मंगलवार, 8 मई 2018

दुष्कर्म का बापू

-जितेन्द्र बच्चन
कथावाचक आसाराम के भक्तों को गहरा आघात! स्वयंभू 'भगवान' आसुमल हरपलाणी उर्फ आसाराम को उम्रकैद। जोधपुर की जिला अदालत ने एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म करने के मामले में सुनाई सजा। जुर्म के इस दलदल में आसाराम के अलावा उसके दो सहयोगियों शिल्पी और शरतचंद्र को भी अदालत ने दोषी ठहराते हुए 20-20 साल की सजा सुनाई है। बाबा के तमाम रसूख कानून के आगे बौने पड़ गए। साजिश और फरेब के बल पर बटोरी गई जिन्दगी भर की अकूत दौलत गवाहों, सबूतों और तर्कों को खरीद नहीं सकी। करीब 77 साल के आसाराम की बाकी की जिंदगी अब सलाखों के पीछ ही कटेगी।
25 अप्रैल, 2018 को सेंट्रल जेल जोधपुर में एससी/एसटी की अदालत में जज मधुसूदन शर्मा के सजा का ऐलान करते ही आसाराम का चेहरा पीला पड़ गया। वह निढाल हो गया। कल तक जो शख्स लोगों को पाप-पुण्य का पाठ पढ़ाता था, आज अपने दुष्कर्मों का अहसास होते ही फूट-फूटकर रोने लगा। साल 2013 के अगस्त महीने की 16 तारीख को आसाराम के खिलाफ यूपी के शाहजहांपुर की एक लड़की ने उसे नंगा कर दिया। कोर्ट ने एक-एक कर आसाराम को कुल छह अपराध में दोषी करार दिया है। उसका हर गुनाह साबित हुआ है। आसाराम के बचाव में खड़ी वकीलों की फौज भी पॉक्सो एक्ट के आगे छोटी पड़ गई।
धारा 370(4) के तहत अदालत ने आसाराम को दोषी पाया है। इस जुर्म के लिए उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना न भरने की स्थिति में सजा एक वर्ष और बढ़ जाएगी। धारा 342 के तहत आसाराम अपराधी करार दिया गया है। इस अपराध के लिए उसे एक वर्ष का कठोर कारावास दिया गया है और 1000 रुपये का जुर्माना लगा है। जुर्माना न भरने की स्थिति में एक माह की अतिरिक्त कैद भोगनी पड़ेगी। धारा 506 के तहत आसाराम का जुर्म साबित हुआ है। इस जुर्म के लिए कोर्ट ने आसाराम को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है और 1000 रुपये का अर्थदण्ड लगाया है। धारा 376(2) (एफ) के तहत भी उसे दोषी पाया गया। इस अपराध के लिए उम्रकैद की सजा मिली है। इसी जुर्म के लिए आसाराम पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है, जिसे अदा न करने पर एक साल का कठोर कारावास बढ़ जाएगा। धारा 376 (डी) के तहत आसाराम अपराधी सिद्ध हुआ है। इसके लिए भी आसाराम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना न भरने की स्थिति में एक साल अतिरिक्त कठोर कारावास की सजा भुगतनी होगी। जबकि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम की धारा 23 के तहत भी आसाराम को अपराधी पाया गया। इसके लिए अदालत ने छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई है।
आसाराम के गुनाहों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि उसको दो-दो आजीवन कारावास और 12 वर्ष 6 माह की कठोर कैद की सजा मिली है। इसके अलावा कुल तीन लाख दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। शाहजहांपुर के एसपी कृष्ण बहादुर सिंह कहते हैं, 'आसाराम पर इल्जाम और तोहमत लगाने वालों की कमी नहीं है, लेकिन खुलासा करने का साहस इस जिले की लड़की ने ही दिखाया।' लड़की के पिता का इल्जाम था कि उनकी बेटी गई तो थी बाबा के गुरुकुल में शिक्षा, संस्कार और दीक्षा की आस लेकर, लेकिन दुष्कर्मी ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। 14 अगस्त, 2013 को  लड़की के माता-पिता अनुष्ठान के लिए बेटी को लेकर जोधपुर के आश्रम गए थे। वहां आसाराम ने उनके ठहरने का इंतजाम करवा दिया, लेकिन 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के दिन अनुष्ठान के बहाने आसाराम ने लड़की के साथ दुष्कर्म किया। लड़की ने विरोध किया तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई।
17 अगस्त को लड़की ने सारी बात घरवालों से बताई। माता-पिता पर पहाड़ टूट पड़ा। आसाराम 18 से 20 अगस्त तक दिल्ली के रामलीला मैदान में शिविर कर रहे थे। परिजनों के साथ पीड़ित लड़की दिल्ली पहुंच गई। मध्य जिला के थाना कमला मार्केट पुलिस से मिली। लड़की का मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत बयान हुआ। लड़की का मेडिकल कराया गया। दुष्कर्म की पुष्टि होते ही पुलिस ने आसाराम के खिलाफ रेप के साथ-साथ पॉस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई के लिए मुकदमा जोधपुर पुलिस को स्थानांतिरत कर दिया।
1941 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पैदा हुए आसाराम का परिवार देश के विभाजन के समय गुजरात आ गया था। यहां करीब 10 एकड़ उपजाऊ जमीन मिल गई, जिसमें आसाराम ने अपना पहला आश्रम बनाया। सथ ही उन्होंने अपना सरनेम बापू कर लिया। आश्रम के प्रवक्ता मनीष बगाड़िया के अनुसार, दुनिया भर में आसाराम के पास 425 आश्रम, 1,400 समिति, 17,000 बाल संस्कार केंद्र और 50 गुरुकुल हैं। वहीं एक अन्य प्रवक्ता नीलम दुबे का दावा है कि भारत और विदेश में आसाराम के पांच करोड़ से अधिक अनुयायी हैं। हो भी सकते हैं, लेकिन आसाराम और उनके बेटे नारायण साईं ने जो किया, वह सर्वविदित है।
आसाराम जब गिरफ्तार नहीं हुए थे, तब उन्होंने अपने एक बयान में कहा था, ‘मैं घटना के दिन आश्रम में मौजूद था, लेकिन लड़की (पीड़िता) को कुछ लोगों ने भटका दिया है। भगवान बुद्ध पर भी ऐसे आरोप लगे थे, पर सच्चाई सामने आ जाएगी। अगर वे मुझे सलाखों के पीछे डालें तो मैं हंसते हुए जेल जाना चाहता हूं। मैं जेल को बैकुंठ जैसा मानता हूं।’ लेकिन वही बैकुंठ अब आसाराम के लिए नरक बन चुका है, तभी तो जोधपुर की अदालत में उम्रकैद की सजा सुनते ही वह रोने लगे।
आसाराम पक्ष के एक वकील आर.के. नायक ने जोधपुर कोर्ट के न्यायाधीश मधुसूदन शर्मा पर दबाव में फैसला करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि इस मुकदमे का ट्रायल मीडिया ने किया है। जज जबरदस्त दबाव में थे, इसलिए उन्होंने इस मामले के तथ्यों को नहीं देखा और दबाव में फैसला सुना दिया। आसाराम का पक्ष लेते हुए आर.के. नायक ने कहा कि आसाराम निर्दोष हैं। वे आसाराम को रेपिस्ट नहीं मानते। इस फैसले के खिलाफ अगर हाईकोर्ट में बात नहीं बनी तो वे उच्चतम न्यायालय तक जाएंगे।
फिलहाल, कैदी नंबर 130 के रूप में आसाराम अभी तो सेंट्रल जेल जोधपुर में एक सजायाफ्ता मुजरिम के तौर पर रहेगा। जेल सूत्रों के मुताबिक, इससे पहले आसाराम अब तक जेल में संत की हैसियत से ही रह रहा था, लेकिन अब उसकी हैसियत एक सजायाफ्ता मुजरिम जैसी ही होगी। डीआईजी (जेल) विक्रम सिंह ने बताया कि अभी तत्काल आसाराम को बैरक नंबर 2 में ही रखा जाएगा। बाद में सुरक्षा के नियमों के तहत किस बैरक में शिफ्ट करना है, उस पर विचार किया जाएगा। वहीं इसी मामले के आरोपी रहे और आसाराम के प्रमुख सेवादार शिवा और रसोइया प्रकाश को अदालत ने बरी कर दिया है। पीड़िता और उसके परिजन भी बहुत खुश हैं। उन्होंने कहा है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। अदालत के इस फैसले से लोगों की आस्था कानून में और बढ़ेगी।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

खूनी सडक़ें, खौफनाक हादसे


जितेन्द्र बच्चन, नई दिल्ली
सडक़ हादसों की हकीकत। देश में बढ़ती दुर्घटनाएं। एक घंटे में 16 मौत। खूनी सडक़ें, खौफनाक हादसे। जिंदगी पर भारी रफ्तार। बेलगाम होता ट्रैफिक, बेमौत मरती जनता। सरकारी इंतजामों की खुलती पोल। हादसों को दावत देतीं सडक़ें और सडक़ों की सेहत पर शर्मसार सरकार। युवाओं को निगल रही तेज रफ्तार, तो कहीं-कहीं नाबालिग खेल रहे हैं मौत का खेल। आखिर कौन है इसका जिम्मेदार? क्यों लोगों की जान से खेल रहा है परिवहन मंत्रालय? फेल होती सडक़ों पर क्या कहती है सरकार?
नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो का दिल दहला देने वाला आंकड़ा। एक दसक में सडक़ दुर्घटनाओं में 42.50 फीसद का इजाफा। रोड पर होने वाली मौतों के मामले में दिल्ली सबसे आगे। राज्यों में उत्तर प्रदेश बना प्राण घातक। केंद्र सरकार के परिवहन विभाग की जारी रिपोर्ट जानकर आपका कलेजा मुंह को आ लगेगा। एकदम भयानक तस्वीर। देश की सडक़ें महज एक साल में डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के लिए काल बन गईं। घायल होने वालों की संख्या तो पांच लाख से भी ज्यादा है। न जाने कितने घर तबाह हो गए। परिवार में कोई नहीं बचा चिराग-बत्ती करने वाला। इसके बावजूद न तो ट्रैफिक पुलिस की लापरवाही खत्म हुई और न ही सडक़ों के निर्माण करने में मिलावाट। तमाम निमय-कानून के बावजूद पुलिस और सडक़ निर्माण करने वाले इंजीनियर से लेकर अधिकारी तक भ्रष्टïाचार में लिप्त हैं।
सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन लोगों की जान से खेलने वाले अधिकारियों का खेल जारी है। स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है। पिछले साल की अपेक्षा सडक़ दुर्घटना में इस साल 4.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि वर्ष 2015 में सडक़ हादसे में मरने वालों में 54 फीसदी लोगों की उम्र 34 साल से भी कम थी। वहीं 2015 में सबसे ज्यादा सडक़ हादसे तो मुंबई में हुए, लेकिन सबसे ज्यादा लोगों ने दिल्ली की सडक़ों पर जान गवाईं। राजधानी की चौड़ी व चमकदार दिखने वाली सडक़ें 1622 लोगों की जिंदगी निगल गईं।
मौत का आंकड़ा पहुंच सकता है सात लाख:
17 नवंबर 2016 को हुई बातचीत में सडक़ परिवहन, राजमार्ग राज्यमंत्री पी राधाकृष्णन ने बताया कि देश में 2013 से 2015 के बीच 14 लाख 77 हजार 299 सडक़ दुर्घटनाएं घटीं। जबकि सडक़ हादसों में लोगों के हताहत होने के आधार पर चिह्नित 789 ऐसे स्थानों में सर्वाधिक 104 उत्तर प्रदेश में हैं। तमिलनाडु में 102 और कर्नाटक में 86 हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने सडक़ दुर्घटना में लोगों के हताहत होने के मामलों को कम करने के लिए सुरक्षा ऑडिट जैसे कई कदम उठाए हैं। वहीं मानवाधिकार विभाग लखनऊ की श्रद्धा सक्सेना का कहना है कि पिछले दस साल की अवधि में सडक़ हादसों में होने वाली मौतों में साढ़े 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वह आगे कहती हैं, देश में जितने लोग बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं से नहीं मरते, उससे कहीं ज्यादा सडक़ दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में नाबालिग बाइकर्स का आतंक है। पिछले तीन साल में यूपी में ये बाइकर्स 14,157 और मध्य प्रदेश में 8, 420 दुर्घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं। नोएडा के यातायात विशेषज्ञ  केपी श्रीवास्तव का कहना है, ‘यदि सडक़ पर गति नियंत्रित नहीं की गई तो 2020 तक भारत में सात लाख प्रति वर्ष से भी ज्यादा मौतें सडक़ हादसों में होंगी।’
तेज र तार का नतीजा :
आखिर इतने अधिक सडक़ हादसों की वजह क्या है और कौन-सी जगहें सडक़ हादसों के हिसाब से सबसे ज्यादा खतरनाक हैं? इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्रालय के परिवहन अनुसंधान विभाग के एक वरिष्ठï अधिकारी एसके भल्ला का कहना है, तमाम राज्य सरकारों, पुलिस और अन्य एजेंसियों से मिले ब्योरे की समीक्षा के बाद पता चला है कि 100 में से 77 सडक़ हादसों में गाड़ी चलाने वाले की ही गलती होती है और उसमें भी सबसे ज्यादा हादसे ओवर स्पीडिंग से हुईं। वहीं केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है, गाड़ी चलाने वालों पर गलती मढ़ देना सबसे आसान है। जबकि बहुत सी जगहें ऐसी हैं, जहां एक ही जगह पर लगातार हादसे होते रहते हैं और सडक़ की डिजाइन में खामी इसकी बड़ी वजह है। परिवहन मंत्रालय ने देश भर में फैले 726 ब्लैक स्पॉट्स की पहचान की है, जहां बार-बार हादसे होते हैं। मंत्रालय ने अब राज्य सरकारों से बात करके इन जगहों पर रोड का डिजाइन दुरुस्त करने का काम शुरू कर दिया है।
कानून में छेद, बड़ी लापरवाही :
परिवहन व राजमार्ग मंत्रायल के आंकड़ों के मुताबिक, 80 फीसद से अधिक हादसे चालक की गलती से होते हैं। वहीं हाई-वे पर रात में गाडिय़ों की गूंजती आवाज को सुनिए तो डर लगता है। 90, 100, 120 और 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से यहां गाडिय़ां चलती हैं। शायद यही कारण है कि 21 नवंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव देश के सबसे लंबे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे का लोकार्पण करते हुए यह अपील करना नहीं भूले कि 100 किमी प्रति घंटे की स्पीड लिमिट क्रॉस न करें। दूसरा कारण है कानून में छेद। हमारे यहां जो कानून हैं, उनमें उदारता कहीं ज्यादा है। लिहाजा हादसे को अंजाम देने वाले चालक को कठोर सजा देने की बजाय, कानून उसे बचाने में ज्यादा सहायक साबित होते हैं। ज्यादातर मामलों में पुलिस लापरवाही से हुई मौत मानकर जिन धाराओं में प्रकरण कायम करती है, उनमें तत्काल जमानत मिल जाती है और सजा का प्रावधान भी दो साल का है।
सडक़ों पर टै्रफिक का बढ़ता बोझ :
दिल्ली पुलिस आयुक्त के अनुसार, फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस भी सडक़ हादसे की एक बड़ी वजह है। वहीं पूर्व डीजीपी (उत्तर प्रदेश) प्रकाश सिंह देश में बढ़ती दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण कुछ सडक़ों पर जरूरत से ज्यादा ट्रैफिक का बढ़ता बोझ को मानते हैं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत में मौत का छठा सबसे बड़ा कारण सडक़ हादसे को मानता है। शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रेडियो संदेश ‘मन की बात’ में इस पर चिंता जताते हुए लोगों की जान बचाने के लिए कदम उठाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार सडक़ परिवहन और सुरक्षा कानून बनाएगी और दुर्घटना के शिकार को बिना पैसा चुकाए तुरंत चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराएगी। प्रधानमंत्री की चिंता वाजिब है, ताकि किसी का सफर आखिरी न हो।
‘मन की बात’:
बढ़ते सडक़ हादसों को रोकने के लिए सरकार सडक़ परिवहन और सुरक्षा कानून बनाएगी और दुर्घटना के शिकार को बिना पैसा चुकाए तुरंत चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराएगी।
-नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
 हादसों को कम करने में नाकाम रहा
हमारा मंत्रालय सडक़ हादसों को कम करने में नाकाम रहा है। इस दिशा में जो भी कदम उन्होंने उठाए हैं, उसका फिलहाल कोई असर नहीं हुआ है। हमें अफसोस है कि सडक़ हादसे में देश के जितने लोगों की जान जा रही है, उतने लोग किसी युद्ध और आतंकी घटना में भी नहीं मरते।
-नितिन गडकरी, केंद्रीय परिवहन मंत्री
कम हो सकता है मौत का आंकड़ा
बच्चों को सडक़ सुरक्षा संबंधी शिक्षा देने से कम हो सकता है मौत का आंकड़ा। बच्चों का व्यवहार उनके परिवार और दोस्तों के बीच ‘प्रहरी’ का काम कर सकता है।
-आलोक कुमार वर्मा, पुलिस आयुक्त, दिल्ली
 कानून का डर नहीं
सडक़ पर गाडी चलाने वाले अक्सर खुद को राजा समझते हैं। उन्हें कानून का डर नहीं होता। उनके इस रवैये से सडक़ पर चलने वाले लोग खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। दूसरों की जिंदगी को लेकर लापरवाह ये लोग कभी नशे में होते हैं, तो कभी महज रोमांच के लिए सडक़ पर गाड़ी गलत तरीके से चलाते हैं। ऐसे लोगों में कानून का डर होना चाहिए। उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि वो हल्की सजा या जुर्माना देकर बच जाएंगे। हर जिंदगी अमूल्य है।
- सर्वोच्च न्यायालय
सडक़ हादसे का बड़ा कारण:
तेज गति, नशे में वाहन चलाना, फुटपाथों पर कब्जे होने से संकीर्ण होते सडक़ मार्ग, लापरवाही, खराब मौसम, रेड लाइट क्रॉस करना, किशोर चालक, सडक़ों में दिए गए सिगनल को नजरअंदाज करना आदि।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

1साल, 520 बलात्कार : पुलिस की खुलती पोल


हरियाणा में हर साल होती हैं 520 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार। राजधानी दिल्ली को भी इसमें जोड़ लें तो दोनों राज्यों को मिलाकर यह आंकड़ा 3380 पहुंच जाता है। जबकि 151 युवतियों के साथ रेप की कोशिश की गई और यौन शोषण में करीब 60 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

जितेन्द्र बच्चन, नई दिल्ली
14 साल की लड़की के साथ हैवानियत! दहल उठा फरीदाबाद! सदमे में हैं शहर की महिलाएं! कांप उठा मां का कलेजा। हिल गए लोग, लेकिन दुष्कर्मियों के न हाथ कांपे और न ही दिल पसीजा। बहते रहे आंसू, सिसकती रही मासूम। तब भी जालिमों को तरस नहीं आया, दबोच लिया भूखे भेड़िए की तरह। रौंद डाली सारी इंसानियत। तोड़ते रहे कहर। ढाते रहे सितम। लहूलुहान हो गई मानवता! बेहोश हो गई बच्ची! भूखी-प्यासी सारी रात वह जंगल में पड़ी रही। उफ! कितना दर्द बर्दाश्त किया होगा उसने। वह भी महज 14 साल की उम्र में। सुबह बड़ी मुश्किल से मां का सामना हुआ तो खून से लथपथ थी बच्ची। जिस्म का अंग-अंग जख्मी था उसका। पर हाय-री पुलिस, इस पर भी उसका रवैया हैरान करने वाला रहा। इस बात का एहसास होते ही कि मामला मीडिया में जा सकता है और फिर होगी पुलिस की छीछालेदर, बच्ची को शहर के एक कोने में बने छोटे से अस्पताल में ले जाकर दाखिल करा दिया, ताकि पता न चले किसी को। एक पुलिसकर्मी ने लड़की के पिता को दो हजार रुपये देने की कोशिश की। उसका कहना था, खर्चा-पानी दे रहा हूं। किसी से कुछ बताओगे तो मुफ्त में बदनाम हो जाओगे। चुप रहने में ही बेहतरी है।
हरियाणा पुलिस का बेरहम चेहरा! पिता की आंखें भर आईं। आत्मा चित्कार उठी- ‘क्या तुम्हारी बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म करता, तब भी तुम मामला रफा-दफा करने की कोशिश करते? कितनी शूरमा है पुलिस! हैवानों के आगे घुटने टेक देती है, लेकिन पीड़ित से सौदा करने में कभी नहीं चूकती! इतना भी नहीं सोचा कि अगर पुलिस ही इंसाफ  के दरवाजे पर ताला लगाकर बैठ जाएगी तो कैसे बचेगी लोकतंत्र की इज्जत? बेदिल ही नहीं, कभी-कभी बेदर्द भी होती है पुलिस।’
हरियाणा की हकीकत! बढ़ता अपराध, घटती साख! पुलिस की खुलती पोल। खट्टर सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है सबकुछ। उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद हरियाणा में महिलाओं और बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही, लेकिन मुख्यमंत्री का दावा है कि राज्य की स्थिति देश के कई अन्य हिस्सों की तुलना में बेहतर है। जबकि बेटियों की सुरक्षा के लिहाज से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) सबसे असुरक्षित क्षेत्र बन चुका है। एनसीआर में बड़ा हिस्सा दिल्ली और हरियाणा का है। दोनों ही राज्यों में बीते तीन वर्षों में बलात्कार और गैंगरेप की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। बीते साल हरियाणा और दिल्ली में 3380 लड़कियां और महिलाएं रेप का शिकार हुईं। करीब 150 महिलाओं के साथ बलात्कार की कोशिश की गई। दिल्ली में तो रेप के मामले 60 फीसद बढ़ चुके हैं। यहां बलात्कार की घटनाएं औसतन 400 रेप प्रति वर्ष की दर से बढ़ती जा रही हैं।
एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) के अनुसार, सामूहिक बलात्कार के मामलों में हरियाणा देश में पहले नंबर पर है। पौने दो करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से राज्य में बीते साल गैंग रेप के 204 मामले सामने आए हैं। आंकड़ों की बात प्रतिशत में करें तो यहां 10 लाख महिलाओं की आबादी पर 16 गैंगरेप की शिकार हुई हैं। इसके बाद देश की राजधानी दिल्ली का नंबर है, लेकिन एक अन्य सर्वे रिपोर्ट की मानें तो छोटा-सा राज्य होने के बावजूद हरियाणा गैंगरेप के कुल केसों के मामले में भी चौथे नंबर पर है। शायद यही कारण है कि हरियाणा एवं पंजाब हाईकोर्ट भी गैंगरेप को लेकर हरियाणा सरकार को लगातार कटघरे में खड़ा करती रही है। इतना ही नहीं पीएम नरेंद्र मोदी ने हरियाणा से ही ‘बेटी बचाओ’ अभियान का आह्वान किया था।
एनसीआरबी का कहना है, दिल्ली के उत्तर में छह राज्यों में हरियाणा ही ऐसा राज्य है, जहां की बहू-बेटियां सबसे ज्यादा जुल्म का शिकार हुईं। यहां 5 सितंबर 2016 तक बलात्कार के 1070 केस दर्ज किए गए, जबकि इससे बड़े राज्य पंजाब में रेप के 886 केस दर्ज हुए। उत्तराखंड में 283, हिमाचल प्रदेश में 250, और जम्मू कश्मीर में 296 रेप के केस दर्ज हुए हैं। हरियाणा के विपक्षी नेताओं का भी कहना है कि खट्टर सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में बलात्कार की घटनाओं में कमी नहीं आई है। पुलिस की निष्क्रियता जगजाहिर है। खुद डीजीपी डॉ. केपी सिंह की ओर से जारी एक आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में हर रोज एक महिला बलात्कार की शिकार होती है। यद्यपि हरियाणा पुलिस का कहना है कि पहले से राज्य में होने वाले अपराध में कमी आई है। बीते एक साल (30 जून 2015 से 30 जून 2016 तक) में बलात्कार के महज 520 मामले दर्ज हुए हैं। जबकि अपहरण के 801 और छेड़छाड़ के 863 मामले सामने आए हैं।
रोहतक में खुलेआम घूम रहा आरोपी
लेकिन यह सरकार आंकड़ा है। अन्य सूत्रों की बात करें तो और चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं, जो पुलिस को कटघरे में खड़ा करती हैं। रोहतक जिले की बात करते हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अपराध पर अंकुश लगाने की बात करने वाली रोहतक पुलिस एक मंदबुद्धि बेटी को एक साल बाद भी इंसाफ  नहीं दिला पाई है। जिस युवक ने दुष्कर्म किया, वह अब भी खुलेआम घूम रहा है। वहीं दुष्कर्म के बाद लड़की गर्भवती हो गई, जिसका जिला प्रशासन की अनुमति के बाद गर्भपात कराया गया था। अब मंदबुद्धि लड़की की बहन न्याय के लिए कभी एसपी के पास तो कभी आईजी के दफ्तर का चक्कर काट रही है। लेकिन आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए कोई तैयार नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, मामले की जांच कर रही डीएसपी पुष्पा खत्री किसी को इंसाफ  दिलाना तो दूर, वह पीड़िता का फोन तक नहीं उठातीं।
दिसंबर 2015 का वाकया है। पीड़ित लड़की की बहन एएनएम स्टूडेंट है। उसका कहना है, उसकी बहन अचानक एक रोज बीमार हो गई। उसे पीजीआई में भर्ती कराया गया, तब पता चला कि वह गर्भवती है। बहन के पैरों तले से जमीन सरक गई। गांव का ही मंजीत उसकी बहन के साथ पिछले नौ महीने से बलात्कार कर रहा था। दरिन्दे ने धमकी दी थी कि यदि किसी से कुछ बताया तो वह उसके पूरे परिवार को खत्म कर देगा। मंदबुद्धि लड़की भय से कांप उठी। पीजीआई न जाती तो अभी न जाने कब तक उसका शारीरिक शोषण होता रहता। फिलहाल, थाना महम पुलिस ने 8 नवंबर 2015 को पीड़िता की बहन के बयान पर 376 और एससीएसटी एक्ट के तहत मामला तो दर्ज कर लिया, लेकिन एक साल बाद भी आरोपी मंजीत गिरफ्तार नहीं हुआ। परिजनों का कहना है, पुलिस क्या कार्रवाई कर रही है, कुछ नहीं बताती। आरोप है कि पुलिस आरोपी पक्ष से मिली हुई है। वहीं एसपी राकेश आर्य का कहना है, यह मामला मेरी जानकारी में नहीं है। यदि आरोपी अभी तक गिरफ्तार नहीं हुआ है तो यह गंभीर मामला है। आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। डीएसपी से बात करके इस केस की स्टेट्स रिपोर्ट मंगाई जाएगी। इसके बाद जो भी कानूनी कार्यवाही होगी, अवश्य की जाएगी।

अपहरण के बाद सामूहिक दुष्कर्म
फरीदाबाद की स्थिति और खराब है। 6 नवंबर 2016 को फतेहपुर बिल्लौच गांव में आधा दर्जन बदमाशों ने एक मकान पर धाबा बोल दिया। परिवार को बंधक बनाकर बदमाशों ने पहले लूटपाट की, फिर घर की 14 वर्षीया एक लड़की और उसकी भाभी का अपहरण कर ले गए। बदमाशों ने जंगल में ले जाकर दोनों के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और फरार हो गए। किसी ने मामले की सूचना थाना सदर बल्लभगढ़ पुलिस को दी तो थाना प्रभारी राजदीप मोर क्राइम ब्रांच की टीम के साथ मौके पर पहुंचे। अब पुलिस का कहना है, पीड़ित महिला ने बताया है कि बदमाशों में शामिल एक युवक नरहावली निवासी एक रिश्तेदार सुशील के छोटे भाई जैसी सूरत का था। सुशील के छोटे भाई और उसके पांच साथियों के खिलाफ  मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है। यह तलाश कब तब जारी रहेगी, कुछ नहीं पता। दुखद स्थिति यह है कि फरीदाबाद में लगातार बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं।
लोगों का दहल गया दिल
देश की राजधानी दिल्ली से करीब 60 किलोमीटर दूर हरियाणा के रोहतक में दिल दहला देने वाली घटना में गैंगरेप के पांच आरोपियों ने तीन साल बाद फिर उसी दलित छात्रा (21) को अगवा कर उसके साथ गैंगरेप किया और मरने के लिए सुखपुरा चौक इलाके की झाड़ियों में फेंककर भाग गए। पीड़ित युवती के परिजनों के अनुसार, सभी आरोपी युवक जमानत पर जेल से बाहर हैं। ये सभी वर्ष 2013 में किए गैंगरेप मामले को लेकर छात्रा पर 50 लाख रुपये लेकर समझौता करने का दबाव डाल रहे थे। वह नहीं मानी तो धमकी दी। उसके बाद फिर से रौंद डाला। पीड़ित का कहना है, पांचों आरोपी कार से आए थे। वह जैसे कॉलेज से बाहर निकली, तीन युवक कार में बैठे थे और दो बाहर खड़े थे। उन्होंने उसे कार में खींच लिया। जबरन कोई नशीली दवा पिला दी और उसकी बेहोशी की हालत में उसके साथ बलात्कार किया। बाद में झाड़ियों के पास फेंककर चले गए।
बलात्कार की बढ़ती ये घटनाएं हरियाणा पुलिस की पोल खोलती हैं। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कमलेश पांचाल भी मानती हैं कि हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ  वारदात बढ़ रही है। वह व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं, ‘महिला आयोग सफेद हाथी नहीं है। बहुत कुछ कर सकता है। प्रदेश के 11 जिलों में मॉनिटरिंग की गई है हमने। कार्यस्थलों उद्योगों में महिला सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे इन घटनाओं पर अंकुश लगेगा?’ शायद सच कहती हैं। कौन है इन घटनाओं का जिम्मेदार? आखिर कब हरियाणा की महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी?

सरकारी अस्पताल भी सुरक्षित नहीं 
यमुनानगर जिले में एक सरकारी अस्पताल के अंदर मानसिक रूप से विक्षिप्त एक लड़की से एक कर्मचारी ने कथित तौर पर बलात्कार किया। घटना 7 जुलाई 2016 की है। पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। यमुनानगर के डीसएपी (मुख्यालय) आदर्शदीप सिंह ने बताया कि रेप की शिकार युवती मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वहीं महिला थाना यमुनानगर की एसएचओ कुलबीर कौर ने बताया कि लड़की का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया है, जिसमें उसके यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है। आरोपी विजय कुमार (22) को गिरफ्तार कर लिया गया है।

इस वर्ष नवंबर 2016 राज्य में हुए रेप के बहुचर्चित मामले
2 नवंबर: फतेहाबाद थाना टोहाना अंतर्गत तीन लोगों ने चलती कार में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया। नरवाना-टाहाना मार्ग से रात करीब आठ बजे महिला को गाड़ी में बिठाया था।
23 अक्टूबर: फरीदाबाद जिले में एक महिला को बंधक बनाकर दो लोगों ने दुष्कर्म किया। पति से किसी बात पर महिला की लड़ाई हो गई थी। उसके बाद वह मायके जा रही थी। आरोपी उसे राजस्थान ले गए, जहां से वह बड़ी मुश्किल से छूटी।
31 जुलाई : गुड़गांव जिले के थाना सदर अंतर्गत सोहना में एक तांत्रिक ने 19 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया। आरोपी पंचायत समिति का पूर्व अध्यक्ष भी है।
21 जुलाई: करनाल में तीन युवकों ने शादीशुदा एक महिला के साथ एक होटल में सामूहिक बलात्कार किया। डीसीपी जितेन्द्र गहलावत के अनुसार, तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।
18 जुलाई: गैंगरेप के पांच आरोपियों ने तीन साल बाद फिर से 21 वर्षीय छात्रा को अगवा कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस मामले की जांच अब एसआईटी कर रही है।
17 जुलाई: फरीदाबाद के त्रिखा कालोनी में पड़ोस में रहने वाले दो युवकों ने सात साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया। थाना प्रभारी योगेंद्र सिंह के अनुसार,  इस मामले के दोनों आरोपी बबलू (32) और बिरजू (28) को गिरफ्तार कर लिया गया है।
7 जुलाई : यमुनानगर के एक सरकारी अस्पताल के अंदर मानसिक रूप से विक्षिप्त एक लड़की से एक कर्मचारी ने बलात्कार किया। पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
7 फरवरी : गुड़गांव में 9 साल की छात्रा से दुष्कर्म। बच्ची की मां की शिकायत पर इस मामले में एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल को गिरफ्तार किया गया है।
19 जनवरी : कुरुक्षेत्र की विवाहित महिला को शादी का झांसा देकर बंधक बनाकर किया दुष्कर्म। महिला थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर शुरू की जांच।
9 जनवरी : रोहतक में गोहाना-दिल्ली मार्ग पर एक नाबालिग लड़के ने ट्यूशन के लिए जा रही 15 वर्षीय एक लड़की को अगवा कर कार के अंदर बलात्कार किया।

अपराध के आंकड़े में कमी आई 
पिछले 10 साल की बात करें तो अपराध के आंकड़े में कमी आई है। सरकार की पहल पर हर जिले में महिला पुलिस थाना खुलने से महिलाओं के प्रति अपराध का ग्राफ  नीचे आया है। आगे भी हम क्राइम कंट्रोल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
-डॉ. केपी सिंह, डीजीपी, हरियाणा

महिला थाने ही काफी नहीं 

मैंने 11 जिलों में मॉनिटरिंग की है। महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए महिला थाने ही काफी नहीं हैं। दूसरे प्रयास भी जरूरी हैं। आयोग सदस्यों को कुछ मदद मिले तो वे भी आगे आकर काम कर पाएंगी।
- कमलेश पांचाल, अध्यक्ष, राज्य महिला आयोग, हरियाणा
सरकार पूरी तरह कटिबद्ध
अपराध पर लगाम लगाने के लिए सरकार पूरी तरह कटिबद्ध है। अगर कहीं पुलिस की कमी नजर आती है तो उसे भी दुरुस्त किया जाएगा।
मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री, हरियाणा
गंभीर मामला 
मामला मेरी जानकारी में नहीं है। यदि आरोपी अभी तक गिरफ्तार नहीं हुआ है तो यह गंभीर मामला है। दोषी जो भी होगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
-राकेश आर्य, एसपी, यमुनानगर
किसी भी राज्य की पुलिस सरकार का चेहरा होती है
जन्म लेने के बाद से ही बेटी को अपने अस्तित्व के लिए लडऩा पड़ता है। बड़ी होकर घर से निकलती है तो यहां भी बड़ी जद्दोजहद के साथ अपना रास्ता बनाना पड़ता है। ऐसे में महिलाओं को बलात्कार, घरेलू हिंसा, ट्रैफिकिंग और उत्पीड़न जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। देश की आधी आबादी के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने देश में महिला सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता में रखा और औज प्रदेश के सभी 21 जिलों में महिला पुलिस थाने काम कर रहे हैं। महिलाएं शारीरिक, मानसिक और योन उत्पीड़न चुपचाप सहन करने की बजाए अपनी रिपोर्ट दर्ज करवाने में संकोच महसूस न करें।
-कविता जैन, महिला एवं बाल विकास मंत्री, हरियाणा

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

शिप्रा, सस्पेंश और साजिश


जितेन्द्र बच्चन
नोएडा। फैशन डिजाइनर शिप्रा मलिक ने खुद के अपहरण की रची साजिश, लेकिन कैसे? यह सस्पेंश अभी बरकरार है। सात सेकेंड की पीसीआर कॉल जरूर साजिश का हिस्सा बन गई। पिता और भाई के साजिश में शामिल होने का गहराया शक। कर्ज और प्रापर्टी के विवाद से पेरशान थी शिप्रा। बैंक की सेक्टर-18 शाखा से मिला सबसे बड़ा सुराग। 29 फरवरी की दोपहर 1.30 बजे लॉकर आप्ररेट करने गई थी शिप्रा। फिर 2.56 पर दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को की थी 7 सेकेंड की आखिरी कॉल। इसके बाद नहीं हुआ किसी से कोई संपर्क।
नोएडा के बीच शहर से दिन-दहाड़े गायब हुई 29 साल की शिप्रा मलिक की घटना से दिल्ली-एनसीआर में सनसनी फैल गई। शिप्रा के पति चेतन मलिक की तहरीर पर नोएडा पुलिस ने मामले की गुमशुदगी दर्ज कर जांच-पड़ताल शुरू कर दी। शिप्रा की कार लावारिस हालत में मिली थी, इसलिए हर कोई यही समझने लगा कि उसका किसी ने अपहरण कर लिया है। हाई प्रोफाइल मामला होने के कारण मामला मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक जा पहुंचा। आईजी सुजीत पांडेय ने नोएडा आकर डेरा डाल दिया। गुरुवार को नोएडा पहुंची डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने केस की शुरुआती जांच में लापरवाही बरतने पर जांच बैठा दी है। जांच गाजियाबाद के एसपी क्राइम श्रवण कुमार कर रहे हैं।
29 साल की शिप्रा दिल्ली की पर्ल एकेडेमी से 2005 में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स पूरा कर के नोएडा में बूटीक चलाती थी। वह सोमवार को अपने घर से चांदनी चौक के लिए निकली थी। रास्ते में वह अपने पति से मिली। इसके बाद शिप्रा चांदनी चौक नहीं पहुंची और न ही घर लौटी। शिप्रा की गाड़ी नोएडा में ही लावारिस पड़ी मिली। चाबी कार के अंदर थी। पति चेतन ने कॉल किया तो शिप्रा का फोन ऑफ  था। पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि शिप्रा को जमीन निगल गई या आसमान।
मंगलवार यानी पहली मार्च 2016 की शाम सेक्टर- 29 विजया एंक्लेव के पास शिप्रा की स्विफ्ट कार जहां मिली थी, पुलिस ने वहां घटना का नाट्य रूपांतरण किया। तब भी कोई सुराग नहीं हाथ लगा। आईजी सुजीत पांडेय ने एसटीएफ, क्राइम ब्रांच समेत कुल आठ टीमें गठित कर दीं। इसके अलावा मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए साउथ दिल्ली पुलिस, नोएडा पुलिस और यूपी एसटीएफ  के डीसीपी, एसपी, एडिशनल एसपी और डीएसपी लेवल के 18 अधिकारी तथा 90 पुलिसकर्मी अलग से दिन-रात एक करने लगे। एसपी सिटी दिनेश यादव और उनके मातहतों ने चेतन मलिक, शिप्रा के पिता सतीश कटारिया, शिप्रा के निवास सेक्टर-37 के सभी गेटों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों सहित 50 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की। ब्रह्मपुत्र मार्केट, सेक्टर-29 स्थित विजया एंक्लेव और सेक्टर-37 के सभी गेटों पर लगे सीसीटीवी खंगाले गए। कई स्थानों पर शिप्रा के पोस्टर लगाए गए। उसके फोटो दिखाकर लोगों से पूछा गया।
मंगलवार की रात ही पता चला कि फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद शिप्रा ने ब्रह्मपुत्र मार्केट में जो शोरूम बनाया था, उसे लाजपत नगर दिल्ली निवासी राहुल तनेजा और उसके भाई गुलशन तनेजा से किराए पर लिया गया था। कुछ दिन बाद शिप्रा का दोनों भाईयों से विवाद हो गया था। उसके बाद शिप्रा ने थाना सेक्टर-20 में दोनों भाईयों के खिलाफ डकैती का मामला दर्ज कराया था और दोनों भाइयों ने शॉप खाली करवा ली थी। एसपी सिटी यादव सोचने लगे, कहीं उसी का नतीजा तो नहीं है शिप्रा का अपहरण? और उन्होंने रात में ही गुमशुदगी के इस मामले को (परिजनों की तहरीर पर) अपहरण के केस में तरमीम करवा दिया। राहुल और गुलशन को पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी।एसएसपी किरन एस ने मंगलवार रात करीब तीन बजे आला अधिकारियों केसाथ एक बैठक की। एएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर और डीएसपी डॉ. अनूप कुमार को दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को की गई कॉल रिकार्डिंग निकलवाने की जिम्मेदारी दी गई। उससे अहम सुराग मिलने की उमीद बढ़ गई। चांदनी चौक की जिस दुकान से शिप्रा बुटीक के लिए कपड़े लाती थी, वहां लगे कैमरों की फुटेज भी खंगाली गई। बुधवार की सुबह आईजी सुजीत पांडेय ने डीएनडी फ्लाई ओवर पहुंचकर सीसीटीवी कैमरों की जांच की।
3 मार्च को सेक्टर-18 स्थित आईएनजी वैश्य बैंक की शाखा से पुलिस को सीसीटीवी की एक ऐसी फुटेज मिली, जिससे अधिकारियों की आंखों में चमक आ गई। उससे यह पता चला कि अगवा होने से पहले शिप्रा ने बैंक आकर लॉकर ऑपरेट किया था। इसके बाद पुलिस ने फेसबुक, ट्वीटर और ह्वाट्सेप को खंगालना शुरू किया। परिवार के सभी मोबाइलों पर पहले से निगरानी रख रही थी, लेकिन तीन दिन बाद भी अभी तक फिरौती के लिए किसी ने कहीं से कोई कंटेक्ट नहीं किया था। ऐसे सवाल उठने लगा कि आखिर शिप्रा को अगवा करने का मकसद क्या है?
लेकिन गुरुवार की रात करीब डेढ़ बजे चेतन मलिक के मोबाइल पर आए एक फोन ने सभी को चौंका दिया। आईजी सुजीत पांंडेय, डीआईडी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी किरन एस और एसपी सिटी दिनेश यादव तुरंत हरकत में आ गए। दरअसल वह फोन हरियाणा स्थित गुडग़ांव के सुल्तानपुर गांव के सरपंच के मोबाइल नंबर से किया गया था और खुद शिप्रा ने किया था। वह बहुत घबराई हुई थी। कॉल से सुराग मिलते ही एसएसपी किरन एस एक टीम के साथ गुडग़ांव जा पहुंचे और वहां से शिप्रा को बरामद कर लिया।
शिप्रा का कहना था, सोमवार को चार-पांच बदमाशों ने नोएडा से उसे अगवा करके अपनी कार में डाल लिया था। डीएनडी होते हुए अपहरणकर्ता लाजपत नगर पहुंचे तो वहां उसे मौका मिल गया और उसने दिल्ली पुलिस को 100 नंबर पर फोन कर दिया, लेकिन हैलो कहते ही बदमाशों ने उसका मोबाइल छीन लिया और उसके हाथ-पैर बांध दिए। ऊपर से एक बोरा डाल दिया। राजस्थान में कहां रखा, मुझे नहीं पता। बाद में वीरवार की रात बदमाश मुझे स्कॉर्पियो से फार्रुखनगर के सुल्तानपुर इलाके में फेककर चले गए। उसने पास के ग्रामीणों से मदद मांगी। ग्रामीणों ने सरपंच की सहायता से पुलिस से संपर्क किया। पहले गुडग़ांव पुलिस से कॉन्टेक्ट किया गया। उसके बाद चेतन को बताया।
शिप्रा ने अपहरण की कहानी तो बता दी, लेकिन उसके शरीर पर कहीं कोई चोट या खरोंच के निशान नहीं मिले। यह भला कैसे हो सकता था? बस यहीं पुलिस को शिप्रा की बयान में शक होने लगा। डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने खुद पूछताछ शुरू की। अंत में थोड़ी सख्ती करते ही शिप्रा टूट गई। उसने कहा कि वह कर्ज को लेकर बहुत परेशान है। परिवारिक कलह के चलते वह घर से चली गई थी। अपहरण का नाटक इसलिए किया कि किसी को उसका कुछ पता न चला। वह बहुत डिप्रेशन में आ चुकी है।
एसपी सिटी दिनेश यादव के अनुसार, शुक्रवार की भोर यानी 4 मार्च की सुबह पुलिस ने शिप्रा का मेडिकल कराया गया। इसके बाद दोबारा उससे पूछताछ की गई। तत्पश्चात मेरठ रेंज की डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने इस मामले का खुलासा करते हुए बताया कि पारिवारिक विवाद के चलते शिप्रा अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई थी। टीवी पर अपने परेशान बच्चे और परिवार को दुखी देखकर वह वापस आ गई। अभी तक अपहरण की कोई बात सामने नहीं आई है।
शक का गहराता संकट:
हकीकत जो भी हो, लकिन शिप्रा के एक बेहद नजदीकी पर उसकी किडनैपिंग में भूमिका होने का संदेह है। पूछताछ के दौरान उसने पुलिस के सामने कई बार अपने बयान बदले हैं। पुलिस को शक है कि कहीं न कहीं इस केस में उसका हाथ जरूर है। खासतौर पर तब, जब अगवा होने से पहले शिप्रा ने बैंक लॉकर ऑपरेट किया हो। डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने भी कहा है कि इस शख्स ने लगातार अपने बयान बदले हैं और उसकी भूमिका संदिग्ध है। उससे भी पूछताछ की जा रही है।
अभी तक नहीं मिले इन सवालों के जवाब:
-शिप्रा बैंक में फोन पर बात करते हुए दाखिल हुईं। उनकी भाई से बात हो रही थी। क्या भाई को उनके लॉकर खोलने की जानकारी थी?
-डीएनडी पर शिप्रा के मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल हुआ और उनकी गाड़ी वहां से नहीं गुजरी, फिर उनकी स्विफ्ट कार सेक्टर-29 में किसने खड़ी की?
-शिप्रा के मोबाइल फोन का डीएनडी से लेकर लाजपतनगर तक इस्तेमाल किया गया है। इस दौरान करीब 15 मिनट तक इंटरनेट का यूज किया गया। आखिर वह किसके संपर्क में थी?

गहराता जा रहा है रहस्य
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, शिप्रा जयपुर के पास एक आश्रम में रुकी थी। वह अपनी दुकान के विवाद और लोन को लेकर परेशान चल रही थी। साजिश में उसके भाई के शामिल होने का शक भी जताया जा रहा है। सात सेकेंड की पीसीआर कॉल भी इसी साजिश का हिस्सा थी, ताकि किसी को शक न हो।
बाक्स:
शिप्रा ने टीवी शो क्राइम पेट्रोल देखकर यह साजिश रची थी। मेडिकल जांच के दौरान उसे किसी प्रकार की कोई चोट नहीं आई है, लेकिन पुलिस शिप्रा के बयान की जांच कर रही है।
-लक्ष्मी सिंह, डीआईजी, मेरठ रेंज

सूबे में शानदार जीत हासिल करेगी सपा



आमने-सामने
59 वर्षीय मदन चौहान का पैतृक गांव मदारपुर जिला मेरठ है। गढ़मुक्तेश्वर उनका कार्यक्षेत्र रहा। इधर करीब 25 साल से नोएडा की राजनीति में भी सक्रिय हैं। उनकी जनसेवा देखकर और वेस्ट यूपी में बढ़ती मदन चौहान की लोकप्रियता को सपा सुप्रीमो भी नजरअंदाज नहीं कर पाए। पार्टी हाईकमान ने 31 अक्टूबर को मनोरंजन कर राज्य मंत्री के रूप में शपथ दिलवाकर इनका कद और बढ़ा दिया। सपा को इससे दो फायदे होंगे, पहला यह कि पार्टी की ठाकुर वोट बैंक पर पकड़ मजबूत होगी और दूसरा युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जानते हैं कि मिशन-2017 को सफल बनाने के लिए वेस्ट यूपी में मदन चौहान से बेहतर और कोई दूसरा प्रतिनिधि नहीं हो सकता है।


मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाले गढ़ के विधायक मदन चौहान करीब 25 साल पहले नोएडा आए थे। अब यहां के सेक्टर-26 के निवासी हैं। प्रॉपर्टी और ट्रांसपोर्ट के कारोबार से भी जुड़े रहे। सामाजिक कार्यों में सक्रियता 
बढ़ती गई, फिर कांग्रेस से जुड़ गए। 1996 में वह पहली बार गढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े, लेकिन 2002 में समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। विधानसभा क्षेत्र गढ़ ही रहा और चुनाव में शानदार विजय हासिल की। इसके बाद मदन चौहान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जनसेवा के साथ लगातार वर्ष 2002, 2007 और 2012 में जीत की हैट्रिक लगाई। अब सरकार में मनोरंजन कर राज्य मंत्री हैं। सामने मिशन-2017 की चुनौती है तो पीछे पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों ने उनसे बहुत-सी उम्मीदें लगा रखी हैं। क्या जनता और सपा सुप्रीमो की कसौटी पर वे खरा उतर पाएंगे? क्या क्षेत्र के विकास को रफ्तार मिलेगी? कार्यकर्ताओं में बढ़ती गुटबाजी को विराम मिलेगा आदि जैसे कई मुद्दों पर मनोरंजन कर राज्य मंत्री मदन चौहान से जितेन्द्र बच्चन ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश:

-वेस्ट यूपी में सपा की नजर ठाकुर वोट बैंक पर है। क्या यही वजह है कि सीएम अखिलेश यादव ने आपको मंत्रिमंडल में शामिल किया है?
मुख्यमंत्री जी का अपना अधिकार है। वे कब क्या निर्णय लेते हैं, वही जानें। हम तो महज इतना जानते हैं कि समाजवादी पार्टी कभी धर्म और जाति की राजनीति में यकीन नहीं करती। समाज का कोई भी वर्ग हो, कोई भी जाति हो, सभी का उत्थान होना चाहिए। प्रदेश के हर कोने का विकास होना चाहिए। गरीबी, अशिक्षा और जहालत खत्म करना पार्टी और सरकार दोनों का मुख्य मिशन है ...और करीब साढ़े चार दशक बाद गंगानगरी को मंत्री पद मिला है तो इसमें गलत क्या है। सियासत का चश्मा उतारकर देखिए तो इसमें वेस्ट यूपी का ही लाभ है। स्वतंत्र प्रभार देने के लिए क्षेत्र के लोगों ने सीएम का आभार भी जताया है।

-अपनी राजनीतिक समझ और सूझबूझ से पार्टी में पकड़ बरकरार रखने में तो आप कामयाब रहे, लेकिन मंत्री बनने के बाद आपके समर्थकों और क्षेत्र के लोगों की अपेक्षा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में पार्टी हाईकमान की कसौटी पर खरा उतरना एक चुनौती नहीं है?
जनता की अपेक्षा और पार्टी हाईकमान की कसौटी पर खरा उतरना वाकई एक चुनौती है, लेकिन जनता का सहयोग करना और क्षमता के अनुसार उनके लिए लड़ाई लडऩा ही हमारा प्रथम कर्तव्य है। आखिर जनहित के लिए हमें मंत्री पद नवाजा गया है। नि:संदेह हम पार्टी और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करेंगे। क्योंकि मैं पार्टी का सच्चा सिपाही हूं और जनता से जुड़कर काम करने में यकीन रखता हूं।

-ब्रजघाट का विकास होगा?
हमने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूं कि ब्रजघाट का हरिद्वार की तर्ज पर विकास करना हमारी प्राथमिकता में शामिल है। इसके अलावा स्वच्छता अभियान को गति दिलाना, उच्च शिक्षा के संसाधन मुहैया कराना, बेहतर चिकित्सा सेवा और युवाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध कराने का भी हम पूरा प्रयास कर रहे हैं। एक बात और हम कहना चाहते हैं- हर काम समय के मुताबिक ही होता है। पार्टी के लिए पूरी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से काम करना हमारा पहला दायित्व है। पार्टी हाईकमान की ओर से जो भी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, हम उसे बखूबी निभाने का प्रयत्न करेंगे।

-वेस्ट यूपी में कद्दावर नेता की जरूरत और ठाकुर समुदाय के प्रतिनिधित्व को देखते हुए मदन चौहान को मंत्रिमंडल में जगह तो मिल गई, लेकिन प्रदेश में हुए दंगे और बढ़ती दबंगई की घटनाओं से लगता नहीं कि मिशन-2017 में सपा को फिर सफलता मिलेगी?
दंगे कौन कराता है, सभी जानते हैं। बेनकाब हो चुकी हैं पार्टियां और उनके सांसद-विधायक। अब उत्तर प्रदेश में पूरी तरह अमन-चैन है। सपा के शासनकाल में प्रदेश दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में मंत्रिमंडल उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की दिशा में अग्रसर है। प्रदेश में फिरकापरस्त ताकतों को मुंह की खानी पड़ी है। सरकार, समाज के सभी वर्गों के लिए कार्य कर रही है। प्रदेश की अवाम जनहित कार्यों से इत्तेफाक जताते हुए सपा के पक्ष में अपनी राय जता रही है। मिशन-2017 के चुनावों में सपा को भारी सफलता मिलेगी। सूबे में शानदार जीत हासिल करेगी समाजवादी पार्टी और प्रदेश को देश के सभी सूबों से विकासशील राज्य का दर्जा प्राप्त होगा।

-पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष है? सपाईयों के बीच चल रही आपसी गुटबाजी के चलते सरकार की सुविधाओं का पूरा लाभ वहां तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिन्हें जरूरत है?
कोई गुटबाजी नहीं है। सपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसमें सभी कार्यकर्ताओं को बराबरी का दर्जा मिलता है। नेताजी (मुलायम सिंह यादव) और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पार्टी के साथ-साथ प्रदेश को भी एकता के सूत्र में पिरोए हुए हैं। उनकी कुशल कार्यशैली के बूते उत्तर प्रदेश में अमन-चैन का माहौल है तथा दबे-कुचले, पिछड़ों को सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ पहुंच रहा है। जिनकी जमीनी पकड़ नहीं है और वे धर्म-जाति की राजनीति करने में यकीन रखते हैं, वही हमारे कार्यकर्ताओं को भी तोडऩे की कोशिश करते हैं। असंतोष की बात फैलाते हैं। हमारे सभी कार्यकर्ता हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। पूरी एकता के साथ हम लोग पार्टी और सरकार की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

-क्या मंत्री बनवाने में सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह का आशीर्वाद प्राप्त है?
अमर सिंह जी से हमारा नाम जोडऩा गलत है। पिछले चार साल में न तो हम अमर सिंह से मिले हैं और न ही हमारी इस बीच कभी फोन पर कोई बात हुई है। हमें पार्टी से टिकट हमेशा सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और सांसद प्रोफेसर राम गोपाल यादव की मेहरबानी से मिला है। अमर सिंह से हमारी उतनी ही दूरी है जितना पार्टी की है।

-मनोरंजन कर की वसूली में लापरवाही बरती जाती है। अधिकारियों के बीच भ्रष्टाचार व्याप्त है?
हमारे बीच भ्रष्टाचार की कोई जगह नहीं है। हमने सख्त आदेश कर रखा है कि प्रदेश में मनोरंजन कर की वसूली में सक्रियता लाई जाए। तीन दिन पहले भी अधिकारियों के साथ बैठक कर वसूली में सक्रियता लाने के साथ 
निष्ठापूर्वक काम करने का निर्देश दिया है। हम इस तरह का प्लान तैयार कर रहे हैं कि लोगों को सस्ता मनोरंजन भी मुहैय्या हो और सरकार को अच्छा राजस्व भी मिले।

20 हजार का लग सकता है अर्थदंड
उत्तर प्रदेश में अब नए साल का जश्न मनाना आसान नहीं होगा। घर में जश्न मना रहे हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि आप नववर्ष की पूर्व संध्या पर होटलों, क्लबों, वाटर पार्कों, रिर्सोटस, मनोरंजन पार्कों, रेजीडेंट कॉलोनियों या अन्य स्थानों पर मनोरंजन के कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं तो आप पर मनोरंजन विभाग की नजर रहेगी। इसके लिए उत्तर प्रदेश के मनोरंजन कर राज्य मंत्री मदन चौहान ने विभाग के समस्त अधिकारियों तथा जिलाधिकारियों को इस संबन्ध में निर्देश दे दिए हैं। उन्होंने आयोजकों को ऐसे मनोरंजक 
कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए पूर्व अनुमति प्राप्त करने के निर्देश दिए हैं। बिना अनुमति के आयोजित कार्यक्रमों के आयोजकों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जाएगी। करीब 20 हजार रुपये का अर्थदंड भी वसूला जा सकता है।

मजबूती के पीछे बड़ा संघर्ष
वर्तमान में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर, हापुड़, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर और गाजियाबाद आदि की 42 विधानसभा सीटों में से छह ही पार्टी के विधायक हैं और मदन चौहान पहली बार सबसे मजबूत स्थिति में पहुंचे हैं। इसके पीछे उनका संघर्ष भी रहा है। गढ़ विधानसभा सीट किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जनाधार वाली सीट थी। बाद में राम मंदिर लहर चली तो बीजेपी की टॉप टेन सीटों में शामिल हो गई, लेकिन सपा प्रत्याशी के तौर पर मदन चौहान ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के राम नरेश रावत को पराजित कर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। उस दौरान उन्हें 43,808 वोट मिले थे, जबकि भाजपा को महज 36,364 मत हासिल हुए। इसके बाद पिछले चुनावों में बसपा प्रत्याशी हाजी शब्बन को हराकर चौहान ने शानदार जीत दर्ज कराई। 

मुख्यमंत्री ने निभाया वादा
मदन चौहान गढ़ सीट पर तीसरी बार जीते तो 25 फरवरी 2012 को एक जनसभा में राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि वे अब इस क्षेत्र को जल्द ही लाल बत्ती से नवाजेंगे। मदन चौहान कहते हैं, देर से ही सही पर सीएम ने अपना वादा पूरा किया।

शनिवार, 15 नवंबर 2014

बैंक रॉबरी, करोड़ों की लूट

हरियाणा के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी बैंक रॉबरी। लुटेरों ने ढाई फुट चौड़ी और 100 फुट लंबी खोदी सुरंग। 86 लॉकर्स से लूटे करोड़ों के जेवरात और दूसरे कीमती सामान। कहां हुई बैंक से चूक? कौन है इस मामले का मास्‍टर माइंड?

शनिवार, 6 सितंबर 2014

नायक बना खलनायक


हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी। एक चेहरा उसका भी था और उस चेहरे के पीछे भी कई चेहरे हैं। एक पति का चेहरा, एक आशिक का चेहरा, एक कातिल का चेहरा और चेहरा आरटीआई कार्यकर्ता का, लेकिन इन सारे चेहरों के पीछे का असली खेल शुरू हुआ था करीब चार महीने पहले। सनसनीखेज खुलासा।

-जितेन्द्र बच्चन
राइट टू इन्फॉरमेशन का डंडा पकड़कर उसने ऐसा झंडा गाड़ा था कि लोग उसे सचमुच सच का सिपाही मान बैठे थे, तभी एक रोज सच के इस सिपाही की कार जली हालत में मिलती है और पुलिस कार के अंदर से एक लाश बरामद करती है। लोग मान लेते हैं कि सच के सिपाही का मुंह हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया गया और आम आदमी से लेकर नेता-कार्यकर्ता तक घटना के विरोध में धरना-प्रदर्शन करना शुरू कर देते हैं, तब किसी को क्या पता था कि यह सब एक साजिश है। प्यार, कत्ल और खुद को मारकर जी उठने की साजिश। लाखों रुपये हथियाने का फरेब। दुनिया की आंख में धूल झोंकने का नायाब तरीका। जी हां, घटना के ठीक चार महीने बाद अचानक वही मुर्दा जी उठता है और फिर इस रहस्य से पर्दा उठता है।
वाकया एक मई 2014 का है। ग्रेटर नोएडा के थाना कसाना पुलिस को खबर मिलती है कि एल्डिको गोल चक्कर के पास एक होंडा सिटी कार में आग लग गई है, लेकिन पुलिस जब तक मौके पर पहुंची, कार जल चुकी थी और उसके अंदर एक शख्स भी बुरी तरह जल चुका था। कौन था वह शख्स? किसकी कार है? यह हादसा है या कुछ और? जितने मुंह उतने सवाल शुरू हो गए। पुलिस तफ्तीश में पता चला कि कार आरटीआई और आप कार्यकर्ता चंद्रमोहन शर्मा की है और वह लाश भी उन्हीं की है। तब तो सनसनी फैल गई। शर्मा की पत्नी सविता को बुलाया गया तो उन्होंने भी शिनाख्त कर दी कि वह शव उनके पति का ही है। उनका कहना यह भी था कि यह कोई हादसा नहीं है बल्कि चंद्रमोहन शर्मा की हत्या की गई है।
पुलिस ने सविता शर्मा की तहरीर पर पांच लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी, लेकिन आम आदमी पार्टी पुलिस जांच से संतुष्ट नहीं थी। उसके कार्यकर्ताओं ने घटना के विरोध में धरना-प्रदर्शन करना शुरू कर दिया- आरटीआई के माध्यम से शर्मा कई मामलों का खुलासा कर चुके हैं। उनके कई दुश्मन थे। यह सब उन्हीं लोगों की साजिश का नतीजा है। शर्मा की हत्या की गई है। अगले रोज सविता शर्मा ने भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से गुहार लगाई- पुलिस कातिलों को नहीं पकड़ रही है। हमें इंसाफ चाहिए। उसी दिन आप संयोजक अरविंद केजरीवाल परजिनों को सांत्वना देने चंद्रमोहन के घर पहुंचे। उन्होंने बताया कि चंद्रमोहन शर्मा ने कुछ दिन पहले ही पुलिस में रिपोर्ट लिखाई थी कि उन्हें जान से मारने की धमिकयां मिल रही हैं, लेकिन पुलिस ने इस मामले में लापरवाही बरती।
40 वर्षीय चंद्रमोहन शर्मा ग्रेटर नोएडा के अल्फा-टू सेक्टर के मकान नंबर एफ-38 में पत्नी सविता शर्मा के साथ रहते थे। आरटीआई के जरिए कई मामलों का अब तक पर्दाफाश कर चुके थे। ऐसे में शक की सुई उनके तमाम अनजान दुश्मनों की तरफ घूमने लगी, लेकिन कार में मिले कुछ सुबूत कुछ और ही इशारा कर रहे थे। थाना कासना के इंसपेक्टर समरजीत सिंह का भी कहना था कि दाल में जरूर कुछ काला है। एसएसपी गौतम बुद्धनगर (नोएडा) डॉ. प्रतिंदर सिंह ने आखिर इंसपेक्टर सिंह के नेतृत्व में चार टीमों का गठन कर मामले की जांच शुरू करवा दी। धीरे-धीरे चार महीने बीत गए। 26 अगस्त को भी डॉ. सिंह इसी मामले से जुड़े कुछ पहलुओं पर इंसपेक्टर समरजीत से बातचीत कर रहे थे, तभी एक ताजा जानकारी मिलते ही उनकी आंखों में चमक आ गई। पुलिस की एक टीम ग्रेटर नोएडा से सैकड़ों मील दूर बेंगलुरु जा पहुंची। वहां 28 अगस्त को वह शख्स मिल गया, जिसकी पुलिस को तलाश थी। चंद्रमोहन।
अब आप सोच रहे होंगे कि एक मुर्दा जिंदा कैसे हो गया? और अगर चंद्रमोहन मरा नहीं था तो उसे नकली मौत मरने की क्या जरूरत थी? इससे भी बड़ा सवाल यह था कि कार में जिस शख्स की लाश मिली थी, वह कौन था? दरअसल, पुलिस जब इस मामले में अपना सिर खपा रही थी, तभी पता चला था कि अल्फा-टू इलाके की एक लड़की भी घटना के रोज से ही गायब है। पुलिस ने उस लड़की का मोबाइल नंबर खंगाला तो ज्ञात हुआ कि सिम कार्ड चंद्रमोहन के नाम रजिस्टर्ड है। पुलिस थोड़ा और गहराई में गई तो यह भी पता चल गया कि वह लड़की चंद्रमोहन की प्रेमिका है। दोनों कहीं छिपे हैं। कहां छिपे हैं, पुलिस यह छानबीन कर ही रही थी, तभी पता चला कि जिस रोज कार में आग लगी थी, उसी दिन से इलाके का एक भिखारी भी गायब है। एक-एक कर कड़ियां आपस में जुड़ने लगीं। सर्विलांस की मदद से पुलिस को लड़की के लोकेशन का पता चल गया। वह बेंगलुरू में थी और घरवालों से लगातार बात कर रही थी। 28 अगस्त को पुलिस मोबाइल के सहारे बंगलुरू पहुंची और चंद्रमोहन के साथ-साथ उस लड़की को भी गिरफ्तार कर लिया। अब पुलिस के आगे सबसे बड़ा सवाल यह था कि वह लाश किसकी थी?
क्लाइमेक्स सामने आया तो कई और सनसनीखेज खुलासे हुए। चंद्रमोहन पेशे से मेन्टिनेंस इंजीनियर है और कासना गांव स्थित होंडा सीएल कार कंपनी में काम करता था। ग्रेटर नोएडा के चर्चित भट्टा कांड के दौरान उसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर राहत का काफी काम किया था, तभी पहली बार उसने आरटीआई के जरिए कई अहम जानकारियां जुटाई थीं। इसी बीच   चंद्रमोहन की दोस्ती मोहल्ले में रहने वाली एक लड़की से हो गई। दोनों में प्यार हो गया। लड़की के इश्क में पड़कर चंद्रमोहन कर्ज में डूबता चला गया। गर्लफ्रेंड की फरमाइश पूरी करते-करते वह इतना कंगाल हो गया कि कर्जदार की कतारें उसे डराने लगीं। इसी डर ने एक साजिश को जन्म दिया। चंद्रमोहन ने बीमा करा रखा था। उसे लगा कि अगर उसकी नकली मौत हो जाए तो बीमे की रकम से वह कर्जदारों के कर्ज चुका देगा। बस इसी के बाद उसने अपनी गर्लफ्रेंड को इस साजिश में शामिल कर लिया।
योजना के मुताबिक, चंद्रमोहन ने अपने ही कद-काठी के किसी मजबूर शख्स को ढूंढना शुरू किया। उसकी तलाश परी चौक इलाके के एक भिखारी पर आकर खत्म हो गई। चंद्रमोहन ने सजिश के तहत सबसे पहले पुलिस में अपने अनजान दुश्मनों के खिलाफ एक झूठी रिपोर्ट दर्ज करवाई। उसके बाद साजिश को अंजाम देने के लिए अंसल प्लाजा में पहले भिखारी का कत्ल किया, फिर उसे साले विदेश की मदद से अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर लाकर बिठा दिया। इसके बाद कार को आग के हवाले कर जमाने की नजरों में मुर्दा बन गया। सोचा था किसी को असलियत पता नहीं चलेगी और प्रेमिका के साथ ऐश करेगा, लेकिन पुलिस ने एक-एक कर सारे रहस्यों पर पड़ा पर्दा उठाकर एक नायक के खलनायक बनने की सारी हकीकत का पर्दाफाश कर दिया।
चंद्रमोहन शर्मा और उसकी प्रेमिका अब जेल में हैं, लेकिन घटना में जलाकर मारे गए मानिसक विक्षिप्त की पहचान अभी पुलिस के लिए पहेली बनी हुई है। कुछ सुबूत मिले हैं, जिसके आधार पर उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर और सहारनपुर के एक व्यक्ति के रूप में हो रही है, लेकिन मृतक का कोई फोटो न होने के कारण यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि वह कहां का रहने वाला था। वहीं इस मामले का तीसरा आरोपी विदेश फरार है। पुलिस उसे तलाश रही है।

साजिश में साले ने दिया साथ

थाना कासना के सब इंस्पेक्टर विजय शर्मा के अनुसार, इस घटना को अंजाम देने के लिए चंद्रमोहन शर्मा ने अपने साले विदेश को नौकरी और पैसे देने का लालच देकर अपनी साजिश में शामिल कर लिया था। चंद्रमोहन ने विदेश को समझाया था कि उसकी मौत सबित करने के बाद सविता को जीवन बीमा की रकम, होंडा कंपनी से मौत पर मिलने वाली मोटी राशि और कंपनी में नौकरी मिल जाएगी। इन सुविधाओं से सविता अपना और बच्चों का आराम से देखभाल कर सकेगी। जब विदेश राजी हो गया तो 30 अप्रैल 2014 को तुगलपुर के पेट्रोल पंप से एक गैलन में तीन लीटर पेट्रोल खरीदकर गाड़ी में रख लिया गया। उसी पेट्रोल का एक मई की घटना में इस्तेमाल किया गया था। पुलिस ने वह गैलन बरामद कर लिया है।

सर्विलांस से मिला सुराग

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

एक थी फूलन !

दिल दहला देने वाली यह वारदात 14 साल पुरानी है। अदालत ने फूलन देवी की हत्या के मुख्य अभियुक्‍त शेर सिंह राणा के गुनाहों का हिसाब कर दिया है। उसे कातिल करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है, लेकिन राणा के घरवालों का कहना है- फूलन की हत्या में राणा नहीं उम्मेद सिंह का हाथ है।



जितेन्द्र बच्चन
चंबल की रानी फूलन देवी। कभी चंबल उसके नाम से जाना जाता था। बीहड़ में उसकी दहशत थी, फिर चंबल से निकलकर वह जेल पहुंच गई और जेल से सीधे संसद। एक डाकू हसीना अब सांसद थी पर यह खुशी ईश्वर को मंजूर नहीं थी। 25 जुलाई 2001 को संसद भवन से घर लौटते हुए ठीक फूलन देवी के सरकारी घर के बाहर गोली मारकर उसकी हत्या कर दी गई। 13 साल बीत गए इस मामले को। अब 13 साल बाद दिल्ली की एक अदालत ने अपना फैसला सुनाया है। फैसला यह कि फूलन देवी का कातिल कोई और नहीं बल्कि वही शेर सिंह राणा है, जिसने कत्ल के बाद खुद ही सामने आकर एलान किया था- हां, मैंने फूलन को मारा है!
1980 के दशक में खूंखार डकैत के रूप में सुर्खियों में रही फूलन देवी के डकैत बनने की कहानी किसी के भी रोंगटे खड़ी कर सकती है। फूलन की दास्तां कानपुर जिले के गुरहा का पुरवा गांव से शुरू होती है, जहां वह अपने मां-बाप और बहनों के साथ रहती थी। उत्तर प्रदेश के इस गांव में फूलन के परिवार को मल्लाह होने के चलते ऊंची जातियों के लोग हेय दृष्टि से देखते थे। इनके साथ गुलामों जैसा बर्ताव किया जाता था। फूलन के पिता की सारी जमीन उसके भाई से झगड़े में छिन गई थी। फूलन इस तरह के दमघोंटू माहौल में अंदर ही अंदर बदले की आग में जलने लगी। उसकी इस जलन को सुलगाने में मां ने भी आग में घी का काम किया।
फूलन 11 साल की हुई तो उसके चचेरे भाई मायादीन ने उसे गांव से बाहर निकालने के लिए उसकी शादी पुट्टी लाल नाम के एक बूढ़े आदमी से करवा दी। फूलन का पति उसे शारीरिक और मानिसक रूप से प्रताड़ित करने लगा। परेशान फूलन पति का घर छोड़कर वापस मां-बाप के पास आकर रहने लगी। यहां वह मेहनत-मजदूरी करने लगी, लेकिन किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था। 1980 में 15 साल की उम्र में गांव के दबंगों ने फूलन के साथ उसके मां-बाप के सामने ही गैंगरेप किया तो उसका खून खौल उठा। वह बागी बन गई। उसके तेवर देख गांववालों ने एक दस्यु गैंग को कहकर फूलन का अपहरण करवा दिया और यहीं से फूलन डाकू बन गई।
फूलन का जिस गैंग ने अपहरण किया, उसमें फूट पड़ गई। दूसरी गैंग की सरगना फूलन देवी बन गई। इसके बावजूद उसकी परेशानी कम नहीं हुई। गैंग का एक लीडर बाबू गुजर फूलन को पाना चाहता था। इसके लिए कुछ दिन बाबू ने फूलन को रिझाने की भी कोशिश की, लेकिन जब वह हाथ नहीं आई तो उसने एक रात फूलन के साथ बलात्कार करने की कोशिश की। उसी दिन फूलन से मन ही मन प्यार करने वाले गैंग के एक और मेंबर विक्रम मल्लाह ने बाबू की हत्या कर दी। उसके बाद गैंग का लीडर विक्र म बन गया। इस घटना ने एक बार फिर फूलन देवी के अंदर की आग •ाड़का दी। 15 साल की उम्र में दबंगों ने उसके साथ गांव में जो किया था, उसका बदला लेने को वह धधकने लगी। बलात्कारियों से प्रतिशोध लेने के लिए उसने बंदूक उठा ली।
1981 में बेहमई हत्याकांड के बाद फूलन देवी सुर्खियों में छा गई। सरकार की सांस फूलने लगी। हर हाल में अब वह फूलन को सलाखों के अंदर चाहती थी। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार ने चंबल की बीहड़ों में राज करने वाली दस्यु सुंदरी फूलन देवी को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर नाकाम रही। आखिरकार इंदिरा गांधी की सरकार ने 1983 में फूलन से यह समझौता किया कि अगर वह आत्मसमपर्ण कर दे, तो उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा और न ही उसके परिवार के किसी सदस्य को कोई नुकसान पहुंचाया जाएगा। फूलन इस शर्त पर राजी हो गई और उसने आत्मसमर्पण कर दिया। 11 साल जेल में बिताने के बाद फूलन देवी 1994 में रिहा हुई और इसी साल फिल्म बैंडिट क्वीन की शक्ल में फूलन की रॉबिनहुड छवि रुपहले पर्दे पर उतरी। 1998 में समाजवादी पार्टी ने फूलन के नाम का फायदा उठाने के लिए उसे मीरजापुर (उत्तर प्रदेश) से लोकसभा का चुनाव लड़वा दिया। चुनाव जीतकर फूलन देवी संसद बन गर्इं। बीहड़ और जेल की जिंदगी को पीछे छोड़ सांसद बनी फूलन समाज के हासिए पर जी रही महिलाओं के लिए कुछ करना चाहती थी। वह राजनीति के शिखर पर पहुंचाना चाहती थी, लेकिन चंबल की परछाई ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।
25 जुलाई 2001 को संसद का सत्र चल रहा था। दोपहर के भोजन के लिए संसद से फूलन 44 अशोका रोड के अपने सरकारी बंगले पर लौटीं। बंगले के बाहर सीआईपी 907 नंबर की हरे रंग की एक मारु ति कार पहले से खड़ी थी। फूलन के गेट पर पहुंचते ही कार से तीन नकाबपोशों नेबाहर निकलकर अचानक उस पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। फूलन देवी को कुल पांच गोली लगी। साथ ही उसका एक गार्ड भी घायल हो गया। इसके बाद हत्यारे उसी कार में बैठकर फरार हो गए।
यह एक राजनीतिक हत्या थी या कुछ और? पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लग पा रहा था। पुलिस फूलन के कातिल की तलाश में लगातार भटक रही थी, तभी 27 जुलाई 2001 को शेर सिंह राणा ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सबको सकते में डाल दिया। उसने कबूल किया कि उसी ने फूलन को गोलियों से उड़ाया है। एक सनसनीखेज वारदात को अंजाम देने के बाद राणा के इस सरेआम इकबालिया बयान ने पुलिस को भी हैरत में डाल दिया। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। राणा करीब ढाई साल तिहाड़ जेल में रहा। इस दौरान उसने एक दिन बयान दिया कि तिहाड़ की सलाखें उसे ज्यादा दिन तक नहीं रोक पाएंगी और हुआ भी यही।
17 फरवरी 2004 की सुबह के 6.55 बजे का वाकया है। तिहाड़ की जेल नंबर एक के बाहर एक आॅटो आकर रुका। उसमें से पुलिस की वर्दी में एक आदमी उतरकर तमाम सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में जेल के अंदर पहुंच गया। उसने अपना नाम अरविंद बताया और शेर सिंह राणा को हरिद्वार कोर्ट में पेशी के लिए ले जाने की इजाजत मांगी। जरूरी कागजात को ध्यान से देखे बिना ड्यूटी पर तैनात तिहाड़ के सुरक्षाकर्मियों ने राणा को नकली पुलिस के हवाले कर दिया। इस तरह 7.05 मिनट पर फूलन देवी की हत्या का मुख्य आरोपी राणा तिहाड़ की कैद से फरार हो गया।
पूरे 40 मिनट बाद जेल प्रशासन की नींद टूटी, यानी पौने आठ बजे। जेल समेत पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। जेल प्रशासन ने आसिस्टेंट सुपारिटेंडेंट और गार्ड को सस्पेंड कर दिया। राणा की फरारी ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी। उसकी गिरफ्तारी के लिए हरिद्वार, रुढ़की और मुजफ्फरनगर इलाके में पुलिस की टीमों ने जबरदस्त छापामारी की। तब भी सफलता नहीं मिली तो राणा का सुराग देने वाले को 50 हजार रुपये इनाम देने की घोषणा कर दी गई, लेकिन पुलिस उसे पकड़ने में नाकाम रही। क्योंकि पुलिस शेर सिंह राणा को हिंदुस्तान में ढूंढ़ रही थी और वह हरेक को चकमा देकर अफगानिस्तान पहुंच चुका था। इसका पता तब चला जब अचानक एक वीडियो सामने आया।
शेर सिंह राणा ने दावा कि वह अफगानिस्तान में पृथ्वीराज चौहान की असली समाधि पर गया और अस्थियां लेकर वापस आ गया। राणा ने अफगानिस्तान में गजनी शहर तक के अपने सफर की बाकायदा वीसीडी तैयार की। तिहाड़ जेल से भागने के पूरे दो साल बाद 17 मई 2006 को शेर सिंह राणा कोलकाता में पकड़ा गया। उसके बाद उसे वापस दिल्ली के उसी तिहाड़ जेल में लाया गया। तब से अब तक यानी पिछले आठ साल से राणा तिहाड़ में ही कैद है। इस बीच उसने तिहाड़ से कंधार तक नाम की एक किताब भी लिखी और अब इस किताब पर एक फिल्म भी बन रही है।
लेकिन 8 अगस्त 2014 को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भारत भूषण ने फूलन देवी की हत्या के मामले में शेर सिंह राणा को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। बाकी के इस मामले से जुड़े अन्य आरोपियों- धन प्रकाश, शेखर सिंह, राजबीर सिंह, विजय सिंह उर्फ राजू (राणा का भाई), राजेंद्र सिंह उर्फ रविंद्र सिंह, केशव चौहान, प्रवीण मित्तल, अमति राठी, सुरेंद्र सिंह नेगी उर्फ सूरी और सवर्ण कुमार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इसके अलावा एक अन्य आरोपी प्रदीप सिंह की नवंबर 2013 में तिहाड़ जेल के अंदर मौत हो गई थी।

कौन है शेर सिंह राणा? 
फूलन देवी हत्याकांड में आए फैसले के बाद शेर सिंह राणा एक बार फिर चर्चा में है। अदालत ने 38 वर्षीय राणा को उम्रकैद की सज़ा सुनाई है। राजपूत जाति से ताल्लुक रखने वाले उत्तराखंड के रुढ़की निवासी राणा इससे पहले भी सुर्खियों में रहा है। उसके हर कारनामे से नाटकीयता जुड़ी रही। दिल्ली के लुटियंस जोन में तत्कालीन सांसद फूलन देवी की हत्या के दो दिन बाद राणा ने देहरादून में आत्मसमर्पण करके इल्जाम अपने सिर लिया। उसका कहना था- उसने बेहमई हत्याकांड में मारे गए 22 ठाकुरों की हत्या का बदला लेने के लिए फूलन देवी की हत्या की है। हालांकि अपनी किताब जेल डायरी में उसने पुलिस पर जुर्म कुबूल करवाने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है।
रुढ़की उत्तराखंड में 17 मई 1976 को जन्मा शेर सिंह राणा का यह कोई पहला गुनाह नहीं है। इससे पहले भी 1997 में एक कार चोरी की वारदात में शेर सिंह राणा का नाम सामने आया था। वर्ष 2000 में राणा और उसके साथियों ने हथियार की नोक पर एक बैंक में 10 लाख की लूट को अंजाम दिया, जिसमें बैंक के गार्ड को राणा और उसके साथियों ने मार डाला था। बैंक लूट की इस सनसनीखेज वारदात के बाद राणा और उसके साथियों नें रुढ़की के एक बैंक में भी 15 लाख की लूट की। इस तरह साल दर साल राणा के गुनाहों की फेहरिस्त लंबी होती चली गई।
फूलन हत्या कांड में गिरफ्तार होने के बाद राणा 17 फरवरी 2004 को तिहाड़ जेल से फरार हो गया था। दो साल बाद 17 मई 2006 को कोलकाता में गिरफ्तार किया गया। राणा का कहना था कि 17 फरवरी 2004 को फिल्मी अंदाज में तिहाड़ जेल से फरार होने के बाद सबसे पहले उसने रांची से फर्जी पासपोर्ट बनवाया। नेपाल, बांग्लादेश और दुबई होते हुए अफगानिस्तान पहुंचा। जान जोखिम में डालते हुए वह 2005 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान की कब्र खोजकर उनकी अस्थियां भारत ले आया। बाद में राणा ने अपनी मां की मदद से गाजियाबाद के पिलखुआ में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर बनवाया, जहां उनकी अस्थियां रखी हैं। वर्ष 2012 में राणा उत्तर प्रदेश के जेवर से निर्दलीय चुनाव भीलड़ा, लेकिन हार गया। और अब वह अदालत में भी हार चुका है। अदालत ने उसे कातिल करार देते हुए 14 अगस्त 2014 को उम्रकैद की सजा सुनाई है।

सोमवार, 2 जून 2014

पत्रकारिता: चुनौतियां जस की तस

जितेन्द्र बच्चन

हिंदी पत्रकारिता के 187 साल पूरे होने के बाद भी उसके सामने चुनौतियों का जो पहाड़ पहले खड़ा था, वह आज भी जस का तस है। भारत में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता की शुरुआत 18वीं शताब्दी के चौथे चरण में कोलकाता, बंबई (मुंबई) और मद्रास (चेन्नई) कहा जाता है, से शुरू हुई थी। हिंदी के पहले समाचार पत्र के रूप में ‘उदंत मार्तण्ड’ की शुरुआत 1826 में हुई थी। इस समय तक अंग्रेरजी पत्रकारिता देश के बड़े शहरों में अपना पैर जमा चुकी थी। हिंदी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी का आइना है.‘उदंत मार्तण्ड’ साप्ताहिक समाचार पत्र था। इसमें मध्य देशीय भाषा का प्रयोग होता था। इसके संपादक पंडित जुगल किशोर ने बड़ी मेहनत से इसका प्रचार-प्रसार किया, लेकिन एक साल बाद ही 1827 में इसका प्रकाशन बंद हो गया। क्योंकि उन दिनों बिना सरकारी सहायता के किसी भी समाचार पत्र को चलाना अंसभव था।



अंग्रेजों के लिए काम करने वाली कंपनी सरकार ने मिशनरी अखबारों के लिए हर तरह की सुविधाएं दे रखी थीं। हिंदी अखबार को कोई सुविधा नहीं मिली थी। यहां तक कि डाक से भेजने की सुविधा भी नहीं थी। ‘उदंत मार्तण्ड’ इसी साजिश का शिकार होकर एक साल में ही बंद हो गया। यह बात और थी कि इसके बाद हिंदी के अलावा बांगला और उर्दू में भी अखबार निकालने की शुरुआत होने लगी थी।हिंदी पत्रकारिता की असल शुरुआत 1873 में हुई, जब भारतेंन्दु ने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ की शुरुआत की। एक साल बाद इसका नाम ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ हो गया। इसके बाद एक के बाद एक कई अखबार शुरू हुए, जो दैनिक, साप्ताहिक और मासिक थे। जानेमाने अखबारों में नागरीप्रचारिणी सभा का ‘सरस्वती’ सबसे प्रमुख अखबार था। 1873 से 1900 के बीच 300 से 350 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था। ये सभी 15 पृष्ठों के बीच होते थे और इन्हें एक तरह से विचारपत्र कहा जाता था।

उदंत मार्तंड के बाद प्रमुख पत्र हैं :
बंगदूत (1829), प्रजामित्र (1834), बनारस अखबार (1845), मार्तंड पंचभाषीय (1846), ज्ञानदीप (1846),मालवा अखबार (1849), जगद्दीप भास्कर (1849), सुधाकर (1850), साम्यदंड मार्तंड (1850),मजहरुलसरूर (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), ग्वालियर गजेट (1853), समाचार सुधावर्षण (1854), दैनिक कलकत्ता, प्रजाहितैषी (1855), सर्वहितकारक (1855), सूरजप्रकाश (1861), जगलाभचिंतक (1861),सर्वोपकारक (1861), प्रजाहित (1861), लोकमित्र (1835), भारतखंडामृत (1864), तत्वबोधिनी पत्रिका (1865), ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका (1866), सोमप्रकाश (1866), सत्यदीपक (1866), वृत्तांतविलास (1867),ज्ञानदीपक (1867), कविवचनसुधा (1867), धर्मप्रकाश (1867), विद्याविलास (1867), वृत्तांतदर्पण (1867),विद्यादर्श (1869), ब्रह्मज्ञानप्रकाश (1869), अलमोड़ा अखबार (1870), आगरा अखबार (1870), बुद्धिविलास (1870), हिंदू प्रकाश (1871), प्रयाग दूत (1871), बुंदेलखंड अखबारर (1871), प्रेमपत्र (1872), और बोधा समाचार (1872)।

साप्ताहिक पत्रों में समाचारों और उन पर की जाने वाली टिप्पणियों का अपना खास महत्व था। दैनिक समाचार पत्रों के प्रति कोई खास रुझान उस समय नहीं होता था। भारतेंदु की पत्रकारिता के 25 साल हिंदी पत्रकारिता के आदर्श माने जाते हैं। उनकी टीका-टिप्पणी से अंग्रेज सरकार के अफसर तक घबराते थे। एक टिप्पणी पर घबराकर काशी के मिजस्ट्रेट ने भारतेंदु के पत्र ‘कविवचनसुध’ को शिक्षा विभाग में लेना ही बंद करा दिया था। भारतेंदु ने सिखाया कि पत्रकार को किस तरह से निर्भीक होना चाहिए।

भारतेंदु के बाद जो पत्रकार आए, वे भी उनकी शुरुआत को आगे बढ़ाते गए। इसके साथ हिंदी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकिसत होती गई। पहले के पत्र शिक्षा और धर्म प्रचार तक ही सीमित थे। समय के साथ-साथ इसमें राजनीतिक, साहित्यक और सामाजिक विषयों को भी शामिल किया जाने लगा। एक समय ऐसा भी आया जब विभिन्न वर्गों और संप्रदाय के सुधर के लिए समाचार पत्रों की शुरुआत हो गई। इसमें धर्म का प्रचार और आलोचना दोनों को ही पूरा मौका मिलने लगा। 1921 के बाद हिंदी पत्रकारिता का समसामयिक युग शुरू हुआ। इस समय तक हिंदी का प्रवेश विश्वविद्यालयों में हो चुका था। आजादी के आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता ने अपना अहम रोल दिखाना शुरू कर दिया था।

अब तक राजनीतिक क्षेत्र में पत्र-पत्रिकाओं की धमक बढ़ने लगी थी और ये जनमन के निर्माण में भी अपना अहम रोल निभाने लगे थे। राजनीतिक पत्रकारिता में हिंदी अखबार ‘आज’ और उसके संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर का सबसे प्रमुख स्थान था। इसके बाद हिंदी पत्रकारिता के विकास में तेजी आई। आजादी के बाद सरकार ने इसके विकास में अहम रोल अदा किया। धीरे-धीरे देश में तमाम तरह के अखबार और  पत्रिकाओं की धूम मच गई। इनके अपने विचार होते थे।  उस समय पाठकों के बलबूते पर ही इनका खर्च निकाला जाता था। सरकार ने सुविधाएं देनी शुरू कीं तो पत्रकारिता पर अपना अघोषित दबाव भी बना दिया। सरकार ने अखबारों को सुविधाएं देने के नाम पर सस्ते मूल्य पर कागज और विज्ञापन देना शुरू किया। यही वह खास मोड़ था जहां से अखबारों पर व्यवसायिकता हावी होने लगी।

1990 के दशक तक अखबारों में संस्करण कम निकलते थे. इसके बाद तो सभी अखबारों के नगर और कस्बे तक के संस्करण निकलने लगे। अब अखबार को उपभोक्ता वस्तु की तरह बेचा जाने लगा। राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण को देखें तो हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद सुविधओं का यहां पूरी तरह अभाव है। आज भी राज्य सरकारों ने अपनी नीति बना रखी है। चंद अखबारों और उनके पत्रकारों को सरकारी सुविधाओं का लाभ दिया जाता है। बदले में यह बंदिश होती है कि वह सरकार के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते समय सावधानी बरतें। जिन पत्रकारों को सत्ता का बरदहस्त हासिल है सही मायनों में उनको ही पत्रकार माना जाता है। बाकी के लिए न सरकार के पास कोई नीति है और न अखबार मालिकों के पास।

हिंदी समाचार पत्रों और उनमें काम करने वाले पत्रकारों के लिए कई तरह के वेतनमान आए और चले गए, लेकिन हिंदी पत्रकारिता की हालत में कोई सुधार नहीं आया। अखबार का मालिक अब इसे व्यवसाय के रूप में परिवर्तित कर चुका है। सरकारी सुविधाओं का लाभ केवल समाचार पत्रों के कुछ लोगों तक ही सीमति रह गया है। मासिक, पाक्षिक और साप्ताहिक की हालत खराब है। सरकार के पास इसकी कोई नीति नहीं है। कहने के लिए केंद्र से प्रदेश सरकारों तक के पास सूचना विभाग का भारीभरकम बजट और स्टाफ है पर यह सब एक तरह की चाटुकारिता को भी बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। इसके बाद भी हिंदी पत्रकारिता प्रगति की राह पर है। आज हिंदी ने मीडिया और इंटरनेट पर भी अपना कब्जा जमा लिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हिंदी केवल भाषा नहीं इस देश के प्राण में बसती है।

नए युग में सरकार की उपेक्षा के बाद भी बहुत सारी पत्रिकाएं बाजार में हैं। यह प्राइवेट विज्ञापनों के भरोसे अपने को बाजार में बनाए हुए हैं। देश में अंग्रेजी का समर्थक एक बड़ा वर्ग है। जो हिंदी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचाने के लिए अपने मीडिया प्लान में अंग्रेजी अखबारों को ही रखता है। जिसका व्यवसायिक नुकसान हिंदी पत्रकारिता को हो रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि हिंदी पत्रकारिता  नई चुनौतियों से रूबरू हो। अपनी पहचान बनाए। आने वाला समय हिंदी का है, इसमें कोई दो राय नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इस दौर में हिंदी पत्रकारिता अपने को आगे बढ़ाने लायक माहौल बनाने का काम करे।

लेकिन 187 साल बाद भी हमारी चुनौतियां जस की तस हैं। आज हमें अंग्रेजी के साथ-साथ सरकारी पालने में पल रही हिंदी पत्रकारिता से भी मुकाबला करना पड़ रहा है। काम सरल नहीं है पर अंसभव भी कुछ नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम भारतेंदु के पद चिन्हों पर चलते हुए हालात का मुकाबला करें। आधुनिक युग में फैली व्यवसायिकता की चुनौती को स्वीकार करते हुए हमें आगे बढ़ना है। हिंदी पत्रकारिता की ताकत हिंदी और उसके पाठक हैं। हमें केवल अपनी बात सही तरह से उनके सामने प्रस्तुत करने भर की जरूरत है। हिंदी के पत्रकारों को हिंदी की आकांक्षाओं को विस्तार देने का काम करना है। प्रगति की चेतना के साथ समाज की निचली कतार में बैठे लोग हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं की ओर देख रहे हैं। जिस तरह से हिंदी ने चिकित्सा, टेक्नोलॉजी पर अपनी छाप छोड़ी है, उसी तरह से हिंदी के पत्रकारों को भी अपने कदम आगे बढ़ाने हैं। जिससे उस जगह को हासिल किया जा सके जिसके हम हकदार हैं।

बुधवार, 2 अप्रैल 2014


                   बेगुनाही की सजा 14 साल


इस तरह की स्तब्ध कर देने वाली यह अकेली कहानी नहीं है. अनेक राज्यों में ऐसे कई वाकए मिल जाएंगे, जहां भयमुक्त शासन की बात करने वाली भाजपा से लेकर अल्पसंख्यकों की हितैषी होने का दम भरने वाली सरकारें हैं. क्या आमिर की त्रासदी उन्हें विचलित कर पाएगी?

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

                         एक सुनंदा, सैकड़ों सवाल



किसी खूबसूरत पहेली की तरह थीं सुनंदा. ऐसी पहेली, जो हमेशा सुलझी दिखती थी, लेकिन अनसुलझी ही इस दुनिया से विदा हो गर्इं. बाकी रह गए कई पोशीदा राज, सवाल और उनके जवाब.

इसे तकदीर का सितम कहें या फिर कुछ और, सुनंदा पुष्कर जीते जी जितनी सुर्खियों में रहीं, अब मौत के बाद भी वे उतनी ही सुर्खियों में हैं. कश्मीर मूल की कनाडाई नागरिक सुनंदा की जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महिलाओं पर लिखी प्रसून जोशी की एक कविता वह अक्सर गुनगुनाती रहतीं- ‘नारी हूं मैं, मजबूरी या लाचारी नहीं. खुद अपनी जिम्मेदारी हूं मैं, नारी हूं मैं.’ जिन मुद्दों पर बड़े-बड़े नेता बयान देने से बचते हैं, उन पर सुनंदा बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखतीं. किसी ने सपने में नहीं सोचा होगा कि इतनी तरक्कीपसंद महिला का अंत इस तरह होगा. 17 जनवरी 2014 की रात दिल्ली के होटल लीला से मौत की एक ऐसी पहेली बाहर निकली, जो अब सुलझाए नहीं सुलझ रही है. 20 जनवरी को पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से यह बात भी साफ हो गई कि सुनंदा की मौत दवा के ओवरडोज से हुई है. यानी दवा जहर बन गई, लेकिन दवा का ओवरडोज सुनंदा ने जान-बूझकर लिया या फिर अनजाने में? इसे खुदकुशी कहेंगे या फिर गलती से हुई मौत, यह सवाल अब भी बरकरार है.

52 साल की सुनंदा की पहचान सिर्फ केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री शशि थरूर की पत्नी तक ही सीमित नहीं थी. वह एक सफल बिजनेस वुमन थीं और उनकी खुद की संपत्ति 100 करोड़ रुपये से अधिक है. हाई प्रोफाइल सुनंदा ने जीवन का सफर जम्मू कश्मीर की हसीन वादियों से शुरू कर दुबई की तपती रेत तक भरपूर जिया. इतना जिया कि लोगों को उनकी शख्शियत पर रश्क होता. सुनंदा मूल रूप से कश्मीर के सोपोर जिले के बंमई गांव की रहने वाली थीं. 1 जनवरी 1962 को जन्म हुआ था. बाद में आतंकवाद की वजह से परिवार जम्मू आ गया. पिता पुष्कर नाथ दास आर्मी में लेफ्टीनेंट कर्नल रहे. सुनंदा का एक भाई सेना में उच्चाधिकारी है और दूसरा डॉक्टर है. खुद सुनंदा मीडिया की सुर्खियों में तब आर्इं, जब तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर के साथ उनकी शादी हुई. इससे पहले उन्हें कोई नहीं जानता था कि वे क्या हैं और क्या करती हैं. लेकिन दिल्ली की चमक और महत्वाकांक्षा की सीढ़ी ने जल्द ही सुनंदा को दिल्ली से दुबई तक की हाई प्रोफाइल सोसाइटियों में प्रसिद्धि दिलवा दी.

19 साल की उम्र में सुनंदा की कश्मीरी ब्राह्मण संजय रैना के साथ पहली शादी हुई थी. रैना उन दिनों दिल्ली के एक होटल में कार्यरत थे और सुनंदा भी एक होटल में रिसेप्शनिस्ट थीं, लेकिन दोनों का वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं गुजरा. वर्ष 1988 में दोनों का तलाक हो गया. आजाद ख्याल की सुनंदा ने वर्ष 1989 में दिल्ली का रुख कर लिया, जहां वह हाई प्रोफाइल पार्टियों की जान बन गर्इं, फिर एक रोज अपना जहां कहीं और तलाशने के लिए सुनंदा ने दुबई की फलाइट पकड़ ली और वहां 1991 में केरल के व्यवसायी सुजीत मेनन के साथ दूसरी शादी कर ली. इसके बाद दोनों ने कुछ लोगों के साथ मिलकर एक्सप्रेशंस नामक एक कंपनी बनाई, जो कई प्रोडक्ट लांच कराए और मॉडल हेमंत त्रिवेदी, विक्त्रम फड़नीस, ऐश्वर्या रॉय के साथ कई शो भी आयोजित किए. इसके बाद सुनंदा को एक बड़ी विज्ञापन कंपनी के साथ काम करने का मौका मिला. उनकी जिंदगी का यह सबसे अच्छा दौर था. दुबई में ही उन्होंने बेटे शिव को जन्म दिया. बला की खूबसूरत तो थी हीं सुनंदा, लोग उन्हें दुबई में ब्यूटीशियन के तौर पर भी जानते थे.

लेकिन 1997 में एक रोज करोलबाग दिल्ली में सुजीत मेनन की एक सड़क हादसे में मौत हो गई. शिव ने बोलना बंद कर दिया. तब वह चार साल का था. इलाज के लिए सुनंदा बेटे को कनाडा ले गर्इं और वहीं की एक आइटी कंपनी में नौकरी कर ली. 2004 में रियल स्टेट कंपनी ‘बेस्ट होम्स’ ने सुनंदा को मुडो दुबई में जनरल मैनेजर के तौर पर काम करने का प्रस्ताव मिला और वह कनाडा से फिर दुबई लौट आर्इं. तब तक उनके कई दोस्त पैसे वाले बन चुके थे. सुनंदा भी जुमेरिया पॉम के एक खूबसूरत अपार्टमेंट में रहने लगीं. बाद में एक फ्लैट जुमेरिया बीच और दो एक्जीक्यूटिव टॉवर में खरीदे. इस बीच दुबई के बिजनेस सर्किल में भी सुनंदा एक सफल नाम जाना जाने लगा. वहां की बेस्ड टेलीकॉम इंवेस्टमेंट कंपनी की वह सेल्स डायरेक्टर थीं और रेंदेवूज स्पोर्ट्स वर्ल्ड में को-वोनर भी इसके अलावा दिल्ली और मुंबई में भी उनका बिजनेस फैलने लगा.

2008 में सुनंदा इंपीरियल में हुए एक अवार्ड समारोह में शामिल होने दिल्ली आर्इं. यहां पहली बार उनकी मुलाकात शशि थरूर से हुई. दोनों दोस्त बन गए. मेल-मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया. केरल के पलक्कड़ जिले के प्रतिष्ठित थरूर परिवार से नाता रखने वाले शशि का जन्म लंदन में हुआ है. उस समय उनके पिता एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के अधिकारी थे. दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई करने वाले शशि की पहली शादी कोलकाता में 1977 में पत्रकार तिलोत्तमा मुखर्जी के साथ हुई थी. उन्होंने जुड़वा बेटों ईशान और कनिष्क को जन्म दिया. बाद में शशि ने पत्नी से तलाक ले लिया और संयुक्त राष्ट्र में अंडर सेके्रटरी जनरल की पोस्ट पर नियुक्त हो गए. वहां उनकी मुलाकात संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग की उप सचिव क्रिस्टा गिल्स से हुई. शशि कैनेडी युवती क्रिस्टा से मुहब्बत कर बैठे. वर्ष 2007 में दोनों ने शादी कर ली. पर यह रिश्ता भी बहुत ज्यादा नहीं चला. जनवरी 2010 में क्रिस्टा से शशि ने तलाक ले लिया और भारत लौट आए. कांग्रेस सरकार ने उन्हें विदेश राज्य मंत्री बना दिया. इसके बाद शशि और सुनंदा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. उनका प्रेम इतना गहरा गया कि अप्रैल 2010 में कोच्चि की इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) टीम को लेकर विवाद हुआ तो सुनंदा ने उस विवाद को खत्म करने के लिए 70 करोड़ रुपयों के इंवेस्टमेंट खुद के द्वारा किया जाने की बात स्वीकार कर ली और इसके बाद थुरूर ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

22 अगस्त 2010 में सुनंदा-शशि ने शादी कर ली. इसके बाद यह जोड़ी इतनी चर्चा में आई कि अक्तूबर 2012 में एक बयान के तहत नरेंद्र मोदी ने सुनंदा पुष्कर को ‘50 करोड़ की गर्ल फ्रेंड’ करार दिया और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता मुख़्तार अब्बास नकवी ने थरूर को ‘लव गुरु’ की उपाधि दे डाली. उन्होंने कहा कि अगर देश में लव मंत्रालय बनता है तो उसका पदभार शशि थरूर को दिया जाना चाहिए. दिसंबर 2013 में सुनंदा एक बार फिर अपने बयान से चर्चा में आर्इं. उन्होंने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए कहा कि ‘संविधान के अनुच्छेद 370 की समीक्षा होनी चाहिए.’ लेकिन 15 जनवरी 2014 को अचानक सुनंदा और थरूर के रिश्ते पर तब सवाल उठ खड़े हुए, जब थरूर के ट्विटर अकाउंट से पाकिस्तान की पत्रकार मेहर तरार को किए गए कुछ ट्वीट सामने आए. थरूर ने ट्वीट किया कि उनका अकाउंट ‘हैक’ कर लिया गया है. मेहर ने भी शोसल मीडिया के जरिए किसी ‘संबंध’ होने से इनकार किया, फिर सूत्रों के मुताबिक, सुनंदा ने उसी रोज मेहर से फोन पर बात की. इसके बाद पति-पत्नी ने एक संयुक्त बयान जारी कर दावा किया कि उनका वैवाहिक जीवन सुख से बीत रहा है और वे चाहते हैं कि यह ऐसा ही रहे.

बात बिगड़ी, ट्विटरबाजी हुई, सुनंदा और मेहर दोनों ने मोर्चा संभाला और थरूर पर अपना-अपना दावा किया, लेकिन जिस तरह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुनंदा के शरीर पर 12 जख्मों के निशान मिले हैं उससे लगता है कि कहीं न कहीं सुनंदा को लग रहा था कि प्यार के इस त्रिकोण में वे बाजी हार रही हैं. बाद में यह बात भी सामने आई कि थरूर के मेहर के साथ कथित अफेयर से खफा सुनंदा ने लोधी रोड आवास के बजाय होटल में रहने का फैसला किया और 14 जनवरी को तिरुवनंतपुरम से दिल्ली आने के दौरान सुनंदा और थरूर के बीच फ्लाइट में और एयरपोर्ट पर भी हल्की झड़प और हाथापाई हुई थी. उसी का नतीजा है कि सुंनदा चाणक्यपुरी के होटल लीला में रहने अकेली पहुंचीं. अब होटल के कमरे से लेकर एम्स की पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक जो बातें उभरकर सामने आ रही हैं, उससे हत्या जैसी बात तो कोरी बकवास के अलावा कुछ नहीं लगती. 21 जनवरी को मामले के जांच अधिकारी एसडीएम (बसंत विहार) आलोक शर्मा ने दंडाधिकारी को अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी. उसकी प्रति थाना सरोजनी नगर के एसएचओ को भी दी गई है. शर्मा ने इस मामले में 11 लोगों से पूछताछ की, जिसमें सुनंदा के भाई राजेश और आशीष पुष्कर, बेटे शिव मेनन, निजी सचिव आरके शर्मा, कंसल्टेंट शिव कुमार, अटेंडेंट नारायण, बजरंगी और उपचार करने वाले दो डॉक्टर शामिल हैं. इसके अलावा पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार नलिनी सिंह से भी पूछताछ की है.

सुनंदा के पारिवारिक मित्र जॉय कहते हैं, ‘‘सुनंदा की ख्वाहिश ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना और जमकर खर्च करना था. शाहखर्ची उनकी आदत बन चुकी थी. दुबई में ही सुनंदा की दोस्ती नंदकुमार राधाकृष्णन से हुई. नंदकुमार को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया. फिर उन्हीं के जरिए सुनंदा शशि थरूर के करीब आईं. इसके बाद ही दोनों ने मिलकर कई सारे निवेश किए.’’ नादिरा बताती हैं, ‘‘कुछ बीमारी के कारण डॉक्टरों ने सुनंदा को शराब का सख्त परहेज बताया था, लेकिन दिल्ली में सुनंदा बहुत ज्यादा तनाव में आ गई थीं. संभवत: वे अत्यधिक शराब पी रही थीं.’’ सफल बिजनेस वुमन होकर भी शायद सुनंदा पति को लेकर असुरक्षित महसूस करती थीं. उसकी दोस्त फराह अली खान कहती हैं, ‘‘किसी भी पब्लिक फंक्शन में वह थरूर के साथ इसी वजह से जरूर जाती थीं. अस्वस्थ होती थीं तो भी.’’

पुलिस को सुनंदा के कमरे से अल्प्राजोलम (अल्प्रैक्स) की दो खाली स्ट्रिप्स मिली थी. सुनंदा ने शायद 27 टेबलेट्स खाई थी. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अल्प्राजोलम की ज्यादा मात्रा से दिमाग की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है. बेहोशी और मौत संभव है. देश के सबसे अनुभवी फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स डॉ. के.एल. शर्मा का कहना है, ‘‘सुनंदा की मौत के लिए जिस अल्प्रैक्स ड्रग के ओवरडोज की बात की जा रही है, उससे उनकी मौत संभव नहीं है जब तक कि उसे किसी और दवा के साथ मिलाकर नहीं लिया जाए. सुनंदा के वजन के बराबर इंसान की मौत तभी हो सकती है जब वह कम से कम 225 टैबलेट का एकसाथ सेवन कर ले.’’ डॉ. एन.पी. सिंह (प्रोफेसर मेडिसीन) कहते हैं, ‘‘दवा के ओवरडोज से किसी की मौत होना अविश्वनीय है. क्योंकि यदि व्यक्ति दवा के सामान्य डोज से 100 गुना अधिक डोज भी ले, तब भी समय से अस्पताल पहुंचाने पर उसकी जान बच जाती है.’’

सुनंदा की मौत के पीछे किसी साजिश के सवाल पर उनके घरवाले साफ इनकार कर रहे हैं. 21 वर्षीय बेटे शिव ने भी कहा है कि शशि थरूर और सुनंदा एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे. शशि उनकी मां को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते. वहीं एसडीएम शर्मा को जांच में थरूर के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला और न ही पुलिस की तहकीकात किसी नतीजे पर पहुंची. 23 जनवरी को पुलिस कमिश्नर बी. एस. बस्सी ने इस केस की जांच क्राइम ब्रांच (रोहिणी के सेक्टर-18) को सौंप दी. ऐसे में इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला है कि आखिर सुनंदा की जान गई कैसे? क्या वे यह मान बैठी थीं कि अब थरूर से उनका भावनात्मक संबंध खत्म हो जाएगा और उन्होंने आत्महत्या कर ली या फिर इस हारती बाजी (मेहर तरार की दरार) का इतना गहरा सदमा लगा कि सोते-सोते ही वे इस दुनिया को अलविदा कह गईं?

                                        मेहर तरार की वजह से पड़ी दरार


45 वर्षीय मेहर तरार भले ही सरहद पार की हैं, लेकिन भारत और सुनंदा थरूर की जिन्दगी में ये नाम काफी पहले दस्तक दे चुका था. जुलाई 2013 में मेहर ने शशि थरूर को मेल लिखा था. वह कुछ इस तरह है- आपकी जिंदगी में जो कुछ भी हो रहा है मुझे उसके लिए बहुत अफसोस है. मैं जानती हूं कि आपके लिए यह शादी क्या मायने रखती है. आपके लिए आपकी बीवी क्या मायने रखती है. मुझे लगता है कि आपने एक दूसरे थ्रेड में गलती से कुछ लिख दिया था. मैं शमिंर्दा हूं. पिछली रात मैंने इस पर मजाक बनाया था, क्योंकि मैं कुछ भी कहने से घबरा रही थी. हम दो बार मिले हैं. हम अच्छे दोस्त बन गए हैं. मुझे बहुत अच्छा लग रहा है और सच तो ये है कि आपकी दोस्त होना एक सम्मान की बात है.’’ इसका मतलब है कि दोनों के रिश्ते की खटास को जानती थीं मेहर. दूसरे ई-मेल में इस बात का उन्होंने जिक्र भी किया है, ‘‘मैं नहीं चाहती थी कि आप दोनों के बीच कोई तनाव हो. इंशाह अल्लाह आपके बीच सबकुछ ठीक हो जाए।’’ एक और मेल में मेहर लिखती हैं, ‘‘ मेरी वजह से आपकी अपनी पत्नी के साथ अनबन हो रही है. मैं क्या कहूं, मैं तो बिल्कुल भी सोचना तक नहीं चाहती हूं. मेरा बेटा बहुत छोटा है. महिला और पुरुष के रिश्तों को हमेशा शक से देखा जाता है. पता नहीं मेरे बेटे पर क्या असर पड़ेगा.’’ अंत में एक बयान में मेहर ने कहा है, ‘‘सुनंदा की शादीशुदा जिंदगी की परेशानी में मेरी कोई भूमिका नहीं थी. मैं इस मामले में साजिश का शिकार हुई हूं.’’

बुधवार, 8 जनवरी 2014

           शेखावटी में लगती है दुल्हनों की बोली !





झुंझनू, सीकर और चुरु में रुपये लेकर विवाह कराने वाले कई गिरोह सक्रिय हैं और देश के दूसरे राज्यों में भी इन्होंने अपना जाल फैला रखा है

जितेंद्र बच्चन

राजस्थान के शेखावटी का चौंकाने वाला सच! 21वीं सदी में भी यहां बेहिसाब बिकती हैं दुल्हनें! गलियों में, दुकानों में, गांवों में और शहरों में सजती है दुल्हनों की मंडी! कभी नौकरी के नाम पर, कभी शादी के नाम पर तो कभी-कभी घरों में काम करने वाली के नाम पर दूर-दराज के इलाकों से लड़कियों को यहां लाकर उनकी बोली लगाई जाती है. 50 हजार से शुरू होता है सौदा और तीन लाख तक पहुंच सकती है आखिरी बोली. महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और पंश्चिम बंगाल के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों की लड़कियों की भेड़-बकरी की तरह होती है खरीद-फरोख्त. बालिग हो या नाबालिग, इस धंधे में लड़की की उम्र कभी आड़े नहीं आती. रकम पूरी मिलनी चाहिए, दलाल किसी भी लड़की को किसी भी उम्र और जाति के पुरुष की दुल्हन बनने पर मजबूर कर सकता है. सबसे खतरनाक तस्वीर झुंझुनू और सीकर की है, जहां रुपये लेकर विवाह कराने वाले कई गिरोह सक्रिय हैं और दूसरे राज्यों में भी उनके एजेंटों ने अपना पूरा जाल फैला रखा है.

दुल्हनों की इस खरीद-फरोख्त के काले कारोबार में राजस्थान पुलिस के कुछ अफसर भी शामिल बताए जाते हैं. अंतरराज्जीय गिरोह के लोग उन्हें बकायदा कमीशन देते हैं. तभी तो शेखावटी (झुंझुनू, सीकर और चुरु) में अब तक 5 हजार से ज्यादा दुल्हनें खरीदकर आ चुकी हैं. यह एक गैरसरकारी संस्था का आकड़ा है. रही बात सरकार और पुलिस की तो वह यह तो मानती है कि शेखावटी में दूसरे राज्यों से दुल्हनें लाई जाती हैं, लेकिन इसका कारण लिंगानुपात में कमी का होना बताया जाता है. जबकि हकीकत यह है कि यहां के तमाम कायदे-कानून दुल्हनों के दालल अपने ठेंगे पर रखते हैं. 27 दिसंबर 2013 को भी नानसा गेट (झुंझुनू) मुहल्ले में बिकने आई चार लड़कियों को पुलिस ने बरामद किया है. वाकया शाम करीब 7 बजे का है. एक युवक के साथ महाराष्ट्र की छह लड़कियां गली में घूम रही थीं. कुछ लोगों को उनके हाव-भाव पर शक हुआ. उन्होंने छिपी नजरों से पीछा करना शुरू कर दिया. युवक को अंदेशा हुआ तो वह और उसके साथ की दो लड़कियां फरार हो गए, लेकिन चार लड़कियों को लोगों ने पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया.

पूछताछ में चारों लड़कियों का कहना था कि वे अमरावती महाराष्ट्र की रहने वाली हैं और यहां अपनी एक रिश्तेदार से मिलने आई हैं, मगर पूरा पता नहीं बता पार्इं. लोगों का कहना है कि लड़कियों को अमरावती से शादी के लिए यहां लाया गया था. मुहल्ले के कुछ कुंवारे लड़कों को उन्हें दिखाने के बाद उनकी बोली लगाई जानी थी. यह तो अच्छा हुआ कि पुलिस ने पहले ही पकड़ लिया वरना दलाल आसानी से इन लड़कियों को दुल्हन के नाम पर नीलाम कर देते. इससे पहले दिल्ली पुलिस भी एक मामले का खुलासा कर चुकी है. घटना 20 सितंबर 2013 की है. मौत से संघर्ष कर रही दो वर्षीय बच्ची फलक को एक युवती एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) में दाखिल कराकर लापता हो गई. पूछने पर उसने खुद को बच्ची की मां बताया था, फिर वह लड़की को छोड़कर गायब क्यों हो गई? यह सवाल उठते ही अस्पताल प्रशासन ने थाना हौजखास के एसएचओ हरपाल सिंह को इत्तला की. उनकी जांच-पड़ताल पर पता चलाकि फलक की मां का नाम मुन्नी खातून है. वह मूल रूप से कटिहार बिहार की रहने वाली है. शराबी पति की पिटाई और आर्थिक तंगी से परेशान तीन बच्चों की मां मुन्नी एक रोज घर छोड़कर दिल्ली चली आई. उसके साथ उसकी छोटी बेटी फलक भी थी. यहां उसकी मुलाकात राजा गार्डेन की लक्ष्मी से हुई. वह लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर उन्हें खरीदने-बेचने का धंधा करती है. उसका गिरोह राजस्थान में भी काम करता है. झुंझुनू की सरोज, कोटपुतली की कांता चौधरी और हरियाणा का शंकर लक्ष्मी के गिरोह के मेंबर हैं. ये लोग जरूरतमंद लड़कों को दुल्हन बेचने का काम करते हैं.

मुन्नी, लक्ष्मी और उसके गिरोह की असलियत जान नहीं पाई. लक्ष्मी ने पहले उसके प्रति सहानुभूति जताकर उसका दिल जीता, फिर तरह-तरह के सब्जबाग दिखाकर उसे दूसरी शादी करने के लिए राजी कर लिया. सरोज ने योजना के अनुसार झूठ बोलते हुए बताया कि भड़ौंदा में उसका भांजा हरपाल सिंह रहता है. अच्छा कमाता-खाता है. उसकी पत्नी की मौत हो चुकी है. कोई बच्चा नहीं है. तुम चाहो तो तुम्हारी शादी के लिए हम उससे बात कर सकते हैं. मासूम फलक का मुंह देखकर मुन्नी ने हामी भर दी. हरपाल के साथ उसकी शादी हो गई. सरोज ने हरपाल से मुन्नी का नाम अनीता बताया था. बाद में भेद खुला तो पता चला कि मुन्नी मुसलमान है. लक्ष्मी ने हरपाल से उसका एक लाख रुपये में सौदा किया है. हरपाल सरोज का भांजा नहीं बल्कि उसे एक दुल्हन की दरकार थी और वह किसी लड़की को खरीदना चाहता था. इसके लिए उसने गिरोह की एजेंट सरोज से संपर्क किया और सरोज ने लक्ष्मी और शंकर के साथ मिलकर मुन्नी उर्फ अनीता को हरपाल के हाथ बेच दिया.

हरपाल तब भी मस्त था, लेकन एक रोज जब पता चला कि मुन्नी ने नसबंदी करा रखी है और अब वह उसके बच्चे की मां नहीं बन सकती तो हरपाल एकदम से तिलमिला उठा- यह तो फरेब है! हमारे साथ धोखा किया गया है. मुन्नी ने सफाई देनी चाही तो हरपाल ने उसकी एक न सुनी और मार-पीटकर उसे घर से निकाल दिया. उसी लड़ाई-झगड़े में मासूम फलक गंभीर रूप से घायल हो गई. मुन्नी बेटी को लेकर दिल्ली चली आई. यहां लक्ष्मी की बड़ी लड़की ने फलक को एम्स में ले जाकर भर्ती करा दिया. सोचा था, मुन्नी अगर अस्पताल गई तो उसकी जुबान लड़खड़ा सकती है. किसी को असलियत पता चल गई तो उसके साथ-साथ वह भी पकड़ी जाएगी. पर हुआ यह कि लक्ष्मी की जो लड़की फलक को एम्स ले गई थी, वह अस्पताल से ही अपने प्रेमी के साथ भाग गई और थाना हौजखास पुलिस मां की तलाश करते-करते मुन्नी खातून तक जा पहुंची. इसके बाद सारे मामले का पर्दाफाश हो गया.

दिल्ली पुलिस ने आरोपी हरपाल सिंह, लक्ष्मी, सरोज, शंकर और फरेब करने के इल्जाम में मुन्नी को •ाी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि हरपाल सिंह के मामले में झुंझुनू के अमर सिंह ने दलाल की भूमिका निभाई थी. वह अब तक शेखावाटी क्षेत्र में 30-35 लड़कियों को शादी के लिए बेच चुका है. उसका संपर्क गिरोह की मेंबर कांता चौधरी से है, जो जयपुर राजस्थान की रहने वाली है. कांता के खिलाफ थाना बहरोड़ में 2, कोटपुतली में 2 और वानापुर में एक दुल्हन बेचने का मामला दर्ज है. इससे पहले एक बार थाना वसंत कुंज (दिल्ली) पुलिस कांता को गिरफ्तार कर चुकी है, लेकिन जमानत पर छूटने के बाद वह फिर से इसी धंधे में उतर गई. अब पुलिस उसके साथ-साथ दलाल अमर सिंह को भी तलाश रही है.

शेखावटी में दलालों ने पूरा जाल बिछा रखा है. करीब दो साल से लड़कियों की खरीद-फरोख्त में लगे एक दलाल ने अपना नाम-पता न उजागर करने की शर्त पर बताया, ‘‘सबसे सस्ती दुल्हन की कीमत 50 हजार रुपये है. इसमें 35 हजार रुपये बाहर के एजेंट का होता है और 15 हजार रुपये हमारा. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी डिमांड एकदम अलग होती है. एक बार एक अधिकारी महोदय टकरा गए. उनका कहना था, ‘दुल्हन सुंदर और कमउम्र होनी चाहिए.’ ऐसी लड़की के लिए कम से कम दो लाख रुपये खर्च हो सकते हैं. एजेंट के माध्यम से लड़की मंगाई जाती है. कई बार लड़की के किसी नाते-रिश्तेदार को भी पटाने के लिए उसे रुपये देने पड़ते हैं. ग्राहक को मंदिर या किसी होटल में लड़की दिखाई जाती है. पसंद आने पर सौदा तय होता है, फिर पूरी रकम लेकर दोनों की शादी करा दी जाती है.’’

दलाल ऐसे बता रहा था जैसे किसी गाय-भैंस को बेचने की बात कर रहा हो. हमारे पूछने पर उसने इस पेशे से जुड़े कुछ और भी खुलासे किए. ‘‘जो ज्यादा पैसे वाले होते हैं, उनकी डिमांड वेल मेंनटेन लड़की की होती है. इसीलिए मुंहमांगी कीमत अदा करते हैं. ऐसी लड़कियां फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं और कहीं भी जाने को तैयार होती हैं. यानी घर में दुल्हन और होटल में गर्लफे्रंड का बाखूबी रोल अदा करती हैं. इस तरह की लड़कियों की आपूर्ति हम दार्जिलिंग और शिलांग के एजेंटों के माध्यम से करते हैं. उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती. असम की कुछ लड़कियां इतनी तेज-तर्रार होती हैं कि शादी के लिए खुद अपना सौदा करती हैं.’’

मुकुंदगढ़ थाना प्रभारी युसुफ अली के मुताबिक, पहली जून 2013 को एक मुखबिर की सूचना पर डूंडलोद (जिला झुंझुनू) निवासी सलीम को 14 वर्षीया लड़की को बंधक बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. मानव तस्करी निरोधक सेल झुंझुनू के प्रभारी अरविंद सिंह चारण ने जब उससे पूछताछ की तो पता चला कि लड़की मूल रूप से अमरावती महाराष्ट्र की रहने वाली है. करीब 10 दिन पहले सलीम उसे बहला-फुसलाकर लाया था. इस बीच एक रोज वह लड़की को लेकर सीकर गया और वहां के सुरेश ने उसे अपनी दुल्हन बनाने के लिए डेढ़ लाख में उसे खरीद लिया. एक लाख 10 हजार रुपये भी दे दिए. शेष रकम शादी के बाद देने को कहा था, लेकिन उसके पहले ही लड़की को हकीकत पता चल गई तो वह रोने लगी. उसने खाना-पानी छोड़ दिया. पुलिस ने सुरेश को भी गिरफ्तार कर लिया है. अदालत के आदेश पर दोनों आरोपी जेल में है और पीड़िता नारी निकेतन में रह रही है.

खुड़ाना के मुकेश और रोहतक की सुनीता को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. आरोप है कि सुनीता को मुकेश ने दुल्हन के लिए खरीदा था. शादी कराने वाले गिरोह ने मुकेश के परिजनों से लड़की को अविवाहित बताया था, जबकि सुनीता पहले से विवाहित है और उसका एक बच्चा भी है. सूत्र बताते हैं कि झुंझनू, सीकर और चुरु के 300 से अधिक गांवों में बंगलादेश की तमाम लड़कियां दुल्हन बनकर रह रही हैं. इन लड़कियों ने अपनी असलियत छिपाते हुए नाम और जाति बदलकर शादी की है. इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह काम कर रहा है. चुरु के 65 वर्षीय बुजुर्ग मानिक चंद बताते हैं, ‘‘शेखावटी में लड़कियों की कमी है. भ्रूण हत्या के चलते यहां के लिंगानुपात में बहुत फर्क आया है. क्षेत्र की जो लड़कियां हैं, वे शिक्षा में अव्वल हैं और अधिकतर सरकारी नौकरी में हैं. इलाके के बेरोजगार और अशिक्षित युवकों के साथ यहां की लड़कियां शादी करने को कतई राजी नहीं होतीं. ऐसे में लड़के बिना शादी के बहुत दिन तक पड़े रहते हैं. गरीब तबके के जो लोग हैं, उनकी शादी 30-35 साल बाद भी नहीं होती. उन्हें दुल्हन मिलनी मुश्किल हो जाती है. ऐसे में शादी के लिए यहां के लोग दलालों के माध्यम से दूसरे राज्यों की लड़कियां खरीदते हैं. कुछ की घर-गृहस्थी अच्छी चल रही है, लेकिन कुछ परिवार इन बाहरी दुल्हनों की धोखाधड़ी के शिकार भी हुए हैं. कई घटनाओं में शादी के दूसरे रोज ही दुल्हन रु. और जेवरात लेकर भाग गई. इसमें दलालों की मिली•ागत होती है. पहले तो लड़केवालों को दलाल तरह-तरह के झांसे देते हैं. उसके बाद लड़की की जो कीमत लगती है, उसमें भी उनका मोटा कमीशन होता है. खासकर महिलाएं इस पेशे से ज्यादा जुड़ी हैं. पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ समाज को भी इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा, तभी ऐसी घटनाओं पर रोक लग पाएगी.’’

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा का दुल्हनों की खरीद-फरोख्त मामले में कहना है कि संबंधित पक्षों से रिपोर्ट मांगी गई है. राजस्थान पुलिस को आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए भी लिखा गया है. 6 जनवरी 2013 को फोन पर हुई बातचीत में झुंझनू के पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप का कहना है, ‘‘करीब पांच महीने पहले उन्होंने चार्ज लिया है. एक-दो मामले संज्ञान में आए हैं पर इसके पीछे की हकीकत यह है कि अधितर लोग पुलिस का सहयोग नहीं करते. उसके कई कारण हो सकते हैं. फिर भी हम तहकीकात करवा रहे हैं. अगर कहीं इस तरह का वाकया पेश आया है तो अवश्य कार्रवाई होगी.’’ दुल्हनों की खरीद-फरोख्त में कई थानेदारों की मिलीभगत के सवाल पर एसपी का कहना था, ‘‘अगर ऐसा है तो पीड़ित को हमसे संपर्क करना चाहिए. पुलिस का जो भी अफसर होगा, अगर वह गलत कार्यों में लिप्त है तो उसके खिलाफ मामला बनता है तो हम कड़ी कार्रवाई करेंगे.’’

सीकर के पुलिस अधीक्षक हैदर अली जैदी और चुरु के एसपी राहुल कोटोती भी इस बात को मानते हैं कि शेखावटी में दूसरे राज्यों की लड़कियां शादी के बाद यहां आई हैं. इन जिलों में लड़कियों की कमी है, इसलिए यहां के लोगों की उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, पंजाब आदि राज्यों की लड़कियों के साथ शादी करना मजबूरी है. कुछ मामले दुल्हनों की खरीद-फरोख्त का भी पता चला है. उनकी एफआइआर दर्ज करवाने के बाद आरोपियों को गिरफ्तार भी किया गया है. किंतु दोनों में से कोई भी पक्ष तभी पुलिस के पास आता है, जब कोई मामला बिगड़ जाता है. कुछ ऐसे भी मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें शादी के बाद दुल्हन नकदी और जेवरात लेकर फरार हो गई. उन केसों की जांच चल रही है. हम भी यही चाहते हैं कि कार्रवाई हो और दुल्हनों की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी लगे.

आरोपियों को तलाश रही पुलिस

14 नवंबर 2013 को झुंझुनू जिले के पचेरी थाना इलाके के पचेरी कलां गांव की एक दुल्हन शादी की पहली रात ही नकदी और जेवरात लेकर भाग गई. मामले के विवेचनाधिकारी सज्जन सिंह के अनुसार, मामले की तफ्तीश की जा रही है. पिचानवा गांव, चिड़ावा कस्बा जिला सीकर में भी सत्यवीर की दुल्हन शादी के 10 दिन बाद भाग गई. दुल्हन का नाम आरती था. सत्यवीर के घर वाले उसके मायके मथुरा पहुंचे. वहां पता चला कि आरती का नाम-पता सब फर्जी है. सत्यवीर और उसके घर वाले माथा पीटकर रह गए. झुंझुनू जिले के भेडकी गांव के महेश की दुल्हन बबीता भी शादी के 17 दिन बाद जेवरात आदि लेकर फरार हो गई. बाद में महेश की तहरीर पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर बबीता को लुधियाना से गिरफ्तार कर लिया. उसका असली नाम सुखविंदर कौर है. उसे बबीता के नाम से महेश के साथ शादी करवाने वाले बाकरा गांव के पवन जाट को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. उसने दुल्हन के बदले में महेश से 1 लाख 20 हजार रुपये लिए थे. अब जेल में है.

चुरु जिले के थाना पिलानी पुलिस ने भी शादी के नाम पर ठगी करने का एक मामला दर्ज किया है. डुलानिया निवासी राजकुमार ने सूचना दी थी कि इंडोल (हिसार) के जितेंद्र, बूचावास (तारानगर) की सावित्री, रेवत और पदमपुर (गंगानगर) की पूजा ने 8 मई 2013 को उसके •ााई अमित की ज्योति नामक लड़की के साथ शादी कराने के लिए 1 लाख 30 हजार रुपये लिए थे. 12 मई को दोनों की शादी हो गई, लेकिन 13 मई की रात दुल्हन घर में रखे 60 हजार की नकदी और करीब 2 लाख के जेवरात लेकर फरार हो गई. पुलिस आरोपियों को तलाश रही है.