करने व गोरखधंधा करने का भी इल्जाम लग चुका है।
आश्रम में ही थे आसाराम
यह साबित हो चुका है कि घटना वाले दिन लड़की और आसाराम बापू आश्रम में ही थे। बाकी के सुबूत आरोपी के खिलाफ जुटाए जा रहे हैं।
-बीजू जॉर्ज जोसेफ, पुलिस आयुक्त
सारा मामला झूठा है
बापू निर्दोष हैं। लड़की झूठ बोल रही है। उन्हें सोनिया और राहुल के विरोध की सजा मिली है। कांग्रेस शासित राज्यों में झूठा मामला दर्ज किया गया है।
-उमा भारती, भाजपा उपाध्यक्ष
नहीं बख्शा जाएगा
बापू के खिलाफ आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे मामले में किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
-अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान
श्रद्धा की हत्या
दुष्कर्मी संत लादेन से कम नहीं। लादेन ने तो हजारों की हत्या की होगी, ये छद्मवेशी तो करोड़ों लोगों के श्रद्धा की हत्या कर रहे हैं।
-तरुण सागर, जैन मुनि
रविवार, 4 अगस्त 2013
आंगन में दफन लड़की
जिंदगी का उसने पहला जुर्म किया था, वह भी बेहद संगीन! उस जुर्म का राज उसने अपने सीने में दफन कर लिया, लेकिन जुर्म नहीं दफन कर सका। उसे छिपाने के लिए उसने घर के आंगन में ही उस जुर्म को हमेशा-हमेशा के लिए दफना दिया। क्या था वह जुर्म और उसका राज?
अजीत को करीब-करीब पूरा मुहल्ला जानता था। वह आईटीबीपी यानी इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस का जवान था, लेकिन उस रोज सुबह-सुबह उसके घर अजीब गहमा-गहमी देखने को मिली। इस हैरानगी की तीन वजहें थीं। पहला, उत्तर प्रदेश के इस घर में हरियाणा पुलिस क्यों आई है? दूसरा, अजीत के हाथ में हथकड़ी क्यों लगी है और तीसरा- पुलिस वाले अपने साथ कुछ मजदूर लेकर क्यों आए हैं? जितने लोग उतनी बात! हथकड़ी का सबब तो फिर भी समझ में आ रहा था कि अजीत ने जरूर कोई जुर्म किया होगा, लेकिन हरियाणा पुलिस की गिरफ्त में वह क्यों है? पुलिस उसे लेकर यहां क्यों आई है? पूरी पुलिस टीम अजीत के घर के आंगन में क्या तलाश रही है? क्या आंगन में अजीत ने कुछ छिपा रखा है? पड़ोसियों की जिज्ञासा बढ़ने लगी। महिलाओं की कानाफूसी भी तेज हो गई। हर किसी के मन में सवालों का तूफान उठ रहा था, लेकिन जवाब एक का भी नहीं मिला। क्योंकि पुलिस ने अजीत के घर के अंदर प्रवेश करने की इजाजत किसी को नहीं दी। रहस्य गहराने लगा।
वाकया अलीगढ़ के (उत्तर प्रदेश) नलकूप कॉलोनी का है। पुलिस ने आंगन में पहुंचते ही अजीत से कुछ पूछा, फिर उसके बताए स्थान पर मजदूरों ने उस जगह की खुदाई करनी शुरू कर दी। उसी के साथ अजीत के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं। पुलिस वाले बीच-बीच में उससे कुछ पूछते भी रहते। वह जैसे याद कर-कर के बता रहा था। खुदाई लगातार चलती रही। करीब घंटे भर में एक गहरा गड्ढा बन गया, लेकिन पुलिस की वह तलाश अभी पूरी नहीं हुई थी, जिसके लिए वह हरियाणा से चलकर यहां पहुंची थी और न ही उसका इंतजार खत्म हुआ। बीच-बीच में थानेदार की बढ़ती बेचैनी उसके माथे पर चुहचुहा आए पसीने से साफ नजर आ रही थी। रह-रहकर वह अजीत से सवाल-जवाब शुरू कर देता। एक घंटे बाद अचानक थानेदार की आंखों में जैसे चमक आ गई। उसने मजदूरों को हिदायत दी, ‘थोड़ा संभालकर फावड़ा चलाओ!’ अगले पल मिट्टी हटाते ही मजदूर सहमकर ठिठक गया। सामने एक लड़की का पैर था।
सभी की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। पहले एक पैर बाहर निकला, फिर उस लड़की की पूरी लाश सामने आ गई! कमीज-सलवार में लिपटी लाश! मजूदरों के रोंगटे खड़े हो गए। पुलिस भी दंग रह गई। शव अब तक कंकाल में तब्दील हो चुका था। शायद उसे महीनों पहले यहां दफनाया गया होगा, पर सवाल था कि अर्धसैनिक बल के इस जवान के घर का आंगन कब्र में कैसे तब्दील हो गया? कौन है यह लड़की और उसका शव इस घर के आंगन में किसने दफनाया? लड़की का इस घर से या फिर अजीत से क्या रिश्ता है? अगर महरूम अजीत की कोई जानकार है, तो फिर उसे इस तरह घर के आंगन में दफनाए जाने के पीछे क्या वजह हो सकती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये अजीत ही इस लड़की का कातिल है?
सवाल कई थे और राजदार महज एक- अजीत! उसने मुंह खोला, तो लोगों के होश उड़ गए। करीब नौ महीने पहले अजीत की सुनीता से पहली बार बातचीत हुई थी। वजह थी उसके मोबाइल पर आई एक मिस्ड कॉल। सुनीता की गलती से ही वह मिस्ड कॉल आई थी और तब किसी को नहीं पता था कि उसकी यही एक छोटी-सी गलती एक दिन उसकी मौत की वजह बन जाएगी। अजीत ने कॉलबैक कर पूछा था, किससे बात करनी है? कौन बोल रही हैं, आप? फिर सुनीता की शहद घोलती बातों में उसकी दिलचस्पी बढ़ने लगी।
सुनीता (22) महेंद्रगढ़ (हरियाणा) डिग्री कॉलेज में पढ़ती थी और आईटीबीपी का जवान अजीत (30) अलीगढ़ के (उत्तर प्रदेश) नलकूप कॉलोनी का रहने वाला है। उन दिनों वह ग्रेटर नोएडा में रह रहा था। हुआ यों कि सुनीता ने उस रोज अपनी एक सहेली से बात करने के लिए उसे एक मिस्ड कॉल दी थी, लेकिन गलती से वह मिस्ड कॉल सहेली के पास न जाकर अजीत के पास पहुंच गई। अजीत ने फौरन उस नंबर पर कॉलबैक किया और दोनों की बातचीत शुरू हो गई। कल तक अजीत और सुनीता दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह अंजान थे, लेकिन बस इस एक मिस्ड कॉल ने दोनों को एक-दूसरे के करीब ला दिया। अजीत पहले से शादीशुदा था। उसकी पत्नी अलीगढ़ में रह रही थी, लेकिन अजीत ने यह बात सुनीता से छिपा रखी थी। बता देता, तो उसकी महबूबा उसके हाथ से फिसल जाती। वहीं, सुनीता यही समझती रही कि अजीत की शादी अभी नहीं हुई है। वह मन ही मन उसे अपना हमसफर मानने लगी, फिर मौका देखकर एक रोज उसने अजीत के सामने शादी का प्रस्ताव भी रख दिया।
अजीत चौंक पड़ा। खेलना-खाना और बात थी, लेकिन शादी-विवाह के बारे में तो वह सोच भी नहीं सकता था। कैसे सोचता, शादी तो उसकी पहले ही हो चुकी थी और एक बेटी का वह बाप भी बन चुका था। उसने पहले सुनीता को टालने की कोशिश की, फिर भी सुनीता जिद पर अड़ी रही तो अजीत ने उसे अपने पास बुला लिया। दोनों ग्रेटर नोएडा में किराए के एक कमरे में रहने लगे। पास-पड़ोस वाले उन दोनों को पति-पत्नी समझते थे। वे दोनों रह भी उसी तरह रहे थे। कुछ रोज बाद सुनीता फिर अजीत पर शादी का दबाव बनाने लगी, तभी एक रोज अजीत का सबसे बड़ा राज सुनीता के सामने फाश हो गया। यह राज था अजीत के पहले से शादीशुदा होने का। सुनीता के पैरों तले से जमीन सरक गई। उसने सारा घर सिर पर उठा लिया। दोनों के बीच पहले बहसबाजी होती रही, फिर सुनीता ने अपने और अजीत के रिश्ते को जमाने के सामने आम कर देने की धमकी देने लगी, ‘तुमने मुझे धोखा दिया है। मैं तुम्हें भरी पंचाचत में नंगा कर दूंगी... तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे।’
अजीत के हाथ-पांव फूल आए- अब क्या करूं? यह लड़की तो गले की हड्डी बन गई! कैसे मिले इस बला से निजात? कुछ नहीं सूझा, तो अजीत ने मन ही मन एक भयानक योजना बना डाली। दिसंबर, 2012 का महीना था। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। अजीत की बीवी अपनी बेटी के साथ मायके गई हुई थी। घर में महज बीमार और बुजुर्ग पिता मौजूद थे। अजीत ने 9 दिसंबर को सुनीता को अलीगढ़ बुला लिया। वह जाना नहीं चाहती थी, लेकिन अजीत ने उसे धोखे से बुलाया। सुनीता को क्या पता था कि आज की रात उसकी आखिरी रात होगी। अजीत ने पहले तो सुनीता को खूब प्यार किया। उसके बाद उसका गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी। अब महज शव ठिकाने लगा था, जिसे अजीत ने रातोंरात घर के आंगन में ही एक गड्ढा खोदकर उसमें दफन कर दिया। सोचा था उसे जुर्म करते हुए किसी ने नहीं देखा है। किसी को कुछ नहीं पता चलेगा। सारा राज उसके सीने में जिंदगी भर दफन रहेगा।
अजीत और उसकी माशूका की ये कहानी वाकई शायद कभी जमाने के सामने नहीं आती, लेकिन एक रोज पुलिसवालों को एक मोबाइल फोन से ही उसकी करतूतों की भनक लग गई। ये शायद सुनीता की तकदीर ही थी, जिसने उससे एक ऐसा मिस्ड कॉल करवाया कि वह सीधे कब्र में पहुंच गई। मिस्ड कॉल से कातिल तक पहुंचने का यह सफर उसने कुछ सेकेंड में पूरा कर लिया, लेकिन इस कब्र के राज तक पहुंचने में पुलिसवालों को पूरे नौ महीने लग गए। हुआ यूं कि सुनीता के घरवाले महेंद्रगढ़ में बेटी को ढूंढ़-ढूंढ़कर थक गए, तब भी उसका कुछ नहीं पता चला, तो उन्होंने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने सुनीता की गुमशुदगी दर्ज कर ली, किंतु उसे तलाशने की जहमत नहीं उठाई। धीरे-धीरे आठ महीने बीत गए। इसके बाद घरवालों ने पुलिस पर फिर दबाव बनाना शुरू कर दिया, तो पुलिस ने सुनीता के मोबाइल नंबर की कॉल डिटेल निकलवाई। इसके बाद अजीत से सुनीता की हुई बातचीत और मौत के पहले तक उसकी लोकेशन पता चल गई।
महेंद्रगढ़ (हरियाणा) पुलिस ने अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक असीम अरुण और पुलिस अधीक्षक (नगर) मान सिंह चौहान के सहयोग से अजीत को हिरासत में ले लिया। पूछताछ में पहले तो अजीत पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करता रहा, लेकिन सख्ती बरतते ही उसने सारा राज उगल दिया। सुनीता की लाश बरामद हो गई। पुलिस ने सड़े-गले शव को फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया। परिजनों ने कपड़ों और कुछ ज्वेलरी से बेटी की पहचान कर दी। बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, तो इस बात का खुलासा हो गया कि सुनीता की हत्या गला घोंटकर की गई थी। आरोपी अजीत अब जेल में है। उसकी पत्नी और बेटी अनाथ-सी हो चुकी हैं। सच है, जुर्म कभी नहीं छिपता चाहे वह सात ताले के अंदर ही क्यों न किया जाए।
15 मार्च, 2012 को अखिलेश यादव ने प्रदेश की बागडोर संभाली थी, तो पहला वादा यही किया था कि राज्य में जुर्म की तस्वीर बदल कर रख देंगे। तस्वीर सच में बदली, पर अच्छी होने के बजाए और खराब हो गई। उनके राज्य के पहले साल में ही तीन हजार से ज्यादा मर्डर, हजार के करीब रेप, हजार से ज्यादा अपहरण और चार हजार से ज्यादा लूट की घटनाएं हुर्इं। राज्य की जनता बेहाल है। लोग पूछ रहे हैं, अखिलेश साहब! आखिर प्रदेश में किसका राज है? पुलिस लाचार और दरिंदों का लगातार अत्याचार बढ़ रहा है। लखनऊ से लेकर इटावा, प्रतापगढ़ से लेकर बुलंदशहर तक लोग बेहाल हैं। वारदात इतनी खौफनाक कि रूह कांप जाए और आप हैं कि बस वादे पर वादे किए जा रहे हैं। सुनीता के ही मामले को देख लें, पहले लड़की को प्रेम-जाल में फंसाया गया, फिर उसे धोखे से प्रेमी ने कमरे में बुलाया। वहां प्रेमी ने उसके साथ पहले मनमानी की, फिर अपने ही घर के आंगन में उसे दफन कर दिया। यह जान-सुनकर और भी हैरानी बढ़ जाती है, जब पता चलता है कि कत्ल करने वाला कोई और नहीं बल्कि आईटीबीपी पुलिस का जवान है। इसके अलावा भी कई ऐसे मामले हैं, जिसे जानकर रूह कांप उठती है। मुख्यमंत्री के गृह जनपद सैफई के मेडिकल कॉलेज में बिस्तर पर पड़ी लड़की की साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया, फिर उसे जिंदा जलाने की कोशिश की गई। करीब 90 फीसदी से ज्यादा जल चुकी है। जिंदगी दोबारा मिलने की संभावना न के बराबर है। इस मामले के सभी सात आरोपी फरार हैं और कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। राज्य के आला पुलिस अधिकारी मामले की लीपापोती में लगे हैं, जबकि जिले का पुलिस महकमा सिर्फ केस दर्ज कर मामले से पल्ला झाड़ने की जुगत में है। ताज्जुब होता है कि उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के राज में अपराधी बेखौफ हो चुके हैं, जबकि पुलिस सुस्त और लाचार! पीड़ा होती है उस बयान को सुनकर भी, जब सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता कहते हैं कि ऐसी घटनाएं तो देश के दूसरे राज्यों में भी होती हैं।
कानून को धता देना आसान नहीं : असीम अरुण, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, अलीगढ़
सुनीता और अजीत दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, लेकिन आगे चलकर दोनों के रिश्ते बहुत खराब हो गए। दअरसल, अजीत की माशूका ने उसके शादीशुदा होने का राज जान लिया था। लेकिन अगर इस प्रेम कहानी का पता अजीत की पत्नी को चलता, तो अजीत की जिंदगी तबाह हो जाती। अपने प्रेम-संबंधों का राज अजीत हरहाल में छिपाए रखना चाहता था। जबकि इसी राज की बात कहकर सुनीता उस पर शादी करने दबाव बनाने लगी। फिर एक वक्त ऐसा आया, जब अजीत को अपनी माशूका से पीछा छुड़ाने के लिए उसे मौत के घाट उतारना ही मुनासिब लगा और बस उसी इरादे से पहले तो उसने सुनीता का गला घोंट कर कत्ल किया, फिर दुनियावालों की निगाहों से बचने के लिए उसने अपने ही घर के आंगन में उसे दफन कर दिया। पर यह भूल गया कि पुलिस और कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। कभी कोई अपराधी कानून को धता देने में कामयाब नहीं हो सकता। उसे उसके असली मुकाम तक पहुंचाना हमारी पुलिस का पहला काम है।
-जितेन्द्र बच्चन
सियासत और सेक्स स्कैंडल
कत्ल. सेक्स. ठगी केरल के सोलर घोटाले में किसी बड़े स्कैंडल के तमाम पहलू हैं। प्रदेश और केंद्र के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों समेत यूडीएफ के कई नेताओं को सरिता के सैकड़ों फोन करने की ही तर्ज पर अब राज्य के गृह मंत्री तिरुवंचुर राधाकृष्णन और केंद्रीय श्रम राज्यमंत्री कोडिकुन्निल सुरेश की शालू से दोस्ती ने राज्य की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है। इनसे निबटना मुख्यमंत्री ओमन चांडी की 24 महीने पुरानी सरकार के लिए मुश्किल साबित हो रहा है।
सत्तारूढ़ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के साथ गहरे संपर्क रखने वाली सरिता एस. नायर (35) की गिरफ्तारी के महीने भर बाद 5 जुलाई को उतने ही गहरे सियासी संपर्कों वाली एक डांसर-एक्ट्रेस शालू मेनन (28) को घोटाले से जुड़े एक और मामले में धर-दबोचा गया। दोनों ही घोटाले के पहले आरोपी बीजू राधाकृष्णन (38) की सहयोगी थीं। बीजू को 17 जून, 2006 में हुई अपनी बीवी की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था। 5 जुलाई को कारोबारी आर. श्रीधरन नायर के इस खुलासे के बाद चांडी भी घोटाले की लपेट में आ गए हैं कि उसे 9 जुलाई, 2012 को सरिता मुख्यमंत्री कार्यालय लेकर गई थी। वहां चांडी ने नायर को बीजू और सरिता की फर्जीवाड़ा करने वाली फर्म टीम सोलर रिन्यूएबल एनर्जी सोल्यूशंस में 40 लाख रु. का इन्वेस्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया। सरिता के खिलाफ नायर की शिकायत पर मुख्यमंत्री के निजी सहायक तेन्नी जोप्पन को 28 जून को गिरफ्तार कर लिया गया। राज्यभर के लोगों से मिली शिकायतों के आधार पर बीजू और सरिता के खिलाफ 40 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। लोगों का आरोप है कि 2011 से 2013 के बीच उन्हें सोलर पैनल लगाने या केरल और तमिलनाडु में सोलर तथा पवन (विंड) फार्मों (जो कहीं थे ही नहीं) में इक्विटी देने के फर्जी प्रस्तावों के जरिए ठगा गया। घोटाले का खुलासा एर्नाकुलम जिले के एक कारोबारी के. सज्जाद की शिकायत पर 3 जून को सरिता की गिरफ्तारी के बाद हुआ। सज्जाद का कहना था कि सरिता ने सोलर पैनल लगाने के नाम पर उससे 40 लाख रु. ठग लिए हैं। विशेष जांच दल (एसआइटी) के प्रमुख अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ए. हेमचंद्रन कहते हैं, “गिरफ्तार किए गए सभी लोगों के खिलाफ स्पष्ट और अकाट्य सबूत हैं।”
खनन और स्टोन क्रैशिंग इकाइयां चलाने वाले श्रीधरन नायर ने फस्र्ट-क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दिए अपने हलफनामे में कहा कि सरिता उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय उस वक्त ले गई, जब उन्होंने उसे 40 लाख रु. में से 15 लाख रु. की तीसरी किस्त का भुगतान करने से मना कर दिया। 25 लाख रु. देने के एक साल बाद भी सरिता और बीजू ने प्रस्तावित सोलर प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं किया था। संयोग नहीं है कि नायर पतनमतिट्टा जिले के एक कांग्रेसी नेता हैं। वे कहते हैं, “जब हम मुख्यमंत्री से मिले तो उन्होंने सरिता की साख का जिम्मा लिया और मुझे पलक्कड़ की अपनी फैक्ट्री में एक सोलर पैनल लगाने का काम उसे सौंपने के लिए प्रोत्साहित किया।” विपक्षी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और बीजेपी ने चांडी के इस्तीफा की मांग करते हुए बड़ा अभियान छेड़ दिया है, लेकिन चांडी सभी आरोपों से इनकार करते हुए सिर्फ इतना स्वीकार करते हैं कि श्रीधरन नायर उनसे दो बार मिले थे। उनका कहना है, ‘‘वह मुलाकात तो मगर सिर्फ खनन से संबंधित कुछ मुद्दे मेरी जानकारी में लाने के लिए हुई थी। सोलर मसले से उसका कोई लेना-देना नहीं था।”
चांडी का दावा है कि उन्हें याद नहीं कि नायर के साथ सरिता थीं या नहीं। उन्होंने मुलाकात की सीसीटीवी फुटेज पेश करने से भी मना कर दिया। वे कहते हैं, “मेरे दफ्तर से सिर्फ एक लाइव वेबकास्ट ही होती है और कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।” उनके सियासी गुरु, केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटनी ने उन्हें क्लीन चिट देने में रत्ती भर भी देरी नहीं की। 9 जुलाई को कोच्चि में एंटनी बोले, “सरकार में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होगा। प्रदेश में राजनैतिक संकट नहीं है. जांच चलने दीजिए।”
5 जुलाई को गिरफ्तार की गई शालू मेनन टीवी सीरियल और फिल्मों की ऐक्ट्रेस है और वह तिरुवनंतपुरम क्षेत्र से केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड (सीबीएफसी) के 64 सदस्यीय सलाहकार पैनल में भी है। उन्हें तिरुवनंतपुरम के एक एनआरआइ कारोबारी रसीत अली की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया। अली का आरोप था कि शालू और बीजू ने तमिलनाडु में विंड फार्म स्थापित करने के नाम पर उनसे 75 लाख रु. ठग लिए।
अप्रैल में शालू के गृह प्रवेश समारोह में शामिल होते हुए गृह मंत्री राधाकृष्णन और केंद्रीय मंत्री सुरेश की तस्वीरें स्थानीय मीडिया में प्रकाशित हुई थीं। राधाकृष्णन कहते हैं, “यह दूसरे आयोजनों की ही तरह था। मैं हर साल ऐसे हजारों कार्यक्रमों में हिस्सा लेता हूं। मैं शालू को नहीं, सिर्फ उसके दादा को जानता था, जो थिएटर की एक जानी-मानी हस्ती थे।” केंद्रीय मंत्री सुरेश 2012 में शालू को सीबीएफसी के सलाहकार पैनल में नामित करने की बात स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, “ऐसा मैंने एक नृत्यांगना और अभिनेत्री की प्रतिष्ठा के आधार पर किया था।”
पिछले साल शालू ने अपने जयकेरल डांस स्कूल की सात शाखाएं खोलीं और इस साल कोट्टायम के अपने पैतृक गांव चंगनशेरी में एक हवेली का निर्माण करवाया। बीजू के साथ उसके संबंध कोई राज नहीं थे, क्योंकि उन्हें अकसर सार्वजनिक रूप से एक साथ देखा जाता था। बीजू की गिरफ्तारी के बाद शालू ने मीडिया को बताया कि उसने उससे भी 20 लाख रु. ठग लिए थे, लेकिन पुलिस के दावे के मुताबिक, बाद में उसने कुबूल कर लिया कि वह बीजू की सहयोगी थी और उससे शादी करने की उसकी योजना थी। इस बीच सरिता के फोन कॉल डिटेल से पता चला है कि मंत्रियों के निजी स्टाफ के सदस्यों के अलावा वह यूडीएफ के 30 से ज्यादा बड़े-बड़े नेताओं के संपर्क में थी। इनमें दो केंद्रीय मंत्रियों समेत छह मंत्री, दो सांसद, आठ विधायक और ऐसे अन्य कई लोग शामिल हैं। ज्यादातर फोन सरिता ने खुद किए थे, लेकिन कम से कम आठ फोन सरिता को किए गए थे। इनमें से तीन फोन मंत्रियों ने किए थे।
गृह मंत्री राधाकृष्णन सफाई देते हैं, “मैंने एक अनजाने फोन नंबर से मिस्ड कॉल मिलने के बाद ही उसे फोन किया था।” सरिता के फोन पर उससे बात करने वालों में से एक, केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रमेश चेन्नीथला कहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में होने की वजह से वे किसी को उन्हें फोन करने से मना नहीं कर सकते। 2006 में बीजू के कथित तौर पर अपनी बीवी की हत्या कर देने के बाद से तलाकशुदा सरिता उसके साथ ही रह रही थी, मगर सरिता की गिरफ्तारी के बाद बीजू ने बताया कि विधायक केबी गणेश कुमार के साथ उसके कथित अवैध संबंधों की वजह से वे दोनों अरसा पहले एक-दूसरे से मुंह मोड़ चुके थे। गणेश कुमार को अपनी बीवी के इस आरोप के बाद वन मंत्री की कुर्सी छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा था कि उनके पति के किसी अज्ञात महिला के साथ नाजायज ताल्लुकात कायम हैं।
इस मामले की न्यायिक या सीबीआइ जांच कराने के लिए विभिन्न अदालतों में पीआइएल दाखिल करने की वजह से चांडी और यूडीएफ पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस आलाकमान हस्तक्षेप करने की इच्छुक नहीं दिख रही। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य कोडियरी बालाकृष्णन चुटकी लेते हुए कहते हैं, “जब आलाकमान की अगुवाई वाली केंद्र सरकार खुद इससे सैकड़ों गुना ज्यादा घोटालों में गले तक डूबी हो, तो वह इसमें हस्तक्षेप कैसे कर सकती है?”
गुरुवार, 25 जुलाई 2013
शोहरत और मुसीबत
22 सितंबर 2002 की रात, जूहू का एक पांच सितारा होटल
सलमान का कद तब भी उस 70 एमएम की स्क्रीन से कहीं ज्यादा बड़ा था, जिसके बड़े पर्दे के वो बड़े सितारे थे पर बड़ा सितारा होने के साथ-साथ बॉलीवुड के बड़े बिगड़ैल का भी खिताब तब तक वो हासिल कर चुके थे। 'हम दिल दे चुके सनम' की सुपरहिट कामयाबी और मोहब्बत और नफरत के बीच ऐश्वर्या राय के नाम तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही। अलाप के दरम्यान 22 सितंबर की रात सलमान जूहू के एक फाइव स्टार होटल में पार्टी की जान बने हुए थे। देर रात तक पार्टी उनका शगल था। रात तीन बजे के बाद सलमान पार्टी से बाहर निकलते है। नशे में पूरी तरह चूर। घर जाने के लिए उनके पास उस रात सफेद रंग की टोयटा लैंड क्रूजर गाड़ी थी। गाड़ी चलाने के लिए साथ में बॉडीगार्ड कम ड्राइवर भी, मगर नशे में चूर होने के बाद भी सलमान खुद ड्राइविंग सीट पर जा बैठे। बॉडीगर्ड मना करता रहा पर शायद तब भी सलमान एक बार जो कमिटमेंट कर लेते थे, तो फिर खुद की भी नहीं सुनते थे।
अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी, हिल रोड, बांद्रा
नशे में चूर सलमान की गाड़ी रात के अंधेरे में ठीक तीन बज कर चालीस मिनट पर बांद्रा के हिल रोड पर पहुंचती है। गाड़ी की रफ्तार बेहद तेज थी और ड्राइवर नशे में। हिल रोड पर अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी से कुछ पहले ही अचानक ड्राइवर गाड़ी का संतुलन खो बैठता है और पल भर में गाड़ी बाईं तरफ से सड़क छोड़कर फुटपाथ पर दौड़ने लगती है। बदनसीबी से उस वक्त उसी फुटपाथ पर अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी में काम करने वाले पांच कर्मचारी सो रहे थे। तेज रफ्तार लैंड क्रूजर पांचों को रौदते हुए आगे निकलती है और फिर दुकान के शटर से टकरा कर गाड़ी रुक जाती है। हादसे में एक मज़दूर करीब-करीब मौके पर ही दम तोड़ देता है, जबकि चार मजदूर बुरी तरह से जख्मी हो जाते हैं। चारों में से ज्यादातर के पैर को गाड़ी ने रौंद डाला था।
हादसे के बाद सलमान खान अचानक घबरा जाते हैं। वो ड्राइविंगं सीट से नीचे उतरते हैं, तब तक गाड़ी के फुटपाथ से टकराने और घायलों की चीख-पुकार सुनकर आसपास सो रहे बाकी लोग भी जाग जात हैं और मौके पर पहुंचते हैं। लोग गाड़ी के नीचे फंसे लोगों को बाहर निकलाते हैं और उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है। सलमान गाड़ी मौके पर ही छोड़कर तब तक गायब हो चो चुके थे पर 70 एमएम की स्क्रीन से भी जिसका कद बडा हो, उसकी एक झलक उसे पहचानने के लिए काफी होती है। भागने से पहले सलमान को सब पहचान चुके थे। सुबह होते-होते पूरी मुंबई में खबर फैल चुकी थी। सलमान खान के दामन पर एक और दाग लग चुका था, लेकिन हादसे के बाद से खुद सलमान गायब थे और गाड़ी का नंबर और चश्मदीद सलमान के खिलाफ चुगली खा चुके थे, लिहाज़ा सुबह-सुबह पुलिस सलमान के घर पहुंचती है। पर सलमान घर पर नहीं थे।
गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज
सलमान खान कानूनी खेल के लिए कुछ वक्त चाहते थे। इसीलिए वो गायब थे पर उन्हें पता था कि ज्यादा देर भागने से मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जमानत मिलने में दिक्कत आएगी, लिहाजा हादसे के करीब आठ घंटे बाद वो खुद सामने आते हैं और पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेती है। इसके बाद उन्हें जेजे अस्पातल ले जाया जाता है, जहां जांच के बाद ये साबित हो जाता है कि उन्होंने अल्कोहल लिया था। सलमान के खिलाफ पुलिस लापरवाही और खतरनाक ढंग से गाड़ी चलाने का मामला तो दर्ज कर लेती है, लेकिन गिरफ्तारी के कुछ देर बाद ही उन्हें महज 950 रुपए के जुर्माने के साथ जमानत पर रिहा कर देती है। सलमान की इतनी आसानी रिहाई का कुछ सामाजिक संगठन विरेध करते हैं और पांच अक्तूबर 2002 को अदालत पहुंच जाते हैं। वो अदालत में सलमान के खिलाफ एक जनहित याचिका दाखिल कर सलमान पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग करते हैं। अदालत न सिर्फ याचिका मंजूर कर लेती है बल्कि सात अक्तूबर 2002 को अदालती आदेश पर गैर इरादन हत्या के जुर्म में सलमान को गिरफ्तार कर लिया जाता है। सलमान जेल चले जाते हैं। पूरे 18 दिन जेल में रहते हैं। इस दौरान चार बार जमानत की अर्जी देते हैं, मगर चारों बार जमानत अर्जी खारिज हो जाती है, फिर 18 दिन बाद 24 अक्तूबर 2002 को सलमान को जमानत मिलती है और रिहा हो जाते हैं।
बॉडीगार्ड ने दिया झटका
मामला कोर्ट में चलता रहता है। इस दौरान केस में कई मोड़ आते हैं। सबसे पहले सलमान की तरफ से कहा जाता है कि उस रात वो गाड़ी चला ही नहीं रहे थे, बल्कि गाड़ी कोई और चला रहा था, फिर हादसे के चार साल बाद एक रोज अचानक केस का एक अहम गवाह अब्दुल्ला रऊफ शेख भी अपनी गवाही से पलट जाता है। अब्दुल्ला मामला का चश्मदीद था और हादसे में घायल हुआ था। शुरू में उसने पुलिस को कहा था कि उसने हादसे के बाद सलमान को गाड़ी की ड्राइविंग सीट से नीचे उतरता देखा था, मगर चार साल बाद 2006 में वो अदालत को बताता है कि उसने सलमान को मौके पर देखा ही नहीं था, लेकिन इस गवाही से सलमान को राहत मिलती उससे पहले ही खुद सलमान के पूर्व बॉडीगार्ड रवींद्र पाटिल ने सलमान को झटका दे दिया। रवींद्र पाटिल हादसे वाली रात सलमान के साथ उसी गाड़ी में मौजूद था। उसने अदालत को बताया कि उस रात सलमान नशे में चूर थे और उसके मना करने के बाद भी वही गाड़ी चला रहे थे, जबकि हादसे के शिकार बाकी कुछ गवाह भी गवाही पर कायम थे।
गुनाह साबित होने पर दस साल की जेल
अलग-अलग गवाहों और बयानों में उलझते-उलझते केस को 11 साल बीत गए और अब आखिरकार अदालत ने लापरवाही से गाड़ी चलाने की बजाए गैर इरादतन हत्या के तहत सलमान के खिलाफ मुकदमा चलाने का फैसला सुना दिया है। सलमान पर आईपीसी की धारा 304(2) के तहत गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया, वहीं धारा 279 के तहत नशे में ड्राइविंग और लापरवाही से गाड़ी चलाने का आरोप तय हुआ। जबकि धारा 337 और 338 के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का आरोप लगा। इसके अलावा धारा 427 के तहत भी आरोप लगाए गए। यानी आगे की डगर अब मुश्किल हो गई है। गुनाह साबित होने पर सलमान दस साल तक के लिए जेल जा सकते हैं। हालांकि, सलमान खान को इतनी राहत जरूर मिली कि अब उन्हें हर सुनवाई पर कोर्ट का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा, लेकिन अदालत ने ये भी साफ कर दिया है कि आगे जब भी जरूरत होगी, सलमान को बगैर किसी हील-हवाले के अदालत में आना होगा।
सोमवार, 22 जुलाई 2013
तीन गोली, एक मौत!
गुड़गांव के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की पत्नी की हत्या का रहस्य गहराता जा रहा है। कौन है गीतांजलि का कातिल? जज साहब या फिर कोई और? पुलिस तलाश रही है सुराग। वहीं, गीतांजलि के घर वालों ने जज और उनके परिजनों पर ही कत्ल का इल्जाम लगाया है और वजह बताई है बेटे की चाहत! क्या है गीतांजलि मर्डर मिस्ट्री का सच?
गुड़गांव के सीजेएम रवनीत गर्ग की पत्नी गीतांजलि की मौत की गुत्थी और उलझती जा रही है। मूल रु प से अंबाला की रहने वाली गीतांजलि ने बीकॉम कर रखा था और बेहद खुशमिजाज दिल की थी। करीब छह साल पहले 2007 में जज रवनीत गर्ग के साथ उसकी शादी हुई थी। उसी गीतांजलि की 17 जुलाई, 2013 को गुड़गांव पुलिस लाइंस के पास एक पार्क में रक्तरंजित लाश मिली, तो शहर में सनसनी फैल गई। पुलिस के तमाम आला अधिकारी मौके पर आ पहुंचे। शव के पास ही सीजेएम गर्ग का लाइसेंसी रिवॉल्वर पड़ा था। प्रथम दृष्टि में मामला आत्महत्या का लग रहा था। खुद जज साहब का भी यही नजरिया था, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आते ही सभी हैरान रह गए। गीतांजलि को एक नहीं, तीन गोलियां लगी थीं और सिर पर भी किसी डंडे से वार किया गया था। सवाल उठता है, आत्महत्या करने वाला खुद को तीन- तीन गोलियां कैसे मार सकता है? उसके सिर पर डंडा किसने मारा? जितने लोग, उतनी बात! जज साहब का भी बयान बदल गया- गीतांजलि की हत्या दो लोग कर सकते हैं, लेकिन वे दोनों कौन हैं? जज साहब के शक का आधार क्या है? इन तमाम बातों का खुलासा उन्होंने नहीं किया। रही बात पुलिस की, तो वह अब भी जज साहब को बुलाकर पूछताछ करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। अपराधी को सिखचों के पीछे पहुंचाने के लिए गीतांजलि के पिता और उनके अन्य नाते-रिश्तेदारों को ही आगे आना पड़ा।
20 जुलाई को गीतांजलि के भाई प्रदीप अग्रवाल, जीजा राजीव बंसल, अमित जिंदल और मामा राजकुमार अग्रवाल थाना सिविल लाइंस पहुंचे। शहर के तमाम लोग भी उनके साथ थे। सभी ने एकसाथ जज के खिलाफ नारे लगाते हुए हंगामा करना शुरू कर दिया- सीजेएम रवनीत बीवी का कातिल है! उसे गिरफ्तार करो! थाना प्रभारी इंस्पेक्टर नरेश कुमार के हाथ-पैर फूल गए। उन्होंने तत्काल मामले की सूचना पुलिस कमिश्नर आलोक मित्तल को दी। मित्तल ने गीतांजलि के भाई प्रदीप अग्रवाल से बात की। उसने बताया कि गीतांजलि की दो बेटियां हैं। एक पांच साल की और दूसरी दो साल की। रवनीत को बेटा चाहिए था। वह पत्नी पर लगातार तीसरे बच्चे के लिए दबाव डाल रहा था। जब नहीं मानी, तो उसकी हत्या कर दी गई। प्रदीप गीतांजलि की मौत के बाद उसकी बेटियों से मिलने उसके घर भी गया था, लेकिन रवनीत के घरवालों ने बच्चियों से मिलने नहीं दिया। मुलाकात हो जाती तो गीतांजलि की हत्या किसने और क्यों की, इसका शायद खुलासा हो जाता।
कमिश्नर आलोक मित्तल ने प्रदीप अग्रवाल की तहरीर के आधार पर सीजेएम रवनीत गर्ग और उसके माता-पिता केखिलाफ यह मामला 501/13 दर्ज करवा दिया। तफ्तीश सब इंस्पेक्टर राम अवतार को सौंप दी, लेकिन आरोपियों को गिरफ्तार करने को कौन कहे, पुलिस उनसे पूछताछ तक नहीं कर रही थी। पीड़ित परिवार समझ गया कि पुलिस दबाव में है। प्रदीप अग्रवाल पुलिस कमिश्नर आलोक मित्तल से दोबारा मिले। मित्तल ने मामले की जांच के लिए एसीपी अशोक बख्शी के नेतृत्व में एक एसआईटी टीम का गठन कर दिया। टीम में एसीपी पंखुड़ी कुमार, इंस्पेक्टर नरेश कुमार, सब इंस्पेक्टर जयपाल और सरोज बाला शामिल हैं। थाना सिविल लाइन पुलिस टीम का पूरा सहयोग कर रही है। मौके से मिले रिवाल्वर व कारतूस को सील कर पुलिस ने बैलेस्टिक एक्सपर्ट के सपुर्द कर दिया और गीतांजलि के हाथ से लिए गए गन पाउडर के सेंपल को जांच के लिए करनाल स्थित मधुबन लैब भेज दिया।
चश्मदीदों के मुताबिक, 17 जुलाई की शाम करीब चार बजे गीतांजलि को पड़ोसियों ने आखिरी बार देखा था। वह दोनों बेटियों को घर में छोड़कर बाहर निकली थी। सीजेएम साहब तब कोर्ट में थे। शाम करीब पांच बजे के बाद पार्क में टहलने आए एक चश्मदीद ने झाड़ी के करीब गीतांजलि को लहूलुहान पड़ी देखकर फौरन पुलिस को खबर दी। पुलिस लाइंस के अंदर ही कत्ल की खबर सुनकर खुद पुलिस वाले हैरान रह गए। चौंकाने वाली बात यह भी है कि कुरु क्षेत्र विश्वद्यिालय की एमबीए टॉपर गीतांजलि का गुड़गांव की जिस पुलिस लाइंस में कत्ल हुआ, वह शहर की सबसे ज्यादा महफूज जगह है। पुलिस लाइंस के अंदर एक तरफ परेड ग्राउंड है और दूसरी तरफ पुलिस और सरकारी अफसरों के मकान। गुड़गांव पुलिस कमिश्नर आलोक मित्तल भी यहीं रहते हैं पर कमाल है, तीन-तीन गोलियां चलने के बाद भी किसी को फायर की आवाज सुनाई नहीं दी! लिहाजा पुलिस इस संभावना से भी इंकार नहीं कर रही कि कत्ल कहीं और हुआ हो और लाश बाद में लाकर यहां फेंक दी गई!
गीतांजलि के घर वालों का कहना है कि सीजेएम और उनके घरवाले कुछ दिनों से गीतांजलि को परेशान कर रहे थे। मौत से कुछ दिन पहले अपनी बहन से गीतांजलि ने तनाव में रहने की बात कही थी, लेकिन इस मामले में जज की ओर से अभी कोई बयान नहीं आया है। पुलिस बराबर मामले की निष्पक्ष जांच करने का भरोसा देती रही, लेकिन परजिनों को भरोसा नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा से मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है। इसके बाद इस मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम 21 जुलाई को एक बार फिर मौके पर गई और फॉरेंसिक जांच के लिए जरूरी वस्तुएं जुटाने में लगी रही। साथ ही देर रात तक कमिश्नर ऑफिस में इस मामले को लेकर पुलिस अधिकारियों की बैठक चलती रही। हाई प्रोफाइल मामला होने के कारण पुलिस फूंक-फूंककर कदम रख रही है।
गीतांजलि के कजिन रमन गुप्ता के मुताबिक, गीतांजलि की दोनों बेटियां गुड्डू और पूनम मौत के बारे में कुछ न कुछ राज की बात जानती हैं। उनको अपने पिता और मां के रिश्ते के बारे में अनसुनी बातों का पता है। इसी कारण उन्हें दोनों बेटियों से मिलने नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि गीतांजलि की हत्या में उसकी ससुरालवालों की मिलीभगत है, तभी तो गीतांजलि के अंतिम संस्कार के मौके पर ससुराल पक्ष की ओर से कुछ ही लोग आए थे। उनके मुताबिक सीजेएम रवनीत गर्ग और गीतांजलि की छह साल पहले हुई शादी के बाद घर में छोटे-मोटे झगड़े हुए थे। गीतांजलि के शरीर पर कई जगहों पर चोट के निशान भी पाए गए हैं। गीतांजलि के पिता ओम प्रकाश और रवनीत के पिता केके गर्ग 20 जुलाई की सुबह मनीमाजरा श्मशान घाट में फूल चुनने आए थे। ओम प्रकाश ने गर्ग से दोनों पोतियों से मिलने की इच्छा जताई। गर्ग ने कहा कि हरिद्वार से लौट आऊं, फिर बात करेंगे। ओम प्रकाश ने कहा कि दोनों बेटियों को कुछ न कुछ पता है, तभी उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा है।
ओम प्रकाश का कहना है कि गीतांजलि के शव के पास .32 बोर का रिवाल्वर पड़ा था, जो रवनीत गर्ग का लाइसेंसी रिवॉल्वर है। पुलिस इसे पहले खुदकुशी का केस मान रही थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद मामला रहस्मय हो गया। पुलिस की थ्योरी पर सवाल खड़े हो गए। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गीतांजलि के सीने, जांघ और गले के पास ठोढ़ी में गोली के जख्म मिले हैं। सीने और ठोढ़ी पर लगी गोली ने ही गीतांजलि की जान ले ली। उसके सिर पर पीछे की तरफ चोट के निशान भी हैं। डॉक्टरों के मुताबिक हो सकता है कि उस पर पीछे से वार किया गया हो। कुल मिलाकर गीतांजलि के कत्ल के बाद से ही गीतांजलि के घरवाले सीजेएम और उनके परिवार पर तमाम इल्जाम लगा रहे हैं, मगर सीजेएम के परिजनों ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। यह अलग बात है कि गीतांजलि मर्डर मिस्ट्री कई अनसुलझे सवालों में लिपटी हुई है। मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस कई कोणों से जांच कर रही है।
पुलिस कमिश्नर (गुड़गांव) आलोक मित्तल के मुताबिक, 21 जुलाई को पुलिस की एसआईटी टीम ने सीजेएम रवनीत गर्ग से गुड़गांव स्थित सिविल लाइन के उनके सरकारी आवास कोठी नंबर 10 में करीब चार घंटे तक उनसे पूछताछ की। उस समय गीतांजलि के परिजन भी मौजूद थे और गर्ग के कई रिश्तेदार भी।
सवाले थे- कत्ल के वक्त यानी शाम पांच से सात बजे के बीच जज साहब कहां और किसके साथ थे? इस दौरान उन्होंने फोन पर किससे-किससे बातें कीं? वह अपना रिवाल्वर कहां रखते थे? क्या गीतांजलि रोज रिवाल्वर लेकर टहलने जाती थी? बेटियों के होने से क्या वे नाखुश थे? क्या उन्होंने कभी गीतांजलि से बेटे की इच्छा जाहिर की थी? क्या इस बात को लेकर उन दोनों (पति-पत्नी) के बीच अक्सर अनबन बनी रहती थी? वे दो लोग कौन हैं, जिन पर जज साहब ने कत्ल का शक जाहिर किया है? उनकी गीतांजलि से क्या दुश्मनी हो सकती है? क्या गीतांजिल हर रोज अपना मोबाइल लेकर नहीं जाती थी? कत्ल के दिन उसका मोबाइल कहां था? रिवाल्वर हमेशा लोडेड रखते थे या फिर कारतूस घर में अलग रखते थे? क्या गीतांजलि ने कभी किसी से दुश्मनी का जिक्र किया था? अदालत का कोई ऐसा फैसला, जिसके चलते रंजिशन किसी ने उनकी पत्नी की हत्या कर दी?
कुल मिलाकर अपनी कविताओं के जरिए नारी के हक और वजूद का सवाल उठाने वाली गीतांजलि की मौत सवालों के कफन में लिपटी है। उसकी हत्या पूरे परिवार के लिए जिंदगी भर का नासूर बन चुकी है। पुलिस गीतांजलि और रवनीत गर्ग दोनों के फोन कॉल्स डिटेल की जांच कर रही है। मुमिकन है कि फोन कॉल में ही छिपा हो इस वारदात के कातिल का राज। जबकि, गीतांजलि के परिवारवाले मान रहे हैं कि गीतांजलि की मौत के पीछे जज रवनीत का हाथ है, लेकिन जज का परिवार सिरे से इन आरोपों को खारिज कर रहा है। अब कत्ल का ये मामला थाने की दहलीज से निकलकर कोर्ट की चौखट पर जाने वाला है। इंसाफ की देवी तय करेंगी कि आधी आबादी को ताकतवर बनाने के दौर में इस गीतांजलि का कत्ल किसने किया और क्यों?
-जितेन्द्र बच्चन
बुधवार, 10 जुलाई 2013
फंदे में फंसा
करोड़पति कंपाउंडर
एक अदना-सा कंपाउंडर और करोड़ों की मिल्कियत! अपना अस्पताल! अजमेर से पाली और उदयपुर से जयपुर तक फैला है इसके जमीन का जाल! दर्जनों नर्सिंग कॉलेजों में है हिस्सेदारी। पूरे राज्य में चल रहा था करप्शन का नेटवर्क। कौन है यह कंपाउंडर? कैसे बना 200 करोड़ का मालिक? और कौन-कौन शामिल हैं उसके गिरोह में?
एंटी करप्शन ब्यूरो ने सवाई मान सिंह अस्पताल जयपुर के एक कंपाउंडर महेश चंद्र शर्मा के घर छापा क्या मारा, जैसे कुबेर का खजाना खुल गया। अफसरों की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। नोट गिनते-गिनते हाथ थक गए और प्रॉपर्टी इतनी कि कोई धन्ना सेठ झक मारे। अपना अस्पताल, कई शहरों में रिसार्ट, दर्जनों नर्सिंग कॉलेजों में हिस्सेदारी और राजस्थान में करोड़ों का फार्महाउस। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने शर्मा को सलाहकार बना रखा था। इंडियन नर्सिंग काउंसिल (भारतीय नर्सिंग परिषद) का सदस्य भी था वह। इसी ओहदे और रुतबे की आंड़ में यह आरोपी नर्सिंग कॉलेजों से लाखों रुपये की उगाही करता था। दो महीने में 55 नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता को लेकर नोटिस दे चुका था। सीट बढ़वाने और उनकी गड़बड़ियां दबा देने के नाम पर 15 से 25 लाख रु पये तक लेता था। जो न देते, उनके यहां निरीक्षण के दौरान कमी निकालकर मान्यता रद करने की धमकी देता। 29 जून की रात भी अग्रवाल फार्म स्थित आरएजी अस्पताल में शर्मा एक नर्सिंग कॉलेज का आईएनसी की वेबसाइट पर नाम जुड़वाने और कॉलेज में दो कोर्स बढ़ाने के नाम पर पांच लाख रुपये की रिश्वत ले रहा था, तभी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की टीम ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया। उसके साथ उसके निजी सहयोगी राजेंद्र सैनी को भी गिरफ्तार किया गया है। तलाशी में ब्यूरो को महेश शर्मा और उसके परिवार के नाम से 200 करोड़ से अधिक की संपत्ति के दस्तावेज मिले हैं। ऐसे में सवाल उठता है, कौन है महेश चंद्र शर्मा? वह कंपाउंडर से दो सौ करोड़ का मालिक कैसे बन गया? क्या उसके गुनाह में नेता और मंत्री भी शामिल हैं? किन-किन अधिकारियों से इसकी साठ-गांठ है?
महेश चंद्र शर्मा (52) जयपुर के विद्युतनगर का रहने वाला है। यहां उसका 800 स्क्वेयर यार्ड में बंगला है। खुद शर्मा सवाई मान सिंह अस्पताल में सेकंड ग्रेड कंपाउंडर था। 1984-85 में उसे यह नौकरी मिली थी, लेकिन नौकरी कम, असर-रसूखदारों वालों से संपर्क बनाने में ज्यादा मशगूल रहता। एक झटके में लाखों-करोड़ों बटोर लेने का सपना था। 2003-2004 में आखिर शर्मा का फरेबी हुनर काम कर गया। एक नर्सिंग कॉलेज में असिस्टेंट लेक्चरर बन गया। तनख्वाह करीब 50 हजार हो गई। इसके बाद शर्मा नर्सिंग कॉलेजों के निरीक्षण आदि कार्यों से जुड़ गया। इसी दौरान उसकी मुलाकात इंडियन नर्सिंग काउंसिल के पदाधिकारियों से हुई। उन पर ऐसा जादू चलाया कि 2007 में इंडियन नर्सिंग काउंसिल ने उसे राजस्थान का आब्जर्वर बना दिया। इसके बाद 2008 में अच्छे काम के लिए शर्मा को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। हौंसले और बुलंद हो गए। 2011 तक आब्जर्वर पद पर बना रहा। फरवरी 2012 में महेश शर्मा ने वीआरएस के लिए आवेदन किया। नहीं मिला, तो उसने नौकरी पर आना ही बंद कर दिया। अब शर्मा राजस्थान के सभी नर्सिंग कॉलेजों को आईएनसी से एनओसी दिलाने का ठेका लेने लगा। अन्य काम भी वही करवाता। बदले में लाखों रुपये लेता। देखते ही देखते शर्मा की दलाली का धंधा चल निकला। दौलत का अंबार लगाता रहा। बाद में कानूनी शिकंजा कसने लगा, तो 2011 में शर्मा स्टेट आब्जर्वर के पद से हट गया, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। अलबत्ता शर्मा को स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपना सलाहकार जरूर बना दिया।
दरअसल, कॉलेज संचालक संस्था का गठन कर चिकित्सा विभाग ग्रुप-3 कार्यालय में विभिन्न कोर्स के लिए आवेदन करते थे। संस्था की फाइल राजस्थान नर्सिंग काउंसिल (आरएनसी) को जांच-पड़ताल के लिए भेजी जाती थी। महेश शर्मा संबंधित संस्था से संपर्क कर उन्हें एनओसी दिलाने का ठेका ले लेता। शर्मा ही आरएनसी के अधिकारियों की मिलीभगत से संस्थाओं के यहां निरीक्षण करने जाता और सारी रिपोर्ट संस्था के पक्ष में लगा देता। इन संस्थाओं में कई नेताओं और उच्च अधिकारियों के नर्सिंग कॉलेज भी शामिल हैं। शर्मा सारे नियम-कानून ताक पर रखकर संस्था की फाइल का सत्यापन कर देता और निरीक्षक फाइल को आरएनसी को सौंप देते। इसके बाद आरएनसी के अधिकारी संस्था की फाइल ग्रुप-3 दफ्तर भेज देते। वहां से कॉलेजों को कोर्स चलाने के लिए एनओसी जारी कर दी जाती। इसके बाद संस्था को आईएनसी से भी विभिन्न कोर्स के लिए एनओसी लेनी पड़ती थी। इसके लिए काउंसिल ने शर्मा को स्टेट आब्जर्वर बना रखा था। शर्मा की रिपोर्ट के आधार पर एनओसी जारी कर दी जाती थी, लेकिन जिस संस्था को कुछ दिन तक एनओसी नहीं मिलती थी, वह महेश शर्मा से संपर्क करती थी। शर्मा उनसे रिश्वत की रकम लेकर संबंधित संस्था को एनओसी देने के लिए आईएनसी को रिपोर्ट भेज देता। तत्पश्चात आईएनसी चेयरमैन उस संस्था को भी एनओसी जारी कर देते।
महेश शर्मा का यह गोरखधंधा कई साल से चल रहा था। बड़े अफसरों और सत्ता में बैठे नेताओं-मंत्रियों तक से उसकी साठगांठ थी। इसीलिए वह अभी तक बचता रहा। एसीबी के अधिकारियों की मानें, तो शर्मा की गिरफ्तारी के समय भी कुछ नेताओं के फोन आए थे। इनमें से कईयों के नर्सिंग कॉलेज चल रहे हैं। उनकी मान्यता से लेकर एनओसी रिन्यू कराने तक का सारा काम महेश शर्मा ही देखता रहा है। लेकिन एक न एक दिन तो इस मामले का पर्दाफाश होना ही था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की महानिरीक्षक स्मिता श्रीवास्तव के अनुसार, वीटी रोड निवासी डॉ. आरपी सैनी का जयपुर के अग्रवाल फार्म स्थित ज्ञानाराम जमनालाल नर्सिंग कॉलेज है। सैनी अपने कॉलेज का नाम आईएनसी की वेबसाइट पर जुड़वाना चाहते थे और दो कोर्स भी शुरू करवाने का इरादा था। इसके लिए महेश शर्मा उनसे 5 लाख रुपये मांग रहा था। डॉ. सैनी ने एसीबी से संपर्क किया। उनकी शिकायत थी कि 2008 से अब तक शर्मा उनसे एक करोड़ रुपये ले चुका है। फरवरी में वेबसाइट पर नाम जुड़वाया था, लेकिन मई में हटवा दिया। अब कॉलेज का नाम फिर से जुड़वाने के लिए पांच लाख रुपये की मांग कर रहा है। स्मिता श्रीवास्तव को यकीन नहीं आ रहा था। उन्होंने मामले की तहकीकात करने के लिए एक टीम बना दी।
योजना के अनुसार, डॉ. सैनी ने महेश चंद्र के मोबाइल पर फोन कर कहा, ‘हमारे पास पांच लाख रुपये की व्यवस्था हो गई है। आप शनिवार की शाम किसी भी समय आकर ले सकते हैं।’ शर्मा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई- तुम्हें तो देना ही था, बेटा! नहीं दोगे तो जाओगे कहां? और 29 जून की रात वह अग्रवाल फार्म स्थित आरएजी अस्पताल पहुंच गया, जहां पांच लाख रुपये लेते समय एसीबी टीम ने उसे रंगे हाथ दबोच लिया। लेकिन अभी इस मामले के कुछ अन्य आरोपियों और तमाम बरामदगी करनी बाकी थी, इसलिए 30 जून की सुबह महेश शर्मा को एसीबी ने अदालत में पेश कर पांच दिन की रिमांड पर ले लिया। उसी रोज महानिरीक्षक स्मिता श्रीवास्तव के आदेश पर इस मामले के तहत राज्य के 10 नर्सिंग कॉलेजों में भी छापे मारे गए। उदयपुर के कांग्रेस नेता पंकज शर्मा के नर्सिंग कॉलेज को ब्यूरो ने सीज कर दिया है।
महेश शर्मा ने तीन-चार महीने पहले अग्रवाल फार्म शिप्रापथ स्थित आरएजी अस्पताल को 22 करोड़ रुपये में खरीदा था। इसके अलावा जयपुर, अजमेर, पाली, उदयपुर सहित अन्य जगहों पर 25 नर्सिंग कॉलेजो में शर्मा की हिस्सेदारी है और छह नर्सिंग कॉलेज उसके खुद के हैं। इनमें से कई कॉलेजों में शर्मा की पत्नी भी हिस्सेदार है। 2 जुलाई को शर्मा के तीन बैंक लॉकरों को एसीबी ने खंगाला, तो करीब 40 लाख रुपये की ज्वेलरी मिली। इनमें से एसबीबीजे बैंक की सी स्कीम स्थित शाखा के लॉकर से टीम को करीब 15 लाख रुपये की ज्वेलरी मिली है। बाकी दो लॉकर आईसीआईसीआई बैंक की शाखाओं के हैं। एसीबी अधिकारियों के मुताबिक, शर्मा के कुल 12 बैंक खातों की जानकारी अब तक सामने आ चुकी है। सभी की जांच की जा रही है। वहीं, जो दस्तावेज बरामद हुए हैं, उनसे करोड़ों की संपत्ति का पता चला है। इनमें कई कॉलोनियों में प्लॉट, फ्लैट और पेट्रोल पंप शामिल हैं। डीआईजी पुरोहित के अनुसार, प्रदेश के जिन नर्सिंग कॉलेजों की रिपोर्ट निगेटिव थी, उन्हें भी काउंसिल ने एनओसी जारी कर दी। कोटा के दो और दौसा के एक कॉलेज का तीन बार निरीक्षण किया गया। हर बार टीम ने यहां की रिपोर्ट निगेटिव ही बताई। इसके बावजूद कॉलेजों को एनओसी जारी हुई है। जयपुर स्थित एक कॉलेज को बिना प्रोफेसर की नियुक्ति किए ही एमएससी नर्सिंग की मान्यता प्रदान कर दी गई। जोधपुर में दो कमरे में पूरा कॉलेज चल रहा था, तब भी उसे काउंसिल ने एनओसी दे रखी है। इसके अलावा शर्मा से एक डायरी और कुछ कागजात बरामद हुए हैं, जिनमें कई नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के नाम शामिल हैं।
इस गिरफ्तारी से इंडियन नर्सिंग काउंसिल के अंदर करप्शन का बड़ा रैकेट भी उजागर हुआ है। एसीबी के अधिकारी अगर दबाव में नहीं आए, तो कई सफेदपोश बेनकाब हो सकते हैं। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह का कहना है कि महेश के भारतीय नर्सिंग परिषद के अध्यक्ष टी दिलीप कुमार से नजदीकी रिश्ते होने का पता चला है। मामले की जांच डीआइजी जीएन पुरोहित कर रहे हैं। दरअसल, महेश भारतीय नर्सिंग परिषद का अध्यक्ष बनना चाहता था। इसके लिए वह लंबे समय से प्रयासरत रहा। पिछले दिनों शिमला में हुई परिषद की बैठक में शर्मा ने एक करोड़ रुपये खर्च किए, तब भी नहीं बना। दिलीप कुमार अध्यक्ष बन गए। शर्मा अब उनकी दलाली कर रहा था। ऐसे में दिलीप भी टीम के हत्थे चढ़ सकते हैं।
कहां-कहां कर रखे हैं निवेश
मानसरोवर में आरएजी हॉस्पिटल के अलावा महेश चंद शर्मा ने अपने पैसों को कई जगह निवेश कर रखा है। टोंक रोड पर एक नामी मोटर्स में साझेदारी है। कॉलोनाइजर व बिल्डर्स के साथ करोड़ों रु पये निवेश कर रखे हैं। जयपुर में इस्कॉन रोड स्थित गणेशनगर व पटेलनगर में कई प्लाट हैं और आगरा रोड पर प्रॉपर्टी कारोबारी राजेन्द्र सैनी के साझेदारी में पेट्रोल पंप व एक टाउनशिप भी है। कई बीघा जमीन भी ले रखी है। साथ ही प्रदेश के करीब 10 कॉलेजों में महेश की 50 फीसदी से अधिक की साझेदारी है या उसके खुद के हैं। इनमें से सूर्यांश स्कूल ऑफ नर्सिंग जयपुर, साकेत कॉलेज ऑफ नर्सिंग, पद्मश्री स्कूल ऑफ नर्सिंग, पूजा स्कूल ऑफ नर्सिंग, स्टार कॉलेज ऑफ नर्सिंग, आदि कॉलेज ऑफ नर्सिंग, मेवाड़ कॉलेज ऑफ नर्सिंग, रामी देवी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, इरशाद स्कूल ऑफ नर्सिंग, पिंकसिटी स्कूल एंड कॉलेज आफ नर्सिंग शामिल हैं। इसके अलावा प्रदेश की करीब 25 कॉलेज ऐसे हैं, जिनमें दस से लेकर 30 फीसदी तक शर्मा की साझेदारी है।
करोड़पति कंपाउंडर
एक अदना-सा कंपाउंडर और करोड़ों की मिल्कियत! अपना अस्पताल! अजमेर से पाली और उदयपुर से जयपुर तक फैला है इसके जमीन का जाल! दर्जनों नर्सिंग कॉलेजों में है हिस्सेदारी। पूरे राज्य में चल रहा था करप्शन का नेटवर्क। कौन है यह कंपाउंडर? कैसे बना 200 करोड़ का मालिक? और कौन-कौन शामिल हैं उसके गिरोह में?
एंटी करप्शन ब्यूरो ने सवाई मान सिंह अस्पताल जयपुर के एक कंपाउंडर महेश चंद्र शर्मा के घर छापा क्या मारा, जैसे कुबेर का खजाना खुल गया। अफसरों की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। नोट गिनते-गिनते हाथ थक गए और प्रॉपर्टी इतनी कि कोई धन्ना सेठ झक मारे। अपना अस्पताल, कई शहरों में रिसार्ट, दर्जनों नर्सिंग कॉलेजों में हिस्सेदारी और राजस्थान में करोड़ों का फार्महाउस। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने शर्मा को सलाहकार बना रखा था। इंडियन नर्सिंग काउंसिल (भारतीय नर्सिंग परिषद) का सदस्य भी था वह। इसी ओहदे और रुतबे की आंड़ में यह आरोपी नर्सिंग कॉलेजों से लाखों रुपये की उगाही करता था। दो महीने में 55 नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता को लेकर नोटिस दे चुका था। सीट बढ़वाने और उनकी गड़बड़ियां दबा देने के नाम पर 15 से 25 लाख रु पये तक लेता था। जो न देते, उनके यहां निरीक्षण के दौरान कमी निकालकर मान्यता रद करने की धमकी देता। 29 जून की रात भी अग्रवाल फार्म स्थित आरएजी अस्पताल में शर्मा एक नर्सिंग कॉलेज का आईएनसी की वेबसाइट पर नाम जुड़वाने और कॉलेज में दो कोर्स बढ़ाने के नाम पर पांच लाख रुपये की रिश्वत ले रहा था, तभी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की टीम ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया। उसके साथ उसके निजी सहयोगी राजेंद्र सैनी को भी गिरफ्तार किया गया है। तलाशी में ब्यूरो को महेश शर्मा और उसके परिवार के नाम से 200 करोड़ से अधिक की संपत्ति के दस्तावेज मिले हैं। ऐसे में सवाल उठता है, कौन है महेश चंद्र शर्मा? वह कंपाउंडर से दो सौ करोड़ का मालिक कैसे बन गया? क्या उसके गुनाह में नेता और मंत्री भी शामिल हैं? किन-किन अधिकारियों से इसकी साठ-गांठ है?
महेश चंद्र शर्मा (52) जयपुर के विद्युतनगर का रहने वाला है। यहां उसका 800 स्क्वेयर यार्ड में बंगला है। खुद शर्मा सवाई मान सिंह अस्पताल में सेकंड ग्रेड कंपाउंडर था। 1984-85 में उसे यह नौकरी मिली थी, लेकिन नौकरी कम, असर-रसूखदारों वालों से संपर्क बनाने में ज्यादा मशगूल रहता। एक झटके में लाखों-करोड़ों बटोर लेने का सपना था। 2003-2004 में आखिर शर्मा का फरेबी हुनर काम कर गया। एक नर्सिंग कॉलेज में असिस्टेंट लेक्चरर बन गया। तनख्वाह करीब 50 हजार हो गई। इसके बाद शर्मा नर्सिंग कॉलेजों के निरीक्षण आदि कार्यों से जुड़ गया। इसी दौरान उसकी मुलाकात इंडियन नर्सिंग काउंसिल के पदाधिकारियों से हुई। उन पर ऐसा जादू चलाया कि 2007 में इंडियन नर्सिंग काउंसिल ने उसे राजस्थान का आब्जर्वर बना दिया। इसके बाद 2008 में अच्छे काम के लिए शर्मा को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। हौंसले और बुलंद हो गए। 2011 तक आब्जर्वर पद पर बना रहा। फरवरी 2012 में महेश शर्मा ने वीआरएस के लिए आवेदन किया। नहीं मिला, तो उसने नौकरी पर आना ही बंद कर दिया। अब शर्मा राजस्थान के सभी नर्सिंग कॉलेजों को आईएनसी से एनओसी दिलाने का ठेका लेने लगा। अन्य काम भी वही करवाता। बदले में लाखों रुपये लेता। देखते ही देखते शर्मा की दलाली का धंधा चल निकला। दौलत का अंबार लगाता रहा। बाद में कानूनी शिकंजा कसने लगा, तो 2011 में शर्मा स्टेट आब्जर्वर के पद से हट गया, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। अलबत्ता शर्मा को स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपना सलाहकार जरूर बना दिया।
दरअसल, कॉलेज संचालक संस्था का गठन कर चिकित्सा विभाग ग्रुप-3 कार्यालय में विभिन्न कोर्स के लिए आवेदन करते थे। संस्था की फाइल राजस्थान नर्सिंग काउंसिल (आरएनसी) को जांच-पड़ताल के लिए भेजी जाती थी। महेश शर्मा संबंधित संस्था से संपर्क कर उन्हें एनओसी दिलाने का ठेका ले लेता। शर्मा ही आरएनसी के अधिकारियों की मिलीभगत से संस्थाओं के यहां निरीक्षण करने जाता और सारी रिपोर्ट संस्था के पक्ष में लगा देता। इन संस्थाओं में कई नेताओं और उच्च अधिकारियों के नर्सिंग कॉलेज भी शामिल हैं। शर्मा सारे नियम-कानून ताक पर रखकर संस्था की फाइल का सत्यापन कर देता और निरीक्षक फाइल को आरएनसी को सौंप देते। इसके बाद आरएनसी के अधिकारी संस्था की फाइल ग्रुप-3 दफ्तर भेज देते। वहां से कॉलेजों को कोर्स चलाने के लिए एनओसी जारी कर दी जाती। इसके बाद संस्था को आईएनसी से भी विभिन्न कोर्स के लिए एनओसी लेनी पड़ती थी। इसके लिए काउंसिल ने शर्मा को स्टेट आब्जर्वर बना रखा था। शर्मा की रिपोर्ट के आधार पर एनओसी जारी कर दी जाती थी, लेकिन जिस संस्था को कुछ दिन तक एनओसी नहीं मिलती थी, वह महेश शर्मा से संपर्क करती थी। शर्मा उनसे रिश्वत की रकम लेकर संबंधित संस्था को एनओसी देने के लिए आईएनसी को रिपोर्ट भेज देता। तत्पश्चात आईएनसी चेयरमैन उस संस्था को भी एनओसी जारी कर देते।
महेश शर्मा का यह गोरखधंधा कई साल से चल रहा था। बड़े अफसरों और सत्ता में बैठे नेताओं-मंत्रियों तक से उसकी साठगांठ थी। इसीलिए वह अभी तक बचता रहा। एसीबी के अधिकारियों की मानें, तो शर्मा की गिरफ्तारी के समय भी कुछ नेताओं के फोन आए थे। इनमें से कईयों के नर्सिंग कॉलेज चल रहे हैं। उनकी मान्यता से लेकर एनओसी रिन्यू कराने तक का सारा काम महेश शर्मा ही देखता रहा है। लेकिन एक न एक दिन तो इस मामले का पर्दाफाश होना ही था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की महानिरीक्षक स्मिता श्रीवास्तव के अनुसार, वीटी रोड निवासी डॉ. आरपी सैनी का जयपुर के अग्रवाल फार्म स्थित ज्ञानाराम जमनालाल नर्सिंग कॉलेज है। सैनी अपने कॉलेज का नाम आईएनसी की वेबसाइट पर जुड़वाना चाहते थे और दो कोर्स भी शुरू करवाने का इरादा था। इसके लिए महेश शर्मा उनसे 5 लाख रुपये मांग रहा था। डॉ. सैनी ने एसीबी से संपर्क किया। उनकी शिकायत थी कि 2008 से अब तक शर्मा उनसे एक करोड़ रुपये ले चुका है। फरवरी में वेबसाइट पर नाम जुड़वाया था, लेकिन मई में हटवा दिया। अब कॉलेज का नाम फिर से जुड़वाने के लिए पांच लाख रुपये की मांग कर रहा है। स्मिता श्रीवास्तव को यकीन नहीं आ रहा था। उन्होंने मामले की तहकीकात करने के लिए एक टीम बना दी।
योजना के अनुसार, डॉ. सैनी ने महेश चंद्र के मोबाइल पर फोन कर कहा, ‘हमारे पास पांच लाख रुपये की व्यवस्था हो गई है। आप शनिवार की शाम किसी भी समय आकर ले सकते हैं।’ शर्मा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई- तुम्हें तो देना ही था, बेटा! नहीं दोगे तो जाओगे कहां? और 29 जून की रात वह अग्रवाल फार्म स्थित आरएजी अस्पताल पहुंच गया, जहां पांच लाख रुपये लेते समय एसीबी टीम ने उसे रंगे हाथ दबोच लिया। लेकिन अभी इस मामले के कुछ अन्य आरोपियों और तमाम बरामदगी करनी बाकी थी, इसलिए 30 जून की सुबह महेश शर्मा को एसीबी ने अदालत में पेश कर पांच दिन की रिमांड पर ले लिया। उसी रोज महानिरीक्षक स्मिता श्रीवास्तव के आदेश पर इस मामले के तहत राज्य के 10 नर्सिंग कॉलेजों में भी छापे मारे गए। उदयपुर के कांग्रेस नेता पंकज शर्मा के नर्सिंग कॉलेज को ब्यूरो ने सीज कर दिया है।
महेश शर्मा ने तीन-चार महीने पहले अग्रवाल फार्म शिप्रापथ स्थित आरएजी अस्पताल को 22 करोड़ रुपये में खरीदा था। इसके अलावा जयपुर, अजमेर, पाली, उदयपुर सहित अन्य जगहों पर 25 नर्सिंग कॉलेजो में शर्मा की हिस्सेदारी है और छह नर्सिंग कॉलेज उसके खुद के हैं। इनमें से कई कॉलेजों में शर्मा की पत्नी भी हिस्सेदार है। 2 जुलाई को शर्मा के तीन बैंक लॉकरों को एसीबी ने खंगाला, तो करीब 40 लाख रुपये की ज्वेलरी मिली। इनमें से एसबीबीजे बैंक की सी स्कीम स्थित शाखा के लॉकर से टीम को करीब 15 लाख रुपये की ज्वेलरी मिली है। बाकी दो लॉकर आईसीआईसीआई बैंक की शाखाओं के हैं। एसीबी अधिकारियों के मुताबिक, शर्मा के कुल 12 बैंक खातों की जानकारी अब तक सामने आ चुकी है। सभी की जांच की जा रही है। वहीं, जो दस्तावेज बरामद हुए हैं, उनसे करोड़ों की संपत्ति का पता चला है। इनमें कई कॉलोनियों में प्लॉट, फ्लैट और पेट्रोल पंप शामिल हैं। डीआईजी पुरोहित के अनुसार, प्रदेश के जिन नर्सिंग कॉलेजों की रिपोर्ट निगेटिव थी, उन्हें भी काउंसिल ने एनओसी जारी कर दी। कोटा के दो और दौसा के एक कॉलेज का तीन बार निरीक्षण किया गया। हर बार टीम ने यहां की रिपोर्ट निगेटिव ही बताई। इसके बावजूद कॉलेजों को एनओसी जारी हुई है। जयपुर स्थित एक कॉलेज को बिना प्रोफेसर की नियुक्ति किए ही एमएससी नर्सिंग की मान्यता प्रदान कर दी गई। जोधपुर में दो कमरे में पूरा कॉलेज चल रहा था, तब भी उसे काउंसिल ने एनओसी दे रखी है। इसके अलावा शर्मा से एक डायरी और कुछ कागजात बरामद हुए हैं, जिनमें कई नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के नाम शामिल हैं।
इस गिरफ्तारी से इंडियन नर्सिंग काउंसिल के अंदर करप्शन का बड़ा रैकेट भी उजागर हुआ है। एसीबी के अधिकारी अगर दबाव में नहीं आए, तो कई सफेदपोश बेनकाब हो सकते हैं। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह का कहना है कि महेश के भारतीय नर्सिंग परिषद के अध्यक्ष टी दिलीप कुमार से नजदीकी रिश्ते होने का पता चला है। मामले की जांच डीआइजी जीएन पुरोहित कर रहे हैं। दरअसल, महेश भारतीय नर्सिंग परिषद का अध्यक्ष बनना चाहता था। इसके लिए वह लंबे समय से प्रयासरत रहा। पिछले दिनों शिमला में हुई परिषद की बैठक में शर्मा ने एक करोड़ रुपये खर्च किए, तब भी नहीं बना। दिलीप कुमार अध्यक्ष बन गए। शर्मा अब उनकी दलाली कर रहा था। ऐसे में दिलीप भी टीम के हत्थे चढ़ सकते हैं।
कहां-कहां कर रखे हैं निवेश
मानसरोवर में आरएजी हॉस्पिटल के अलावा महेश चंद शर्मा ने अपने पैसों को कई जगह निवेश कर रखा है। टोंक रोड पर एक नामी मोटर्स में साझेदारी है। कॉलोनाइजर व बिल्डर्स के साथ करोड़ों रु पये निवेश कर रखे हैं। जयपुर में इस्कॉन रोड स्थित गणेशनगर व पटेलनगर में कई प्लाट हैं और आगरा रोड पर प्रॉपर्टी कारोबारी राजेन्द्र सैनी के साझेदारी में पेट्रोल पंप व एक टाउनशिप भी है। कई बीघा जमीन भी ले रखी है। साथ ही प्रदेश के करीब 10 कॉलेजों में महेश की 50 फीसदी से अधिक की साझेदारी है या उसके खुद के हैं। इनमें से सूर्यांश स्कूल ऑफ नर्सिंग जयपुर, साकेत कॉलेज ऑफ नर्सिंग, पद्मश्री स्कूल ऑफ नर्सिंग, पूजा स्कूल ऑफ नर्सिंग, स्टार कॉलेज ऑफ नर्सिंग, आदि कॉलेज ऑफ नर्सिंग, मेवाड़ कॉलेज ऑफ नर्सिंग, रामी देवी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, इरशाद स्कूल ऑफ नर्सिंग, पिंकसिटी स्कूल एंड कॉलेज आफ नर्सिंग शामिल हैं। इसके अलावा प्रदेश की करीब 25 कॉलेज ऐसे हैं, जिनमें दस से लेकर 30 फीसदी तक शर्मा की साझेदारी है।
बुधवार, 3 जुलाई 2013
आत्महत्या के मामले में जबलपुर अव्वल
एक भयावह सच! एक अनचाही और अनपेक्षति मौत! हंसते-खेलते जीवन का त्रासद अंत। चौंकाने वाले आंकड़े और आंकड़ों से उठती चीख! जबलपुर में साल भर में 572 लोगों ने खत्म कर ली जिंदगी। 63 फीसदी का इजाफा! क्यों बढ़ रही है यहां खुद को खत्म करने की खौफनाक प्रवृत्ति?
जितेन्द्र बच्चन
-ओमती थाना के चौथा पुल स्थित माता गुजरी महाविद्यालय के छात्रावास में बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा जेसिका केल्स ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। इसी थाने के होटल अरिहंत में ठहरी युवती मनीषा दास (31) ने आत्महत्या कर लिया।
-मझौली थाना क्षेत्र में एक महिला ने दांत दर्द से निजात पाने के लिए आत्मदाह कर लिया।
-गढ़ा थाना क्षेत्र के बदनपुर निवासी महारानी लक्ष्मी कन्याशाला की 12वीं की छात्रा गायत्री कोल (17) ने खुद पर कैरोसिन डालकर आग लगा ली।
-साइंस कॉलेज के चौकीदार ने फांसी लगाकर जान दे दी।
-केंद्रीय कारागार जबलपुर में एक कैदी ने चादर को फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली।
ये घटनाएं रोंगटे खड़ी करने वाली हैं। फांसी, जहर, आग और भी न जाने क्या-क्या नए-पुराने तरीके जबलपुर में मौत को गले लगाने के लिए आजमाएं जा रहे हैं। खुदकुशी की खबरों की जिले में बाढ़-सी आ गई है। कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब कहीं न कहीं से आत्महत्या की खबर न मिलती हो। शहर ही नहीं, गांव और कस्बों में भी लोग अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली है। देश के 53 प्रमुख शहरों में आत्महत्या के मामले में जबलपुर सबसे आगे है। वर्ष 2012 में यहां 572 लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। जबकि 2011 में 351 लोगों ने आत्महत्या की थी। यानी 63 फीसदी का इजाफा। कारण आर्थिक तंगी, बीमारी, कर्ज का बढ़ता बोझ, एकल परिवार और हताशा है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन ये घटनाएं सोचने को मजबूर करती हैं कि कहीं हमारा सामाजिक ताना-बाना बिखर तो नहीं गया? क्या इनके लिए उम्मीद की छोटी-सी लौ भी नहीं बची थी कि इतने लोगों ने जिंदगी से इस तरह मुंह मोड़ लिया?
दरअसल, जीवन के बदले तौर-तरीकों ने भी बच्चों और युवाओं में सहनशीलता कम कर दी है। अभिभावकों ने कहीं जाने से रोका या कभी पैसे देने से इंकार कर दिया या फिर उनकी किसी मांग को पूरा करने में असमर्थता जताई, तो अक्सर ऐसे बच्चे गुस्से में आत्महत्या जैसे भयानक कदम उठा लेते हैं। इस मामले में प्रेमी भी पीछे नहीं रहते। प्रेमी या प्रेमिका ने ठुकरा दिया या धोखा दिया, तो इसका समाधान अक्सर वे जीवन से मुंह मोड़ने में ही पाते हैं। सोचने की बात तो यह है कि आत्महत्या एक इंसान की नहीं होती, बल्कि उसके साथ जुड़े परिवार की भी होती है जो जीते जी मर जाते हैं। मौत को गले लगाने से कोई समस्या नहीं सुलझती, बल्कि अचानक कुदरत का नियम तोड़ने से हो सकता है कि आप और आपका परिवार पहले से अधिक अंजानी और अजीब समस्याओं के भवरजाल में उलझ जाए। जरूरत है सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझते महिलाओं और बच्चों को एक सही दिशा की। क्योंकि कानून बनाना ही काफी नहीं, संवेदनशीलता का होना भी जरूरी है।
विलुप्त हो रही सहनशक्ति
भारतीय मानस पहले इतना कमजोर कभी नहीं था, जितना अब दिखाई पड़ रहा है। कम सुविधा व सीमति संसाधन में भी संतोष और सुख से रहने का गुण इस देश की संस्कृति में रचा-बसा है। इसका सबसे बड़ा आधार हमारी आध्यात्मिकता रही है। आम भारतीय की सोच ईश्वर में विश्वास कर हर परिस्थिति में हिम्मत और धैर्य रखने की है। जैसे-जैसे लक्जरी ने जरूरतों का रूप धारण करना आरंभ किया है। आर्थिक उदारीकरण और टेक्नोलॉजी ने चारों दिशाओं में पंख पसारे हैं, वैसे-वैसे तेजी से एकसाथ सब कुछ हासिल करने की लालसा भी तीव्रतर हुई है। साधन और सुविधा पर सबका समान हक है, मगर उस हक को पाने में क्यों कुछ लोगों को सबकुछ दांव पर लगा देना पड़ता है और क्यों कुछ लोगों के लिए वह मात्र इशारों पर हाजिर है? जीवन स्तर की यह असमानता ही सोच और व्यक्तित्व को कुंठित बना रही है। जबकि सोच की दिशा यह होनी चाहिए कि मेहनत और लगन से सबकुछ हासिल करना संभव है, बशर्ते धैर्य बना रहे। लेकिन विडंबना यह है कि समय के साथ सहनशिक्त और समझदारी विलुप्त हो रही है।
बेमानी लगते हैं नाते-रिश्ते
बदलते दौर में टीवी-संस्कृति ने परस्पर संवाद को कमतर किया है। परिणामस्वरूप माता-पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं बचा है। यह स्थिति दोनों तरफ है। आज का किशोर और युवा भी व्यस्तता से त्रस्त है। कंप्यूटर-टीवी ने खेल संस्कृति को डसा है। आउटडोर गेम्स के नाम पर बस क्रि केट बचा है। टीम भवना विकिसत करने वाले, शरीर में स्फूर्ति प्रदान करने वाले और खुशी-उत्साह बढ़ाने वाले खेल अब विलुप्त हो रहे हैं। यही वजह है कि न बाहरी रिश्तों में सुकून है न घर के रिश्तों में शांति। दोस्ती और संबंधों का सुगठित ताना-बाना अब उलझता नजर आ रहा है। कल तक जो संबल और सहारा हुआ करते थे, वे आज बोझ और बेमानी लगने लगे हैं।
अपने आपमें सिमटते युवा
देश की युवा शक्ति आज के हांफते-भागते दौर में अस्त-व्यस्त और त्रस्त है या फिर अपनी ही दुनिया में मस्त है। आत्मकेंद्रित युवा अपने सिवा किसी को देख ही नहीं रहा है। जब उसे पता ही नहीं है कि दुनिया में उससे अधिक दुखी और लाचार भी हैं, तो वह अपने दुख-तकलीफों को ही बहुत बड़ा मान लेता है। घर आने पर कोई उससे यह पूछने वाला नहीं है कि उसके भीतर क्या चल रहा है। हर कोई टीवी की तरह अपनी दिनचर्या निर्धारित करने में लगा है। किसे फुरसत है अपने ही आसपास टूटते-बिखरते अपने ही घर के युवाओं को जानने-समझने की। उनकी भावनात्मक जरूरतों और वैचारिक दिशाओं की जांच-पड़ताल करने की? ऐसे में एक दिन जब वह आत्मघाती कदम उठा लेता है, तो पता चलता है कि ऊपर से शांत और समझदार दिखने वाला युवा भीतर कितना आंधी-तूफान लिए जी रहा था। वास्तव में माता-पिता को समय के साथ बदलना होगा। कब तक सारी की सारी अपेक्षाएं संतान से ही की जाती रहेंगी। ढेर सारे सामाजिक दबाव, सारी जिम्मेदारियां उसी की क्यों? सारे समझौते वही क्यों करें? दबाव की इस स्थिति को मां-बाप, निकट के रिश्तेदार और मित्र ही अगर चाहें, तो बड़ी कुशलता से निपटा सकते हैं।
जिंदगी से बड़ी कोई तकलीफ नहीं
समाधान कहीं और से नहीं हमारे ही भीतर से आएगा। खुद को खत्म कर देने की बात जब आती है, तो दूसरों को दोष देने में थोड़ा संकोच होता है। वास्तव में हम स्वयं ही हमारे लिए जिम्मेदार होते हैं। कोई भी दु:ख या तकलीफ जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा दौर आता है जब सबकुछ समाप्त-सा लगने लगता है, लेकिन इसका यही तो सार नहीं कि खुद ही खत्म हो जाएं। हर आत्महत्या करने वाले को एक बार, सिर्फ एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या उसकी जिंदगी सिर्फ उसी की है? इस जिंदगी पर कितने लोगों का कितना-कितना अधिकार है? क्या वह जानता है कि उसकी मौत के बाद उसका परिवार कितनी-कितनी बार मरेगा? जिस पर इतने सारे लोगों का हक है, उसे खत्म करने का हमें कोई हक नहीं है। वैसे भी रोशनी की एक महीन लकीर जब अंधेरे को चीर सकती है। एक तिनका डूबते का सहारा बन सकता है और एक आशा भरी मुस्कान निराशा के दलदल से बाहर निकाल सकती है, तो फिर भला मौत को वक्त से पहले क्यों बुलाया जाए? जिंदगी परीक्षा लेती है तो उसे लेने दीजिए, हौसलों से आप हर बाजी जीतने का दम रखते हैं, यह विश्वास हर मन में होना चाहिए।
10 हजार 861 किसानों ने लगाया मौत को गले
भाजपा के आठ साल के शासन में 10 हजार 861 से अधिक किसानों ने की खुदकुशी। देश के किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्य प्रदेश चौथे नंबर पर पहुंच गया है। किसी भी सरकार के लिए इससे अधिक शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता है कि उसके नागरिक राज्य की नीतियों के कारण आत्महत्या को मजबूर हों। मध्य प्रदेश की सरकार ‘थोथा चना बाजे घना’ की तर्ज पर राज कर रही है। राज्य अब दूसरा विदर्भ बनने के कगार पर है। मुख्य वजह किसानों की आर्थिक तंगी, कर्ज का बढ़ता बोझ और परिवार है। रोजगार के सीमित साधन,बढ़ती महंगाई,घटती आय लोगों का सुख-चैन छीन रहे हैं। ऐसे में बढ़ती महत्वकांक्षाएं, पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों के निर्वहन पर भारी साबित हो रही है। ये तमाम हालात व्यक्ति को तनाव व अवासादग्रस्त बनाते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में हर रोज 18 लोग आत्मघाती कदम उठा कर मौत को गले लगा रहे हैं। बीते साढेÞ चार माह में 2541 लोगों ने आत्महत्याएं की हैं, जिनमें 205 किसान व 95 खेतिहर मजदूर हैं। राज्य विधानसभा के मौजूदा पावस सत्र में कांग्रेस विधायक राम निवास रावत के सवाल के जवाब में गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने समाज की इस हकीकत का बयान करते हुए कहा कि एक मार्च 2012 से 15 जुलाई तक राज्य में 2541 लोगों ने आत्महत्याएं की हैं। इस तरह 135 दिनों में हर रोज औसतन 18 लोगों ने मौत को गले लगाया है। गृहमंत्री के जवाब के मुताबिक, इस अवधि में सागर जिले में सबसे ज्यादा 172 लोगों ने मौत को गले लगाया। दूसरे स्थान पर इंदौर है, जहां 158 लोगों ने जान दी। सतना में 153, भापाल में 130 और जबलपुर में 113 आत्महत्या के प्रकरण सामने आए हैं।
खतरनाक रूप से बढ़ रही इस नकारात्मकता ने अचानक सभी को चिंता में डाल दिया है। आखिर क्यों बढ़ रही है खुद को खत्म करने की यह खौफनाक प्रवृत्ति? क्यों होती जा रही है स्थिति विकराल? किसानों के मामले में समस्याएं बेहद स्पष्ट लेकिन ढेर सारी हैं। यूं तो परेशानी और पीड़ा की वजह गरीबी अपने आप में एक अहम वजह है, लेकिन आए दिन किसानों को फसल चौपट होने से लेकर कर्ज न चुका पाने जैसी भीषण दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कभी योजनाओं के नाम पर सरकारी छल-कपट के शिकार होते हैं किसान, तो कभी अनाज के खरीद-बिबिक्री में हुए घोटालों के कारण व्यथित होते हैं। ऐसे में उन्हें एक ही रास्ता आसान लगता है- मौत का।
मध्य प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रु पये का कर्ज है। वहीं प्रदेश में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या 32,11,000 है। म.प्र. के कर्जदार किसानों में 23 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि है और 4 हेक्टेयर भूमि वाले कृषकों पर 23,456 रु पये कर्ज चढ़ा हुआ है। कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश के 50 फीसदी से अधिक किसानों पर संस्थागत कर्ज चढ़ा हुआ है। किसानों के कर्ज का यह प्रतिशत सरकारी आंकड़ों के अनुसार है, जबकि किसान नाते-रिश्तेदारों, व्यवसायिक साहूकारों, व्यापारियों और नौकरीपेशा से भी कर्ज लेते हैं। इस आधार पर राज्य के 80 से 90 फीसदी किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि समर्थन मूल्य मूल उत्पादन की औसत लागत से 50 फीसदी अधिक होना चाहिए। प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के किसानों से 50 हजार रुपये कर्ज माफी का वादा किया था, लेकिन प्रदेश सरकार ने उसे भुला दिया। यदि समय रहते खेती-किसान दोनों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं और बढेंÞगी और मध्य प्रदेश भी विदर्भ की तरह मुंह ताकता रह जाएगा।
खुदकुशी पर सियासत नहीं होनी चाहिए
आत्महत्या किसी की भी हो, तकलीफदेह होती है। यह एक प्रदेश की समस्या नहीं है। जापान, कोरिया सहित देश के अन्य प्रांतों में भी इस तरह की घटनाएं होती हैं। कुछ राज्यों में तो इसके आंकडेÞ यहां से ज्यादा हैं। इस विषय को राजनीतिक रूप देने की कोशिश की जा रही है, जो ठीक नहीं है। आत्महत्या के कारण मनोवैज्ञानिक होते हैं। उन्हें दूर करने के प्रयत्न किए जाएंगे।
-शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री
मुख्य कारण पारिवारिक कलह
जबलपुर में इधर हुई अधिकतर आत्महत्याओं की खास वजह पारिवारिक कलह रही है। दरअसल, संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। पति-पत्नी के बीच विवाद होने पर उनमें बीच-बचाव करने वाला कोई नहीं होता। कलह बढ़ते ही लोग खुदकुशी करने तक के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरा कारण एकल परिवार है, जिसके चलते लोग खुदकुशी करने को मजबूर हो जाते हैं।
-हरिनारायणचारी मिश्र, पुलिस अधीक्षक, जबलपुर
बुधवार, 19 जून 2013
मिली खाक में मोहब्बत
महविश ने मोहब्बत क्या की, जमाना दुश्मन बन गया। शौहर को गोलियों से भून डाला। ससुर को पेड़ से लटका कर मार डाला। जेठ जिंदा जल गया। सितम पर सितम होता रहा उस पर। कोई सामने नहीं आया। न परिवार, न समाज और न ही सरकार! आखिर प्यार करने की सजा कब तक भूगतेगी महविश? समाज के ठेकेदार उसे कब तक देते रहेंगे मोहब्बत की सजा? पहले कटघरे में परिवार और खाप पंचायत थी। अब पुलिस है!
जितेन्द्र बच्चन
उत्तर प्रदेश पुलिस का एक और कारनामा! बुलंदशहर कोतवाली के इंस्पेक्टर पर लगा महविश और उसके परिवार को आत्मदाह करने के लिए उकसाने का आरोप! वाकया 12 जून 2013 का है। शौहर के कातिलों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रही महविश और उसके परिवार के सात सदस्यों ने पुलिस की मौजूदगी में मिट्टी का तेल छिड़ककर आत्मदाह करने की कोशिश की। महविश का जेठ यूसुफ 98 फीसदी जल गया। बाकी के सदस्य बचा लिए गए, लेकिन यूसुफ को डॉक्टर नहीं बचा पाए। दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में 14 जून को उसकी मौत हो गई। महविश और उसके परिवार का आरोप है कि थाना कोतवाली (देहात) बुलंदशहर के इंस्पेक्टर आरबी यादव ने परिजनों को धमकाते हुए महविश पर ही पति की हत्या का आरोप लगाया। यह इल्जाम महविश और उसके परिजन सह नहीं पाए। न्याय पाने की उम्मीद टूट गई, तो सामूहिक रूप से मौत को गले लगाना ही अच्छा समझा। इस पर इंस्पेक्टर को तरस नहीं आया। उसने यूसुफ को माचिस देते हुए कहा, ‘लो, लगा लो आग। तुम लोगों के मरने से ही पुलिस और सरकार को राहत मिलेगी।’
बड़ी दर्दनाक दास्तां है महविश की। करीब 11 साल की उम्र में पड़ोस के लड़के अब्दुल हकीम से दिल लगा बैठी। नादान थी, अल्हड़ बाला। उसे क्या पता था कि उसकी मोहब्बत का एक रोज यह जमाना दुश्मन बन जाएगा। छठीं में पढ़ती थी महविश और हकीम 8वीं क्लाश में था। प्यार का ढाई अक्षर कब उनके दिल में अंकुरित हो गया, पता ही नहीं चला। मन ही मन चाहने लगे दोनों एक-दूसरे को। कोई ऐसा लम्हा नहीं था जब महविश ने हकीम को महसूस न किया हो। एक रोज दिल की बात होंठों पर आ गई। महविश ने अपनी चाहत का इजहार कर दिया। हकीम ने भी धीरे से उसके अधरों को छूकर कबूल कर लिया। दोनों का इश्क परवान चढ़ने लगा, लेकिन महविश के वालिदानों को यह रिश्ता किसी कीमत पर मंजूर नहीं था। अम्मी ने तालीम बंद करवाकर बेटी को घर में कैद कर दिया। तब महविश आठवीं में थी। उसके इश्क पर पहरा बिठा दिया गया और प्यार पर तमाम बंदिशें लगाई जाने लगीं।
हकीम उन दिनों बुलंदशहर के एक इंटर कॉलेज में दाखिला ले चुका था। दोनों का मिलना-जुलना बंद हो गया। करीब पांच साल गुजर गए, लेकिन उनके दिलों की धड़कन एक-दूसरे के लिए जारी थी। अम्मी को भनक लगी, तो उनकी सलाह पर महविश की खाला के लड़के के साथ वालिदानों ने उसका रिश्ता पक्का कर दिया। महविश को तब पता चला, जब गली-मोहल्ले में भी शादी के कार्ड बंटने लगे। उसकी पेशानी पर बल पड़ गए। भवे तन गई, यह तो जोर-जर्बदस्ती है! हकीम से मिलने के लिए छटपटाने लगी महविश। शादी से चंद दिनों पहले 28 अक्टूबर 2010 की रात दो बजे बड़ी मुश्किल से उससे मिलने का मौका मिला। हकीम ने महविश को देखते ही अपनी बाहों में समेट लिया, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता महविश। मैं अपनी जान दे दूंगा या फिर तुम्हें कत्ल कर दूंगा।’ महविश का आंखें भर आर्इं, ‘नहीं हकीम, मोहब्बत में खून-कत्ल कायर करते हैं। चलो, यहां से कहीं दूर चलते हैं। हम अपना एक नया आशियाना बसाएंगे।’
और 29 अक्टूबर की रात साढ़े आठ बजे महविश और हकीम घर-गांव छोड़कर भाग गए। दोनों अलीगढ़ पहुंचे। वहां हकीम का एक दोस्त रहता था। उसकी मदद से 7 नवंबर, 2010 को दोनों ने अलीगढ़ में कोर्ट मैरिज कर ली। इसके बाद 15-20 रोज वहीं रहे, फिर रोजी-रोजगार की तलाश में मेरठ चले गए। वहां तालपुरी के एक मोहल्ले में 11 नवंबर को काजी ने महविश और हकीम का निकाह करवा दिया। अब सामाजिक तौर पर भी उन्हें पति-पत्नी की तरह जिंदगी गुजारने की इजाजत मिल गई थी। जिंदगी हसीन हो उठी, लेकिन नौकरी-चाकरी न मिलने के कारण परेशानी अभी कम न हुई थी। मेरठ में थोड़े दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद फरवरी 2011 में दोनों दिल्ली चले गए। वहां सीलमपुर इलाके में किराए पर एक छोटा-सा कमरा लेकर रहने लगे। पास में जो जमा-पूंजी थी, वह पहले ही खर्च हो चुकी थी। दो जून की रोटी के जुगाड़ में हकीम ने अपनी मोटरसाइकिल भी बेच दी। उसके बाद 100 रुपये रोजाना पर आॅटो चलाना शुरू किया।
उधर अड़ौली गांव में महविश की हकीकत का पता परिजनों को चला, तो पैरों तले से जमीन सरक गई। दोनों के घरवाले एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। 31 अक्टूबर को महविश की बारात आनी थी। नाते-रिश्तेदारों से घर भरने लगा। जाति-विरादरी के लोगों का भी आना-जाना बढ़ गया। अंत में शादी की भीड़ ने पंचायत का रुख अख्तियार कर लिया। महविश के घरवालों ने हकीम के परिवार पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। हकीम और उसके परिजनों के खिलाफ महविश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस हकीम को कुत्ते की तरह खोजने लगी। परेशान होकर महविश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली। उच्च न्यायालय ने बुलंदशहर पुलिस को महविश, उसके पति और परिवार को सुरक्षा देने का आदेश दिया, लेकिन पुलिस ने हाईकोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं की और इन दोनों को थाना कोतवाली से भगा दिया। इससे महविश के परिजनों के हौसले बुलंद हो गए। अड़ौली गांव के दो दर्जन लोगों ने पंचायत कर हकीम के पिता मोहम्मद लतीफ को पेड़ से उलटा लटका दिया और उन्हें खूब मारा-पीटा। उनकी मौत हो गई। इसके बाद खाप पंचायत ने फरमान जारी कर दिया कि हकीम को जो भी गोली से मारेगा, उसे 50 हजार रुपये का नकद इनाम दिया जाएगा। तब भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि पेड़ से लटकाने व मार-पीट के कारण हुई लतीफ की मौत को साधरण मौत बताकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
21 जुलाई, 2011 को महविश ने एक बेटी को जन्म दिया। उसका नाम मनतशा है। इसी दौरान हकीम के एक दोस्त ने उसे पहाड़गंज के एक एनजीओ ‘लव कमांडो’ के चेयरमैन संजय सचदेव से मिलवाया। महविश ने उन्हें सारी कहानी बताकर मदद की फरियाद की। सचदेव ने बुलंदशहर के तत्कालीन एसएसपी राजेश कुमार राठौर से बात की। राठौर ने थाना कोतवाली (देहात) पुलिस को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने का सख्त आदेश दिया। साथ ही खाप पंचायत के फरमान से लड़ने के लिए उस समय चल रहे अभीनेता आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ के पांचवें एपिसोड में महविश की कहानी बताकर उसकी सुरक्षा की मांग की गई।
14 जुलाई, 2012 को महविश बुलंदशहर के पुलिस अधीक्षक (देहात) विजय गौतम से मिली और शौहर तथा परिवार की सुरक्षा के लिए गुहार लगाई। महविश इसी दौरान दोबारा मां बनने वाली थी। पुलिस ने उसके साथ सहानुभूति दिखाई। हकीम को भी यकीन हो गया कि अब परिस्थितियां बदलेंगी। वह 18 जुलाई को महविश को लेकर घर (भाटगढ़ी) लौट आया। उस समय तक हकीम कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियरिंग का कोर्स कर दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा था, इसलिए महविश को घर छोड़कर वह फिर दिल्ली चला गया। बाद में नवंबर 2012 में आया।
22 नवंबर की शाम चार बजे महविश के सिर में दर्द हो रहा था। हकीम उसे घर के पास ही एक डॉक्टर के यहां ले गया। वहां से दवा लेकर दोनों जैसे ही बाहर निकले, आधा दर्जन लोगों ने हकीम को घेरकर उस पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। उसकी मौके पर ही मौत हो गई। महविश कुछ नहीं कर सकी। जिसे इतना चाहा, उसे अपने ही परिवार को लोग भून डालेंगे, उसने सपने में भी नहीं सोचा था। पुलिस ने भी कोई सुनवाई नहीं की। अपनी और हकीम की सुरक्षा के लिए वह कुल 48 अर्जियां दे चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अंत में हकीम की हत्या कर दी गई। महविश की तहरीर पर थाना कोतवाली (देहात) के तत्कालीन कोतवाल राकेश कुमार ने हत्या के इस मामले को पांच आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाकर घटना की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गुलाब सिंह को दी। उनके निर्देश पर दो टीमें बनाई गर्इं और पुलिस ने तीन आरोपियों गुल्लू, आसिफ और सरवर को गिरफ्तार कर लिया।
आॅनर किलिंग के इस मामले की गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ी। नेताओं और महिला संगठनों की महविश की ससुराल में आने-जाने का दौर शुरू हो गया। दो अभिनेताओं ने आर्थिक मदद देने की घोषणा की। कुछ बड़े नेता जो झोझा समाज से ताल्लुक रखते हैं, वे भी सहानुभूति जताने लगे। मुख्यमंत्री की ओर से पांच लाख रुपये की मदद दी गई। साथ ही कुछ अन्य मदद की घोषणा महविश के बच्चों के भविष्य को देखते हुए की गई। यह अलग बात है कि वक्त के साथ वे सारी घोषणाएं भी ठंडे बस्ते में चली गर्इं। सरकार ने महविश को आवास, गैस एजेंसी, सरकारी पट्टे की जमीन और उसके परिवार की सुरक्षा के लिए हथियार के लाइसेंस देने की घोषणा भी की थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। पुलिस जरूर जांच करने के नाम पर परेशान करती रहती है। ताजा घटनाक्रम भी उसी का एक हिस्सा है।
9 जून, 2013 को महविश के शौहर अब्दुल हकीम के कथित हत्यारोपी गुल्लू की मां ने अपनी आठ साल की बेटी की पिटाई को लेकर थाना कोतवाली देहात में महविश, उसके जेठ यूसुफ समेत 6 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। यूसुफ को पता चला, तो उसने 12 मई को एसपी (सिटी) से मुलाकात कर थाना कोतवाली (देहात) के इंस्पेक्टर आरबी यादव की उनसे शिकायत की, ‘कोतवाल यादव आरोपियों के साथ मिलकर जबरन एक साजिश रच रहे हैं...।’ एसपी ने इंस्पेक्टर यादव को बुलाकर इस मामले में झाड़ लगाई। महविश के मुताबिक, एसपी की फटकार से इंस्पेक्टर यादव का पारा आसमान छूने लगा। वह पुलिस बल के साथ महविश के घर जा धमके। वहां उन्होंने काफी गाली-गलौज की। साथ आए पुलिसकर्मियों का गुस्सा उनसे भी ज्यादा नजर आ रहा था। धमकाते हुए कहा,‘पुलिस से उलझने की कोशिश मत करो, वरना दो-चार ऐसे मामले लाद (फर्जी मामले में फंसा) दूंगा कि जमानत के लिए तरस जाओगे। पूरा परिवार जेल में सड़ता नजर आएगा।’ महविश पुलिसवालों का फरेब सुनकर सन्न रह गई। यूसुफ ने हाथ जोड़कर कहा, ‘देखिए साहब, हमें धमकाने की कोशिश मत करिए। आप लोग भी कानून से ऊपर नहीं हैं। हमें न्याय नहीं मिलेगा तो हम आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन सितम पर सितम अब नहीं सहेंगे।’
इंस्पेक्टर यादव तिलमिला उठे। बताया जाता है, उन्होंने जीप से माचिस निकाली और यूसुफ के ऊपर फेंकते हुए कहा, ‘जान देना इतना आसान नहीं है। ये लो माचिस, लगा लो आग! है हिम्मत... मर जाओगे तो जान छूटेगी।’ और वे चले गए, लेकिन महविश और उसके परिवार को खुदकुशी के लिए उकसा गया। थोड़ी देर बाद ही महविश और उसके परिवार के सात अन्य लोगों ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाल लिया। यूसुफ के हाथ में माचिस थी, उसने खुद को आग के हवाले कर दिया। वह धू-धूकर जलने लगा। पूरे गांव में हड़कंप मच गया। महविश और उसकी बेटियों को बड़ी मुश्किल से बचाया गया, लेकिन यूसुफ 98 फीसदी जल चुका है। वह दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। पहले हकीम और अब यूसुफ की इस हालत पर महविश और उसका पूरा परिवार दहशत में है। महविश ने कोतवाल आरबी यादव को बर्खास्तग करने और एक स्थानीय नेता अमजद अली गुड्डू के खिलाफ इस मामले में कार्रवाई रकने की मांग की है।
वहीं, भटगढ़ी में एक बार फिर से अधिकारियों और नेताओं के आने-जाने का दौर शुरू हो गया है। ठीक वैसा ही नजारा बनता जा रहा है, जैसा साढ़े छह महीना पहले हाकिम की हत्या के बाद बना था। इधर जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ रहा है, मीडिया की मौजूदगी भी बढ़ती जा रही है। 14 जून, 2013 को पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय साहनी और एएसपी वैभव कृष्ण भटगढ़ी पहुंचे और पीड़ित परिवार से मिले। पुलिस अधिकारियों ने महविश से मुलाकात कर उसे भरोसा दिलाया कि पुलिस उनके साथ कुछ भी गलत नहीं होने देगी।
जारी है जिंदगी की जद्दोजहद
मेरे शौहर हकीम की हत्या का कारण हम दोनों की विरादरी रही है। मैं बुलंदशहर की झोझा विरादरी से ताल्लुक रखती हूं मेरे पति की विरादरी अल्वी (फकीर) है। मुस्लिम समाज में अल्वी विरादरी को झोझा विरादरी से कमतर आंका जाता है। चूंकि मैं झोझा विरादरी से ताल्लुक रखती थी और अल्वी विरादरी के लड़के के साथ भागकर निकाह कर लिया था, इसलिए मेरे पति को मौत के घाट उतार दिया गया। मेरा प्यार जरूर छीन लिया गया, लेकिन उसी प्यार के सहारे मैं अपनी दोनों बेटियों मनतशा और जोया के साथ जिंदगी जीने की जद्दोजहद कर रही हूं। गांव भटगढ़ी में कोई स्कूल नहीं है। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर मैं अपना खर्च चलाती हूं और बच्चों को शिक्षित भी कर रही हूं। यदि मुझे न्याय नहीं मिला, तो मैं प्रदेश सरकार द्वारा प्रदान की गई आर्थिक मदद लौटाने पर विचार कर सकती हूं।
-महविश (अब्दुल हकीम की बेवा)
एसएसपी से मांगी रिपोर्ट
मुझे घटना की जानकारी मिल गई है। एसएसपी से तत्काल रिपोर्ट मांगी गई है। देहात कोतवाली प्र•ाारी के आचरण की जांच की जाएगी और दोषी पाए जाने पर निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी।
-भवेश कुमार सिंह, आईजी, मेरठ जोन
परिजनों पर दर्ज होगा मामला?
घटनाक्रम के अुनसार इंस्पेक्टर आरबी यादव हत्यारोपी की शिकायत के एक मामले की जांच-पड़ताल करने महविश के घर गए, तो महविश और उसके जेठ यूसुफ ने इंस्पेक्टर से उल्टे अभद्रता की और इसके बाद परिवार के लोगों ने आत्मदाह करने की कोशिश की। इस पूरे प्रकरण की जांच चल रही है। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए चाहे आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज करना पड़े या फिर अंटेप्ट-टू-सुसाइड की रिपोर्ट लिखनी पड़े।
-गुलाब सिंह, एसएसपी, बुलंदशहर
गुरुवार, 6 जून 2013
भैया राजा को उम्रकैद
बुंदेलखंड का बाहुबली और इलाके में आतंक का पर्याय रहे रतनगढ़ी के भैया राजा पर 38 से ज्यादा संगीन आरोप हैं! उनमें से एक फैशन डिजाइनर वसुंधरा हत्याकांड में अदालत ने पवई के पूर्व विधायक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कौन है भैया राजा? क्या है उसके पापों की काली कहानी?
नब्बे के दशक में बुंदेलखंड में अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा की तूती बोलती थी। उन दिनों वह पवई विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहा था। चुनाव चिह्न हाथी था। भैया ने नारा दिया था- ‘मोहर लगेगी हाथी पर, नहीं तो गोली चलेगी छाती पर! लाश मिलेगी घाटी पर!’ बड़े-बड़े तुर्रम खां भैया राजा के नाम से कांपते थे। जिसने की हुक्मअदूली, उसे खिला दिया जिंदा मगरमच्छों को। चुनाव में जीत हुई। अकूत धन-संपदा के मालिक तो हैं ही, विधायक बनते ही इलाके में सरकार भी अपनी चलने लगी। पुलिस दारोगा की बात छोड़िए, केंद्र और राज्य के मंत्रियों में दम नहीं होता था कि भैया राजा के मुंह से निकली बात को पलट दें। कर्नल हो कैप्टन, हर कोई उसके खिलाफ जाने में सौ बार सोचता। रियासत नहीं रही तो क्या हुआ, राजाओं और नवाबों वाला रुतबा तो बरकरार ही था। उनकी हैसियत की समाजवादी पार्टी के मुखिया भी कायल रहे। 1993 में पवई (जिला पन्ना) से भैया राजा सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और विजयी रहे। उनकी पत्नी आशा रानी सिंह छतरपुर जिले के बिजावर विधासभा सीट से भाजपा की विधायक हैं, लेकिन कानून और अदालत के आगे किसी की नहीं चलती। कहावत भी है, देर से ही सही पर अत्याचार का अंत जरूर होता है। 30 मई को छतरपुर जिला के नवम अपर सत्र न्यायाधीश संजीव कालगांवकर ने इस बाहुबली और पूर्व विधायक भैया राजा को वसुंधरा हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। छतरपुर जिले के गहरवार में बनी भैया राजा की रतनगढ़ी हवेली में अब सन्नाटा पसर चुका है और परिजन मायूस हैं।
भैया राजा पर फैशन डिजाइनर व अपनी ही नातिन वसुंधरा का यौन-शोषण और उसकी हत्या करने का आरोप था। पुलिस ने इस मामले में कुल 36 गवाह अदालत में पेश किए। अदालत ने अपने 124 पृष्ठों के फैसले में भैया राजा, भूपेंद्र सिंह उर्फ हल्के, राम किशन उर्फ छोटू लोधी, अभमन्यु उर्फ अब्बू और पंकज शुक्ला उर्फ मरतंड शुक्ला को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद के साथ पांच-पांच सौ रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। जबकि इसी मामले की एक अन्य आरोपी रोहणी शुक्ला उर्फ रंपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
वसुंधरा उर्फ निशि बुंदेला (20) उन दिनों भोपाल में रहकर फैशन डिजायनिंग की पढ़ाई पूरी कर रही थी। भैया राजा के रिश्ते में वह उसकी भाजी लगती थी। उसी लिहाज से जब भी भैया राजा भोपाल जाते, वसुंधरा से जरूर मिलते। ऐसे में ही कहते हैं कि एक रोज उनकी नजर उस पर खराब हो गई। उसने वसुंधरा को तरह-तरह के उपहार आदि देकर उसे जल्द ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कभी-कभी छुट्टियों में अब वसुंधरा भी भैया राजा की छतरपुर वाली हवेली में आने लगी थी। मौका देखकर एक रोज वह शैतान बन गया। उसने अपनी भाजी को ही खराब कर डाला। न उम्र की परवाह की और न ही मान-मर्यादा के बारे में सोचा। भाजी के साथ भैया राजा के अवैध संबंधों का सिलसिला चल पड़ा। जब भी मौका मिलता, वह दबोच लेते। बेचारी लाज-भयवश किसी से कुछ कह नहीं पा रही थी। इसका भी भैया राजा ने बहुत फायदा उठाया। होश तब उड़ गए, जब एक रोज पता चला कि वसुंधरा गर्भवती है।
भैया राजा ने वसुंधरा से अबॉर्शन कराने को कहा, तो वह तिलमिला उठी, ‘कभी नहीं! तुमने जो पाप किया है, उसे अब मैं पूरी दुनिया के सामने लाकर रहुंगी। तुम्हारी यह झूठी आन-बान और शान मैं मिट्टी में मिला दूंगी। मैं तुम्हें समाज के सामने नंगा कर दूंगी।’ वसुंधरा का गुस्सा देखकर भैया राजा के पैरों तले से जमीन सरक गई। वह समझ गया कि अगर अभी इसका इलाज नहीं किया गया, तो वह वाकई बदनाम हो जाएगा। उसने जबरन वसुंधरा का गर्भवती करवा दिया, फिर उसकी हत्या की साजिश रचनी शुरू कर दी। भैया राजा के इस खूनी खेल में भूपेंद्र उर्फ हल्के, पंकज शुक्ला, राम किशन उर्फ छोटू, रंपी उर्फ रोहिणी और अ•िामन्यु शामिल थे। भूपेंद्र, अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा का जीप चालक था। रोहिणी भैया राजा के दत्तक पुत्र राम अवतार की बेटी है और वसुंधरा की सहेली थी। पंकज शुक्ला रोहिणी का पति है और अभिमन्यु भाई।
वसुंधरा को भैया राजा के इस संगीन षड्यंत्र की भनक तक नहीं लगी। योजना के अनुसार 10 दिसंबर, 2009 को रोहिणी भोपाल गई। वसुंधरा को फोन कर शॉपिंग करने के बहाने 10 नंबर मार्केट में बुलाया। वहां कुछ देर दोनों सहेलियां बाजार में घूमती-फिरती रहीं, फिर उसे बहला-फुसलाकर रोहिणी छतरपुर ले आई। यहां से वसुंधरा को रतनगढ़ी कोठी में पहुंचा दिया गया। पर कटे पंक्षी को फड़फड़ाते देखकर भैया राजा के होंठों पर मुस्कान फैल गई। उसके एक इशारे पर ड्राइवर भूपेंद्र ने उन्हीं की पिस्टल से वसुंधरा को गोली मार दी। बेचारी तड़पकर ठंडी पड़ गई, फिर सभी ने मिलकर वसुंधरा की रक्तरंजित लाश जीप में डाली और ठिकाने लगाने के लिए रात के अंधेरे में निकल पड़े।
11 दिसंबर की सुबह थाना मिसरोद पुलिस को किसी ने फोन कर सूचना दी कि गुदरी घाट स्थित रतन सिंह रोड के किनारे झाड़ियों के पास एक युवती का शव पड़ा है। पुलिस ने उसे बरामद कर शिनाख्त करवाई, तो हड़कंप मच गया। वह लाश निशि उर्फ वसुंधरा की थी। पुलिस की सूचना पर वसुंधरा के पिता मृगेंन्द्र सिंह और मां भारती भी आ गए, लेकिन यह कत्ल किसने और कहां किया? कातिल कौन है? उसका मकसद क्या था आदि के संबंध में पुलिस को कोई सुराग नहीं लगा। सभी हैरान-परेशान थे। पोस्टमार्टम के बाद वसुंधरा के अंतिम संस्कार के समय भी उसकी मां भारती इसी उधेड़बुन में लगी रही कि कातिल का चेहरा कैसे बेनकाब हो। उन्हें रोती-विलखती देखकर रोहिणी के भाई अभिमन्यु से नहीं रहा गया। उसने उनके कान में बता दिया कि भूपेंद्र ने अपने आका के कहने पर वसुंधरा को गोली मारी थी। इतना सुबूत बहुत था। पुलिस ने गहन छानबीन के बाद 20 दिसंबर को भैया राजा और इस कत्ल की साजिश में शामिल अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद वसुंधरा हत्या कांड का राज फाश होते देर नहीं लगी।
भैया राजा और अन्य आरोपियों ने लाख कोशिश की, लेकिन जमानत नहीं हुई। भैया राजा ने हाई कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया, तब भी सीखचों से बाहर नहीं आ सका। दरअसल, भैया राजा के गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। उस पर तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह के भतीजे सिद्धार्थ राव की हत्या करने का भी आरोप है। इस घटना को नैनीताल में अकबर अहमद डम्पी के बंगले में अंजाम दिया गया था। भैया राजा इस मामले में कई साल उत्तर प्रदेश की जेल में बंद भी रहा। उसी दौरान एमपी की सुंदर लाल पटवा सरकार ने भैया राजा की झील को नेस्तनाबूद कर दिया था। बताया जाता है कि भैया राजा अपने दुश्मनों को अपनी झील में फेंक देता था। उसमें मगरमच्छ पाल रखे थे, जो मिनटों में जिंदा आदमी की हड्डियां तक चट कर जाते थे। इसी वजह से तत्कालीन सुंदर लाल पटवा सरकार को उसकी झील को नेस्तनाबूद करना पड़ा था। इसके बाद मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती बनीं, तो उनके आदेश पर भी भैया राजा की झील और बंगले पर पुलिस अधिकारियों ने बड़ी कार्रवाई की थी। अपराध के आरोपों के मामले में भैया राजा की पत्नी और भाजपा विधायक आशा रानी सिंह भी पीछे नहीं हैं। उन पर अपनी नौकरानी तिज्जी बाई को मई 2007 में आत्महत्या के लिए विवश करने का आरोप है, जिसके चलते वह महीनों जेल में भी बंद रही हैं। अब जमानत पर हैं।
लेकिन भैया राजा एक ऐसा शातिर रहा है, जिसे गिरफ्तार करने में बड़े-बड़े पुलिस अफसर भी कांप जाते थे। दर्जनों अपराधों का इल्जाम है उस पर, किंतु कोई टीआई अपने थाने में उसकी फोटो गुंडा लिस्ट में लगाने की हिम्मत नहीं कर सका था। इसी मामले की विवेचना में लगे टीआई भूपेंद्र सिंह का अब तबादला हो चुका है, तब भी वह अदालत में भैया राजा के खिलाफ कुछ खास नहीं बोले। 18 मार्च 2010 को इस मामले की चार्जशीट पुलिस ने अदालत में पेश की थी। घटना के करीब चार साल बाद अदालत ने मामले का अब फैसला सुनाते हुए कहा है कि भैया राजा ने छतरपुर जिला स्थित रतनगढ़ी में वसुंधरा की हत्या की साजिश रची थी। उसकी लाश ठिकाने लगाने के लिए एक बोलेरो जीप का इस्तेमाल किया गया था। जीप से न केवल वसुंधरा के कानों के टाप्स बरामद हुए बल्किउसकी सीट के नीचे से कई और भी सुबूत मिले हैं। इस मामले के सभी आरोपियों को दोषसिद्ध होने के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है।
रतनगढ़ी हवेली में पसरा सन्नाटा
30 मई को अदालत का फैसला आने के बाद भैया राजा की रतनगढ़ी वाली हवेली में सन्नाटा पसर गया। जबकि छतरपुर अदालत परिसर छावनी में तब्दील हो चुका था। सुरक्षा-व्यवस्था के मद्देनजर यहां तीन सीएसपी और पांच थाना प्र•ाारियों के अलावा सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। फैसला सुनने के बाद विधायक आशा रानी सिंह बहुत मयूस दिखीं। बेटी रश्मि, दीप्ति और कंचन ने उन्हें सहारा दे रखा था। मां और तीनों बेटियों की आंखें भर आई थीं। दोनों बेटे भी अदालत में मौजूद थे, लेकिन सभी के चेहरे उतरे हुए थे। उप संचालक अभियोजन राजेश रायकवार ने बताया कि अभियोजन पक्ष इस मामले में आरोपी रंपी उर्फ रोहिणी को सजा दिलाने के लिए भी हाई कोर्ट में अपील करेगा।
उसके पाप की सजा कम
वसुंधरा के पिता मृगेंद्र सिंह का कहना है कि भैया राजा की साजिश ये थी कि वसुंधरा की लाश कलियासोत में फेंक दी जाए, ताकि उसकी शिनाख्त न हो सके। लेकिन आरोपी रास्ता •ाूल गए और सुबह होने के फेर में वे गुडारी घाट के पास झाड़ियों में लाश फेंक गए। वहीं मां भारती ने बताया कि हत्या से ठीक पांच दिन पहले उन्हें पता चला था कि भैया राजा मेरी बेटी का देह-शोषण करता रहा है। एक बार इंदौर ले जाकर उसका गर्भवती भी करवाया था, फिर जब उसे डर लगने लगा कि वसुंधरा उसे बेनकाब कर देगी, तो बदनामी के डर से भैया राजा ने उसकी हत्या करवा दी। उसने जो पाप किया है, उसके लिए उम्रकैद की सजा बहुत कम है।
-जितेन्द्र बच्चन
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