बुधवार, 22 मई 2013

                           किले में सेंध!

सोनिया-राहुल के गढ़ में वरुण गांधी की दस्तक।भाजपा में वरु ण का कद बढ़ा। पार्टी ने तय की उनके लिए बड़ी भूमिका। खासकर युवाओं को पार्टी से जोड़ने की है कोशिश। खास फोकस है उत्तर प्रदेश, क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।


जितेंद्र बच्चन
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, सीटों की संख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में नए-नए राजनीतिक समीकरण उभरने लगे हैं। भाजपा की रणनीति बड़े चेहरों को मैदान में उतारने की है। उसी कड़ी में वरुण गांधी अगला लोकसभा चुनाव सुलतानपुर से लड़ने की तैयारी में हैं। इसके संकेत पहले से भी मिलते रहे हैं, लेकिन 16 मई को वरुण ने सुलतानपुर के खुर्शीद क्लब मैदान में स्वाभिमान रैली कर के अपने चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत कर दी। भाजपा ‘अपने गांधी’ के लिए बड़ी भूमिका तय कर चुकी है। खासतौर पर वरुण के जरिए युवाओं को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, तभी तो रैली में पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने वरुण को युवा हृदय सम्राट बताया। उत्तर प्रदेश पर पार्टी का खास फोकस रहा, क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।
वरुण की उम्मीदवारी से राजनीतिक हलचल तेज :
परिवार के दूसरे खेमे के राहुल गांधी के अमेठी से सटी सुलतानपुर सीट से वरुण की उम्मीदवारी ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। यह तय माना जा रहा है कि सुलतानपुर, अमेठी, रायबरेली में गांधी परिवार की त्रिमूर्ति (वरु ण-राहुल-सोनिया) की मौजूदगी की राजनीतिक गूंज दूर तक सुनी जाएगी। 16 मई को शहर के खुर्शीद क्लब में हुई भाजपा की स्वाभिमान रैली में भारी भीड़ जुटी। आसपास के कई जिलों के लोग वरु ण को देखने-सुनने पहुंचे। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी सहित प्रदेश के तमाम पदाधिकारी, नेता और अनेक विधायक वरुण का हौसला बढ़ाने और अपना चेहरा दिखाने की होड़ में लगे रहे। वरु ण ने अपने भाषण में अमेठी, रायबरेली या फिर सोनिया गांधी का जिक्र करने से परहेज किया। हालांकि भाषण की शुरुआत उसी अंदाज में की जैसे परिवार के अन्य सदस्य ‘अमेठी या रायबरेली को अपना बताने के लिए’ करते रहे हैं। वरुण ने कहा, ‘अपने घर आया हूं। यहां के लोगों ने हमेशा मेरे पिता का हाथ थामे रखा।’ इस उल्लेख के साथ वरु ण काफी भावुक हो गए। उन्होंने कहा, ‘मेरा परिवार कुछ महीनों से काफी दु:खी है। 19 मार्च को मेरे बेटी पैदा हुई थी। परिवार में बेहद खुशी थी, लेकिन 19 अप्रैल को वह गुजर गई। जो माता-पिता हैं वे इस दर्द को समझ सकते हैं। लोगों को लगता है कि जो मंच पर बैठते हैं। मुकुट पहनते हैं। वे बहुत सुखी और ऐशोआराम से हैं पर उनके भी दु:ख हैं।’ ये सब बताते हुए भावुक वरु ण कुछ पल को ठहर गए। सामने जोश में उमड़ती भीड़ के बीच भी सन्नाटा पसर गया, लेकिन जब उन्होंने कहा कि यहां के हजारों बच्चे भी तो मेरे बच्चे हैं, तो अगले ही क्षण उनके लिए तालियां बजाते हुए लोगों ने नारे बुलंद करने शुरू कर दिए।
भाजपा में वरु ण को पहली बार तरजीह :
भौगोलिक व जातिगत समीकरणों के आधार पर देखें, तो तीनों लोकसभा सीटों सुलतानपुर, अमेठी और रायबरेली में काफी समानता है। 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में इन तीनों जगहों पर कांग्रेस का पत्ता लगभग साफ हो चुका है। इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं और भाजपा वरु ण को पहली बार तरजीह दे रही है। पार्टी में उनका कद बढ़ा है। वहीं, विरोधी खेमों में रहते हुए भी गांधी परिवार के सदस्य अब तक चुनाव प्रचार में एक-दूसरे के क्षेत्रों में जाने से परहेज करते रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में यह परंपरा टूटेगी? दरअसल, वरुण का सुलतानपुर से चुनाव लड़ने का फैसला अचानक नहीं है। वे पिछले साढेÞ तीन साल से इसकी तैयारी कर रहे हैं। 20 दिसंबर, 2009 को उन्होंने सुलतानपुर में एक बड़ी सभा कर पहली बार इसका संकेत दिया था। इस सभा की सफलता के लिए उनके प्रतिनिधियों ने यहां महीनों मशक्कत की थी। तब वरु ण ने सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ‘हम बचपन से सुलतानपुर-अमेठी के विषय में सुनते-जानते रहे हैं। मेरे पिता संजय गांधी को यहां के लोगों ने बहुत प्यार दिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार मैं यहां आया था, तब जल्दी-जल्दी आने का वादा किया था, लेकिन नहीं आया तो इसकी वजह थी कि मैं अपने को पूरी तरह तैयार करना चाहता था। अब तैयार हूं।’
राजनीतिक कर्मभूमि :
वरुण गांधी पिछली बार पीलीभीत से सांसद चुने गए थे और अच्छे बहुमत से जीते थे, लेकिन चुने जाने के चंद महीनों के भीतर ही उन्होंने सुलतानपुर में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। शायद इस क्षेत्र को वे अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाना चाहते हैं। इसीलिए दिल्ली में रहते हुए भी वह सुलतानपुर के लोगों से संपर्क बढ़ाते रहे हैं। मेल-मुलाकात में सुलतानपुर के लोगों को प्राथमिकता दी है। पिछले कुछ महीनों में इस काम में और तेजी आई है। अपने प्रतिनिधियों और सर्वेक्षण एजंसियों के जरिए उन्होंने सुलतानपुर में संभावनाएं टटोलीं। अब  उनके स्टाफ के करीब डेढ़ दर्जन लोगों ने यहां डेरा डाल रखा है और पूरी तरह से चुनाव प्रचार में लग गए हैं। सुलतानपुर जिला मुख्यालय पर वरुण गांधी के नाम के पोस्टर और होर्डिंग लगा दिए गए हैं। स्टाफ वालों ने स्थानीय इकाई के नेताओं के साथ बराबर संपर्क बना रखा है। 16 मई की रैली में भी स्थानीय नेताओं की अच्छी खासी जमात मौजूद रही। इनमें एमएलसी डॉ. महेंद्र सिंह, विधायक उपेंद्र   तिवारी, विधायक सावित्री फूले, सीमा द्विवेदी, रामनाथ कोरी, रामपति त्रिपाठी, देवेंद्र सिंह चौहान, लक्ष्मण आचार्य, मोती सिंह, ओम प्रकाश पांडेय, डॉ. आरए वर्मा, नगर पालिका अध्यक्ष प्रवीण कुमार वर्मा, अर्जुन सिंह, विजय बहादुर पाठक, मनीष शुक्ला, जगजीत सिंह छंगू, अखिलेश जायसवाल, लोकसभा प्रत्याशी अमेठी प्रदीप सिंह, थौरी धीरज पांडेय, दिलीप पांडेय, श्रीप्रकाश सिंह, वीरेंद्र बहादुर सिंह, संजय सिंह सोमवंशी, जिला मीडिया प्रभारी विनय सिंह आदि शामिल रहे।   
विरासत के पीछे संघर्ष की पृष्ठभूमि :
सुलतानपुर के एक ओर अयोध्या है, तो दूसरी ओर अमेठी। वरुण ने 2009 के चुनाव में हिंदुत्व के मुद्दे को उभारने की कोशिश की थी। अयोध्या से इसकी संगत बैठती है। जबकि इसी जिले की अमेठी गांधी परिवार की उस विरासत का प्रतीक है, जहां से परिवार के रिश्तों की बुनियाद वरु ण के पिता दिवंगत संजय गांधी ने डाली थी। इस विरासत के पीछे वरु ण से पहले की पीढ़ी के संघर्ष की पृष्ठभूमि भी है। संजय गांधी ने 1977 में अमेठी से पहला चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में वे हार गए थे। 1980 में वे अमेठी से ही जीते, लेकिन जल्दी ही एक हवाई दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। इसके बाद संजय गांधी की पत्नी अमेठी में पति की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की इच्छुक थीं, लेकिन सास इंदिरा गांधी ने विधवा बहू मेनका गांधी के दावे को दरिकनार कर विमानन कंपनी की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अपने बडेÞ बेटे राजीव गांधी को अमेठी में उपचुनाव लड़ाया। वे 1981 का यह उपचुनाव आसानी से जीत भी गए। विद्रोह पर उतारू मेनका ने अपनी सास का घर छोड़ने के बाद अमेठी का रु ख कर लिया। 1984 के चुनाव में उन्होंने यहां आकर अपने जेठ राजीव गांधी को असफल चुनौती दी थी। पराजय की पीड़ा इतनी गहरी थी कि मेनका फिर कभी सुलतानपुर-अमेठी नहीं आर्इं।
आक्रमण की धार तेज : ढाई दशक बाद मेनका के बेटे वरु ण ने 2009 में भी सुलतानपुर के उसी खुर्शीद क्लब में सभा की, जहां उनकी मां मेनका ने अपने परिवार को चुनौती देते हुए पहली सभा की थी। अपने परिवार से नाराज मेनका के स्वर और आरोप बेहद तीखे हुआ करते थे, लेकिन वरु ण ने पिछली बार जब यहां सभा की थी, तो वे संतुलित और संयमति थे। इसके बावजूद राहुल-सोनिया का नाम लिए बिना उन पर कटाक्ष करने से नहीं चूके, ‘वीआईपी इलाकों में वैसे विकास कार्य नहीं हुए हैं जैसे होने चाहिए थे। प्रतिनिधि जनता के सेवक हैं और उनसे काम का हिसाब लिया जाना चाहिए।’ वरु ण अब सुलतानपुर से लडेंÞगे, तो आक्र मण की धार और तेज हो सकती है। वे अपनी मां द्वारा बीच में छोड़ी लड़ाई का अगला चरण शुरू कर रहे हैं। पड़ाव भले सुलतानपुर है, लेकिन निशाने पर अमेठी-रायबरेली है। पिछले लोकसभा चुनाव 2012 में सुलतानपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार की हैसियत से अमेठी के युवराज संजय सिंह जीते थे। आजकल पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। उनका मानना है कि कांग्रेसियों ने जान-बूझकर अमिता सिंह को हराया है। कांग्रेस व संजय सिंह के बीच पनपी इस खटास का फायदा भाजपा वरुण को सुलतानपुर लोकसभा क्षेत्र से उतार कर उठाना चाहती है।
अंधा कानून या वरुण की दबंगई? 
चार साल पहले 2009 के चुनाव में भाजपा नेता वरुण गांधी के एक भाषण ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया था। उन पर सात और आठ मार्च 2009 को पीलीभीत जिले के डालचंद और बरखेड़ा में भड़काऊ भाषण देने का केस दर्ज हुआ। कई दिनों तक वे सलाखों के पीछे भी रहे। अब चार साल बाद 33 साल के वरु ण गांधी बेदाग हैं। लेकिन कोर्ट में जो गवाह पलट गए थे, उन्हीं गवाहों ने एक स्टिंग आॅपरेशन में यू-टर्न लेते हुए खुलासा किया है कि कैसे केस का गला घोंटा गया और वरु ण सबूत के अभाव में बेदाग बरी हो गए।
कोर्ट में बेशक इस आरोप का कोई गवाह नहीं मिला कि वरु ण गांधी ने वाकई 2009 में डालचंद और बरखेड़ा में नफरत फैलाने वाला भाषण दिया, लेकिन स्टिंग आॅपरेशन में साफ हो चुका है कि न सिर्फ वरु ण ने जहर उगलने वाला भाषण दिया था, बल्किमुकदमे से बेदाग बचने के लिए पूरी न्याय प्रक्रि या को तोड़-मरोड़ डाला। वरु ण ने न्याय प्रक्रि या को इस हद तक प्रभावित किया कि इन दोनों केस   के अलावा दूसरे कुछ मामलों के सभी 88 गवाह मुकर गए। गवाहों के मुताबिक बयान बदलवाने में एसपी अमति वर्मा की अहम भूमिका रही। स्टिंग आॅपरेशन से यह भी जाहिर हुआ है कि खुद को बेदाग बचाने के लिए वरु ण ने यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हरवा दिया, ताकि समाजवादी पार्टी का नेता चुनाव जीत सके और केस से बचने में उनकी मदद कर सके। यह अंधा कानून है या फिर वरुण की दबंगई, जो साम-दाम-दंड-भेद तमाम हथकंडे अपनाकर केस से बेदाग बरी हो गया?
चरम पर है गुटबाजी



भाजपा ने 2014 का चुनाव जीतने के लिए एक खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। पूरे प्रदेश को पूर्वांचल, मध्य भाग, पश्चिम और बुंदेलखंड सहित कई हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से से पार्टी अपने कम-से-कम एक ऐसे चेहरे को लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहती है, जिसके नाम पर उस सीट पर तो वोट मिले ही, आस-पास की सीटों पर भी वे दूसरे भाजपा प्रत्याशियों को जिताने में मदद कर सकें। लेकिन 2014 के चुनाव के लिए भाजपा जहां एक ओर उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत लगा रही है, वहीं आपसी गुटबाजी पार्टी की पूरी कवायद पर पानी फेरने को तैयार बैठी है। राजनाथ सिंह की अगुवाई में घोषित कार्यकारिणी को एक धड़ा चाटुकारों की फौज, कमजोर व परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली करार दे रहा है। कार्यकारिणी में राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, लाल जी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह और प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार को पद मिलने से भी बहुत लोग नाराज हैं। प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के समय कार्यकारिणी में जो लोग शामिल थे, उनमें से अधिकांश को इस कार्यकारिणी में जगह नहीं मिली है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं है, जो थोड़ी-बहुत नाराजगी है, चुनाव से पहले वह ठीक हो जाएगी।’

                                क़ैदी का खत


सलाम! हम भी इंसान हैं और देशभक्त शहरी भी जो नापाक साजिशों के तहत दहशतगर्दी के आरोप में ज़बरदस्ती फंसाए गए बेकसूर हैं. आज हम लोग बेइन्तहां जुल्म से परेशान होकर आपस में आत्महत्या और उसकी जायज गुंजाइश के बारे में एक दूसरे से पूछने लगे हैं. हमारे खिलाफ़ होने वाली अमानवीयता (जो जेल अधिकारियों की आपराधिक मानसिकता के कारण है) ने हमें इस क़दर मायूस कर दिया है कि आत्महत्या ही आखिरी विकल्प लगने लगा है.
हममें से सभी को अपने-अपने घरों, बाजारों, खेतों से, राह चलते हुए गैर-कानूनी कैद कर अगवा करके, गैर कानूनी हिरासत में रखकर भयानक हिंसा के ज़रिए कहानियां गढ़कर लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव या फिर अन्य दूसरी जगहों से कई-कई दिन बाद गैरकानूनी सामानों के साथ गिरफ्तारियां दिखाकर लंबी-लंबी पुलिस हिरासत में लेकर सुबूत गढ़ने के बाद सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया. सुरक्षा के नाम पर हाई-सेक्योरिटी के नाम पर बने कमरों में ठूंसकर बेपनाह उत्पीड़न पहले भी किया गया और आज भी इरादतन साम्प्रदायिक तौर पर जारी है.
सीलन भरी अंधेरी, बेरोशनदान वाली आठ गुणे बारह की छोटी सी सेल में लगातार बंद रखा जाता, एक मिनट के लिए भी न खोला जाता. तेरह जून 2008 दिन शुक्रवार को जुल्म का नंगा नाच करते हुए हमें चमड़े के हंटरों और लाठियों से हमारे जिस्मों को फाड़ा और तोड़ा गया. पवित्र कुरान को अपवित्र किया गया, उसके पन्ने फाड़कर शौचालय में फेंका गया.
हमारे सारे कपड़े, चादर, किताबें जप्त कर ली गईं, बल्कि शुरु के ही दिनों में कपड़ों पर पाबन्दी लगा दी गई कि सिर्फ दो जोड़े कपड़े, एक लुंगी, एक तौलिया यहां तक की अण्डरवियर भी दो से ज्यादा रखने की इजाज़त न दी जाती थी. तंग होकर हमने लंबी भूख हड़ताल, खाने-पीने का मुकम्मल बाईकाट विरोध के बतौर किया. तब 27 जनवरी 2009 से आधा घंटा के लिए पत्थर की ऊंची दीवारों वाले इतने छोटे से बरामदे में खोला जाने लगा जिसमें से 12 बजे के बाद से ही धूप गायब हो जाती और हरियाली का तो नामों निशान तक नज़र नहीं आता.
दिसम्बर 2011 से बहुत दरख्वास्त करने पर एक घंटे के लिए खोला जाने लगा. पता होना चाहिए कि जेल के रजिस्टर में हमें बाकी कैदियों की तरह मैनुवल के लिहाज से खुला ही दिखाया जाता है, जबकि हम यहां लगातार बंद रखे जाते हैं. लगातार बंद रहने की वजह से यहां लोग बीमार रहने लगे हैं. जबकि कई तो डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं, याददाश्त प्रभावित हो चुकी है. और कईयों की आंखे कमजोर होने लगी हैं.
कई साल से ऊपर हो गए होंगे जेल मुआयना पर आने वाले मजिस्ट्रेट को हाई-सेक्योरिटी तशरीफ लाए हुए. बड़े अफसरान और ऑथोरिटीज को हाई सेक्योरिटी नहीं लाया जाता कि हम शिकायत न कर दें. हमारी दरख्वास्तें ऑथोरिटीज को नहीं फॉरवर्ड की जाती कि कहीं हमें इंसानी हुकूक देने को न कह दिया जाय. सुप्रीम कोर्ट की बकायदा हिदायत है कि किसी भी अण्टर ट्रायल को कैद कर तनहाई में न रखा जाय. सजायाफ्ता को भी सिर्फ तीन माह तनहाई में रखे जाने की गुंजाइश है. हमारे साथ गैरकानूनी, गैरइंसानी और आपराधिक बर्ताव क्यों रखा जाता है, जबकि हम साजिशन फंसाए गए बेकसूर नागरिक हैं.
साथियों ऐसे में अधिकारियों की तंग नजरी, बड़े ऑथोरिटीज तक पहुंच न हो पाने, मुक़दमों का जल्द फैसला न हो पाने और ज़रुरत की दवाओं के न मिल पाने की वजह ने बहुतों को बहुत मायूस कर दिया है. जिसकी वजह से कुंठा व बेचैनी से मजबूर होकर आत्महत्या के जायज़ होने या गुंजाइश होने का मसला अक्सर होने वाली बातचीत में मुझसे पूछा जाता है. साजिशों में फंसाए गए इन लोगों को कैसे समझाया जा सकता है. जबकि ये परेशान कैदी जब थोड़ी देर खुले में ताजा हवा या धूप खाने और बीमारियों के सही इलाज की दरख्वासत करते हैं कि सर ऐसे तो हम मर जाएंगे तो हंसी उड़ाते हुए कहा जाता है कि मर जाओ हमें क्या फर्क पड़ता है, सुसाइड कर लो. हम जवाब दे लेंगे और जहां चाहे शिकायत कर लो हमें फर्क नहीं पड़ता.
यहां के लोगों और खुद अपनी बेबसी देखकर, प्रशासन का रवैया देखकर दिल हिल जाता है. रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हम हिन्दोस्तान की जेल में हैं या अंग्रेजों की. हम किसी सेकूलर स्टेट में हैं या कम्यूनल स्टेट में. हम आपसे मदद के प्रार्थी हैं. हुकूमती सतह पर या बड़ी अदालतों और ऑथोरिटीज के ज़रिए इन्सानी हुकूक़ के खिलाफ़ हो रहे कार्यवाइयों पर लगाम लगाया जा सकता है. मेहरबानी करके नफ़रत की इस भट्टी में सिसकती, बिलखती इंसानियत को बचाने के खातिर देश की मज़बूती व तरक्की के खातिर हम बेबसों की तरफ ध्यान दीजिए. क्योंकि इंसाफ़ से मुल्क व हुकूमत को मज़बूती मिला करती है.
द्वारा-
मोहम्मद तारिक कासमी
कैदी हाई सेक्योरिटी,
सी ब्लाक जिला जेल
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
22 सितम्बर 2012
Mohd Kamran के फेसबुक वॉल से.

सोमवार, 22 अप्रैल 2013


हैवानियत

नन्हीं-सी जान और दो-दो शैतान! न दया आई, न ही दिल पसीजा। हैवानियत की सारी हदें पार कर गए दरिंदे। आंखों का पानी तो पहले ही मर चुका था, इंसानियत का भी कत्ल कर डाला! रही-सही कसर पुलिस ने बच्ची के बाप को दो हजार रुपये देने की पेशकश कर पूरी कर दी! लानत है ऐसी पुलिस पर, जो वर्दी को शर्मसार कर दे!


पांच साल की बच्ची के साथ हैवानियत! दहल उठी दिल्ली! सदमे में हैं देश के प्रधानमंत्री! कांप उठा मां का कलेजा। हिल गए लोग, लेकिन दुष्कर्मियों के न हाथ कांपे और न ही दिल पसीजा। बहते रहे आंसू, सिसकती रही मासूम। तब भी जालिमों को तरस नहीं आया, दबोच लिया भूखे भेड़िये की तरह। रौंद डाली सारी मासूमियत। तोड़ते रहे कहर। ढाते रहे सितम। लहूलुहान हो गई इंसानियत! बेहोश हो गई बच्ची! भूखी-प्यासी 40 घंटे बंद रखा कमरे में। हवा तक नहीं लगने दी बाहर की। उफ्! कितना दर्द बर्दाश्त किया होगा उसने। वह भी महज पांच साल की उम्र में। दो दिन बाद बड़ी मुश्किल से मां का सामना हुआ, तो खून से लथपथ थी मासूम। जिस्म का अंग-अंग जख्मी था उसका। पर, हाय री दिल्ली पुलिस, इस पर भी उसका रवैया हैरान करने वाला रहा। इस बात का एहसास होते ही कि मामला मीडिया में जा सकता है और फिर होगी हमारी छीछालेदर, बच्ची को दिल्ली के एक कोने में बने नगर निगम के अस्पताल में ले जाकर दाखिल करा दिया, ताकि पता न चले किसी को। एक पुलिसकर्मी ने लड़की के पिता को दो हजार रुपये देने की कोशिश की। उसका कहना था, ‘खर्चा-पानी दे रहा हूं। किसी से कुछ बताओगे, तो मुफ्त में बदनाम हो जाओगे। चुप रहने में ही बेहतरी है।’ पिता की आंखें भर आइं- ‘क्या तुम्हारी बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म करता, तब भी तुम मामला रफा-दफा करने की कोशिश करते?’ कितनी शूरमा है दिल्ली पुलिस! हैवानों के आगे घुटने टेक देती है, लेकिन पीड़ित से सौदा करने में कभी नहीं चूकती! इतना भी नहीं सोचा कि अगर पुलिस ही इंसाफ के दरवाजे पर ताला लगाकर बैठ जाएगी, तो कैसे बचेगी लोकतंत्र की इज्जत? बेदिल ही नहीं, बेदर्द भी है दिल्ली पुलिस।
वाकया 15 अप्रैल 2013 का है। पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर इलाके में मासूम गुड़िया का परिवार रहता है। पिता पेशे से बेलदार है और चाचा मेहनत-मजदूरी करता है। प्रथम तल पर किराए का कमरा ले रखा है। गरीबी में ही गुजर-बसर होता है। वारदात की शाम पांच साल की गुड़िया अपने दरवाजे पर खेल रही थी, तभी भूतल पर रहने वाला मनोज (22) आ गया। मासूम को देखते ही उसके दिमाग का शैतान नाचने लगा। वह बहला-फुसलाकर उसे अपने कमरे में ले आया। अगवा कर लिया बच्ची को। कमरे में उसका दोस्त प्रदीप भी था। दोनों ने गुड़िया के साथ दो दिन तक कई बार रेप किया। तब भी मन नहीं भरा, तो बच्ची के प्राइवेट पार्ट में दो मोमबत्तियां और सौ मिलीलीटर तेल की सीलबंद एक शीशी डाल दी। बेचारी दर्द से बिलबिला उठी, लेकिन हैवानों को उस पर तरस नहीं आया। बच्ची की छाती, होंठ और गालों पर दांत काटने के कई निशान हैं। गला दबाने और चाकू से गर्दन काटने की कोशिश भी की गई। बच्ची बेहोश हो गई। शैतानों ने सोचा, शायद बच्ची खत्म हो गई और दोनों आरोपी बाहर से दरवाजे पर ताला लगाकर फरार हो गए। गुड़िया के माता-पिता बेटी को खोज-खोजकर परेशान थे। पूरा दिन बीत गया। सारा गली-मोहल्ला छान मारा। समझ में नहीं आ रहा था कि नन्हीं-सी जान को धरती निगल गई या आसमान। रात करीब साढ़े आठ बजे बच्ची की मां थाना गांधीनगर पहुुंची। एसएचओ धर्मपाल सिंह और सब-इंस्पेक्टर महावीर सिंह, दोनों थाने में मौजूद थे। मां उनके आगे रोने लगी, ‘साहब! मेरी फूल-सी बच्ची न जाने कहां गायब हो गई। बहुत तलाश किया, लेकिन कुछ पता नहीं चल रहा है।’ पुलिस ने बड़ी हिकारत से एक नजर उसे देखा, फिर झिड़कते हुए कहा, ‘तो यहां क्यों चली आई? पुलिस कोई जादू की छड़ी है क्या कि घुमाया और लड़की मिल गई! जाओ, खुद ही तलाश करो।’ उसी समय गुड़िया के पिता और चाचा भी थाने आ पहुंचे। वे भी बार-बार पुलिसवालों से हाथ-पांव जोड़ते रहे। बड़ी मुश्किल से रात करीब 10 बजे थानेदार का दिल पसीजा। उसके आदेश पर अपहरण का मामला दर्ज कर लिया गया। घटना की तफ्तीश सब-इंस्पेक्टर महावीर सिंह को मिली, लेकिन महावीर ने मौके पर जाकर छानबीन करने की जरूरत नहीं समझी। उन्होंने परिजनों को बच्ची को तलाशने की हिदायत देकर घर भेज दिया। गोया एफआईआर लिख ली और तफ्तीश भूल गए। अगले रोज भी बच्ची का कुछ पता नहीं चला, न ही कोई पुलिस वाला पीड़ित परिवार के घर पूछताछ करने आया। मां-बाप बेटी को लेकर हलकान रहे। पूरी रात आंखों-आंखों में काट दी। तीसरे दिन भी मां का कलेजा बच्ची को लेकर कचोटता रहा, ‘न जाने कहां है गुड़िया? किस हाल में होगी हमारी बेटी?’ तभी पड़ोसी मनोज के कमरे से लड़की के रोने की आवाज सुनकर उसका कलेजा मुंह को आ लगा- ‘यह तो मेरी बेटी है!’ मां के सीने पर दोहत्थड़ बजने लगे। छाती-कपार पीटते हुए उसने सारा मोहल्ला इकट्ठा कर लिया। पिता ने फोन पर मामले की सूचना पुलिस को दी। तब भी सब-इंस्पेक्टर महावीर सिंह मौके पर नहीं गए। लोगों ने मनोज के कमरे का ताला तोड़ दिया। सामने गुड़िया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी। काटो तो खनू नहीं, सब के सब अवाक् रह   गए। मां-बाप की पीड़ा का पारावार न था। फूट-फूटकर रोने लगे परिजन। पुलिस को हालात से अवगत कराया गया। एसएचओ के निर्देश पर बच्ची को दिलशाद गार्डन स्थित स्वामी दयानंद अस्पताल में ले जाकर भर्ती करा दिया गया। यहां के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरएन बंसल ने बताया कि बच्ची की हालत बहुत नाजुक थी। उसकी तत्काल सर्जरी की गई। प्राइवेट पार्ट से मोमबत्तियों के टुकड़े और पेट में सौ मिलीलीटर तेल की एक शीशी निकली। बच्ची के पेट में भी संक्रमण पाया गया है। इस बीच दुष्कर्म की यह घटना जो ही सुनता, आक्रोश में मुट्ठी ताने विरोध करने दयानंद अस्पताल पहुंचने लगा। लोगों ने हंगामा और प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। ‘आप’ के तमाम कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर पुलिस के विरोध में नारे बुलंद करने लगे। करवां बढ़ता गया और विरोध भी। लोगों की मांग थी कि आरोपी को फौरन गिरफ्तार किया जाए और बच्ची को किसी बड़े अस्पताल में रेफर किया जाए, लेकिन पुलिस और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। 19 अप्रैल को जब मामला हाथ से निकलने लगा, तो दिल्ली सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ. एके वालिया, किरण वालिया और कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित बच्ची को देखने दयानंद अस्पताल पहुंचे। आक्रोशित लोगों ने इनका जमकर विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने किरण वालिया को गाड़ी से बाहर नहीं निकलने दिया। डॉ. वालिया और संदीप दीक्षित के साथ धक्का-मुक्की की गई। वहीं, अब तक इस मामले में दिल्ली पुलिस का चेहरा बेनकाब हो चुका था। प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच मौजूद इलाके के एसीपी बनी सिंह अहलावत दोषी पुलिसकर्मियों को बर्खास्त करने की मांग सुनकर तिलमिला उठे। उन्होंने प्रदर्शन कर रही ‘आम आदमी पार्टी’ की कार्यकर्ता बीनू रावत को दो झापड़ रसीद कर दिए। तब तो लोगों का गुस्सा और फूट पड़ा। थाना गांधीनगर से लेकर अस्पताल तक विरोध करने वाले सड़क पर उतर आए। डॉ. वालिया सहम गए। उनके आदेश पर तुरंत बच्ची को दयानंद अस्पताल से एम्स रेफर कर दिया गया। एम्स के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डीके शर्मा के अनुसार, दुष्कर्म पीड़ित बच्ची को तत्काल एबी-5 की पांचवीं मंजिल पर आईसीयू में शिफ्ट किया गया। इलाज के लिए डिपार्टमेंट आॅफ गायनकोलॉजी, पीडियाट्रिक सर्जरी, पीडियाट्रिक मेडिसन और डिपार्टमेंट आॅफ एनेस्थेसिया के चार डॉक्टरों की टीम बनाई गई। इस बीच लोगों के बढ़ते विरोध व आक्रोश को देख-सुनकर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के भी हाथ-पांव फूल आए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घटना पर हैरानी जताते हुए दिल्ली के उपराज्यपाल से बात की और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने पर जोर दिया। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी मामले की समीक्षा की। उसके बाद पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार को कुछ दिशा-निर्देश दिए। दिल्ली पुलिस मुख्यालय में हड़कंप मच गया। रात करीब आठ बजे पुलिस कमिश्नर के घर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक बैठक हुई, जिसमें विशेष पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) दीपक मिश्रा भी शामिल थे। रात लगभग नौ बजे मीटिंग समाप्त होने के पश्चात पुलिस मुख्यालय में पूर्वी दिल्ली के डीसीपी प्रभाकर ने पत्रकारों को बताया कि एसीपी बीएस अहलावत को दुर्व्यवहार के मामले में निलंबित कर दिया गया है। रेप केस में लापरवाही बरतने वाले थाना गांधीनगर के एसएचओ धर्मपाल सिंह और मामले के विवेचनाधिकरी  महावीर सिंह को सस्पेंड कर दिया गया है। साथ ही पीड़ित परिवार को दो हजार रुपये देने की कोशिश के मामले की जांच विजिलेंस शाखा को सौंप दी गई है। इसके अगले रोज 20 अप्रैल को दिल्ली पुलिस की टीम ने आरोपी मनोज (22) को बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित थाना करजा के चिकनौटा गांव में उसकी ससुराल से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी ने पुलिस पूछताछ में गुड़िया के साथ गुनाह करने का जुर्म कबूल कर लिया है। 22 अप्रैल 2013 को इस मामले के दूसरे आरोपी प्रदीप को भी पुलिस ने बिहार के लखीसराय से गिरफ्तार कर लिया। वह अपने मामा के घर बढ़ैया गांव में छिपा था। प्रदीप मूल रूप से दरभंगा बिहार का रहने वाला है। दोनों अब तिहाड़ जेल में हैं। लेकिन दुष्कर्म की इस घटना के विरोध में लोगों का विरोध जारी है। पुलिस मुख्यालय और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निवास पर लोगों का लगातार धरना-प्रदर्शन जारी था। उनकी मांग है, पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार इस्तीफा दें। भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने आरोपी को फांसी देने की मांग की है। इसके बावजूद अपराधियों के हौंसले बुलंद हैं। राजधानी में रेप की घटनाएं थमने का नाम ले रही हैं।

शातिर दिमाग है मुलजिम
आरोपी मनोज मूल रूप से ग्राम भरथुआ थाना औराई जिला मुजफ्फरपुर बिहार का रहने वाला है। उसके दो भाई और चार बहने हैं। मनोज के पिता बिंदेश्वर शाह दिल्ली के ओल्ड सीलमपुर इलाके में फ्रूट जूस की रेहड़ी लगाते हैं, जबकि मनोज एक फैक्ट्री में मजदूरी करता था। करीब साल भर पहले इसने गांव में लव मैरिज की थी। पत्नी गांव में ही रहती है। मनोज को इसके पहले भी वर्ष 2010 में थाना गांधीनगर पुलिस ने बिना इजाजत किसी के घर में घुसने के मामले में गिरफ्तार किया था। उस वक्त करीब सवा महीने वह जेल में रहा था। वह बहुत शातिर दिमाग है। मुजफ्फरपुर में भी मनोज के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज हैं। बेटे की हरकतों से तंग आकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। इसके बाद उसने पीड़ित के घर के पास किराए पर कमरा लिया था। घटना की शाम मनोज ने दोस्त प्रदीप के साथ अश्लील फिल्म देखी और  दोनों ने शराब भी पी थी। उसके बाद दोनों ने  मासूम के सथ रेप किया। दोनों आरोपियों ने पूछताछ में गुनाह कबूल कर लिया है।
प्रभाकर, डीसीपी, पूर्वी दिल्ली

तारीख बदली तकदीर नहीं
16 दिसंबर को दिल्ली में हुई दामिनी गैंगरेप की घटना से भी दिल्ली पुलिस ने कोई सबक नहीं सीखा। आपको याद होगा पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार साहब, आपने उस वक्त कहा था कि ‘हर कंप्लेंट पर कार्रवाई की जाएगी।’ दिल्ली के लोगों से वादे किए थे, सड़क पर पूरी फोर्स उतरेगी। बिस्तर से उठकर पुलिस अफसर सुरक्षा में लगेंगे। तारीख बदली, दिन बदले, लेकिन तकदीर नहीं बदली। पहले दामिनी शिकार बनी थी और अब गुड़िया! उस रोज 16 दिसंबर था और आज 15 अप्रैल। दरिंदगी की कहानी वही है और पुलिस कमिश्नर भी आप ही हैं। गुस्सा तो बहुत आएगा आपको यह पढ़कर कि आपकी पुलिस के निकम्मेपन की कहानी हम बता रहे हैं। क्या करें, हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जाता कमिश्नर साहब! न तो आपकी पुलिस ने उस घटना से कोई सबक लिया और न ही दिल्ली में जुर्म कम हुआ। उस पिता से क्या कहें कमिश्नर साहब, जिसकी बेटी के साथ रेप हुआ और पुलिस उसी पर मामले को दबाने का दबाव बनाती रही। छह घंटे तक मां को इस कोशिश में थाने में बिठाए रखा कि शायद अब भी मामला रफा-दफा हो जाए?

लापरवाही की हद कर दी
इस मामले पर केंद्र सरकार को सख्त कदम उठाना चाहिए। दिल्ली पुलिस महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अत्याचार पर रोक लगाने में अक्षम रही है। लापरवाही की हद कर दी है।
-ममता शर्मा, अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग

उच्चस्तरीय जांच की मांग
पीड़ित बच्ची के परिजनों ने पुलिस पर रिश्वत देने का जो आरोप लगाया है, वह अपने आपमें शर्मनाक है। इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।
-बरखा सिंह, अध्यक्ष, राज्य महिला आयोग
-जितेंद्र बच्चन

सोमवार, 15 अप्रैल 2013


हवालात की हकीकत

यूपी पुलिस की एक और काली करतूत! महिला पुलिस ने ही मासूम पर ढाया जुल्म! मांगा न्याय, मिली हवालात! भ्रष्ट पुलिस का अमानवीय चेहरा बेनकाब! पूरी रात आरोपी के परिजनों से होती रही सौदेबाजी! बात नहीं बनी, तो दबंग दारोगा ने पीड़ित बच्ची को ही हिरासत में ले लिया! क्या है हकीकत? बुलंदशहर से लौटकर खोजपरक रिपोर्ट...


      उत्तर प्रदेश पुलिस का घिनौना चेहरा! वर्दीधारी गुंडों की करतूत! क्र ाइम कंट्रोल के नाम पर बुलंदशहर पुलिस ने लगाया अखिलेश सरकार को पलीता! रोंगटे खड़े कर देने वाले दिल्ली के सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद भी पुलिस के रवैए में कोई सुधार नहीं आया है। रेप के कानून में कड़े प्रावधान के पश्चात भी पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझती है। बुलंदशहर में दलित बच्ची के साथ हुई घटना ने साबित कर दिया है कि समाज का कमजोर तबका आज भी सुरक्षा के साथ सम्मान का जीवन जीने को दूभर है। दस साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ था। उसकी हालत खराब थी। बेटी के साथ मां मामला दर्ज कराने थाना कोतवाली पहुंची, तो पहले पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं की। बाद में दोनों को रात भर कोतवाली में बिठाए रखा। इस बीच बच्ची का डॉक्टरी परीक्षण भी नहीं कराया। मुसीबत तब और बढ़ गई, जब बच्ची को महिला थाने भेज दिया। वहां भोर में महिला पुलिसकर्मियों ने लड़की के परिजनों को कुछ रुपये दिलाने की बात कहकर मामला दर्ज न कराने को कहा। तब भी पीड़ित पक्ष नहीं माना, तो उन्हें गालियां दी गईं और मासूम बच्ची को ही हवालात में डाल दिया।
 समाज और कानून को ठेंगा दिखाने वाला यह वाकाया 7 अप्रैल, 2013 का है। आठ अप्रैल की सुबह पुलिस की यह शर्मनाक करतूत जंगल में लगी आग की तरह फैलते देर नहीं लगी। शहर में बवाल मच गया। करतूत मीडिया की सुर्खियां बनने लगीं। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर के नेतृत्व वाली पीठ ने 10 अप्रैल को स्वत: इस मामले पर संज्ञान लेते हुए नाराजगी जताई और उप्र सरकार को नोटिस देकर पूछा है कि पुलिस दस वर्षीय लड़की को हिरासत में कैसे रख सकती है?
बुलंदशहर का मीरपुर गांव लोधी बहुल है। मुख्यालय से 22 किमी दूर और हाईवे से महज तीन किमी पूर्व में बसे इस गांव की आबादी करीब 1600 है। गांव में चार घर जाटवों के हैं, बाकी 146 घर लोध राजपूत के हैं। जाटवों में ही एक परिवार 47 वर्षीय रामलाल (परिवर्तित नाम) का है। दलित समुदाय के रामलाल की जिंदगी हमेशा दुश्वारियों और किल्लत से भरी रही। उसके दस बच्चे हैं। चार लड़के और छह लड़कियां। पत्नी का नाम इमरती देवी (परिवर्तित नाम) है। दो कमरों के एक घर में बड़ी मुश्किल से पूरे परिवार का गुजर-बसर होता है। खुद रामलाल किराने की एक दुकान पर 200 रुपये रोज की दिहाड़ी पर काम करता है। सबसे बड़ा बेटा मामचंद (परिवर्तित नाम) 25 साल का है। उसकी शादी हो चुकी है। मेहनत-मजदूरी करके घर-गृहस्थी में हाथ बंटाता है, लेकिन आजकल पीलिया से पीड़ित है। तमाम जगह की खाक छानते हुए जब हम पीड़ित लड़की के घर पहुंचे, तो बच्ची के कई नाते-रिश्तेदार मौजूद थे। दरवाजे पर दो पुलिसकर्मी पहरा दे रहे थे। उन्होंने मुझे तिरछी नजरों से घूरा- लो, एक और मीडिया वाले आ गए!
लड़की की मां और बहनों का रो-रोकर बुरा हाल था। थोड़ी देर पहले ही एक महिला डॉक्टर बच्ची को दवा आदि देकर गई थी। बच्ची एक कंबल ओढ़कर घर की कच्ची फर्श पर लेटी हुई थी और अब भी उसकी हालत ठीक नहीं थी। हमारे कैमरामैन को देखते ही घर की ड्योढ़ी पर बैठी कुछ महिलाओं की आंखें भर आर्इं। गोया न्याय मिलने की आस फिर से जाग उठी हो। जितने मुंह उतनी बात, ‘देखिए साहब जी, दबंगों ने इस बच्ची के साथ कितनी जोर-जबरदस्ती की है?’ मां के एक-एक आंसू दुष्कर्म और पुलिसिया अत्याचार की कहानी बता रहे थे। वैसे यह परिवार हमेशा से गांव के दबंगों के निशाने पर रहा है, लेकिन 7 अप्रैल की शाम करीब साढ़े छह बजे जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। बच्ची गांव में ही किराने की दुकान से कुछ सामान लेने गई थी। वहां से लौटते समय गांव के ही हरेंद्र लोध की नजर उस पर पड़ गई। लड़की के साथ छह साल की उसकी भतीजी भी थी। उसी ने कुछ देर बाद आकर इमरती देवी को बताया कि गांव का हरेंद्र लड़की को जबरन खींचकर खेतों में ले गया है। वहां भिटौर (उपलों का ढेर) की आड़ में उसके साथ गलत काम कर रहा है।
इमरती देवी का कलेजा मुंह को आ लगा। वह करीब-करीब दौड़ती हुई घर से बाहर निकली। खेतों के बीच पतली-सी सड़क पर उसकी मासूम बच्ची बेहोशी की हालत में पड़ी थी। उसके चेहरे और पूरे शरीर पर काटने और जख्म के निशान थे। बेटी की दुर्दशा देखकर मां का कलेजा कचोटने लगा। वह छाती-कपार पीटती हुई चीखने-चिल्लाने लगी। पास-पड़ोस के तमाम लोग जुट आए। जैसे-तैसे बेहोश बेटी को घर लाया गया। गांव के ही एक-दो लोगों ने मामले की खबर पुलिस को दी, लेकिन कोई नहीं आया। गुस्साए परिजनों ने पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।
इमरती देवी के अनुसार, गांव के कई राजपूतों ने उसका घर घेर लिया। दबंगों का कहना था कि लड़की की जो भी कीमत है, उसे लेकर मामला यहीं रफा-दफा कर दो। थाना-पुलिस करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट-कचेहरी में लड़की ने मुंह खोला, तो उसे पत्थरों से   मार-मारकर हम उसकी जान ले लेंगे, लेकिन परिजन साहस बटोरकर रात करीब 9 बजे पीड़ित बच्ची के साथ थाना कोतवाली पहुंच गए। इंस्पेक्टर कवींद्र नारायण मिश्र कोतवाली में मौजूद नहीं थे। सेकंड अफसर सीनियर सब इंस्पेक्टर पीआर शर्मा से इमरती ने घटना के बारे में बताया। उन्हें लिखित में आरोपी हरेंद्र के खिलाफ एक तहरीर भी दी, लेकिन पुलिस मामला दर्ज न कर बड़े (कोतवाल) साहब के आने की बात कर समय जाया करती रही। साहब को न आना था और न ही आए, क्योंकि इंस्पेक्टर मिश्र उस रोज अवकाश पर थे। इस बीच बताया जाता है कि शर्मा का आरोपी पक्ष से भी संपर्क बना रहा। उनका इरादा शायद दबंगों से कुछ रुपये-पैसे दिलवाकर समझौता करवाना था, इसलिए रेप का केस दर्ज न कर मामले को टालते रहे।
रात करीब तीन बजे एसएसआई शर्मा पीड़ित बच्ची को महिला थाना ले गए, जो थाना कोतवाली के बगल में ही है। महिला थानाध्यक्ष गयाश्री चौहान और सब इंस्पेक्टर सरिता द्विवेदी कार्यालय में मौजूद थीं। इमरती देवी ने उनसे भी दुष्कर्म का मामला दर्ज करने की फरियाद की, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इमरती देवी बताती हैं कि महिला थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें खूब गालियां दीं, फिर उनकी बेटी को दो झापड़ मारकर हवालात में ठूंस दिया। मैं वहीं लॉकअप के बाहर बैठी रही। रात पहाड़ बन गई, बड़ी मुश्किल से बीती। सुबह 8 अप्रैल को लोगों को पता चला तो महिला थाना और कोतवाली पर भीड़ बढ़ने लगी। इस बीच महिला पुलिसकर्मियों ने जल्दी से पीड़ित बच्ची को हवालात से बाहर निकाल दिया।
लेकिन तब तक मीडिया के माध्यम से मामले की भनक एसएसपी गुलाब सिंह और पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय कुमार साहनी को लग चुकी थी। ये दोनों अधिकारी थाना कोतवाली आ गए। उन्होंने माना कि मामला संगीन है और विक्टिम को किसी भी स्थिति में हवालात में बंद नहीं किया जा सकता। उनके आदेश पर थाना कोतवाली पुलिस ने हरेंद्र लोध के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कर बच्ची को मेडिकल के लिए हॉस्पिटल भेज दिया। इसके थोड़ी देर बाद पुलिस ने मीरपुर निवासी दो बच्चों के पिता आरोपी हरेंद्र को गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट और जान से मारने की धमकी का भी आरोप है, लेकिन खुद हरेंद्र ने पुलिस के सामने ही रेप करने की बात से इंकार किया है। उसका कहना है, ‘घटना की शाम बच्ची उसके खेत में टमाटर तोड़ रही थी। उसने मना किया और उसे पकड़कर दो थप्पड़ मारे और वहां से भगा दिया। इसके अलावा उसने और कुछ नहीं किया।’ लेकिन इमरती देवी उस शाम का वाकया याद आते ही कांप जाती हैं। वह रुंधे गले से बताती हैं, ‘दबंग कहते हैं कि वे मरद हैं। मन मचल गया, तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा। असली कसूर तो तुम लोगों का है। क्यों लड़की को अकेली घर से बाहर भेजती हो? एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी! हमारा घर जलाने और बेटी कोे मारने की धमकी दे रहे हैं दबंग। गांव की पंचायत भी उन्हीं के साथ है। हम पर बराबर मुकदमा वापस लेने का दबाव डाला जा रहा है।’
8 अप्रैल को जिलाधिकारी जीएस प्रियदर्शी ने मामले की विस्तृत जानकारी मांगी, तो शाम तक एसएसपी गुलाब सिंह ने मामले को ठंडा करने की नीयत से महिला थाना की दो सिपाही नीरू और सोनिया को निलंबित कर दिया। सोचा था मामला दब जाएगा, लेकिन लोगों का विरोध लगातार जारी रहा, तो महिला थानाध्यक्ष गयाश्री चौहान और वहीं की एक सब इंस्पेक्टर सरिता द्विवेदी को भी लाइन हाजिर कर दिया गया। इन सभी पर पीड़ित बच्ची को लॉकअप में बंद करने का आरोप है। एसएसपी के अनुसार, 9 अप्रैल को डॉक्टरी रिपोर्ट मिली। मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि नहीं हुई है। इस मामले की विवेचना क्षेत्राधिकारी (नगर) वैभव नारायण मिश्र कर रहे हैं। 10 अप्रैल को प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) अरुण कुमार ने बताया कि पुलिस अधीक्षक (नगर) की रिपोर्ट पर लड़की को हिरासत में रखने के मामले में महिला पुलिस थाना प्रभारी गयाश्री चौहान और उपनिरीक्षक सरिता द्विवेदी को निलंबित कर दिया गया है। साथ ही इस संबंध में अज्ञात पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा भी दर्ज किया गया है।  लेकिन अब इस मामले ने सियासी रंग लेना शुरू कर दिया है। राजनीतिक दल सक्रि य हो गए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता संतोष जाटव 10 अप्रैल को मीरपुर गांव पहुंचे और पीड़ित परिवार से पूछताछ की। उनके अलावा और भी नेताओं के गांव पहुंचने का दौर जारी है।

कोतवाली पुलिस पर कार्रवाई क्यों नहीं की?



आईपीएस अधिकारी व एसपी (सिटी) अजय कुमार साहनी दुष्कर्म व पुलिस के खिलाफ दर्ज मामले की जांच कर रहे हैं। उन्होंने माना कि थाना कोतवाली (नगर) के सीनियर सब इंस्पेक्टर पीआर शर्मा और कुछ अन्य पुलिसकर्मी भी जांच के दायरे में हैं। पेश है उनसे की गई बातचीत के मुख्य अंश:
दुष्कर्म का मामला होते हुए भी पुलिस ने तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की?
कार्रवाई तो की गई है। पुलिस ने 7 अप्रैल (घटना) की रात साढ़े 11 बजे ही इस मामले के आरोपी के खिलाफ दफा 376 और 306 के तहत मामला दर्ज कर थाना कोतवाली पुलिस ने जांच शुरू कर दी थी। अब इस मामले की विवेचना सीओ (क्षेत्राधिकारी) सिटी वैभव कृष्ण कर रहे हैं।
फिर मामला इतना बिगड़ कैसे गया? क्या कोतवाली पुलिस ने पीड़ित बच्ची को   हिरासत में रखने का आदेश दिया था?
     कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर कवींद्र नारायण मिश्र उस रोज अवकाश पर थे। एसएसआई पीआर शर्मा का कहना है कि उन्हें पेशबंदी के तहत फंसाया जा रहा है। मामले की जांच की जा रही है। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ जरूर कार्रवाई की जाएगी।
महिला थाना के अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। कहीं यह लीपापोती का प्रयास तो नहीं है?
    प्रारंभिक रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है। हमें पैथालॉजिकल रिपोर्ट का इंतजार है। वहीं, अब तक चार महिला पुलिसकर्मियों महिला थाना के एसओ गयाश्री चौहान, एसआई सरिता द्विवेदी और दो सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है।
पीड़ित बच्ची का अगर 7 अप्रैल की रात ही डॉक्टरी परीक्षण हो गया था, तो उसे परिजनों के हवाले क्यों नहीं किया गया? बच्ची को हिरासत (हवालात) में क्यों रखा गया?
   मामले की जांच की जा रही है। हम यह भी देख रहे हैं कि 8 अप्रैल की शाम तक बच्ची को महिला थाने में रखने का क्या औचित्य था? पीड़ित लड़की के बड़े भाई की तहरीर के आधार पर महिला पुलिस थाना के अज्ञात कर्मियों के खिलाफ भी बच्ची को हवालात में रखने का मामला दर्ज कर लिया गया है। शीघ्र ही आरोपी पुलिसकर्मियों के नाम उजागर हो जाएंगे।
पीड़ित परिवार को जान-माल का खतरा है?
पीड़ित परिवार की मांग पर दो पुलिस वाले तैनात किए गए हैं। साथ ही वे हमारी निगरानी में हैं।

बढ़ते अपराध के चलते हटाए गए डीजी


प्रदेश में हत्या, दुष्कर्म, लूट और डकैती की घटनाओं पर नजर डालें तो यूपी के प्रमुख शहर यानी राजधानी लखनऊ, कानपुर, मेरठ, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद, गोरखपुर और बरेली में ही पिछले एक साल में 1059 हत्याएं की गर्इं, 382 दुष्कर्म, 906 लूट की वारदात और 64 डकैतियां पड़ीं। लखनऊ में पिछले साल अप्रैल से अब तक 126 हत्याएं, 42 दुष्कर्म, 35 लूट और 4 डकैती की घटनाएं हो चुकी हैं। वहीं राजधानी से महज 80 किलोमीटर दूर कानपुर का हाल और भी बुरा है। पिछले साल अप्रैल से इस साल मार्च तक यहां 253 हत्याएं, 75 दुष्कर्म, 146 लूट और 10 डकैतियां पड़ीं। मेरठ भी अपराध के मामले में पुलिस के लिए बड़ी चुनौती साबित होता दिख रहा है। यहां अप्रैल 2012 से अब तक 211 हत्याएं, 62 बलात्कार, 246 लूट की घटनाएं और 22 डकैतियां पड़ चुकी हैं। अन्य शहरों की बात करें, तो आगरा में जहां 2012 में 70 हत्याएं, 32 दुष्कर्म, 230 लूट और 3 डकैती की घटनाएं हुर्इं। वहीं इस साल अब तक 28 हत्याएं, 13 दुष्कर्म, 40 लूट और तीन डकैतियां पड़ चुकी हैं। इलाहाबाद में 2012 में 102 हत्याएं, 49 दुष्कर्म, 47 लूट और 3 डकैती की घटनाएं हुर्इं। वहीं 2013 में अब तक तीन महीने में यहां 22 हत्याएं, 5 दुष्कर्म, 7 लूट की घटनाएं हो चुकी हैं। इसी तरह बरेली में 2012 में 84 हत्याएं, 48 दुष्कर्म, 68 डकैती और दो लूट की घटनाएं हुर्इं, जबकि 2013 में अब तक 12 हत्याएं, 6 दुष्कर्म, 12 लूट और तीन डकैती की घटनांए हो चुकी हैं। गोरखपुर में 2012 में 57 हत्याएं, 28 दुष्कर्म, 39 लूट और 7 डकैती की घटनाएं दर्ज की गर्इं, जबकि इस साल अभी तक 7 हत्याएं, 5 दुष्कर्म, 8 लूट और 6 डकैती यहां हो चुकी हैं। वहीं वाराणसी में 2012 में जनवरी से दिसंबर तक 21 हत्याएं हुर्इं, 9 दुष्कर्म, 14 लूट की घटनाएं हुर्इं, जबकि इस साल अब तक यहां 13 हत्याएं हो चुकी हैं, इनके अलावा 8 दुष्कर्म, 14 लूट और एक डकैती की घटना दर्ज हो चुकी है।
प्रदेश में बढ़ते अपराध के चलते राज्य सरकार ने पुलिस महानिदेशक अंबरीश चंद्र शर्मा को 12 अप्रैल की शाम हटा दिया। इनकी जगह पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नित बोर्ड के चेयरमैन देवराज नागर को राज्य का नया पुलिस महानिदेशक बनाया गया है। शर्मा को डीजी पीएसी पद की जिम्मेदारी सौपी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान


उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में लेने के बाद प्रदेश के एडीजी अरुण कुमार ने  इस बात की पुष्टि की है कि 10 अप्रैल की शाम दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं। इस मामले की जांच बुलंदशहर के  पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय कुमार साहनी को सौंपी गई है, लेकिन हैरानी इस बात की है कि थाने में आपराधिक कृत्य करने वाले पुलिसकर्मियों को पुलिस अभी चिन्हित तक नहीं कर पाई है। एसपी साहनी के अनुसार, थाना कोतवाली के एसएसआई पीआर शर्मा की तहरीर पर अज्ञात पुलिसवालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। लोगों का कहना है कि यह महज खानापूर्ति की जा रही है। क्योंकि 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में खुद का बचाव भी करना है।
महिला थाने के जिस हवालात में लड़की को रखा गया, उसके बारे में नई थाना प्रभारी पुष्पा शर्मा ने बताया कि यह हावालात के साथ-साथ सुरक्षा केबिन भी है। वहीं, इस बीच पीड़ित बालिका को हवालात में रखकर उत्पीड़न किए जाने के मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस एचके सेमा ने प्रदेश के मुख्य सचिव, डीजीपी, प्रमुख सचिव (गृह) और एसएसपी बुलंदशहर को नोटिस दी है। चेयरमैन ने इन अधिकारियों को एक माह का मौका देते हुए घटना और  की गई कार्रवाई के संदर्भ में आख्या मांगी है। लेकिन 12 अप्रैल को ‘हमवतन’ से फोन पर बातचीत करते हुए निलंबित महिला दारोगा ने जो कहा, उससे इस मामले में एक बड़ा मोड़ आ गया है। दंडित महिला पुलिसकर्मियों का कहना है कि असली मुलजिम कोई और है। उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है। निलंबित महिला सिपाहियों के अनुसार, दुष्कर्म पीड़ित बच्ची को कोतवाली के एसएसआई शर्मा के आदेश पर हवालात में डाला गया था। निलंबित एसओ गयाश्री चौहान और एसआई   सरिता द्विवेदी ने बताया कि 7 अप्रैल की रात उनकी नामौजूदगी में करीब साढ़े तीन बजे बच्ची को महिला थाने लाया गया। सुबह जब वह आई तो बच्ची को पूछताछ के लिए कोतवाली नगर बुलाया गया था। इसके बाद थानाध्यक्ष गयाश्री चौहान क्राइम मीटिंग में चली गई। उन्हें तो इस घटना के बारे में जानकारी ही नहीं है। बच्ची का मेडिकल रात साढ़े तीन बजे हो गया था। इसके बाद बच्ची को उसे परिजनों के हवाले कर दिया जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं किया गया। क्यों? एसआई सरिता द्विवेदी का कहना है कि जब वह 8 अप्रैल की सुबह थाने में आर्इं, तो उस समय बच्ची लॉकअप में नहीं थी। इसके बाद वह राउंड पर चली गई। उन्होंने सिपाही नीरू और सोनिया से बात की। दोनों ने बताया कि एसएसआई कोतवाली व एक दरोगा बच्ची को लेकर आए थे और उन्होंने ही कहा कि इसे हवालात में डाल दो, कहीं भाग न जाए। उन्हें कुछ पता नहीं था। अफसर के आदेश की नाफरमानी भी वह नहीं कर सकती थीं।

पंचायत ने सुनाया फरमान, दलितों में बढ़ी दहशत

15 अप्रैल को मीरपुर गांव में कथित दुष्कर्म मामले को लेकर पंचायत की गई। पंचों ने पीड़ित दलित परिवार को 40 हजार रुपये देते हुए मामले को  वापस लेने का दबाव बनाया। साथ ही पंचायत ने कहा है कि जब डॉक्टरी रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है, तो आरोपी हरेंद्र को पुलिस फौरन रिहा करे। इससे दलित परिवार की दहशत और बढ़ गई है। पीड़ित परिजनों का कहना है, ‘सर्वण हमें गांव से निकालने की साजिश रच रहे हैं।’
-जितेन्द्र बच्चन

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

जुर्म की रियासत

हर रोज यहां होता है 5 महिलाओं से बलात्कार! 10 लड़कियों से छेड़छाड़! दो कत्ल और 9 दूसरी वारदात! ये है आज की दिल्ली की दास्तान! सोनिया की रियासत! मनमोहन की राजधानी! यहां पास होता है संसद में कानून, फिर भी क्राइम पर नहीं है कंट्रोल! क्राइम कैपिटल बन चुकी है दिल्ली! क्योंकि यहां जुर्म है ज्यादा!

रविवार, 31 मार्च 2013


रात का राक्षस

एक वार और गर्दन धड़ से अलग! खून करना उसका शौक है! वह खुद कहता है, 20 साल की उम्र में अब तक 5 कत्ल कर चुका है! 13 और लोगों की हत्या करने का इरादा है! हिट लिस्ट बना रखी है शैतान ने! खून देखकर अफसोस नहीं आनंद आता है उसे! दहशत में हैं इलाके के लोग। कांप उठती हैं औरतें उसका नाम सुनकर। पुलिस साइको किलर मानती है! कौन है यह नरपिशाच?

-जितेन्द्र बच्चन
इंसान की शक्ल में नरपिशाच! नाम है राकेश राज और काम, कत्ल करना! करीब बारह वर्षों में शायद ही गोरखपुर के किसी इंसान ने इस शैतान को दिन के उजाले में देखा हो, लेकिन शाम ढलते ही वह अपनी शैतानी सत्ता का शहंशाह होता है। जिस दिन वह जेल से छूटकर आया, आठ-10 किलोमीटर के इलाके में खौफनाक मंजर था। दहशत और महज सन्नाटा, गोया शहर में कफर््यू लगा हो। आखिर चुन-चुनकर लोगों का कत्ल करने का उसके सिर पर जुनून जो सवार है। हिट लिस्ट बना रखी है उसने। डुमरी गांव और आस-पास के 18 लोगों के नाम थे उसकी सूची में, जिनमें से दो लोगों की लाश पुलिस बरामद कर चुकी है और तीन लापता हैं। अब उस •ोड़िए की खूनी नजर बाकी बचे 13 लोगों पर है। पुलिस के अनुसार, आरोपी के खिलाफ हत्या, जान से मारने का प्रयास और एनडीपीएस एक्ट के तहत कई मामले दर्ज हैं। राकेश खुद कहता है कि अब तक वह पांच लोगों को मौत के घाट उतार चुका है और बहता खून देखना उसे अच्छा लगता है। सूरज डूबते ही वह निकल पड़ता है अपने गड़ासे की प्यास बुझाने।
10 मार्च, 2013 की रात भी राकेश राज ने डुमरी गांव के चौकीदार पाले (80) की गंडासे के एक वार से ही हत्या कर दी। इसके बाद 11 और 12 मार्च की रात सुनील गौड़ और अशोक गौड़ की हत्या करने के इरादे से उनके घरों में हमला किया, लेकिन वे दोनों बच गए। अपने मकसद में कामयाब न होने पर राकेश ने खीझकर अशोक के घर पथराव भी किया। घटना से सदमे में आया अशोक का आठ साल का बेटा रवि गौड़ आज भी उस रात का खौफनाक मंजर यादकर सिहर उठता है। थाना सहजनवां पुलिस की जीना भी हराम हो गया। संगीन वारदात की खबर मिलते ही थानाध्यक्ष रामकार यादव मयफोर्स खूनी दरिंदे की तलाश में रवाना हो गए। पुलिस की कई टुकड़ी रात-रात भर गांव-गली की खाक छानती रही, तब जाकर 14 मार्च की सुबह सफलता मिली। राकेश राज को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उसके हौंसले में कोई कमी नहीं आई। उसने पुलिस के सामने अपना गुनाह कबूल करते हुए उसने कहा कि उस रात वह खाना खाकर सोने जा रहा था, तभी याद आया कि पाले का काम तमाम करना है और उसने जाकर उसकी हत्या कर दी।
शाम होते ही घरों में दुबक जाते हैं लोग
राकेश की संगत अच्छी नहीं थी। बचपन से ही वह गांव के नशेड़ियों के साथ रहने लगा था। कोई कभी रोकने-टोकने की कोशिश करता, तो राकेश उसे ही उल्टा धमकाने लगता। आरोपी के पिता राजेंद्र राज भी गांजा पीते थे। गांव के बाज़ार में बने मंदिर पर अक्सर दो-चार लोगों के साथ उनकी महफिल जमी रहती। कभी बेटे को सुधारने की उन्होंने कोशिश नहीं की। कभी राकेश पकड़ा जाता, तो मां थाने-पुलिस में जाकर किसी तरह उसे छुड़ा लाती। उसकी मां के हाथ-पैर जोड़ने पर कई बार इलाके के कुछ नेताओं ने भी राकेश को छोड़ने के लिए स्थानीय पुलिस से सिफारिश की है, तब किसी को क्या पता था कि आगे चलकर राकेश राज लोगों की जान से खेलने लगेगा। नतीजतन आज उसके आतंक से गोरखपुर के छह गांव पूरी तरह से दहशत में जी रहे हैं। डुमरी, सोनचार, शहरी, गोविंदपुर, घघसरा, पतेड़ आदि गांवों के लोग सूरज ढलते ही घरों में दुबकने लगते हैं।
रात के सन्नाटे में करता है शिकार
मुल्जिम का कत्ल करने का तरीका, औजार और समय करीब-करीब एक-सा ही होता है। चौकीदार पाले की हत्या भी उसने उसी तरह से की जैसे इसने अपने पिछले शिकारों को अंजाम दिया था। रात 11 बजे के बाद अपने बरामदे में गहरी नींद में डूबे पाले की गर्दन गड़ासे के वार से उसने धड़ से अलग कर दी। आधी रात के आसपास पूरा गांव सोया होता है। गर्मी में कुछ लोग घर के बाहर सोते हैं, जिससे राकेश को अपने शिकार पर वार करने में आसानी होती है। वह हमेशा गंड़ासे से ही कत्ल करता है। शिकार का सिर, चेहरा और गर्दन उसके निशाने पर होते हैं। उसकी पूरी कोशिश होती है कि एक ही वार में काम तमाम हो जाए। न कोई आवाज और न ही बचने का मौका।
अदालत की परवाह नहीं
इस घटना से करीब एक महीने पहले अपने ही गांव के नरेंद्र राज की हत्या के मामले में जेल से जमानत पर रिहा हुआ था राकेश, लेकिन सीखचों के बाहर आते ही एक बार फिर उसने अपना खूनी शौक पूरा करते हुए चौकीदार पाले की हत्या कर दी। राकेश को अदालत और जज से भी डर नहीं लगता। उसका कहना है, ‘क्या करेगा जज? मैं किसी अदालत से नहीं डरता। मुझे जिसे मारना था, मार दिया। एक नहीं मैंने कई खून किए हैं मैने। मुझे खून देखकर बहुत मजा आता है। मेरी फाइल जो आगे बढ़ाएगा, मैं उसे भी मार दूंगा।’ थाने में भी आरोपी की हेकड़ी कम नहीं हुई। जेल जाने से वह कतई नहीं डरता। कहता है, ‘क्या होगा, वहां भी सबकुछ चलता रहेगा। सीधे या फिर टेढ़े।’ कुछ लोग राकेश को सनकी कहते हैं। सच्चाई जो भी हो, लेकिन आरोपी के दावे और उसके साइको होने के तथ्य ने पुलिस का सिरदर्द बढ़ा दिया है। पुलिस हत्या के उन मामलों की जांच में जुटी है, जिनमें हत्या का तरीका राकेश के शिकार बने लोगों की तरह ही था।
चोरी की तहरीर से शुरू हुई बगावत
पुलिस के अनुसार, 2011 में डुमरी निवास नरेश मिश्रा ने राकेश के खिलाफ चोरी की तहरीर दी थी। पुलिस ने इस मामले की तहकीकात क्या शुरू की, राकेश राज बागी बन गया। उसने नरेश मिश्रा के चेहरे और सिर पर घातक वार किए, लेकिन लंबे इलाज के बाद नरेश बच गए। पीड़ित का कहना है कि जब वह अस्पताल में था और उसके बचने की खबर राकेश को मिली, तो गुस्से में उसने दूसरे दिन उसके घर में आग लगा दी। उनका पूरा घर खाक हो गया। आरोपी के दूसरे शिकार बने गांव के ही प्रहलाद यादव। उस पर भी राकेश ने रात में ही हमला किया था। सिर एवं चेहरे पर गहरे जख्म हैं। एक आंख की रोशनी चली गई। प्रहलाद की महज इतनी गलती थी कि उन्होंने नरेश मिश्रा का साथ दिया था। राकेश जमानत पर जेल से बाहर आया, तो प्रहलाद डर के मारे दिन भर नजरबंद रहते और रात पड़ोसी बाबूलाल चौबे के घर में सोते थे।
घात लगाकर देता है वारदात को अंजाम
राकेश का तीसरा शिकार बना बाबूलाल का 18 वर्षीय बेटा गौतम चौबे। पहले राकेश से उसकी दोस्ती थी। गांव के कुछ लोगों का कहना है कि गौतम और राकेश में चोरी के माल के बंटवारे को लेकर विवाद हुआ था। इसी के चलते गौतम ने एक दिन उसे गांव में सबके सामने थप्पड़ मार दिया था। अपने अपमान से क्षुब्ध राकेश तिलमिला उठा। मौका पाते ही एक रात उसने बरामदे में सोते हुए गौतम पर हमला कर दिया, लेकिन भगवान की कृपा से वह बच गया। अब भजन-कीर्तन की टोली में शामिल गौतम रामचरित मानस का पाठ करता है। उसकी मां मंजू चौबे आज भी उस दिन के खूनी मंजर को याद कर सिहर उठती हैं। कहती हैं, अगर इलाके की पुलिस अगर पहले ही मामले में कड़ी कार्रवाई करती, तो आज गांव में दहशत का यह माहौल न होता। फिलहाल, राकेश राज के हौसले बुलंद रहे। दिसंबर, 2012 में उसने गांव के ही नरेंद्र राज की हत्या कर दी... और अब चौकीदार पाले का कत्ल का मामला सामने आया है।
जेल जाने के बाद भी कम नहीं हुआ डर
पुलिस अधिकारियों की गहन पूछताछ के बाद आरोपी राकेश राज को गोरखपुर की सक्षम अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भ•ोज दिया गया। इससे डुमरी गांव के लोगों ने राहत की सांस ली है, लेकिन उनकी आंखों में दहशत कम नहीं हुई है। आरोपी राकेश के माकन में ताला बंद था, लेकिन पड़ोसी इतने खौफजदा हैं कि उसके बारे में कुछ पूछने पर वे तुरंत अपना दरवाजा बंद कर देते हैं। एक बुजुर्ग ने कहा, भ‘•ौया हम उसके बारे में कुछ नहीं कह सकते। अगर उसे पता चल गया, तो वह हमारी भी हत्या कर देगा।’
आरोपी से 16 लोगों की लिस्ट बरामद
उत्तर प्रदेश के आर्थिक रूप से पिछड़े जनपद गोरखपुर के थाना सहजनवां के डुमरी नेवास गांव के आरोपी राकेश ने यहां के लोगों का जीना हराम कर रखा है। मुख्यालय से महज 25 किमी़ दूर स्थित डुमरी निवास गांव में कोई रात में घर से बाहर नहीं निकलता। राकेश देर रात ही लोगों पर घात लगाकर वार करता है। अब तक इस गांव के निवासी नरेश, गौतम, प्रह्लाद और नरेंद्र उसके गड़ासे के वार से घायल हो चुके हैं। बाद में नरेश की मौत हो गई। कुछ दिन तो गांव के लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर वह कौन सनकी है, जो एक के बाद एक संगीन वारदात को अंजाम दे रहा है। अब बुजुर्ग पाले की हत्या के बाद राकेश की गिरफ्तारी से पुलिस ने आरोपी का पर्दाफाश कर दिया है। थानाध्यक्ष (सहजनवां) रमाकर यादव ने बताया कि आरोपी को जेल भ•ोज दिया गया है। उसने बदला लेने के लिए गांव के चार लोगों पर वार किया था। राकेश के पास से 16 लोगों की एक लिस्ट भी बरामद हुई है। आगे मामले की जांच की जा रही है।
गोरखपुर से- प्रिंस पांडेय
जमानत का विरोध करेगी पुलिस
आरोपी राकेश राज के बारे में मिली जानकारी बहुत चिंताजनक है। वह समाज के लिए खतरा बन चुका है। उसकी केस हिस्ट्री खोली जा रही है। हमारा प्रयास है कि जेल में उसकी मेडिकल और सायिकोलोजिकल काउंसलिंग कराई जाए, ताकि उसकी हिंसक प्रवृत्ति पर काबू पाया जा सके। अदालत में हम आरोपी की जमानत का पुरजोर विरोध करेंगे। इसके बावजूद वह जमानत पर जेल से बाहर आने में कामयाब हो जाता है, तो उसकी गतिविधियों को पुलिस मॉनिटर करेगी। साथ ही मुल्जिम के उस बयान की जांच भी कराई जाएगी, जिसमें उसने अब तक कई हत्याएं करने की बात कही है।
शलभ माथुर
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, गोरखपुर

सोमवार, 11 मार्च 2013


  यूपी के दबंग, ठेंगे पर कानून

उनके एक इशारे पर डीएसपी को गोली मार दी जाती है, प्रधान को अगवा कर लिया जाता है, औरत की इज्जत नीलम कर दी जाती है। सरकार कुछ नहीं कर पाती। क्योंकि सरकार से वे नहीं, उनसे सरकार चलती है और वो राज करते हैं! गुंडाराज! यूपी के दबंग! पूर्वांचल के बाहुबली! कानून को रखैल समझते हैं और पुलिस को नपुंसक!
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कलेंडर बदला, तारीख बदली। नहीं बदली तो यूपी की तकदीर और तस्वीर! 15 मार्च, 2012 को अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 15 मार्च, 2013 को उनकी सरकार के एक साल पूरे हो जाएंगे। सूबे में न जुर्म कम हुआ और न ही गुनहगारों को बचाने की सियासत! जनवरी, 2012 से जून 2012 तक उत्तर प्रदेश में 1164 मर्डर, 920 लूट और 326 रेप की वारदात हो चुकी है। क्योंकि राज्य में सरकार से ज्यादा दबंगों की चलती है। सत्ता इनकी मुट्ठी में होती है! मुख्यमंत्री इनके इशारे पर चलते हैं। कानून से खेलना बाहुबलियों का पेशा है। जेल में रहें या रेल में, गुनाह का खेल खेलना कभी नहीं चूकते। जो दाउद से नहीं डरते, वो राजा भैया का नाम सुनते ही कांप उठते हैं। एफआईआर में उनका नाम है, लेकिन वो आजाद हैं। क्योंकि वो ‘राजा भैया’ हैं! इलाके में उनकी हुकूमत चलती है। रियासत चली गई, ठसक बाकी है! ताल ठोंककर कहते हैं, ‘मर्डर करने की क्या जरूरत है! सरकार अपनी है, ट्रांसफर करवा देते।’
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। मुल्क की सियासत भी इसी राज्य के रहमोकरम पर चलती है। यहां हमेशा कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है, जो देश ही नहीं दुनिया की मीडिया में सुर्खियां बनता है। समय बदला, समाज बदला, लेकिन नहीं बदला उत्तर प्रदेश। कहा जाता है कि राजनीति के अपराधीकरण की शुरुआत भी यहीं से हुई। कल तक जो दबंग और बाहुबली राजनेताओं के संरक्षण में काम करते थे, आज वे बिना किसी मुखौटे के राजनीति में हैं... और तो और इनमें से कुछ मंत्री पद का सुख भ•ाोग चुके हैं, तो कुछ भ•ाोग रहे हैं। इन बाहुबलियों की दबंगई ऐसी है कि मुख्यमंत्री भी जब-तब इनके सामने नतमस्तक नजर आते हैं। इनकी ‘साजिश’ और ‘चाल’ से प्रदेश की धरती कांप उठती है और जब इन्हें गुस्सा आता है, तो सूबें की सरकारें हिल जाती हैं, लेकिन इनका जलवा न कल कम था और न ही आज।
हरिशंकर तिवारी : माफिया के पितामह
दाउद जैसे अपराधी जिस समय गुनाह का ए, बी, सी, डी सीख रहे थे, उस समय उत्तर प्रदेश में हरिशंकर तिवारी अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके थे। हरिशंकर के बाहुबल का डंका विदेशों तक बजता था। स्व. वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी के बीच होने वाली गैंगवार अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में छाई रहती थी। तिवारी ने उत्तर प्रदेश, बिहार और पड़ोसी देश नेपाल तक अपना साम्राज्य बढ़ा लिया था। गोरखपुर के बुजुर्ग बताते हैं कि तिवारी ने ऐसे लोगों की टीम बना रखी थी, जो उनके एक इशारे पर बिना कुछ सोचे-समझे कुछ भी करने पर उतारू रहते थे। आज भी उनका जलवा कम नहीं हुआ है। आम आदमी हो या फिर माफिया, दोनों ही इनसे बचकर रहना पसंद करते हैं।
76 साल के तिवारी छात्र जीवन में गोरखपुर शहर में किराए के एक कमरे में रहते थे, लेकिन आज जटाशंकर मुहल्ले में उनके किलेनुमा निवास को ‘हाता’ के नाम से जाना जाता है। वे 3 बार निर्दलीय विधायक रहे। 2 बार कांग्रेस के टिकट पर जीते और एक बार तिवारी कांग्रेस से भी जीते। अब पूरी तरह राजनीति को समिर्पत हैं। एक बेटा कुशल उर्फ भीष्म तिवारी खलीलाबाद से बसपा सांसद हैं। दूसरा विनय तिवारी अभी राजनीतिक पारी आरंभ होने का इंतजार कर रहा है। भ•ाांजा गणेश शंकर विधान परिषद् अध्यक्ष है, लेकिन दूसरा बेटा विनय तिवारी विधानसभ•ाा और लोकसभ•ाा चुनाव हार चुका है। वहीं तिवारी जब से राजनीति में आए, उनका रसूख हमेशा बरकरार रहा। सरकार किसी की भी बने, मंत्री पद मिलना तय रहता। एकाध बार माफिया मंत्री के नाम पर काफी हो हल्ला भी मचा, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। तिवारी मंत्री की कुर्सी पर कायम रहे। सन 1998 में कल्याण सिंह द्वारा बसपा को तोड़कर बनाई सरकार में साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री रहे। वर्ष 2000 में राम प्रकाश गुप्त की भ•ााजपा सरकार में स्टांप रजिस्ट्रेशन मंत्री बने। इसके बाद 2001 में राजनाथ सिंह की भजपा सरकार बनी, तब भी हरिशंकर तिवारी की मंत्री की कुर्सी कायम रही। 2002 में मायावती की बसपा सरकार में भी वे मंत्रिमंडल के सदस्य बने रहे। उसके बाद 2003-07 तक मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी तिवारी मंत्री रहे। उनका कोई बाल नहीं बांका कर सका और आज भी यूपी में तिवारी माफिया के पितामाह कहे जाते हैं।
अतीक अहमद : अपराध में अव्वल
पढ़ाई में फिसड्डी, क्र ाइम में अव्वल! अतीक अहमद की आज यही पहचान बन चुकी है। आतंक इतना कि इलाहाबाद में दहशत का दूसरा नाम अतीक अहमद माना जाता है। जुर्म की दुनिया में अपने नाम का डंका बजाने के बाद अतीक प्रदेश की राजनीति में ढोल बजाने लगे। इलाहाबाद में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप लगा और वह जेल पहुंच गए। इनके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी के करीब 35 मामले दर्ज हैं। इलाहाबाद की नगर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक रहे अतीक ने आपने छोटे भ•ााई अशरफ को समाजवादी पार्टी की साइकिल पर चढ़ाकर यह सीट उसे दे दी और खुद फूलपुर संसदीय सीट से लोकसभ चुनाव लड़ा। ज्ञात रहे कि इसी सीट से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सांसद थे। अतीक भी सांसद बन गए।
लेकिन अतीक के आतंक से ऊबे मतदाताओं ने नवंबर 2004 में हुए प्रदेश विधानसभी चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी प्रवृत्ति का था। जनता को लगा कि अतीक से अच्छा है छोटे अपराधी को जिता दिया जाए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि अतीक क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और उसके छोटे भ•ााई अशरफ ने मिलकर साजिश रची और राजू पाल की हत्या करवा दी। सपा के शासन में ही यह घटना हुई थी। ऐसे में पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भ•ााई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। बसपा सरकार बनी, तो माया ने अतीक को उसकी हैसियत याद दिला दी। ़फिलहाल आज भी अतीक के रसूख में कोई कमी नहीं आई है।
ब्रजेश सिंह : अपराध सुप्रीमो
उड़ीसा में गिरफ्तार ब्रजेश सिंह को पूर्वांचल ही नहीं देश के कई राज्यों में संगठित अपराध का सुप्रीमो माना जाता है। भ•ाुवनेश्वर में पहचान छिपाकर रियल स्टेट का कारोबार चलाता था यह डॉन। वहीं के बिग बाजार के बाहर से गिरफ्तार हुए ब्रजेश सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच लाख रु पये का इनाम घोषित कर रखा था। हैरानी इस बात की है कि करीब 20 वर्षों तक किसी ने भी इसकी शक्ल नहीं देखी। इस डॉन की गिरफ़्तारी भी बड़े नाटकीय ढंग से हुई और उसमें भी सियासत की बू आती है, लेकिन गायब रहकर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्रजेश सिंह का आतंक इतना रहा कि पूरे इलाके में रेलवे और दूसरे सरकारी ठेकों से लेकर कोयले तक की दलाली में इसका सिक्का चलता था। गायब रहते हुए भी ब्रजेश ने राजनीतिक संरक्षण के रास्ते तलाश लिए थे। भ•ााई चुलबुल सिंह को बीजेपी में लगाया। भ•ातीजा विधायक बन चुका है, लेकिन वर्तमान समय में ब्रजेश गैंग के अधिकतर बड़े अपराधियों की या तो हत्या हो चुकी है या फिर वो किसी न किसी नेता के संरक्षण में अपना काम चला रहे हैं।
ब्रजेश को सबसे बड़ा आघात तब लगा, जब उसके सबसे खास अवधेश राय का मर्डर हो गया। अवधेश के छोटे भ•ााई अजय राय ने विधायक बनने के बाद शांति धारण कर ली। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय को ब्रजेश का मुंशी कहा जाता था और वही अघोषित तौर पर ब्रजेश गिरोह को चलाते थे। बाद में आरोप है कि पूर्वांचल के एक और माफिया मुख्तार अंसारी ने अपने शूटर मुन्ना बजरंगी से कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी। ब्रजेश के अपराधी जीवन का आरंभ आजमगढ़ की बाजार में पिता की हत्या होने के बाद हुआ। इलाके के दबंग ठाकुरों ने ब्रजेश के पिता का शरीर चाकू और गोलियों से छलनी कर दिया था। ब्रजेश ने पहले पिता की हत्या का बदला लिया, फिर बिहार में ब्रजेश सिंह और वीरेंद्र टाटा ने अपना कॉकस बना लिया। चंदौसी से बोकारो और जमशेदपुर तक इसकी तूती बोलती थी। कोयले की उगाही के साथ ही रेलवे, पीडब्ल्यूडी और दूसरे सरकारी विभ•ाागों की ठेकेदारी इन लोगों की कमाई का मुख्य जरिया था। ब्रजेश ने जेजे अस्पताल मुंबई में दाउद इब्रहिम के बहनोई पारकर की हत्या का बदला इस तरह लिया कि देश कांप उठा था। ब्रजेश के सबसे खास साथी वीरेंद्र टाटा की हत्या बनारस से मीरजापुर के रास्ते में श्रीप्रकाश शुक्ल गैंग ने कर दी थी। उसके बाद से यह माफिया अंडरग्राउंड हो अपनी गतिविधियां चला रहा था। अब जेल में है।
धनंजय सिंह : जेल से चलता है खेल
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे धनंजय सिंह वर्तमान में बसपा से जौनपुर से सांसद हैं। इनके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी जैसे कई मामले दर्ज हैं। लखनऊ के इलाकाई माफिया अरुण शंकर शुक्ल उर्फअन्ना और अंबेडकर नगर के माफिया अभय सिंह के दोस्त रहे हैं धनंजय सिंह। बाद में ये तीनों अलग हो गए। धनंजय की दोनों दोस्तों से आगे निकलने की भी रोचक दास्तान है। एक पुलिस मुठभ•ोड़ के बाद पुलिस ने दावा किया कि धनंजय सिंह मारा गया, लेकिन कुछ दिन बाद धनंजय सामने आया और आरोप लगाया कि उप्र पुलिस उसे जान से मार देना चाहती है। इसके बाद धनंजय सिंह नेताओं का दुलारा बन गया। विधानसभ•ाा चुनाव में उतरा और जीत गया।
लेकिन विधायक बनने के बाद भी धनंजय सिंह का आचरण नहीं बदला। उस पर अपने परम मित्र अरुण उपाध्याय के भ•ााई की हत्या का आरोप लगा, जिसका शव मीरजापुर से बरामद हुआ था। उसी समय अरुण ने कसम खाई कि जब तक इस हत्या का बदला नहीं ले लिया जाएगा, वह अपने भ•ााई की तेरहवीं नहीं करेगा। पिछले लोकसभ•ाा चुनाव में इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रत्याशी की लाश एक पेड़ से लटकी मिली। इस मामले का भी आरोपी रहा धनंजय। बाद में अदालत से वह इस मामले में बरी कर दिया गया। एक और दोस्त अतुल सिंह के साथ भी धनंजय का विवाद हुआ। इलाके के लोग आज भी इतना डरते हैं कि कोई धनंजय सिंह के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पुलिस भी जो कभी इनका पीछा करती थी, आज सलाम करती है। आखिर वह माननीय संसद सदस्य हैं।
मुख्तार अंसारी : सत्ता की रही सरपरस्ती
कौमी एकता दल से मऊ विधानसभ•ाा से विधायक हैं मुख्तार अंसारी। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप है। 1989 में मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में मुख्तार को सत्ता का संरक्षण मिला। उसके बाद अंसारी के विरु द्ध सारे मामलों में सीबीसीआईडी की जांच लगवा दी गई। कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनी, तो मुख्तार के खिलाफ टाडा लगा दिया गया। बसपा और बीजेपी की पहली साझा सरकार में मायावती ने मुख्तार को जेड प्लस श्रेणी सुरक्षा मुहैया कराई थी। इसके बाद मुख्तार का कद इतना बढ़ गया कि वह माफिया से पूर्वांचल के मुसलमानों का रहनुमा कहा जाने लगा। तीसरी बार मुलायम सिंह की सरकार बनी, तो मुख्तार अपने चरम पर थे। ये वो दौर था जब मुख्तार की तूती बोलती थी। उसके यहां बाहर के सूबों के अपराधियों को भी संरक्षण मिलने लगा था।
उन दिनों के एक धाकड़ डीएसपी शैलेन्द्र सिंह ने एक एलएमजी पकड़ी, जो मुख्तार के पास पहुंचनी थी। मुख्तार का तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन डीएसपी साहब को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। कहा जाता है, एक बड़े नेता ने मुख्तार को बचाने में अपनी सारी ताकत झोंक दी थी। इसी दौरान मऊ दंगों में मुख्तार का दंगाई रूप भी देखने को मिला और मुलायम की पूर्व सरकार में गाजीपुर में दो दर्जन से अधिक मुख्तार के विरोधियों की हत्या हुई, लेकिन मुख्तार का कुछ नहीं बिगड़ा। यहां तक कि 22 फरवरी 2009 को करंडा में एक सपा समर्थक ठेकेदार की हत्या का आरोप भी मुख्तार पर लगा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनकी आन-बान शान कायम रही। वर्ष 2007 में विधानसभ•ाा चुनाव के बाद मायावती की सरकार बनी। मुख्तार असांरी को मायावती का पूर्ण संरक्षण मिलने लगा। लोकसभ•ाा चुनाव में मुख्तार को वाराणसी और उसके भ•ााई अफजाल को गाजीपुर का टिकट थमा दिया गया। अब मुख्तार अंसरी जेल में हैं।
धर्मंपाल उर्फ डीपी यादव : संगीन आरोप
यादव पर दर्जनों संगीन आरोप हैं। दिल्ली, उत्तराखंड और हरियाणा तक रसूख का फैला है साम्राज्य। पश्चिम उत्तर प्रदेश का इन्हें शराब माफिया कहा जाता है। बेटा विकास तिहाड़ जेल में बंद है। उसे देश के चर्चित नीतीश कटारा हत्याकांड में सजा हो चुकी है। खुद डीपी यादव पर पहला मामला सन 1989 में गाजियाबाद जिले के कविनगर थाने में दर्ज हुआ। इसके बाद कत्ल और डकैती के 2-दो और अपहरण, गैंगस्टर और टाडा जैसे मामले मुकदमों की फेहरिस्त में शामिल होते गए। इसके साथ ही जेसिका लाल हत्याकांड में भी यादव और उसके बेटे विकास का नाम आरोपियों में शामिल हुआ।
डीपी यादव ने राष्ट्रीय परिवर्तन दल बनाया। पत्नी उर्मिलेश विधायक चुनी गर्इं। बाद में पत्नी सहित यादव ने बसपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। उसके बाद डीपी तब चर्चा में आए, जब विधानसभ•ाा चुनाव में अखिलेश यादव ने इनकी छवि के चलते सपा में लेने से इंकार कर दिया। वैसे तो हमेशा ही कोई न कोई विवाद साथ जुड़ा रहता है, लेकिन बदायूं जिले की बिसौली तहसील के गांव रानेट के पास यादव की हाल ही में स्थापित यदु शुगर मिल की बात करें, तो मिल की स्थापना दबंगई और बेईमानी से ही की गई है। मिल के डायरेक्टर छोटे पुत्र कुणाल यादव को बनाया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये मिल जबरन लिखाई गई जमीनों पर बनी है।
राजा भैया : कुंडा का गुंडा
न थाना न कचहरी, आॅन स्पाट फैसला! इलाके में राजा भैया की तत्काल न्याय दिलाने वाले युवराज की छवि है। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया (40) को उनके विरोधी ‘कुंडा का गुंडा’ कहते हैं। इनके पिता उदय प्रताप सिंह प्रतापगढ़ जिले की तहसील कुंडा के थाना हथिगवां स्थित बेंती और भदरी स्टेट के राजा हुआ करते थे। बेंती कोठी पूरे इलाके में मशहूर है। कुंडा (प्रतापगढ़) विधानसभ•ाा क्षेत्र से ही राजा भैया विधायक हैं। वर्ष 1993 से अब तक हुए पांच बार चुनाव में उन्हें कोई हरा नहीं पाया है। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1989 में स्नातक इस राजा पर तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। आठ आपराधिक मुकदमों में न्यायालय ने संज्ञान लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पोटा लगाया, बाद में बरी हो गए। वर्ष 2010 में निकाय चुनाव के दौरान एक नेता की हत्या के प्रयास का मुकदमा भी चल रहा है, जिसमें राजा भैया समेत 13 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 2002 में विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने राजा के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया, जो अब भी अदालत में विचाराधीन है, लेकिन चुनाव में उन्हें कोई शिकश्त नहीं दे सका।
राजा भैया वर्ष 1996 में पहली बार कल्याण सरकार में मंत्री बने। इसके बाद 1999 में राम प्रकाश गुप्ता की सरकार, 2000 में राजनाथ सिंह और 2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी राजा भैया को मंत्री पद से नवाजा गया। दिसंबर, 2010 में एक इलाकाई नेता ने स्थानीय निकाय चुनावों के समय राजा भैया सहित एक सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य समेत 13 लोगों के विरु द्ध जान से मारने के प्रयास का मामला दर्ज कराया था। इस मामले में राजा भैया को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया। इससे पहले साल 2002 में बीजेपी विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने अपने अपहरण करने का आरोप लगाया था, 2004 में राजा के घर से एके-47 बरामद हुई, लेकिन वर्ष 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार बनी, तो राजा भैया को कारागार मंत्री बनाया गया। जेल मंत्री रहे राजा भैया जेल में सजा भी काट चुके हैं। ताजा मामला डीएसपी हत्याकांड की सीबीआई जांच कर रही है। राजा भैया पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है, लेकिन उनके रुतबे में कोई कमी नहीं आई। इलाके में आज भी उनकी तूती बोलती है।

-जितेन्द्र बच्चन

रविवार, 3 मार्च 2013


कातिल चेहरा


माफिया का चेहरा बदल गया, लेकिन चेहरा बदलने के बावजूद अपराध तो अपराध ही है. उसके निशाने पर पहले भी बेगुनाह थे और आज भी बेगुनाह हैं। हां, दहशत की वजह इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि कातिल का चेहरा पहले से भोला, दिमाग पहले से शातिर और तकनीक पहले से एडवांस हो गई है।
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बेहमई 2 किलोमीटर! मील का यह पत्थर आते ही कानपुर देहात जिले का भूगोल और इतिहास करवट लेने लगता है। हरे-भरे खेतों वाले मैदान पीछे छूट जाते हैं। बीहड़ से होकर आहिस्ता-आहिस्ता रास्ता यमुना किनारे की आखिरी बस्ती की ओर बढ़ता है। सरकारी इंटर कॉलेज की एक अधबनी इमारत, ताला बंद प्राइमरी पाठशाला और खाट पर लंबी तान कर पड़े पुलिसवालों की चौकी पार करने के बाद आप खुद को जिस जगह पाते हैं, वह है बेहमई। वही गांव, जहां आज से 31 साल पहले 14 फरवरी, 1981 को देश के आपराधिक इतिहास की सबसे दुस्साहसिक इबारत लिखी गर्ई थी। तब बुरी तरह सताई गई फूलन देवी बदले की आग में जल रही थी। 23 साल की उस युवती ने 20 लोगों को गोलियों से छलनी कर अपराध की दुनिया की सारी परिभाषाएं बदल दीं।
इस एक पीढ़ी पुरानी स्मृति में अपराध और अपराधी की तस्वीर बहुत कुछ फिल्मी है। फूलन देवी और बाबा मुस्तकीम की अगुवाई में 40 डकैत नाव से नदी पार कर जालौन की सीमा से बेहमई में घुसते हैं। सबने पुलिस की वर्दी पहन रखी है और फूलन तो एसपी की ड्रेस में है। कंधे पर बंदूकें और जुबान पर गालियां। जिन्हें मारना है, उन्हें दिनदहाड़े घर से खींचा और फिर एक लाइन में खड़ाकर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। तीन भाई, चाचा और एक भतीजे को खोने वाले 73 वर्षीय ठाकुर श्रीराम सिंह इस वाकये को याद करते हैं, ''मेरे भाई ने मेरे बेटे को अपनी पीठ के पीछे छुपा लिया था। डकैतों ने गोली चलाई। भाई मर गया, बेटा बच गया, लेकिन डकैतों ने बेटे को फिर पकड़ा और उसके पेट में गोली मार दी, लेकिन भगवान ने मेंटर को उमर दी थी, वह बच गया। तब 18 साल के रहे मेंटर सिंह आज तहसील में कर्मचारी हैं। इस घटना की याद आज भी शहीद स्मारक के तौर पर घटनास्थल पर मौजूद है। स्मारक ही गांव का नया मंदिर है।
''इन 21 वर्षों में बेहमई बहुत नहीं बदला। यहां आज भी न तो बिजली है और न टीवी, जिनको दहेज में फ्रिज मिल गए वे आलमारी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जालौन जाने के लिए आज भी यमुना का कछार है। इसी भुरभुरी मिट्टी से होकर टूटे पीपे के पुल से लोग मोटर साइकिल खींच ले जाते हैं।'' पहलवानी कदकाठी के 35 वर्षीय संजय सिंह बातों-बातों में जैसे दार्शनिक हुए जा रहे हैं। वे कहते हैं, ''हां, तब से गांव में कोई बड़ी वारदात नहीं हुई। नेता और अफसर तो यहां पहले भी नहीं आते थे, चार-छह साल से तो डाकुओं का आना भी बिल्कुल बंद हो गया है। वैसे भी डकैती के धंधे में रखा क्या है।''
क्या वाकई डकैती का धंधा घाटे का सौदा है? इसका जवाब देते हैं सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह, ''बड़ी से बड़ी डकैती में कोई गैंग 20 लाख रु. हासिल कर लेगा। ऊपर से बीहड़ में कष्ट सहने का जोखिम, वहीं एक अपहरण में घर बैठे एक-दो करोड़ रु. फिरौती में वसूल लो। अपराध के और भी सॉफिस्टिकेटेड तरीके हैं, इसलिए अब आपको पुराने किस्म के डकैत नजर नहीं आएंगे। अपराधी बदल रहे हैं।
तो फिर गब्बर सिंह और चाइना गेट के जगीरा जैसे फिल्मी पात्रों की जगह कौन ले रहा है! कहीं कहानी फिल्म का वह भोंदू-सा बीमा एजेंट बॉब बिस्वास तो नहीं जो सब के शक से तो परे है, लेकिन है खामोश हत्यारा या बाजीगर फिल्म का वह शाहरुख खान जो कब मोहब्बत करता है और कब कातिल बन जाता है, पता लगाना मुश्किल है। वैसे जो बातें फिल्में नहीं कह पाती हैं, वह सामने आ जाती हैं। हत्या के उन चर्चित कांडों से जिन्होंने पिछले कुछ साल में मीडिया में भूचाल लाकर रख दिया। जिन हत्याकांडों ने पिछले कुछ साल में सनसनी मचार्ई है, उसमें दो चीजें खास थीं। पहली कातिल उनका पुराना परिचित था और दूसरी वे महिलाएं मौत के घाट उतार दी गईं, जिन्होंने अपने आकाओं को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
जून, 2008 में नोएडा का आरुषि-हेमराज हत्याकांड एक ऐसी ही मिसाल के तौर पर उभरता है। 13 साल की एक लड़की पॉश इलाके के अपने घर में मार दी जाती है। पहली रपट यह कहती है कि नौकर हेमराज लड़की को मारकर फरार हो गया। पुलिस की एक टीम उसकी तलाश में नेपाल रवाना हो जाती है, लेकिन अगले दिन नौकर की लाश छत पर मिलती है। उसके माता-पिता लगातार गहराई से जांच करने की मांग कर रहे हैं। टेलिविजन कैमरों के सामने दहाड़ रहे हैं। मासूम को न्याय दिलाने के लिए कैंडल मार्र्च कर रहे हैं। हत्याकांड के बाद तलवार दंपती ने अपने परिवार की छवि एक हंसते खेलते परिवार की बताई थी। मौत के आठ दिन बाद नूपुर तलवार ने टेलिविजन इंटरव्यू में कहा, ''कितना हंसता खेलता परिवार था हमारा। मैं हमेशा सोचा करती थी कि मैंने पिछले जन्म में जरूर कुछ अच्छे कर्म किए होंगे, तभी मुझे इतना अच्छा परिवार मिला है।'' उन्होंने अपने पति की ऐसी छवि पेश की जो बेटी पर जान छिड़कते थे। वे कहती हैं, ''हम उसका जन्मदिन मनाने वाले थे। राजेश ने आरुषि से कहा था कि वह जितने चाहे दोस्त बुला सकती है।'' उनकी ये मासूम दलीलें सभी ने हाथों हाथ ली। पुलिस और सीबीआइ हाथ-पैर मारकर थक गईं और सीबीआइ ने तो एक बारगी मामले में क्लोजर रिपोर्ट ही फाइल कर दी, लेकिन आज की तारीख में तलवार दंपती ही नए आरोपी बनकर उभरते हैं। अदालत का आखिरी फैसला जो भी आए, लेकिन इतना तो साफ है कि आरुषि का हत्यारा उसके करीब का शख्स था और उसे मारने भाड़े का कोई सुपारी किलर नहीं आया था।
वहीं दिसंबर 2006 में नोएडा के ही निठारी कांड ने खामोश कातिल को नरपिशाच की श्रेणी तक ला दिया। जिस सुरेंद्र कोली को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, वह आदमखोर अपने आस-पड़ोस से बच्चे अगवा कर उन्हें खा जाता था। कोली कई साल तक यह काम करता रहा। बंगले के नीचे नाले में नर कंकालों का ढेर लग गया और कोली के एंप्लायर मोहिंदर सिंह पंढेर को खबर तक नहीं हुई। और पुलिस कहां थी? प्रकाश सिंह कहते हैं, ''पुलिस में ताकत नहीं बची है। पुलिस को नेताओं ने पूरी तरह चूस लिया है। वे अपनी जान बचा लें और नेताजी की ड्योढ़ी पर हाजिरी बजा लें, इतना ही बहुत है।'' निठारी कांड ने देश को हिलाकर रख दिया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घटना के बाद बच्चों के गुमशुदा होने के मामलों को दर्ज करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इस घटना ने शहरों के अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा को लेकर सदमे में ला दिया।
उधर मुंबई में 2011 में फिल्म अभिनेत्री लैला खान की हत्या का मामला भी एक उलझ मामला है। यह हत्याकांड भी मौत के दो साल बाद जाकर सुर्खियों में आया और तब पुलिस के कान खड़े हुए। हल्ला मचा तो पुलिस ने कश्मीर से लैला की कार और पुणे के पास फार्महाउस में दफन छह लाशें भी निकाल लीं और यहां भी हत्यारा निकला लैला की मां का दूसरा शौहर। घर में छिपे कातिल का ही शिकार मई 2006 में बीजेपी नेता प्रमोद महाजन भी बने थे।
इन सब मामलों में न सिर्फ हत्यारे आस-पास के लोग थे बल्कि उनका हत्या करने का तरीका भी नृशंष था। आरुषि हत्याकांड के साक्ष्य इशारा करते हैं कि हत्या ठंडे दिमाग से की गई। लैला खान की हत्या में संकेत मिले कि गड्ढे में सिर्फ लाशें ही नहीं फेंकी गई थीं, बल्कि कई लोग जिंदा ही दफन कर दिए गए थे। निठारी कांड की नृशंषता के बारे में अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। इस कांड में क्रूरता की हर हद पार कर दी गई, जिसकी कल्पना एक आम दिमाग कर सकता है। विशेषज्ञ इस क्रूरता की सड़ांध को घरों के बेडरूम तक महसूस कर रहे हैं। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फॉरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर टी.डी. डोगरा लाशों के अंदरूनी रहस्यों और वीभत्सता से हैरान हैं। इससे पहले उनका अनुभव था कि हत्याएं आम तौर पर पेशेवर हत्यारे करते हैं, मगर इन दिनों पुलिस जो लाशें अस्पताल पहुंचाती है; उनमें लाशों की आंतों में घरेलू रसायनों की मौजूदगी, क्रूर हिंसा से आई चोट और धब्बे अक्सर नजर आते हैं। वे बताते हैं, ''यह कहते हुए मुझे दुख होता है, लेकिन घरेलू हत्याएं प्रमुख प्रवृत्ति के तौर पर उभर रही हैं।''
दूसरी तरफ वे घटनाएं हैं, जहां राजनैतिक रसूख वाले लोगों के फेर में महत्वाकांक्षी लड़कियां मारी गईं। मई 2003 में लखनऊ में कवि मधुमिता शुक्ला मार दी जाती है और खून के छींटे तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी के दामन पर उछलते हैं। 2011 में भोपाल में एक लड़की शेहला मसूद अण्णा के आंदोलन में भाग लेने के लिए कार में सवार होती है और कोई उसकी कनपटी पर गोली दाग देता है। यहां भी कातिल की तलाश लंबे समय तक अंधेरे में भटकती है। कई सियासी, नौकरशाह और ब्लैकमेलिंग के कोने खंगाले जाते हैं, तब कहीं जाकर शक की सुई उसकी अपनी सहेली जाहिदा परवेज पर आकर टिकती है। राज खोलती हैं तकिए के नीचे रखी डायरियां। राजस्थान में एक मामूली-सी नर्स भंवरी देवी कुछ ही साल में सियासत के गलियारों में अपनी हनक महसूस कराती है। उसकी लोकगीतों की सीडी बाजार में पहुंच जाती हैं, लेकिन अचानक वह औरत गायब हो जाती है। फिर सामने आती है एक और सीडी। इस सीडी में भंवरी और राजस्थान सरकार के तत्कालीन मंत्री महिपाल मदेरणा आपत्तिजनक स्थिति में नजर आते हैं। इस सब के बाद मदेरणा के पुलिस जांच के दायरे में आने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। राजनीतिक दबाव के बीच मामला जब सीबीआइ के पास पहुंचा, तो नहर से भंवरी का कंकाल भी मिल जाता है। भंवरी हत्याकांड की अब तक की जांच यह बताने के लिए काफी है कि यहां कत्ल बहुत ठंडे दिमाग से किया गया। हत्या कराने वालों और सुपारी लेकर कत्ल करने वालों ने अपनी तरफ से कोई सुबूत नहीं छोड़ा और बड़ी सफाई से रास्ते का कांटा दूर किया।
नेताओं को अपने रास्ते का कांटा दूर करने के लिए हमेशा कत्ल करना या कराना पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार उनकी घाघ चालें वह माहौल बना देती हैं, जहां लड़की के पास जिंदगी को तौबा करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। नहीं तो क्या वजह है कि 2012 में गीतिका शर्मा जैसी लड़की 23 साल की उम्र में एक सुसाइड नोट छोड़कर फांसी पर लटक जाती है! हरियाणा के मंत्री गोपाल गोयल कांडा तक कानून का हाथ तभी पहुंच पाता है, जब एक मासूम की बलि चढ़ जाती है। लेकिन नेताओं का हौसला देखिए कि इस आत्महत्या के तीन दिन बाद तक कांडा टीवी चैनलों पर न सिर्फ अपनी बेगुनाही की दलीलें पेश करते रहे, बल्कि यह भी कहते रहे कि गीतिका उनके लिए बेटी की तरह थी, लेकिन गीतिका ने अपने सुसाइड नोट में एक ऐसा वाक्य ''गोपाल गोयल कांडा अच्छा आदमी नहीं है।'' लिख छोड़ा था जो कांडा को सलाखों के पीछे ले गया। उनका राजनैतिक कद उन्हें पुलिस की गिरफ्त से बचाने में बौना साबित हुआ।
खामोश अपराधों का यह कौन-सा दौर है? अपराधी घर के इतने नजदीक कैसे आ गए? इन सवालों पर मध्य प्रदेश क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के पुलिस महानिरीक्षक संजय कुमार झा मानते हैं कि महिलाओं के खिलाफ न सिर्फ अपराध बढ़े हैं, बल्कि इन अपराधों के दर्ज होने की संख्या भी बढ़ी है। चंबल से डकैतों का सफाया करने में अहम भूमिका निभाने वाले पुलिस अफसर ने कहा, ''महिलाओं के बीच से वह कलंक खत्म हो रहा है, जो उन्हें खुद पर हो रहे अत्याचारों को समाज के सामने लाने से रोकता था। आज औरत अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को पुलिस में दर्ज कराने में सकुचाती नहीं है।'' झा मानते हैं कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को मीडिया भी पर्याप्त जगह देने लगा है, इससे भी ये अपराध ज्यादा दिखने लगे हैं।
इन दो दशक में बेडरूम के भीतर से जहां अपराधी पनपे, वहीं सड़कों पर अपराधी गैंगों के बीच होने वाला खूनी खेल काफी हद तक इतिहास के पन्नों में दब गया। एक दशक पहले तक बिहार में जहां जातीय तनाव को लेकर नरसंहार हो रहे थे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में माफिया गिरोह एक दूसरे से खुलेआम सड़कों पर भिड़ रहे थे। मुंबई के गैंगवार हालांकि अभी तक फिल्म निर्माताओं की पसंद बने हुए हैं, लेकिन मुंबई में गैंगवार की आखिरी बड़ी झलक अगस्त, 1997 फिल्म निर्माता गुलशन कुमार की हत्या में मिली थी। छिटपुट वारदातें होती रहीं।
बिहार में 1987 से 1997 के बीच नौ बड़े नरसंहार हुए। रणवीर सेना, भाकपा माले और एमसीसी जैसे संगठनों के इस खूनी खेल में सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। 1987 में दलेलचक-बघौर में एमसीसी ने 54 लोगों की हत्या की। इसके बाद साल-दर-साल तिसखोरा, देव सहियारा, बारा, बथानी टोला, हैबसपुर, जलपुरा, कोडरमा और 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार सामने आए। इस जातीय हिंसा ने पूरे देश में बिहार की छवि एक अराजक राज्य के रूप में पेश की। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों स्वीकार किया, ''बिहारी कहलाना शर्म की बात हो गई थी, लेकिन अब विकास का काम शुरू हुआ है तो लोग बिहारी कहलाने में फख्र महसूस करने लगे हैं।'' बिहार में इस जातीय हिंसा का अंतिम अध्याय इस साल तब समाप्त हुआ जब रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया की हत्या कर दी गई। मुखिया उस खूनी युद्ध के आखिरी गवाहों में से था।
उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश में शराब माफिया और अन्य ठेकों से जुड़े माफिया की गैंगवार भी अब गुजरे कल का हिस्सा है। खासकर पिछले शासनकाल में जिस तरह उत्तर प्रदेश में एक ही शख्स को शराब का सारा कारोबार दे दिया गया, उससे शराब ठेकों को लेकर चलने वाली गैंगवार पर खुद-ब-खुद अंकुश लग गया।
इन दोनों इलाकों से इस तरह के खूनी इतिहास की विदाई का विश्लेषण करते हुए अपराधशास्त्री और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के प्रो. जी.एस. वाजपेयी ने कहा, ''ये अपराध इस तरह के थे कि जिन का एक सिरा व्यक्तियों में दिखाई देता था तो दूसरा सिरा समाज और राजनैतिक व्यवस्था में छिपा हुआ था। बिहार में राजनैतिक वातावरण में आए बदलाव ने जातीय हिंसा को हतोत्साहित किया।'' दरअसल बिहार में पिछले एक दशक में बहुत सारी चीजें बदली हैं, जिनमें खास चीज है नए किस्म के जातीय समीकरणों का उभार। इसके अलावा राजनीतिक दलों का जो संरक्षण रणवीर सेना या एमसीसी जैसे संगठनों को मिल रहा था, वह भी समय के साथ खत्म हुआ। वहीं उत्तर प्रदेश में जब माफिया इस हद तक ताकतवर हो गया कि उससे सत्ता के शीर्ष को ही खतरा होने लगा तो पुलिस को उसके सफाए के लिए मजबूर होना पड़ा।
वाजपेयी की मानें तो ''माफिया के खात्मे और अपराधियों के सीधे तौर पर राजनीति में आने का समय तकरीबन एक ही है।'' दरअसल यहां से उस दौर की शुरुआत हुई जब पुराने माफिया ने खादी पहन ली और सत्ता में बैठकर दूसरे तरीकों से वे आर्थिक हित साधे जिसके लिए पहले उसे खूनी गैंगवार करनी पड़ती थी। वहीं मुंबई में गैंगवार की समाप्ति की शुरुआत 1993 के बम धमाकों के साथ ही हुई। दाऊद इब्राहिम और बाकी सरगनाओं के देश से फरार होने के बाद मुंबई में माफिया का चेहरा बदल गया, लेकिन चेहरा बदलने के बावजूद अपराध तो अपराध ही है. उसके निशाने पर पहले भी बेगुनाह थे और आज भी बेगुनाह हैं। हां, दहशत की वजह इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि कातिल का चेहरा पहले से भोला, दिमाग पहले से शातिर और तकनीक पहले से एडवांस हो गई है।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013


जेबतराशों का जाल

करोड़ों का काला कारोबार! मुल्क के कई महानगरों में फैला है जेबतराशों का जाल! कुछ राज्यों में खूबसूरत लड़कियों का भी होता है इस्तेमाल! जितना बड़ा शहर, उतना बड़ा गिरोह! विदेशी पर्यटक भी होते हैं निशाने पर! कौन है इसका जिम्मेदार?

नई दिल्ली। मुल्क का हर बड़ा शहर उनके निशाने पर है! रेलवे स्टेशन हो या बस अड्डा। अस्पताल हो या कोर्ट-कचहरी। मंदिर हो या भीड़भ1ड़ वाली सड़क अथवा कोई बाजार, हर जगह इनका फैला है जाल! आप चूक सकते हैं, इनकी नजर नहीं चूकती। पलक झपकते आपकी जेब पर हाथ साफ कर देते हैं। जितना बड़ा शहर, उतना बड़ा गिरोह। दिल्ली में जेबतराशों के तकरीबन 50 गिरोह सक्रिय हैं, जिनके गुर्गे पूरे एनसीआर में फैले हुए हैं। पश्चिम बंगाल में 40, बिहार में 22, झारखंड में 20, उत्तर प्रदेश में 25, मध्य प्रदेश में 17, मुंबई में 10, चंडीगढ़ में 11, पंजाब में 14, चेन्नई में 9 और हरियाणा में 7 जेबतराश गिरोह काम कर रहे हैं। इन पाकेटमार गिरोहों का भले ही अलग-अलग राज्य और शहर-नगर में जाल बिछा हो, लेकिन इनके काम करने का तरीका और कूटभ•ााषा करीब-करीब एक-सी होती है। जेबतराशों की दुनिया में सौ के नोट को ‘गांधी’, पांच सौ के नोट को ‘नोटबुक’ और एक हजार के नोट को ‘किताब’ बोलते हैं। गिरोह को ‘कंपनी’ और सरगना को ‘गुरु’ कहते हैं। शिकार को ‘मुद्दा’ और मुहिम को ‘फूल’ बोलते हैं। गिरोह की सदस्य संख्या सात से कम नहीं होती। पुलिस की तरह इनके ‘गुरुओं’ (सरगना) का भी इलाका (हलका) होता है और जेबकतरों को ‘बीट’ बंटी होती है। ‘कंपनी’ अक्सर उसी नाम से जानी जाती है, जो गिरोह का सरगना होता है। जेबकतरे को ‘मशीन’ कहते हैं और उसके सहयोगी को ‘ठेकबाज’। मिशन कामयाब होते ही ‘मशीन’ नकदी या पर्स ‘ठेकबाज’ के हवाले कर देता है। इस काम को ‘मैनेजर’ कहा जाता है। महिला शिकार को ‘केटी’ कहते हैं। ‘मुद्दा’ या ‘केटी’ को अपने आसपास खड़े ‘मशीन’ या ‘ठेकबाज’ पर शक हो जाता है, तो गिरोह के लोग आपस में एक-दूसरे को होशियार करने के लिए ‘मुद्दा-विला’ कहकर अलग हो जाते हैं।
‘मशीन’ और ‘ठेकबाज’ में बंटती है रकम
मिशन को अंजाम देने से पहले गिरोह के सदस्य एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होते हैं, जिसे ‘फूल’ कहते हैं। जेबकतरा जब बस में चढ़ता है, तो उसे ‘डंडा लेना’ और ट्रेन में सवार होने को ‘छड़ी लेना’ बोलते हैं। बस या ट्रेन से उतरना है, तो ‘कलटी करना’ शब्द का प्रयोग होता है। पुलिस को जेबतराशों का गिरोह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से आपस में संबोधित करता है। दिल्ली में पुलिस को गिरोह के सदस्य ‘बिल्ला’, उत्तर प्रदेश में ‘ठुल्ला’, बिहार में ‘मामा’, पश्चिम बंगाल में ‘दल्ला’, चेन्नई में ‘बुकी’ कहते हैं। पुलिस का अगर कोई बड़ा अफसर है, तो उसे ‘बोगी’ कहते हैं। शिकार को घेरकर खड़े होने को ‘जूट में चलना’ कहा जाता है। हर महीने की पांच से 10 तारीख के बीच के समय को ‘सीजन’ बोला जाता है। दिन भ•ार की कमाई का हिसाब-किताब रखने वाले को ‘मैनेजर’ और कमाई का जो हिस्सा मिलता है, उसे ‘पूड़ी’ कहते हैं। जेबतराशी की रकम का आधा ‘मशीन’ और आधे को ‘ठेकबाजों’ में बांट दिया जाता है।
एनसीआर में धन्नी गिरोह का आतंक
दिल्ली के जेबतराशों में धनराज उर्फ धन्नी का गिरोह ‘डी कंपनी’ के नाम से कुख्यात रहा है। धन्नी ने सात शादियां की थीं। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, पटना, हैदराबाद और भ•ोपाल की जिस लड़की से धन्नी ने शादी की, उसी महानगर में ‘डी कंपनी’ का अड्डा खोल दिया। कंपनी में करीब 11 सौ लोग काम करते थे। वर्ष 2002 में गाजियाबाद पुलिस की एक मुठभ•ोड़ में धन्नी मारा गया, लेकिन उसकी औरतें धन्नी के शागिर्दों के साथ मिलकर आज भी ‘डी कंपनी’ का संचालन करती हैं। खासकर इस गिरोह का एनसीआर में आतंक है।
सारा काम तर्जनी का
जेबतराश के दाएं हाथ की तरजनी अंगुली का नाखून आधा इंच लंबा होता है। ‘मशीन’ नाखून में एक छोटा ब्लेड छिपाकर रखता है। ‘मुद्दा’ की जेब पर हाथ साफ करते समय नाखून से धारदार ब्लेड निकालकर जेब पर चला देता है। जेबतराशी को तालीम देने वाले को ‘मास्टर’ कहते हैं। दिल्ली के मंगोलपुरी की एक स्लम बस्ती में बाबर, सीमापुरी में हाजी, सीलमपुर में बाबू, वेलकम इलाके में अजीज और नंदनगरी में लाला गूजर (70) पाकेटमारों की पाठशाला चलाता है। लाला का नाम एनसीआर के जेबकतरों में कुख्यात है। उसका ‘मशीन’ नंबर एक माना जाता है। हर सरगना लाला की ‘मशीनों’ को मुंहमांगा पैसा देने को तैयार रहता है, लेकिन ‘ठेकबाज’ को ‘कंपनी’ में भर्ती होने के लिए जेबतराशी की दो वारदात में कामयाब होना जरूरी होता है।
बागी को मिलती है क्रूर सजा
जेबतराशी का धंधा भले ही गैरकानूनी है, लेकिन गिरोह का जो सदस्य कंपनी का उसूल नहीं मानता, उसे कंपनी का सरगना कू्रर से क्रूर सजा देता है। कई बार बागी को सिगरेट से दागने की भी खबरें मिली हैं। मिशन पर जाने से पहले ‘शकुन’ विचार होता है। जेबतराशी के बड़े गिरोह का ‘मशीन’ जिस बस में चढ़ता है, उसका सरगना उस बस के पीछे-पीछे कार से चलता है। एक-दो लोग और उसके साथ होते हैं। अगर जेबकतरा पकड़ा गया, तो सरगना ‘शरीफ आदमी’ बनकर बस के अंदर से ‘मशीन’ को पुलिस को सौंपने के नाम पर अपने साथ ले जाता (बचा लेता) है।
हिंसा का सहारा
जेबतराशी में शिकार को खरोंच नहीं आती और उसकी जेब साफ हो जाती है। पकड़े जाने पर भी कोई जेबकतरा हिंसा का सहारा नहीं लेता, लेकिन जेबतराशी के जुर्म के इस पेशे में अब काफी बदलाव आ चुका है। कुछ जेबतराश जान-माल बचाने के लिए शिकार का खून करने से भी नहीं चूकते। दिल्ली में ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं। कुछ आरोपियों को पुलिस गिरफ्तार कर जेल भ•ोज चुकी है।
सदस्यों को मिलती है तरक्की और सेवानिवृत्ति
पाकेटमार की जमानत ‘कंपनी’ अपने खर्च पर कराती है। जो ‘मशीन’ पुराने हो जाते हैं, स्वास्थ्य और शरीर साथ नहीं देता, उनका भी गिरोह का सरगना पूरा ख्याल रखता है। सदस्यों को तरक्की और सेवानिवृत्ति भी मिलती है। ‘ठेकबाज’ प्रमोशन पाकर ‘मशीन’ बन जाता है। इस अवसर पर पुरानी ‘मशीन’ नई ‘मशीन’ को पगड़ी बांधता है और इस खुशी में जश्न मनाया जाता है।
जेबतराशी में बच्चों का इस्तेमाल
मुल्क में कई ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो देश भर से गायब हुए मासूम बच्चों को जुर्म की दुनिया में काफी समय से धकेल रहे हैं। इनमें से कुछ लड़के-लड़कियों को जरायम का पाठ पढ़ाकर बाकायदा जेबतराश बनाया जाता है। पिछले दिनों थाना प्रसाद नगर (दिल्ली) पुलिस ने ऐसे ही एक गिरोह के सात सदस्यों को पकड़ा था, जिनमें रैगरपुरा का विनोद बुची, टैंक रोड का दीपक, देवनगर का मनीष और शिखा, मुल्तानी ढांडा का कालू और राजकुमारी तथा पंजाबी बस्ती की राधा शामिल थे। आरोपी देवनगर करोलबाग के खंडहरों में खेलने वाले गरीब बच्चों को अगवा कर उन्हें बुरी तरह मार-पीटकर उनसे राजधानी के अलावा देहरादून, मसूरी और वैष्णो देवी की यात्रा में जेबतराशी कराते थे। 20 जून को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) पुलिस द्वारा पकड़ी गई किरण ने भी खुलासा किया था कि गुनाह के ऐसे स्कूल महानगरों की झुग्गी-झोपाड़ियों, स्लम बस्तियों, खंडहरों और शहर से दूर-दराज के जंगलों में चलते हैं। आरोपी किरण के मुताबिक, गाजियाबाद में भी रेल ट्रैक के आसपास बच्चों को जेबतराशी की तालीम दी जाती है। इस संबंध में गाजियाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रशांत कुमार ने मामले की जांच कराने के लिए कहा है।
जेबकतरों का कारपोरेट कारोबार
जेबतराशों के कुछ ऐसे भी गिरोह हैं, जो सिर्फ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई यानि देश के महानगरों में शिकार तलाशते हैं। करोड़ों के इस काले कारोबार में कमउम्र और खूबसूरत लड़कियों का भी इस्तेमाल होने लगा है। कुछ ऐसी युवतियां मोटे कमीशन पर काम करती हैं। सारा धंधा मोबाइल और इंटरनेट के जरिए अंजाम दिया जाता है। कारपोरेट बिजनेस! अंतर्राज्जीय गिरोहों का गठजोड़! देश के कई पर्यटन स्थल पर इन गिरोहों के मुखबिर नियुक्त होते हैं और पर्यटक होते हैं निशाने पर। एक्सप्रेस ट्रेनों या एयरपोर्ट पर यात्री बनते हैं शिकार। गिरोह का मुखबिर शिकार की पहचान कर जेबकतरे को मोबाइल पर कूटभ•ााषा में बता देता है। किन्हीं कारणों से ‘मशीन’ मिशन को अंजाम नहीं दे पाता, तो प्रथम गिरोह अगले गिरोह के हाथों ‘मुद्दा’ बेच देता है। कामयाबी की रकम फर्जी बैंक खातों के जरिए अदा की जाती है। पुलिस को भनक तक नहीं लगती और जेबतराशों का सरगना मालामाल!
पुलिस की साठगांठ
सूत्र बताते हैं कि अधिकांश थानेदारों को अपने इलाके के जेबतराशों की पूरी जानकारी होती है। कुछ थानेदार तो जेबतराशों से मुखबिर का भी काम लेते हैं। जेबतराशी की वारदात कब और कहां अंजाम दी जानी है, पुलिस को पहले से गिरोह सरगना सूचित कर देता है। पुलिस ‘मशीन’ को बचा लेती है। रकम का बंटवारा पुलिस और सरगना के बीच बराबर का होता है। कभी संयोग से कोई शिकार पुलिस के घर का हुआ, तो स्थानीय थानेदार के दबाव में रकम वापस करनी पड़ती है। अगले रोज खबर छपती है- दुनिया में अभी ईमानदारी बची है!
कायदा-कानून
दिल्ली के क्रिमिनल लॉयर कमल चौधरी के मुताबिक जेबतराशी का जुर्म भ•ाारतीय दंड विधान की धारा 379 के तहत दंडनीय अपराध है। जुर्म साबित होने पर कम से कम तीन साल की सजा या पांच हजार रुपये का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।
राजधानी में बढ़ अपराध
आईपीएस नीरज कुमार ने 30 जून को दिल्ली पुलिस आयुक्त का चार्ज संभ•ाालने के बाद कहा था कि आतंकवाद रोकना उनकी पहली प्राथमिकता है। कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाना और आम लोगों से पुलिस के अच्छे संबंध बने, इस पर खासा जोर रहेगा। स्ट्रीट क्राइम पर लगाम कसी जाएगी, लेकिन पुलिस इनमें से किसी भी मामले में कमी नहीं ला पाई। यहां अपराध का ग्राफ और बढ़ा है। झपटमारी की घटनाओं में दोगुना बढ़ोतरी हुई है। बाइकर्स का आतंक बढ़ा है। बलात्कार के मामलों में भी कमी नहीं आई है। लूट, सेंधमारी और वाहन चोरी की वारदात को अंजाम देने में भी बदमाशों के हौसले बुलंद हुए हैं।
1 जनवरी से 30 जून के बीच बलात्कार की 327, लूट की 267, हत्या का प्रयास 201, फिरौती के लिए किडनैप 14, सेंधमारी 824, वाहन चोरी 6918, हाउस थेफ्ट 797, रंगदारी 56, हर्ट 856, हत्या 262, डकैती 16 और दंगे की 32 घटनाएं हुर्इं, जबकि 1 जुलाई से 3 सितंबर के बीच स्नौचिंग की 368, बलात्कार की 127, लूट की 125, हत्या का प्रयास 84, फिरौती के लिए किडनैप 2, सेंधमारी 323, वाहन चोरी 2690,   हाउस थेफ्ट 315, रंगदारी 28, हर्ट 344, हत्या 86, डकैती की 4 और दंगों की 12 वारदात हो चुकी हैं।

-जितेन्द्र बच्चन

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

पुलिस प्रताड़ना

पुलिस का एक और खौफनाक चेहरा! एक महिला शिक्षक को बना दिया नक्सली! पहले माओवादियों ने कहर बरपा। अब पुलिस ने उसे अपने शिकंजे में ले लिया है। टार्चर करने का तरीका सुनकर दिल दहल जाता है। क्यों कर रही है पुलिस अत्याचार? क्या है महिला और उसके पति की हकीकत?
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35 साल की सोढ़ी कल तक मुल्क के नौनिहालों को अंधेरे से उजाले की राह दिखाती थी, लेकिन आज उसका अपना खुद का वजूद दांव पर लग चुका है। जिंदा लाश बनकर रह गई है। उस पर किए गए पुलिस के अत्याचार को सुनकर दिल दहल जाता है। कोई सोच भी नहीं सकता कि पुलिस इतनी क्रूर होती है। बेइंतहा मारा-पीटा, फिर गुप्तांग में पत्थर डालने जैसा दुस्साहस भी पुलिस ने कर दिखाया। ठीक से खड़ी नहीं हो पाती सोढ़ी। इलाज के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, तब कहीं जाकर उसे दिल्ली के एम्स में दाखिल किया गया। सोढ़ी के माता-पिता को माओवादियों ने गोली मारकर जख्मी कर दिया था। उनका जगदलपुर के हास्पिटल में इलाज हुआ। उजड़ गया घर, बिखर गए सपने। पति माओवादी होने के आरोप में जेल में है। पांच से 12 साल के तीन बच्चे रिश्तेदारों और होस्टल के सहारे जी रहे हैं। भ•तीजा लिंगाराम नक्सलियों के लिए चौथ वसूली करने के इल्जाम में सीखचों के पीछे कैद है।
सोढ़ी मूलत : छत्तीसगढ़ के जिला दंतेवाड़ा स्थित पालनार थाना अंतर्गत बडेÞ बेडमा की रहने वाली है। पिता का नाम मुंडरा है, जो दंतेवाड़ा के पूर्व विधायक नंदाराम के भ•ााई हैं। सोढ़ी की लोगों की मदद करना शुरू से आदत रही है। उसकी गिनती बेबाक और तेज-तर्रार महिलाओं में होती है। गीदम के एक गैर आदिवासी युवक अनिल पुटानी के साथ सोढ़ी की शादी हुई। दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी छत्तीसगढ़ से बाहर दूसरे राज्य में पढ़ती है और बाकी के दोनों बच्चे नाना-नानी के पास रहते हैं। भतीजा लिंगाराम कोडोपी सोढ़ी के साथ ही रहता था। खुद सोढ़ी मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर दंतेवाड़ा के समेली के सरकारी स्कूल में पढ़ा रही थी। घर-गृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी। करीब पांच साल पहले सोढ़ी को जबेली के बालिका आश्रम में बतौर अधीक्षिका नियुक्त कर दिया गया। वह बडेÞ बेडमा से समेली में आकर रहने लगी, तभी जैसे एक तूफान आया और सबकुछ एक झटके में तबाह कर गया। माओवादियों ने 15 जून, 2011 को सोढ़ी के घर पर धावा बोल दिया। जमकर लूटपाट की। पिता मुंडरा को गोली मार दी। जाते-जाते घर के बाहर खड़े ट्रैक्टर को आग के हवाले कर दिया। आतताईयों के फरार होने के बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई। आनन-फानन में मुंडरा को महारानी अस्पताल ले जाया गया, जहां उसका लंबा इलाज चला।
सोढ़ी ने घटना के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की, तो नक्सली और खफा हो गए। पुलिस ने भी सोढ़ी की मदद नहीं की, बल्कि उसी को नक्सलियों की मददगार कहने-बताने लगी। इधर कुआं उधर खाई, कहां जाए सोढ़ी? पुलिस का अत्याचार लगातार बढ़ता गया। नकुलनार के कांग्रेसी नेता अवधेश सिंह गौतम के घर हुए माओवादी हमले के मामले में पुलिस ने सोढ़ी के पति अनिल को गिरफ्तार कर लिया। उसने लाख अपनी बेगुनाही की सफाई दी, लेकिन पुलिस एक नहीं मानी। करीब एक साल से अनिल दंतेवाड़ा जेल में बंद है। इसके बाद 9 सितंबर को दंतेवाडा पुलिस ने एक घटनाक्रम में ‘एस्सार’ कंपनी के किरंदुल इकाई के महाप्रबंधक डीवीसीएस वर्मा और ठेकेदार बीके लाला को नक्सली समर्थक लिंगाराम कोडोपी को 15 लाख रु पये देते हुए दबोचा लिया। दोनों इस समय जगदलपुर जेल में कैद हैं। पुलिस का कहना है कि इस मामले में सोढ़ी भी आरोपी है। माओवादियों को आर्थिक मदद पहुंचाने (अवैध वसूली) का काम करती थी वह। उस रोज लिंगाराम के साथ सोढ़ी भी मौजूद थी, लेकिन पुलिस के आते ही भ•ाग निकली। एस्सार कांड से नाम जुड़ते ही सोढ़ी को छात्रावास की अधीक्षिक पद से निलिंबत कर दिया गया। पुलिस उसे तेजी से तलाशने लगी।
पुलिस अधीक्षक (दंतेवाड़ा) अंकित गर्ग के अनुसार,आरोपी लिंगाराम कोडोपी सोढ़ी के रिश्ते में भतीजा है। खुद कोडोपी ने दिल्ली से पत्रकारिता कर रखी है और स्वामी अिग्नवेश सहित दिल्ली के कई बुद्धिजीवियों से उसके मधुर संबंध हैं। पुलिस ने इलेक्ट्रानिक सर्विलेंस की मदद से सोढ़ी पर नजर रखना शुरू कर दिया। पता चला, सोढ़ी जयपुर स्थित बरकतनगर में पीयूसीएल की महासचिव कविता श्रीवास्तव के घर छिपी है। दो अक्टूबर की सुबह छत्तीसगढ़ और राजस्थान पुलिस ने मिलकर कविता के घर छापा मारा, लेकिन सोढ़ी नहीं मिली। हां, राजस्थान की सुरक्षा एजेंसियों और इंटेलीजेंस में जरूर हड़कंप मच गया। दंतेवाड़ा पुलिस ने सोढ़ी का पता लगाने के लिए जय जोहार सेवा संस्थान के सचिव नरेंद्र दुबे से भी पूछताछ की। बाद में 4 अक्टूबर को दक्षिण दिल्ली के कटवारिया सराय इलाके के बस स्टैंड से दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने सोढ़ी को गिरफ्तार कर लिया।
दिल्ली पुलिस के तत्कालीन डीसीपी (क्र ाइम ब्रांच) अशोक चांद के अनुसार, 5 अक्टूबर को सोढ़ी को साकेत कोर्ट में पेश किया गया। अदालत में सोढ़ी ने बताया कि वह और उसका पति इलाके के सर्वोदय कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के संपर्क में थे और उनके मजदूरी बढ़ाने के लिए किए गए आंदोलन में शामिल होने की बात पुलिस डायरी में भी दर्ज है। छत्तीसगढ़ पुलिस का यह इल्जाम कि वे दोनों पति-पत्नी नक्सलियों की आर्थिक मदद के लिए एस्सार कंपनी से चौथ वसूली करते थे, गलत है। लेकिन अदालत ने सोढ़ी को एक दिन की ज्यूडिशियल कस्टडी में तिहाड़ जेल भज दिया। बाद में छत्तीसगढ़ पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर सोढ़ी को छत्तीसगढ़ ले गई। कहते हैं यहां उस पर आरोप स्वीकारने के लिए यातनाओं का दौर चलाया गया। उसके पैर जंजीर से जकड़ दिए गए। सोढ़ी के सिर में गंभीर चोट आई है। बेहोशी की हालत में पुलिस उसे अस्पताल ले गई, जहां जंजीर बांधे जाने के विरोध में सोढ़ी ने अनशन शुरू कर दिया।
दो दिन बाद पुलिस ने सोढ़ी को प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी योगिता वासनिक की अदालत में पेश किया। वहां से उसे 17 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में जगदलपुर सेंट्रल जेल भ•ोज दिया गया। इस बीच पुलिस की ज्यादती के चलते सोढ़ी की तबियत और खराब हो गई। इलाज के लिए उसे जगदलपुर के महारानी अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो रायपुर के भीमराव अंबेडकर अस्पताल में ले जाया गया। वहां सोढ़ी ने पुलिस ज्यादती के विरोध में भ•ाूख हड़ताल शुरु कर दी। उसका कहना है कि थाना किरंदुल में पदस्थ आरक्षक मंकार का इस घटना से पहले उससे संपर्क था। माओवादी को इस बात को लेकर शक हो गया कि मैं पुलिस के लिए काम करती हूं और उन्होंने हमें तबाह करना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस झूठे आरोप लगाकर हमें परेशान करने लगी।
अस्पताल में सोढ़ी के पैरों की बेड़ियां खोल दीं गर्इं, लेकिन दूसरी तरह के पुलिसिया कहर कम नहीं हुए। वह बस्तर जेल में बंद है, लेकिन तबियत में सुधार न होने के कारण उसे इस समय अदालत की दखल पर एम्स में भ•ार्ती कराया गया है। मामले की जांच अब सीआइडी के आइजी पीएन तिवारी की अगुआई में गठित एसआइटी को सौंपी दी गई है। इस चार सदस्यीय टीम में पहले से इस मामले की जांच कर रहे किरंदुल के एसडीओ (पुलिस)अंशुमान सिंह भी शामिल हैं। सोनी और उसका परिवार नक्सलवादी हैं या नहीं, यह पुलिस जांच और न्यायालय के फैसले से ही तय होगा, मगर सोढ़ी की हालत को देखते हुए हमारी व्यवस्था पर जो सवाल उठता है, उनका क्या होगा?
पुलिस की खुली पोल
दंतेवाड़ा पुलिस का कहना है कि एस्सार से पैसा लेकर बीके लाला, लिंगाराम कोडोपी और सोढ़ी सोरी नक्सलियों को देने वाले थे। इस बात की भनक मिलते ही पुलिस ने पालनार गांव के साप्ताहिक बाजार से बीके लाला और लिंगाराम कोडोपी को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन मौके पर मौजूद सोढ़ी फरार हो गई। उसे बाद में दिल्ली अपराध शाखा की पुलिस ने पकड़ा। सोढ़ी लोगों की हमदर्दी बटोरने के लिए मीडिया और अदालत को गुमराह कर रही है, लेकिन जब इस घटना की जांच हुई, तो रहस्योद्घाटन हुआ कि दंतेवाड़ा पुलिस ने आरोपी बीके लाला और लिंगाराम कोड़ोपी को उनके घर से उठाया था और उन्हें नाटकीय तरीके से पालनार बाजार में पकड़े जाने की बात कही थी।
लिंगाराम को इससे पहले भी अक्टूबर 2009 में 40 दिनों तक एसपीओ बनने का दबाव देकर थाने में रखा गया था, जिसे उच्च न्यायालय के दखल के बाद छोड़ा गया। बाद में दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई करने के दौरान भी अप्रैल 2010 में उस पर नक्सल हमले में शामिल होने का आरोप लगाया गया था, वहीं नक्सलियों ने जून 2011 में सोढ़ी के पिता के पैर में गोली मार दी थी। इससे यह सवाल खड़ा होना लाजमी है कि जिस परिवार पर नक्सली हमले कर रहे हैं, उसी की बेटी को पुलिस कैसे नक्सली समर्थक बता सकती है?
दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक बयान जारी कर कहा है कि सोढ़ी और लिंगाराम कोडोपी को राजनीतिक कारणों से फंसाया गया है। इन दोनों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद हैं। सोढ़ी के भतीजे कोडोपी ने सीआरपीएफ द्वारा तीन आदिवासियों की हत्या के मामले को उजागर किया था। उसी खुन्नस में लिंगाराम को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी का सोढ़ी ने विरोध किया, तो पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया। एमनेस्टी ने मांग की है कि सोढ़ी और लिंगाराम कोडोपी के खिलाफ राजनीति से प्रेरित तमाम मामले वापस लिए जाएं और उन्हें बिना शर्त तत्काल रिहा किया जाय। साथ ही पुलिस प्रताड़ना और लापरवाही पूर्वक इलाज के मुद्दे पर एक त्वरित, निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभवशाली जांच सुनिश्चित की जाए। मामले में जो भी पुलिसकर्मी दोषी पाए जाते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
बस्तर में कैद है आरोपी
बस्तर (छत्तीसगढ़) के पुलिस अधिक्षक मयंक श्रीवास्तव के अनुसार, सोनी सोढ़ी पर नक्सलियों को आर्थिक मदद पहुंचाने का आरोप है। उसने एस्सार कंपनी से वसूली की थी। यह मामला दंतेवाड़ा पुलिस ने दर्ज किया है, जो न्यायालय में विचारााधीन है। आरोपी सोढ़ी इस समय सेंट्रल जेल बस्तर में बंद है।

-जितेन्द्र बच्चन

एक रात चार कत्ल

जुर्म की कोई उम्र नहीं होती। कानून के हाथ अपराधी की गर्दन तक एक न एक दिन पहुंच ही जाते हैं। जयभन ने खजाना हथियाने के लिए पहले उस परिवार की बहू को अपने प्रेमजाल में फंसाया, उसके बाद एक-एक कर चार लोगों को मौत के घाट उतार दिया। देह-दौलत से जुड़ी लोमहर्षक दास्तां!
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बेहद हसीन थी सुनीता। जो ही देखता, पहली नजर में उसका दीवाना हो जाता, लेकिन जयभन पर वह खुद ही फिदा हुई थी। आंखों के रास्ते दिल में उतर गई। जय•ाान ने हल्का-सा इशारा क्या किया, सुनीता उफनाई नदी की तरह सागर में समा गई। हुस्न को मजबूत जिस्म का सहारा मिल गया, लेकिन जयभान को सुनीता की देह से ज्यादा उसकी दौलत की ख्वाहिश थी। हर वक्त वह इसी उधेड़बुन में लगा रहता कि इस परिवार के पास इतनी दौलत कहां से आई? सुनीता के सास-ससुर खेती-बारी में लगे रहते। सुनीता का पति राजू होटल चलाता था। दिन-रात उसे अपने काम-धंधे से फुर्सत न मिलती, इसके बावजूद इतनी कमाई नहीं थी कि बीवी ऐश करे। वह पति सुख के लिए दिन-रात सुलगती रहती। उन्हीं दिनों एक रोज जयभान से नजर मिली और फिर दोनों के बीच अवैध संबंधों का सिलसिला चल पड़ा।
13 वर्षीय बेटी को भी नहीं छोड़ा
27 दिसंबर, 2012 की सुबह थाना सरई के प्रभारी निरीक्षक मलखान सिंह प्रांगण में बैठे धूप ले रहे थे, तभी भारसेड़ी गांव के राजू साहू ने आकर बताया कि उसके माता-पिता, पत्नी सुनीता और 13 वर्षीय बेटी पूजा की हत्या कर दी गई। एक ही परिवार के चार लोगों के कत्ल की खबर सुनते ही मलखान सिंह के होश उड़ गए। उन्होंने फौरन इस लोमहर्षक घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक (सिंगरौली) इरशाद अली, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजीव सिन्हा और एसडीओपी पीएल कुर्वे को दी। जो ही सुनता, दांतों तले अंगुली दबा लेता। पूरे सिंगरौली जिले में हड़कंप मच गया। पुलिस अधिकारियों की सायरन बजाती गाड़ियां राजू के घर पहुंचने लगीं। दरवाजे पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।
शक यकीन में बदला
अजीब भयानक वाकया था। मौके पर खून ही खून बिखरा था। सवाल पर सवाल उठने लगे- कौन है हत्यारा? क्यों किया चार-चार लोगों का कत्ल? प्रभारी निरीक्षक मलखान सिंह ने मौके पर मौजूद कुछ लोगों से पूछताछ की, तो पता चला कि जयभान सिंह का राजू के घर आना-जाना है। वह राजू के पड़ोसी राम आश्रय यादव का रिश्तेदार था और लामी गांव (सिंगरौली, मध्य प्रदेश) का रहने वाला था। सुनीता उसे बहुत चाहती थी। खुद राजू ने भी जयभान सिंह पर शक जाहिर किया था, लेकिन सवाल उठता था कि जयभान सुनीता को चाहता था, तो वह उसकी हत्या क्यों करेगा?
टीआई मलखान सिंह चारों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भजवाकर जयभान के गांव लामी जा पहुंचे। वह घर में नहीं था। उसकी औरत ने भी नहीं बताया कि वह कहां है, तब तो मलखान का माथा ठनका। उनका शक यकीन में बदलने लगा। उन्होंने मुखबिरों को सचेत कर दिया। पुलिस की मेहनत रंग लाई, 5 फरवरी, 2013 की शाम एक मुखबिर ने सूचना दी कि जयभान इस समय घर में मौजूद है। टीआई मलखान सिंह आधी रात के वक्त मयफोर्स आरोपी के घर जा धमके। जयभान ने घर से भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे दौड़ाकर दबोच लिया। पूछताछ में आरोपी ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। पता चला कि इस सामूहिक नरसंहार का कारण छत्रधारी साहू को कुछ दिन पहले उसके खेत में मिले दफीना को लूटना था। घटना में जयभान के दो और साथी शामिल हैं।
फलित नहीं हुआ लूट का माल
दफीना यानी खजाना! गांव वालों के मुताबिक, पूरा इलाका डकैतों से •ारा पड़ा था। पुलिस से बचने के लिए वे अक्सर लूट का माल किसी पहचान के सहारे खेतों में दबा देते थे। बाद में कई बार डकैतों के मारे जाने, पकड़े जाने या फिर उनके जेल से छूटकर वापस आने तक वह धन किसी दूसरे के हाथ लग जाता है या खेत की पहचान का चिह्न ही उस समय तक नष्ट हो जाता। सारा धन जमीन में ही गड़ा रह जाता। ऐसा ही एक दफीना छत्रधारी साहू के हाथ लग गया, लेकिन गांव वालों की मान्यता है कि इस प्रकार की दौलत हर किसी को नहीं फलती। छत्रधारी साहू के परिवार के लिए भ खजाना काल बन गया। घर में अकूत दौलत आते ही सुनीता की चाल-ढाल बदल गई। वह पहले से अब कहीं ज्यादा सजने-संवरने लगी थी। उन्हीं दिनों सुनीता का संपर्क जयभान सिंह से हुआ। दोनों जल्द ही एक-दूसरे से प्रेम करने लगे। पति राजू पास के गांव में होटल चलाता है। सास-ससुर खेती-किसानी में लगे रहते। एक बेटी थी पूजा, सुनीता उसे सहेलियों के साथ खेलने भज देती। इसके बाद जयभान के साथ खुलकर वासना का खेल खेलती। सुनीता को क्या पता था कि उसके जिस्म की आग एक दिन पूरे घर को जलाकर राख कर देगी। जयभान को जल्द ही छत्रधारी साहू को मिले खजाने का पता चल गया। खुद सुनीता ने उसकी बाहों में मचलते हुए बताया था, ‘जानते हो, मेरे ससुर को अपने खेत में सोने का घड़ा मिला है।’ जयभान की आंखों में चमक आ गई। अब उसकी दसों अंगुलियां घी में थी। पहलू गर्म करने के लिए प्रेमिका और खर्च करने के लिए लाखों की दौलत।
साजिश में दो और लोग शामिल
जयभान अब किसी भी कीमत पर उस दफीना को हासिल करना चाहता था। इसके लिए सबसे पहले उसने सुनीता को उसके ससुर के खिलाफ •ाड़काते हुए उसे अपने भ•ारोसे में लिया, ‘छत्रधारी बहुत कंजूस है। वह तुम्हें उस खजाने में से एक पाई नहीं देगा। मेरा कहा मानो, तो छोड़ो उस खजाने को। तुम मेरे साथ निकल चलो। मैं तुम्हें अपनी रानी बनाकर रखूंगा।’ सुनीता तो पहले से उस पर मरती थी। उसने फौरन जयभान सिंह का प्रस्ताव मान लिया। अब महज जयभान को यह पता करना था कि सोने का घड़ा छत्रधारी ने कहां छिपा रखा है? सुनीता से पूछा तो उसने नहीं बताया। इस पर जयभान का पारा आसमान पर चढ़ गया। उसने खजाना लूटने की साजिश रचनी शुरू कर दी। योजना को अंजाम देने के लिए जयभान ने गांव के ही दो बदमाशों बब्बू सिंह और सत्य नारायण तिवारी से संपर्क किया। वे दोनों भी तैयार हो गए।
प्रेमिका के सीने में उतारा खंजर
घटना की रात तीनों आरोपी भरखेड़ी रेलवे स्टेशन के पास मिले, फिर छत्रधारी साहू के घर पहुंच गए। अंदर प्रवेश करते ही आंगन में सबसे पहले छत्रधारी से सामना हुआ। जयभान ने उससे खजाने के बारे में पूछा, तो उसने नहीं बताया। गुस्से में बदमाशों ने उसे मारना-पीटना शुरू कर दिया, तभी छत्रधारी की पत्नी आ गई। बचाव में उसने शोर मचाना शुरू कर दिया। आरोपियों ने पकड़े जाने के •ाय से छत्रधारी और उसकी पत्नी की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी। इस बीच सुनीता अपने कमरे से निकल आई। उसने हिम्मत दिखाते हुए तीनों बदमाशों का विरोध शुरू कर दिया। उसे यह नहीं पता था कि जिसे वह चाहती है, वही आज उसकी छाती में खंजर उतार देगा। बब्बू और सत्य नारायण ने लपककर सुनीता को दबोच लिया। तब भी उसने खजाने के बारे में नहीं बताया, तो बदमाशों ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद तीनों आरोपी खुद ही पूरे घर में सोने का घड़ा खोजने लगे। इस बीच अपने कमरे से निकलकर पूजा आ गई। उसने जयभान को पहचान लिया। वह उन तीनों का राज फाश कर सकती थी, इसलिए तीनों ने मिलकर पूजा को भी मौत के घाट उतार दिया। इसके बावजूद बदमाशों को दफीना हाथ नहीं लगा। घर में जो धन-दौलत थी, उसी को समेट कर वे भाग निकले। पुलिस ने इस मामले के दोनों अन्य आरोपियों को भ•ाी गिरफ्तार कर तीनों को जेल भ•ोज दिया है।
मुठभ•ोड़ में सरगना की मौत
गांव के लोगों का कहना है कि छत्रधारी साहू को अपने खेत में जो घड़ा मिला था, उसमें सोने-चांदी के लाखों रुपये के आभ•ाूषण थे। डाकू सरगना ने उसे पहचान बनाकर खेत में मिट्टी के नीचे गाड़ दिया था। बाद में दस्यु सरदार की एक दूसरे मामले के दौरान पुलिस मुठभ•ोड़ में मौत हो गई। खजाने के बारे में सरगना ने अपने साथियों को भी कुछ नहीं बताया था। चारों हत्याओं के बाद पुलिस ने छत्रधारी साहू के घर की बहुत छानबीन की, लेकिन उस खजाने का कुछ पता नहीं चला। आरोपियों को भी वह खजाना हाथ नहीं लगा।

- जितेंद्र बच्चन