शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

  1. यूपी बार काउंसिल की अध्यक्ष दरवेश सिंह की यहत्या की गुत्थी और उलझी


आठ चश्मदीदों में से चार के बयान के बाद इस मामले की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ गई है। हत्या करने वाले वकील की भी मौत हो गई।

जितेन्द्र बच्चन
दो दिन पहले ही दरवेश सिंह यादव का सितारा बुलंदियों पर पहुंचा था। वह उत्तर
प्रदेश बार एसोसिएशन की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गई थीं। उन्होंने यूपी बार काउंसिल में इतिहास रचा था। देश-प्रदेश के तमाम लोग उन्हें बधाईयांदे रहे थेतभी 12 जून का वह मनहूस दिन आया। आगरा की दीवानी कचहरी के वरिष्ठ वकील अरविंद मिश्रा के चेंबर में अधिवक्ता मनीष शर्मा ने लाइसेंसी रिवाल्वर से दरेवश की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद खुद की कनपटी पर भी गोली मारकर आत्महत्या करने की कोशिश की है
गोलियों की गूंज से कचहरी परिसर में तहलका मच गया। वकील-जज सभी सन्न रह ग। दरवेश और मनीष कई साल से एकसाथ काम कर रहे थे।मनीष करीब-करीब उनका सारा कामकाज देखता थाफिर ऐसा क्या हुआ कि उसी ने दरवेश को गोली मारकर मौत के घाट उतार दियाआगरा पुलिस के आला अफसर मौके पर पहुंच गए। दरवेश को तीन गोली मारी गई थी। मनीष की सांस अभी चल रही थी। उसे फौरन नजदीक के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। तब तक आगरा के एडीजी अजय आनंद भी मौके पर आ गए। उनके दिशा-निर्देश पर थाना कोतवाली न्यू आगरा पुलिस ने दरवेश का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजकर मामले की गहन जांच-पड़ताल शुरू कर दी है।
दरवेश सिंह यादव मूलत: एटा उत्तर प्रदेश की रहने वाली थीं। आगरा कॉलेज से
विधि स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर आगरा
विश्वविद्यालय से एलएलएम किया। 2004 में वकालत शुरू की। 2012 में पहली
बार वह बार एसोसिएशन की सदस्य बनीं। 2016 में बार काउंसिल की उपाध्यक्ष और 2017 में कार्यकारी अध्यक्ष चुनी गईं। जून, 2019 को प्रयागराज में यूपी बार काउंसिल का चुनाव हुआ तो दरवेश यादव प्रदेश के बार काउंसिल के इतिहास में पहली महिला अध्यक्ष चुनी गईं।
दरवेश की किसी से कोई दुश्मनी-अदावत नहीं थी। दरवेश के भाई पंजाब सिंह यादव के बेटे सनी यादव ने थाना न्यू आगरा में इस मामले में तीन लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कराया है। आरोपितों में अधिवक्ता मनीष शर्माउसकी पत्नी वंदना शर्मा और विनीत गुलेचा शामिल हैं। दरवेश के मौसेरे भाई मनोज यादव का कहना है कि दरवेश पिछले चार साल से बार कौंसिल की उपाध्यक्ष थीं। बार कौंसिल से मनीष दरवेश के नाम पर पैसा लेता रहा। उसने 50 लाख का गबन किया था। जब भी हिसाब मांगा जातावह आनाकानी करने लगता।
मनोज यादव बताते हैं, “मनीष बार कौंसिल का चुनाव लड़ना चाहता था। दरवेश के
चुनाव जीतने पर वह दीदी से जलने लगा था। मनमुटाव होने के बाद दरवेश अपना चेंबर छोड़कर अरविंद मिश्रा के चेंबर में बैठने लगी थीं। मनीष ने उनके चेंबर पर कब्जा कर लिया था। 12 जून को दरवेश का आगरा दीवानी परिसर में अभिनंदन होना था। दरवेश अरविंद मिश्रा के चेंबर में थीं। दोपहर करीब दो बजे मनीष कार्यक्रम में आया और आते ही उसने दरवेश के साथ अभद्रता करनी शुरू कर दी। दरवेश ने विरोध किया तो बात और बढ़ गई। गुस्से में मनीष ने पहले मनोज पर गोली चला। वह बच गया तो उसने दरवेश को गोली मार दी। वह मौके पर ही ढेर हो गईं।
वरिष्ठ वकील अरविंद मिश्रा कहते हैं, “वारदात के वक्त मनीष शर्मा हमारे चेंबर में समझौते के लिए आया था। दरवेश और मनीष करीब चार घंटे तक साथ रहे। बाद में मनीष को किस बात पर क्यों गुस्सा आयाहमें नहीं मालूम पर यह सच है कि मनीष बहुत पहले से दरवेश के बैंक खाते आदि देखता था।
एसएसपी के अनुसार इस घटना के आठ चश्मदीद गवाह हैं। चार लोग चेंबर के अंदर
थे और चार लोग बाहर थे। एक चश्मदीद का कहना है कि मौके पर इंस्पेक्टर
सतीष यादव मौजूद थे। उसे देखते ही मनीष शर्मा को गुस्सा आ गया और उसने दरवेश को गोली मार दी। इंस्पेक्टर यादव मैनपुरी पुलिस लाइन में तैनात हैं। दो अन्य चश्मदीदों ने भी इस बात की तस्दीक की है कि इंस्पेक्टर सतीश यादव मौका-ए-वारदात पर मौजूद थेलेकिन 20 जून की शामथाना न्यू आगरा में इंस्पेक्टर सतीश यादव ने अपने बयान में कहा है, मैं घटना के वक्त चेंबर में मौजूद नहीं था और न ही हमें यह मालूम है कि मनीष को गुस्सा क्यों आया?
इस विरोधाभाषी बयान से मामले की गुत्थी और उलझ गई है। घटना के आठ चश्मदीदों में से चार के बयान अब तक हो चुके हैं, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हुआ कि मनीष ने यह वारदात क्यों कीपुलिस की उम्मीद अब बाकी के चार गवाहों और 12 जून से गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती हत्यारोपित अधिवक्ता मनीष शर्मा के बयान पर टिकी है। मनीष को अभी होश नहीं आया है। उन्हें वेंटिलेटर के सहारे रखा गया है। बाकी के इस मामले के दो आरोपितों वंदना शर्मा और विनीत गुलेचा को तफ्तीश कर रहे थाना न्यू आगरा कोतवाली के इंसपेक्टर अजय कौशल ने 22 जून को निर्दोष बताया है।
दरवेश यादव के भतीजे पार्थ ने मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। दिल्ली की वकील इंदू कौल ने भी 21 जून को सीबीआई जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस सूर्यकांत की अवकाशकालीन पीठ के सामने प्रस्तुत याचिका में दरवेश यादव के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा दिलाने के साथ ही पूरे देश की अदालतों में महिला वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले की अगली सुनवाई 25 जून को करेगा।

रविवार, 22 जुलाई 2018

मुन्ना बजरंगी हत्याकांड: किसकी साजिश, कौन सूत्रधार?



-जितेन्द्र बच्चन
सोमवार की सुबह करीब 6.10 बजे उत्तर प्रदेश की बागपत जेल में पूर्वांचल के कुख्यात माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। लखनऊ से लेकर दिल्ली-मुंबई तक जिस बजरंगी का आतंक था, 40 से ज्यादा हत्याएं कर चुका था, लूट, अपहरण और रंगदारी जैसी कई संगीन वारदात को अंजाम दे चुका था, सरकार ने सात लाख का इनाम घोषित कर रखा था, उसी को गोलियों से भून दिया गया। वह भी जेल के अंदर। इतनी बड़ी साजिश! पुलिस के साथ-साथ सियासी हल्के में भी हड़कंप मच गया- किसने रची साजिश, कौन है सूत्रधार? क्या किसी सफेदपोश के इशारे पर इस वारदात को अंजाम दिया गया या फिर वर्दीवाले बिक गए? आखिर इस कत्ल का मकसद क्या है और कौन है कातिल?
51 वर्षीय प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर के पूरेदयाल गांव का रहने वाला था। पिता का नाम पारस नाथ सिंह है। वह मुन्ना को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे, लेकिन बेटे को फिल्मों की तरह गैंगस्टर बनने का शौक हो गया। पिता के अरमानों को कुचलते हुए 5वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी और किशोर उम्र में ही जुर्म की राह पर चल पड़ा। महज 17 साल की उम्र में उसके खिलाफ जौनपुर के थाना सुरेरी में मारपीट और अवैध असलहा रखने का मामला दर्ज हुआ।
1980 आते-आते मुन्ना अपराध की दुनिया में एक अलग पहचान बनाने लगा। इसी दौरान जौनपुर के स्थानीय दबंग माफिया गजराज सिंह ने उसे संरक्षण दे दिया। मुन्ना के हौंसले और बुलंद हो गए। वर्ष 1984 में मुन्ना ने लूट के लिए एक व्यापारी की हत्या कर दी। इसके बाद गजराज के इशारे पर जौनपुर के भाजपा नेता रामचंद्र सिंह का भी मर्डर कर दिया। फिर तो पूर्वांचल में मुन्ना बजरंगी की तूती बोलने लगी।
1990 में मुन्ना पूर्वांचल के बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी की गैंग में शामिल हो गया। वह मऊ से अपनी गैंग संचालित कर रहे थे पर वर्चस्व पूरे पूर्वांचल पर था। करीब छह साल बाद मुख्तार ने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा। वह 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर मऊ से विधायक निर्वाचित हुए। मुख्तार की ताकत बढ़ गई। उनके निर्देश पर मुन्ना सरकारी ठेकों को भी अब प्रभावित करने लगा था।
उधर उन्हीं दिनों भाजपा विधायक कृष्णानंद राय भी तेजी से आगे बढ़ने लगे। पूर्वांचल में सरकारी ठेकों और वसूली के कारोबार पर उनका कब्जा होने लगा। दरअसल, कृष्णानंद पर मुख्तार अंसारी के दुश्मन ब्रिजेश सिंह का हाथ था। कृष्णानंद का गैंग तजी से फलने-फूलने लगा। दोनों गैंग के मुखिया अपनी-अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अंडरवर्ल्ड के साथ भी जुड़ गए। बाद में कृष्णानंद मुख्तार की आंख की किरकिरी बन गए। उसने चुनौती बन रहे कृष्णानंद का काम तमाम करने का मन बना लिया। यह जिम्मेदारी मुन्ना बजरंगी को दी गई। मुन्ना ने मुख्तार के निर्देश पर 29 नवंबर, 2005 को दिनदहाड़े कृष्णानंद राय को गोलियों से भून दिया।
मुन्ना और उसके साथियों ने लखनऊ हाईवे पर गाजीपुर से बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की दो गाड़ियों पर एके- 47 से 400 गोलियां बरसाई थीं। वारदात में राय के अलावा उनके साथ चल रहे छह अन्य लोग भी मारे गए थे। इन सभी के शरीर से पोस्टपार्टम के दौरान 60 से 100 तक गोलियां बरामद हुईं थीं। इस घटना के बाद मुन्ना बजरंगी के नाम से हर कोई खौफ खाने लगा। कानून की नजर में वह मोस्ट वॉन्टेड बन गया। हत्या, अपहरण और वसूली के कई मामले उस पर अब तक दर्ज हो चुके थे। सरकार ने मुन्ना बजरंगी पर सात लाख रुपये का इनाम घोषित कर दिया। सीबीआई, उत्तर प्रदेश पुलिस और एसटीएफ उसे तलाशने लगी।
मुन्ना लगातार लोकेशन बदलता रहा। पुलिस का दबाव भी लगातार बढ़ता गया। यूपी, बिहार और दिल्ली में रहना मुश्किल हो गया तो मुन्ना भागकर मुंबई पहुंच गया। वहां एक लंबा अरसा उसने गुजारा। अंडरवर्ल्ड के लोगों से रिश्ते गहरे हो गए। उन्हीं दिनों लोकसभा चुनाव होने लगा तो उसने गाजीपुर लोकसभा सीट पर एक महिला को डमी उम्मीदवार बनाने की कोशिश की। इस बात को लेकर मुन्ना के मुख्तार अंसारी से संबंध खराब हो गए। उधर राय की हत्या के चलते भाजपा भी मुन्ना को दरकिनार कर चुकी थी। ऐसे में उसने कांग्रेस का दामन थाम लिया।

लेकिन अपराधी कितना भी चालक क्यों न हो, कानून से ज्यादा गुनाह की उम्र नहीं होती। दिल्ली पुलिस ने 29 अक्टूबर, 2009 को दिल्ली के विवादास्पद एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह की हत्या में हाथ होने के शक में मुंबई के मलाड इलाके से मुन्ना को गिरफ्तार कर लिया। तब से उसे अलग-अलग जेलों में रखा जा रहा था। इसके बावजूद वह जेल से लोगों को धमकाने, वसूली करने जैसे मामलों को अंजाम देता रहा। खुद मुन्ना का दावा था कि वह 20 साल में 40 हत्याएं कर चुका है।
रविवार, 08 जुलाई को मुन्ना बजरंगी को झांसी जेल से बागपत जेल में शिफ्ट किया गया था। बसपा के पूर्व विधायक लोकश दीक्षित और उनके भाई नारायण दीक्षित से 22 सितंबर, 2017 को फोन पर रंगदारी मांगने और धमकी देने के मामले में मुन्ना को सोमवार को कोर्ट में पेशी थी। उसी सुबह बागपत जेल में गोली मारकर उसकी हत्या कर दी गई। सिर और सीने पर कुल 10 गोलियां मारी गई थीं। मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह की तहरीर पर थाना खेखड़ा पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी है। मुन्ना बजरंगी के वकील विकास श्रीवास्वत का कहना है कि माफिया सुनील राठी ने उसकी हत्या की है। पुलिस ने कत्ल में इस्तेमाल पिस्टल जेल की गटर से बरामद कर लिया है। साथ ही आरोपी सुनील राठी से कड़ी पूछताछ जारी थी।
पुलिस तीन एंगल से गैंगस्टर सुनील राठी से पूछताछ कर रही है।
उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपराध जगत में सुनील राठी कुख्यात है। हाल ही में राठी को रुड़की जेल से बागपत शिफ्ट किया गया था। राठी का भाई पूर्वांचल की जेल में बंद है, जहां उसके साथ हाल ही में कुछ कैदियों ने जेल में दबदबे को लेकर मारपीट की थी। राठी को शक था कि उसके भाई के साथ मारपीट करने वाले मुन्ना बजरंगी के गुर्गे थे। दूसरा, सुनील राठी का उत्तराखंड में बड़ा वर्चव था। वहां की जेल में रहते हुए राठी कारोबारियों से अवैध वसूली कर रहा था। मुन्ना की नजर भी उत्तराखंड पर थी। तीसरा कारण किसी ने मुन्ना बजरंगी की हत्या की सुपारी दी थी।
लेकिन 09 जुलाई को बागपत जिला अस्पताल में मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि इस हत्याकांड की साजिश में केंद्रीय रेलमंत्री मनोज सिन्हा, पूर्व सांसद धनंजय सिंह और कृष्णानंद राय की पत्नी व भाजपा विधायक अलका राय शामिल हैं। इन्हीं लोगों ने शासन-प्रशासन से मिलकर मुन्ना बजरंगी की हत्या करवाई है। ये लोग नहीं चाहते थे कि वह राजनीति में आगे जाएं। सीमा ने यह भी कहा कि इससे पहले भी उसके पति पर कई बार हमले हो चुके हैं। इसकी शिकायत हमने मुख्यमंत्री से भी की थी और सुरक्षा की गुहार लगाई थी, लेकिन हमारी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।
फिलहाल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं। एडीजी जेल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बागपत के जेलर उदय प्रताप सिंह, डिप्टी जेलर शिवाजी यादव, हेड वार्डन अरजिंदर सिंह और बैरक के प्रभारी माधव कुमार को निलंबित कर दिया है। कारागार की व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित रहे, इसके लिए जिला कारागार गौतमबुद्धनगर के जेलर सुरेश कुमार सिंह को तैनात किया गया है। सीमा सिंह ने मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। वहीं इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला है कि जेल में पिस्टल कैसे पहुंचा? और जेल में जिस सेल के पास मुन्ना बजरंगी को गोली मारी गई, वहां के सीसीटीवी खराब क्यों थे?
सवाल और भी हैं। जैसे हत्या के वक्त बैरक के पास लगा सीसीटीवी काम नहीं कर रहा था। क्या ऐसा जान-बूझकर किया गया था या यह सिर्फ जेल प्रशासन की लापरवाही है? जिस तरह से हाई सिक्योरिटी बैरक में हत्यारे ने गोली मारकर फोटो खींची, इससे साफ है कि वो पूरे इत्मिनान में था कि काम होने तक उसे कोई पकड़ने नहीं आएगा। कहीं जेल प्रशासन या सिस्टम का आदमी हत्यारे से मिला हुआ था? इसके अलावा एक और सवाल बड़ा है, कहीं सरकारी मशीनरी ने ही मुन्ना बजरंगी को सोची-समझी साजिश के तहत ठिकाने तो नहीं लगा दिया?
अब नियमित होगा जेलों का निरीक्षण
जेलों में बिगड़ी व्यवस्था को सुधारने के लिए अब कड़ी नजर रखी जायेगी। वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जेलों का निरीक्षण भी अब नियमित होगा। लापरवाही पर विधिक कार्रवाई की जायेगी। शासन भी इस मामले को लेकर गंभीर है और जेलों के अंदर की व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए एक प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एक कमेटी का गठन किया गया है।
- चन्द्र प्रकाश, अपर पुलिस महानिदेशक, जेल

यूपी की जेलों में पहले भी हो चुका है खूनखराबा
15 मार्च, 2005 : वाराणसी के केंद्रीय कारागार में मुन्ना बजरंगी के शार्प शूटर अनुराग उर्फ अन्नू त्रिपाठी की गोली मारकर हत्या। अन्नू त्रिपाठी बंशीलाल यादव की हत्या के आरोप में वाराणसी की जेल में बंद था।
16 मार्च, 2012 : कानपुर देहात के माती जेल में  सजायाफ्ता बंदी रामशरण सिंह भदौरिया की संदिग्ध हालत में बैरक के अंदर ही हुई मौत। इस मामले में बंदियों का आरोप था कि वसूली को लेकर जेल के सुरक्षा कर्मियों ने देर रात रामशरण की पिटाई की थी, जिससे उसकी मौत हो गयी।
18 अप्रैल, 2012 : मेरठ के कारागार में जेल अधिकारियों द्वारा जेल के अंदर तलाशी के दौरान कैदियों ने बवाल कर दिया। स्थिति को संभालने के लिए गोली चलानी पड़ी, जिसमें एक बंदी मेहरादीन पुत्र बाबू खां और कैदी सोमवीर ने दम तोड़ दिया।
14 फरवरी, 2014 : गाजीपुर जेल में निरीक्षण के दौरान जिला प्रशासन के अधिकारियों व कैदियों के बीच कहासुनी खूनी संघर्ष में तब्दील हो गई। आक्रोशित कैदियों को काबू में करने के लिए बल  प्रयोग में एक बंदी विश्वनाथ प्रजापति की मौत हो गयी।
17 जनवरी, 2015 : मथुरा की जेल में बंदियों के दो गुट आपस में भिड़ गए। इस दौरान एक बंदी द्वारा रिवाल्वर से दूसरे बंदी पिन्टू उर्फ अक्षय सोलंकी पुत्र सत्येन्द्र सोलंकी की हत्या कर दी थी।
26 मार्च, 2017 : फर्रूखाबाद के फतेहगढ़ जिला जेल में  थी को सही समय पर इलाज न मुहैया कराये जाने पर कैदियों ने हंगामा शुरु कर दिया। जेलकर्मियों पर पथराव कर जेल के भंडार गृह में आग लगा दी थी। बवाल में प्रभारी जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी और जेल अधीक्षक समेत कई अधिकारियों को चोटें आयी थीं।
21 मई, 2017 : कन्नौज जनपद के अनोगी जेल में जेलरों द्वारा एक कैदी की पिटाई से नाराज कैदियों ने देर रात बवाल कर दिया। शांत कराने के लिए पहुंचे जेल अधीक्षक यूपी मिश्रा को घेरकर कैदियों ने हाथापाई शुरू कर दी। जेलर को बचाने पहुंचे डिप्टी जेलर सुरेन्द्र मोहन तो कैदियों ने उनको जमकर पीटा था।
19 दिसम्बर, 2017 : जौनपुर की जिला जेल में कैदियों के दो गुटों के बीच बवाल हो गया था। इस खूनी संघर्ष में कुख्यात अपराधी प्रमोद राठी सहित छह बदमाश घायल हुए थे।

रविवार, 17 जून 2018

शशि थरूर हाजिर हो!


-जितेन्द्र बच्चन
कानून के कटघरे में शशि थरूर। उधड़ने लगीं सुनंदा पुष्कर की मौत की परतें। टूटने लगा 17 जनवरी 2014 की रात का तिलस्म। दिल्ली पुलिस का संगीन इल्जाम। कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता का चेहरा बेनकाब। करीब चार साल तक एक शख्स बड़े-बड़े अधिकारियों के लिए छलावा बना रहा। मामले की तफतीश में लगी दिल्ली पुलिस भी गच्चा खा गई, लेकिन उसी की एसआईटी के कुछ अफसरों की नजर अर्जुन की तरह सिर्फ और सिर्फ मछली की आंख पर लगी रही। तीर निशाने पर बैठा और कोर्ट में पेश तीन हजार पेज की चार्जशीट पर अदालत ने 5 जून, 2018 को संज्ञान ले लिया- शशि थरूर हाजिर हो!
5 जून, 2018 को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल ने दिल्ली पुलिस की एसआईटी की चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए कहा है, ''दलीलें सुनने के बाद इस मामले में चार्जशीट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर केस आगे बढ़ाया जा सकता है। पुलिस की रिपोर्ट में शशि थरूर पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने और उनके साथ क्रूर तरीके से पेश आने के आरोपी हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार है।'' अदातल ने शशि थरूर को 7 जुलाई को इस मामले में हाजिर होने का आदेश दिया है।
पुलिस का दावा है कि थरूर के खिलाफ आरोपों की जांच पेशेवर तरीके से की गई है और कोर्ट में वह अपने आरोपों का बचाव करेगी। वहीं थरूर के वकील विकास पाहवा ने कोर्ट के फैसले पर कहा कि शशि थरूर ने कोई गुनाह किया ही नहीं है। सारा केस मनगढ़ंत है। चार्जशीट से निपटने के लिए हमारे पास सभी कानूनी रास्ते खुले हुए हैं। खुद कांग्रेस नेता थरूर ने भी एक बयान में कहा है, ''इस मामले की शुरुआत से ही मैंने जांच में पूरा सहयोग किया और सभी तरह से कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया। पुलिस की चार्जशीट मनगढ़ंत और बदले की भावना से तैयार की गई है। यह हमारी छवि धूमिल करने की साजिश का हिस्सा है। आखिर में जीत सत्य की होती है।'' इससे पहले थरूर ने अपने एक ट्वीट में चार्जशीट को हास्यास्पद बताया था और कहा था- ''जो कोई भी सुनंदा को जानता था, उसे यह बात पता है कि केवल मेरे उकसाने से वह आत्महत्या नहीं कर सकती है। यह अविश्वसनीय है।''
फिलहाल, पुलिस का मानना है कि शशि थरूर के खिलाफ पर्याप्त सबूत (यथावत के 01 से 15 जून के अंक में प्रकाशित) मौजूद हैं। मार्च 2018 में आई सीक्रेट रिपोर्ट की मानें तो पुलिस को पहले दिन से पता था कि सुनंदा की हत्या की गई है। दिल्ली पुलिस के डिप्टी कमिश्नर बी. एस. जायसवाल ने जो पहली रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें साफ तौर पर जिक्र था कि वसंत विहार के एसडीएम आलोक शर्मा ने निरीक्षण के बाद कहा था कि यह सुसाइड नहीं है। इस आधार पर सरोजिनी नगर थाना के एसएचओ को इस मामले की जांच हत्या के तौर पर भी करने को कहा था।
ज्ञात रहे कि 17 जनवरी, 2014 की रात दिल्ली के लीला होटल के कमरा नंबर 345 में सुनंदा पुष्कर संदिग्ध हालात में मृत मिली थीं। उनकी बॉडी होटल के एक कमरे में बेड पर पड़ी थी। दिल्ली पुलिस ने जांच शुरू की और एक साल बाद मर्डर केस दर्ज किया था। अदालत में दिल्ली पुलिस ने सुनवाई के दौरान यह भी बताया कि मौत से दो दिन पहले सुनंदा पुष्कर ने एक बेहद उदासी भरी कविता लिखी थी। उन्होंने लिखा था कि वह जीना नहीं, मरना चाहती हैं। कथित तौर पर इससे एक दिन पहले सुनंदा और पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के बीच ट्विटर पर बहस हुई थी। यह बहस शशि थरूर के साथ मेहर के कथित ‘अफेयर’ को लेकर हुई थी। पुलिस ने सुनंदा की कविता को चार्जशीट का हिस्सा बनाया है। साथ ही थरूर के नौकर नारायण सिंह को मुख्य गवाह बनाया है।
7 जुलाईको मामले की अगली सुनवाई एडिशल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (एसीएमएम) समर विशाल की अदालत में होगी। भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि वह इस केस में हस्तक्षेप याचिका दायर कर आईपीसी की धारा 201 (साक्ष्यों को नष्ट करने) और 302 (हत्या) को भी जोड़ने की मांग करेंगे। अब आगे क्या होगा, यह तो वक्त के गर्भ में है, लेकिन इतना निश्वित है कि 3000 पन्नों की चार्जशीट में सांसद शशि थरूर अकेले आरोपी हैं। इसमें आईपीसी 498ए (महिला पर क्रूरता के लिए पति या उसका कोई संबंधी जिम्मेदार) और आईपीसी 306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) का जिक्र है। अगर इन दोनों धाराओं के तहत शशि थरूर दोशी पाए जाते हैं तो 498ए में अधिकतम तीन साल और दफा 306 में 10 साल की सजा हो सकती है।

रविवार, 3 जून 2018

सुनंदा मामले में थरूर पर कसेगा कानून का शिकंजा


-जितेन्द्र बच्चन
तकदीर का सितम कहें या फिर कुछ और, सुनंदा पुष्कर जीते जी जितनी सुर्खियों में रहीं, मौत के बाद भी वे उतनी ही सुर्खियों में हैं। कश्मीर मूल की सुनंदा की जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महिलाओं पर लिखी प्रसून जोशी की एक कविता वह अक्सर गुनगुनाती रहतीं- ‘नारी हूं मैं, मजबूरी या लाचारी नहीं। खुद अपनी जिम्मेदारी हूं मैं, नारी हूं मैं...।’ जिन मुद्दों पर बड़े-बड़े नेता बयान देने से बचते हैं, उन पर सुनंदा बेबाकी से राय रखतीं। लेकिन उनकी मौत का रहस्य आज भी बरकरार है। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इतनी तरक्कीपसंद महिला का अंत इस तरह होगा।
करीब सवा चार साल बाद 14 मई, 2018 को सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में दिल्ली पुलिस की एसआइटी (विशेष जांच दल) ने पटियाला हाउस कोर्ट में चार्जशीट दायर की है। एसआईटी ने आत्महत्या के लिए उकसाने और प्रताड़ना की धाराओं के तहत करीब 3000 पेज की चार्जशीट में पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर को मुख्य संदिग्ध आरोपी माना है। उन्हें कॉलम नंबर 11 में रखा गया है, लेकिन निचली अदालत और हाई कोर्ट की तमाम फजीहत के बाद दिल्ली पुलिस ने जो चार्जशीट पेश की है, उससे उसकी मंशा पर ही सवाल उठने लगे हैं। खुद थरूर ने कहा है, '17 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली हाई कोर्ट में मामले के जांच अधिकारी ने बयान दिया था कि इस केस में उन्हें किसी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है। अब छह महीने बाद वह कह रहे हैं कि मैंने सुनंदा को खुदकशी के लिए उकसाया है। यह अविश्वसनीय है।'
दरअसल 17 जनवरी, 2014 की रात दिल्ली के होटल लीला पैलेस के कमरा नंबर 345 से मौत की जो पहेली बाहर निकली, उसकी गुत्थी आज तक नहीं सुलझी है। फाइव स्टार के उस होटल में सुनंदा का शव मिला था। 20 जनवरी की प्रथम पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि सुनंदा की मौत दवा के ओवरडोज से हुई है। यानी दवा जहर बन गई, लेकिन दवा का ओवरडोज सुनंदा ने जान-बूझकर लिया या फिर अनजाने में? इसे खुदकुशी कहेंगे या फिर गलती से हुई मौत, यह गुत्थी नहीं सुलझी तो सुनंदा के शव का दोबारा पोस्टमार्टम कराया गया। एम्स के मेडिकल बोर्ड ने 29 सितंबर, 2014 की रिपोर्ट में बताया कि सुनंदा की मौत जहर से हुई है। लेकिन वह जहर कौन-सा था, इसके बारे में बोर्ड नहीं बता पाया। नतीजतन मौत का रहस्य बरकरार रहा।
पुलिस की तफ्तीश में इस बीच एक और बात पता चली कि घटना से एक दिन पहले सुनंदा और पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के बीच ट्विटर पर बहस हुई थी। यह बहस शशि थरूर के साथ मेहर के कथित ‘अफेयर’ को लेकर हुई थी। थाना सरोजनी नगर पुलिस ने एक जनवरी, 2015 को अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर शशि थरूर सहित कई व्यक्तियों से पूछताछ की। थरूर के घरेलू सहायक नारायण सिंह, चालक बजरंगी और दोस्त संजय दीवान का पॉलीग्राफ टेस्ट भी कराया गया, लेकिन सुनंदा की मौत का कोई सुराग नहीं मिला। तब सुनंदा के विसरा को जांच के लिए एफबीआई लैब अमेरिका भेजा गया। वहां की लैब में भी जहर के बारे में पता नहीं लग सका।
सुनंदा पुष्कर (51) की पहचान सिर्फ केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री रहे शशि थरूर की पत्नी तक ही सीमित नहीं थी। वह एक सफल बिजनेस वुमन थीं और उनकी खुद की संपत्ति 100 करोड़ से अधिक है। हाई प्रोफाइल सुनंदा ने जीवन का सफर जम्मू कश्मीर की हसीन वादियों से शुरू कर दुबई की तपती रेत तक भरपूर जिया। इतना जिया कि लोगों को उनकी शख्शियत पर रश्क होता। मूल रूप से कश्मीर के सोपोर जिले के बंमई गांव की रहने वाली सुनंदा का जन्म 01 जनवरी, 1962 को हुआ था। बाद में कश्मीर में आतंकी घटनाएं बढ़ने लगीं तो परिवार जम्मू आ गया। पिता पुष्कर नाथ दास आर्मी में लेफ्टीनेंट कर्नल थे, जबकि सुनंदा का एक भाई सेना में उच्चाधिकारी है और दूसरा डॉक्टर है।
19 साल की उम्र में सुनंदा की कश्मीरी ब्राह्मण संजय रैना के साथ पहली शादी हुई थी। रैना उन दिनों दिल्ली के एक होटल में कार्यरत थे। सुनंदा भी एक होटल में रिसेप्शनिस्ट थीं, लेकिन दोनों का वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं गुजरा। वर्ष 1988 में दोनों का तलाक हो गया। आजाद ख्याल की सुनंदा ने वर्ष 1989 में दिल्ली का रुख कर लिया, जहां वह हाई प्रोफाइल पार्टियों की जान बन गर्इं, फिर एक रोज अपना जहां तलाशने के लिए सुनंदा ने दुबई की फलाइट पकड़ ली और वहां 1991 में केरल के व्यवसायी सुजीत मेनन के साथ दूसरी शादी कर ली। दोनों ने कुछ लोगों के साथ मिलकर एक्सप्रेशंस नामक एक कंपनी बनाई, जो कई प्रोडक्ट लांच कराए और मॉडल हेमंत त्रिवेदी, विक्त्रम फड़नीस, ऐश्वर्या रॉय के साथ कई शो भी आयोजित किए। इसके बाद सुनंदा को एक बड़ी विज्ञापन कंपनी के साथ काम करने का मौका मिला। उनकी जिंदगी का यह सबसे अच्छा दौर था। दुबई में ही उन्होंने बेटे शिव मेनन को जन्म दिया।
बला की खूबसूरत थीं सुनंदा। लोग उन्हें दुबई में ब्यूटीशियन के तौर पर भी जानते थे, लेकिन खुद सुनंदा मीडिया की सुर्खियों में तब आर्इं, जब तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर के साथ उनकी शादी हुई। इससे पहले उन्हें कोई नहीं जानता था कि वे क्या हैं और क्या करती हैं, लेकिन दिल्ली की चमक और महत्वाकांक्षा की सीढ़ी ने जल्द ही सुनंदा को देश-विदेश की हाई प्रोफाइल सोसाइटियों में प्रसिद्धि दिलवा दी। शशि थरूर के साथ उनकी जोड़ी को लोग खूब सराहते। खुद सुनंदा और थरूर भी अपने दांपत्य को लेकर बहुत खुश नजर आते पर उनकी इस खुशी को न जाने किसकी नजर लगी कि सुनंदा की मौत हो गई। ऐसी मौत, जिसकी गुत्थी पुलिस आज तक नहीं सुलझा पाई।
भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 30 अगस्त, 2017 को हाई कोर्ट में कहा था, 'सुनंदा केस मर्डर के अलावा मनी लांड्रिंग से जुड़ा हुआ है, जिसकी जांच होना बहुत जरूरी है। हो सकता है कि सुनंदा का मर्डर इसीलिए किया गया हो।' उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि पुलिस इस बात पर अपना समय क्यों बर्बाद कर रही है कि सुनंदा को ज़हर कौन-सा दिया गया? जांच तो इसकी होनी चाहिए कि जहर क्यों और किसने दिया?' हाई कोर्ट ने भी दिल्ली पुलिस को जमकर फ़टकारते हुए कहा कि तीन साल से ज्यादा बीत जाने के बाद भी आप लोग किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं। 2014 के मामले में अब तक न आपके पास कोई स्टेटस रिपोर्ट है और न ही आप चार्जशीट फ़ाइल कर पाए हैं।
05 सितंबर, 2017 को पटियाला कोर्ट में इस मामले की सुनवाई थी। उस रोज महानगर दंडाधिकारी धर्मेन्द्र सिंह ने भी नराजगी जाहिर करते हुए संबंधित पुलिस उपायुक्त को कोर्ट में पेश होने का निर्देश देते हुए पूछा कि पुलिस बताए कि उसे इस मामले की जांच के लिए अब और समय क्यों दिया जाए? अदालतों का सख्त रुख देखते हुए 15 सितंबर को गृह मंत्रालय ने भी इस मामले में दिल्ली पुलिस को एक पत्र लिखकर सुनंदा पुष्कर के विसरा नमूने को एफबीआई प्रयोगशाला से भारत वापस लाने के लिए कहा। उसके बाद 18 सितंबर को मामले में गठित एसआईटी के सदस्य डीसीपी (साउथ) ईश्वर सिंह की अगुवाई में एक टीम अमेरिका गई। वहां से लौटकर टीम ने ज्वॉइंट सीपी आरपी उपाध्याय को रिपोर्ट सौंप दी।
21 सितंबर, 2017 को दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की तरफ से हाई कोर्ट में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल संजय जैन पेश हुए। कोर्ट को बताया कि मामले की जांच आखिरी पड़ाव पर है। अगले आठ सप्ताह में पूरी हो जाएगी, लेकिन करीब सवा चार साल बाद 14 मई, 2018 को दिल्ली पुलिस की एसआईटी ने पटियाला हाउस कोर्ट में आईपीसी की धारा 306 और 498ए के तहत 3000 पेज की चार्जशीट पेश की। शशि थरूर इस चार्जशीट में अकेले आरोपी हैं। जांच में एसआईटी को हत्या के सबूत नहीं मिले। जो सबूत मिले हैं, उसके अनुसार सुनंदा को बहुत प्रताड़ित किया जाता था और उनकी पिटाई की जाती थी। एसआईटी का मानना है कि थरूर की प्रताड़ना से तंग आकर सुनंदा ने खुदकशी की थी और दिल्ली पुलिस ने थरूर को संदिग्ध आरोपी माना है। मामले की अगली सुनवाई 05 जून को होगी। उस रोज पटियाला हाउस कोर्ट शशि थरूर को समन कर सकता है। ऐसे में उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अब देखना यह है कि सुनंदा की मौत की गुत्थी सुलझती भी है या फिर यह मर्डर केस भी देश की अनसुलझी पहेलियों की फेहरिस्त में शुमार हो जाएगा?


इस केस से जुड़े सभी गवाहों और दस्तावेजों को यूपीए सरकार और भ्रष्ट पुलिस ने नष्ट कर दिया था। वर्तमान साक्ष्य के आधार पर चार्जशीट दाखिल हुई है। ट्रायल के दौरान अधिक सूचनाएं सामने आएंगी। शशि थरूर पर आरोप है कि उन्होंने सुनंदा पुष्कर को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया था।
- सुब्रमण्यम स्वामी, भाजपा नेता


'जो कोई भी सुनंदा को जानता था, उसे यह बात पता है कि अकेले मेरे उकसाने से वह खुदकशी नहीं कर सकती। सवा चार साल की जांच के बाद दिल्ली पुलिस का ऐसे नतीजों पर पहुंचना उसकी मंशा पर सवाल खड़े करता है। 17 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली हाई कोर्ट में जांच अधिकारी ने बयान दिया था कि इस केस में उन्हें किसी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है। अब छह महीने बाद वह कह रहे हैं कि मैंने खुदकशी के लिए उकसाया है। यह अविश्वसनीय है।
-शशि थरूर, पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता

महत्वपूर्ण घटनाक्रम: कब क्या हुआ
15 जनवरी 2014: सुनंदा पुष्कर ने होटल लीला पैलेस में चेक इन किया।
17 जनवरी 2014: शशि थरूर के आने पर दोनों सुइट नंबर 345 में शिफ्ट हुए।
17 जनवरी 2014: सुनंदा पुष्कर होटल के कमरे में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गईं। एसडीएम जांच बैठाई गई।
18 जनवरी 2014: डॉ. सुधीर गुप्ता, डॉ. आदर्श कुमार, डॉ. शशांक पुनिया की देखरेख में मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया।
19 जनवरी 2014: केरला इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के निदेशक डॉ. जी विजयराघवन ने मीडिया में बयान दिया कि सुनंदा को ऐसी कोई गंभीर बीमारी नहीं थी, जिससे कि अचानक उनकी जान चली जाती।
21 जनवरी 2014 : सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने अपनी रिपोर्ट में मौत का कारण जहर देना बताया। एसडीएम आलोक शर्मा ने पुलिस को हत्या, खुदकशी के दृष्टिकोण से मामले की जांच करने के लिए कहा।
23 जनवरी 2014: मामला क्राइम ब्रांच को सौंपा गया, लेकिन क्राइम ब्रांच ने केस लेने से मना कर दिया।
22 मार्च 2014: फोरेंसिक विभाग ने विसरा रिपोर्ट जारी कर बताया कि मौत का कारण जहर नहीं था। पुलिस ने फिर रिपोर्ट को एम्स भेजकर उसकी राय मांगी।
09 जून 2014: एम्स के फोरेंसिक विभाग के प्रमुख सुधीर गुप्ता ने कहा कि रिपोर्ट तैयार करने में उनपर दबाव बनाया जा रहा है।
02 जुलाई 2014 : एम्स ने सुधीर के आरोपों का खंडन किया और स्वास्थ्य मंत्री को रिपोर्ट सौंपी।
06 जनवरी 2015: दिल्ली पुलिस आयुक्त ने मीडिया को दिए बयान में सुनंदा पुष्कर मामले में हत्या की धारा के तहत मामला दर्ज किए जाने संबंधी बयान दिया।

मंगलवार, 8 मई 2018

दुष्कर्म का बापू

-जितेन्द्र बच्चन
कथावाचक आसाराम के भक्तों को गहरा आघात! स्वयंभू 'भगवान' आसुमल हरपलाणी उर्फ आसाराम को उम्रकैद। जोधपुर की जिला अदालत ने एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म करने के मामले में सुनाई सजा। जुर्म के इस दलदल में आसाराम के अलावा उसके दो सहयोगियों शिल्पी और शरतचंद्र को भी अदालत ने दोषी ठहराते हुए 20-20 साल की सजा सुनाई है। बाबा के तमाम रसूख कानून के आगे बौने पड़ गए। साजिश और फरेब के बल पर बटोरी गई जिन्दगी भर की अकूत दौलत गवाहों, सबूतों और तर्कों को खरीद नहीं सकी। करीब 77 साल के आसाराम की बाकी की जिंदगी अब सलाखों के पीछ ही कटेगी।
25 अप्रैल, 2018 को सेंट्रल जेल जोधपुर में एससी/एसटी की अदालत में जज मधुसूदन शर्मा के सजा का ऐलान करते ही आसाराम का चेहरा पीला पड़ गया। वह निढाल हो गया। कल तक जो शख्स लोगों को पाप-पुण्य का पाठ पढ़ाता था, आज अपने दुष्कर्मों का अहसास होते ही फूट-फूटकर रोने लगा। साल 2013 के अगस्त महीने की 16 तारीख को आसाराम के खिलाफ यूपी के शाहजहांपुर की एक लड़की ने उसे नंगा कर दिया। कोर्ट ने एक-एक कर आसाराम को कुल छह अपराध में दोषी करार दिया है। उसका हर गुनाह साबित हुआ है। आसाराम के बचाव में खड़ी वकीलों की फौज भी पॉक्सो एक्ट के आगे छोटी पड़ गई।
धारा 370(4) के तहत अदालत ने आसाराम को दोषी पाया है। इस जुर्म के लिए उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना न भरने की स्थिति में सजा एक वर्ष और बढ़ जाएगी। धारा 342 के तहत आसाराम अपराधी करार दिया गया है। इस अपराध के लिए उसे एक वर्ष का कठोर कारावास दिया गया है और 1000 रुपये का जुर्माना लगा है। जुर्माना न भरने की स्थिति में एक माह की अतिरिक्त कैद भोगनी पड़ेगी। धारा 506 के तहत आसाराम का जुर्म साबित हुआ है। इस जुर्म के लिए कोर्ट ने आसाराम को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है और 1000 रुपये का अर्थदण्ड लगाया है। धारा 376(2) (एफ) के तहत भी उसे दोषी पाया गया। इस अपराध के लिए उम्रकैद की सजा मिली है। इसी जुर्म के लिए आसाराम पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है, जिसे अदा न करने पर एक साल का कठोर कारावास बढ़ जाएगा। धारा 376 (डी) के तहत आसाराम अपराधी सिद्ध हुआ है। इसके लिए भी आसाराम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना न भरने की स्थिति में एक साल अतिरिक्त कठोर कारावास की सजा भुगतनी होगी। जबकि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम की धारा 23 के तहत भी आसाराम को अपराधी पाया गया। इसके लिए अदालत ने छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई है।
आसाराम के गुनाहों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि उसको दो-दो आजीवन कारावास और 12 वर्ष 6 माह की कठोर कैद की सजा मिली है। इसके अलावा कुल तीन लाख दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। शाहजहांपुर के एसपी कृष्ण बहादुर सिंह कहते हैं, 'आसाराम पर इल्जाम और तोहमत लगाने वालों की कमी नहीं है, लेकिन खुलासा करने का साहस इस जिले की लड़की ने ही दिखाया।' लड़की के पिता का इल्जाम था कि उनकी बेटी गई तो थी बाबा के गुरुकुल में शिक्षा, संस्कार और दीक्षा की आस लेकर, लेकिन दुष्कर्मी ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। 14 अगस्त, 2013 को  लड़की के माता-पिता अनुष्ठान के लिए बेटी को लेकर जोधपुर के आश्रम गए थे। वहां आसाराम ने उनके ठहरने का इंतजाम करवा दिया, लेकिन 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के दिन अनुष्ठान के बहाने आसाराम ने लड़की के साथ दुष्कर्म किया। लड़की ने विरोध किया तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई।
17 अगस्त को लड़की ने सारी बात घरवालों से बताई। माता-पिता पर पहाड़ टूट पड़ा। आसाराम 18 से 20 अगस्त तक दिल्ली के रामलीला मैदान में शिविर कर रहे थे। परिजनों के साथ पीड़ित लड़की दिल्ली पहुंच गई। मध्य जिला के थाना कमला मार्केट पुलिस से मिली। लड़की का मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत बयान हुआ। लड़की का मेडिकल कराया गया। दुष्कर्म की पुष्टि होते ही पुलिस ने आसाराम के खिलाफ रेप के साथ-साथ पॉस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई के लिए मुकदमा जोधपुर पुलिस को स्थानांतिरत कर दिया।
1941 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पैदा हुए आसाराम का परिवार देश के विभाजन के समय गुजरात आ गया था। यहां करीब 10 एकड़ उपजाऊ जमीन मिल गई, जिसमें आसाराम ने अपना पहला आश्रम बनाया। सथ ही उन्होंने अपना सरनेम बापू कर लिया। आश्रम के प्रवक्ता मनीष बगाड़िया के अनुसार, दुनिया भर में आसाराम के पास 425 आश्रम, 1,400 समिति, 17,000 बाल संस्कार केंद्र और 50 गुरुकुल हैं। वहीं एक अन्य प्रवक्ता नीलम दुबे का दावा है कि भारत और विदेश में आसाराम के पांच करोड़ से अधिक अनुयायी हैं। हो भी सकते हैं, लेकिन आसाराम और उनके बेटे नारायण साईं ने जो किया, वह सर्वविदित है।
आसाराम जब गिरफ्तार नहीं हुए थे, तब उन्होंने अपने एक बयान में कहा था, ‘मैं घटना के दिन आश्रम में मौजूद था, लेकिन लड़की (पीड़िता) को कुछ लोगों ने भटका दिया है। भगवान बुद्ध पर भी ऐसे आरोप लगे थे, पर सच्चाई सामने आ जाएगी। अगर वे मुझे सलाखों के पीछे डालें तो मैं हंसते हुए जेल जाना चाहता हूं। मैं जेल को बैकुंठ जैसा मानता हूं।’ लेकिन वही बैकुंठ अब आसाराम के लिए नरक बन चुका है, तभी तो जोधपुर की अदालत में उम्रकैद की सजा सुनते ही वह रोने लगे।
आसाराम पक्ष के एक वकील आर.के. नायक ने जोधपुर कोर्ट के न्यायाधीश मधुसूदन शर्मा पर दबाव में फैसला करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि इस मुकदमे का ट्रायल मीडिया ने किया है। जज जबरदस्त दबाव में थे, इसलिए उन्होंने इस मामले के तथ्यों को नहीं देखा और दबाव में फैसला सुना दिया। आसाराम का पक्ष लेते हुए आर.के. नायक ने कहा कि आसाराम निर्दोष हैं। वे आसाराम को रेपिस्ट नहीं मानते। इस फैसले के खिलाफ अगर हाईकोर्ट में बात नहीं बनी तो वे उच्चतम न्यायालय तक जाएंगे।
फिलहाल, कैदी नंबर 130 के रूप में आसाराम अभी तो सेंट्रल जेल जोधपुर में एक सजायाफ्ता मुजरिम के तौर पर रहेगा। जेल सूत्रों के मुताबिक, इससे पहले आसाराम अब तक जेल में संत की हैसियत से ही रह रहा था, लेकिन अब उसकी हैसियत एक सजायाफ्ता मुजरिम जैसी ही होगी। डीआईजी (जेल) विक्रम सिंह ने बताया कि अभी तत्काल आसाराम को बैरक नंबर 2 में ही रखा जाएगा। बाद में सुरक्षा के नियमों के तहत किस बैरक में शिफ्ट करना है, उस पर विचार किया जाएगा। वहीं इसी मामले के आरोपी रहे और आसाराम के प्रमुख सेवादार शिवा और रसोइया प्रकाश को अदालत ने बरी कर दिया है। पीड़िता और उसके परिजन भी बहुत खुश हैं। उन्होंने कहा है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। अदालत के इस फैसले से लोगों की आस्था कानून में और बढ़ेगी।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

खूनी सडक़ें, खौफनाक हादसे


जितेन्द्र बच्चन, नई दिल्ली
सडक़ हादसों की हकीकत। देश में बढ़ती दुर्घटनाएं। एक घंटे में 16 मौत। खूनी सडक़ें, खौफनाक हादसे। जिंदगी पर भारी रफ्तार। बेलगाम होता ट्रैफिक, बेमौत मरती जनता। सरकारी इंतजामों की खुलती पोल। हादसों को दावत देतीं सडक़ें और सडक़ों की सेहत पर शर्मसार सरकार। युवाओं को निगल रही तेज रफ्तार, तो कहीं-कहीं नाबालिग खेल रहे हैं मौत का खेल। आखिर कौन है इसका जिम्मेदार? क्यों लोगों की जान से खेल रहा है परिवहन मंत्रालय? फेल होती सडक़ों पर क्या कहती है सरकार?
नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो का दिल दहला देने वाला आंकड़ा। एक दसक में सडक़ दुर्घटनाओं में 42.50 फीसद का इजाफा। रोड पर होने वाली मौतों के मामले में दिल्ली सबसे आगे। राज्यों में उत्तर प्रदेश बना प्राण घातक। केंद्र सरकार के परिवहन विभाग की जारी रिपोर्ट जानकर आपका कलेजा मुंह को आ लगेगा। एकदम भयानक तस्वीर। देश की सडक़ें महज एक साल में डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के लिए काल बन गईं। घायल होने वालों की संख्या तो पांच लाख से भी ज्यादा है। न जाने कितने घर तबाह हो गए। परिवार में कोई नहीं बचा चिराग-बत्ती करने वाला। इसके बावजूद न तो ट्रैफिक पुलिस की लापरवाही खत्म हुई और न ही सडक़ों के निर्माण करने में मिलावाट। तमाम निमय-कानून के बावजूद पुलिस और सडक़ निर्माण करने वाले इंजीनियर से लेकर अधिकारी तक भ्रष्टïाचार में लिप्त हैं।
सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन लोगों की जान से खेलने वाले अधिकारियों का खेल जारी है। स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है। पिछले साल की अपेक्षा सडक़ दुर्घटना में इस साल 4.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि वर्ष 2015 में सडक़ हादसे में मरने वालों में 54 फीसदी लोगों की उम्र 34 साल से भी कम थी। वहीं 2015 में सबसे ज्यादा सडक़ हादसे तो मुंबई में हुए, लेकिन सबसे ज्यादा लोगों ने दिल्ली की सडक़ों पर जान गवाईं। राजधानी की चौड़ी व चमकदार दिखने वाली सडक़ें 1622 लोगों की जिंदगी निगल गईं।
मौत का आंकड़ा पहुंच सकता है सात लाख:
17 नवंबर 2016 को हुई बातचीत में सडक़ परिवहन, राजमार्ग राज्यमंत्री पी राधाकृष्णन ने बताया कि देश में 2013 से 2015 के बीच 14 लाख 77 हजार 299 सडक़ दुर्घटनाएं घटीं। जबकि सडक़ हादसों में लोगों के हताहत होने के आधार पर चिह्नित 789 ऐसे स्थानों में सर्वाधिक 104 उत्तर प्रदेश में हैं। तमिलनाडु में 102 और कर्नाटक में 86 हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने सडक़ दुर्घटना में लोगों के हताहत होने के मामलों को कम करने के लिए सुरक्षा ऑडिट जैसे कई कदम उठाए हैं। वहीं मानवाधिकार विभाग लखनऊ की श्रद्धा सक्सेना का कहना है कि पिछले दस साल की अवधि में सडक़ हादसों में होने वाली मौतों में साढ़े 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वह आगे कहती हैं, देश में जितने लोग बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं से नहीं मरते, उससे कहीं ज्यादा सडक़ दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में नाबालिग बाइकर्स का आतंक है। पिछले तीन साल में यूपी में ये बाइकर्स 14,157 और मध्य प्रदेश में 8, 420 दुर्घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं। नोएडा के यातायात विशेषज्ञ  केपी श्रीवास्तव का कहना है, ‘यदि सडक़ पर गति नियंत्रित नहीं की गई तो 2020 तक भारत में सात लाख प्रति वर्ष से भी ज्यादा मौतें सडक़ हादसों में होंगी।’
तेज र तार का नतीजा :
आखिर इतने अधिक सडक़ हादसों की वजह क्या है और कौन-सी जगहें सडक़ हादसों के हिसाब से सबसे ज्यादा खतरनाक हैं? इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्रालय के परिवहन अनुसंधान विभाग के एक वरिष्ठï अधिकारी एसके भल्ला का कहना है, तमाम राज्य सरकारों, पुलिस और अन्य एजेंसियों से मिले ब्योरे की समीक्षा के बाद पता चला है कि 100 में से 77 सडक़ हादसों में गाड़ी चलाने वाले की ही गलती होती है और उसमें भी सबसे ज्यादा हादसे ओवर स्पीडिंग से हुईं। वहीं केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है, गाड़ी चलाने वालों पर गलती मढ़ देना सबसे आसान है। जबकि बहुत सी जगहें ऐसी हैं, जहां एक ही जगह पर लगातार हादसे होते रहते हैं और सडक़ की डिजाइन में खामी इसकी बड़ी वजह है। परिवहन मंत्रालय ने देश भर में फैले 726 ब्लैक स्पॉट्स की पहचान की है, जहां बार-बार हादसे होते हैं। मंत्रालय ने अब राज्य सरकारों से बात करके इन जगहों पर रोड का डिजाइन दुरुस्त करने का काम शुरू कर दिया है।
कानून में छेद, बड़ी लापरवाही :
परिवहन व राजमार्ग मंत्रायल के आंकड़ों के मुताबिक, 80 फीसद से अधिक हादसे चालक की गलती से होते हैं। वहीं हाई-वे पर रात में गाडिय़ों की गूंजती आवाज को सुनिए तो डर लगता है। 90, 100, 120 और 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से यहां गाडिय़ां चलती हैं। शायद यही कारण है कि 21 नवंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव देश के सबसे लंबे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे का लोकार्पण करते हुए यह अपील करना नहीं भूले कि 100 किमी प्रति घंटे की स्पीड लिमिट क्रॉस न करें। दूसरा कारण है कानून में छेद। हमारे यहां जो कानून हैं, उनमें उदारता कहीं ज्यादा है। लिहाजा हादसे को अंजाम देने वाले चालक को कठोर सजा देने की बजाय, कानून उसे बचाने में ज्यादा सहायक साबित होते हैं। ज्यादातर मामलों में पुलिस लापरवाही से हुई मौत मानकर जिन धाराओं में प्रकरण कायम करती है, उनमें तत्काल जमानत मिल जाती है और सजा का प्रावधान भी दो साल का है।
सडक़ों पर टै्रफिक का बढ़ता बोझ :
दिल्ली पुलिस आयुक्त के अनुसार, फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस भी सडक़ हादसे की एक बड़ी वजह है। वहीं पूर्व डीजीपी (उत्तर प्रदेश) प्रकाश सिंह देश में बढ़ती दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण कुछ सडक़ों पर जरूरत से ज्यादा ट्रैफिक का बढ़ता बोझ को मानते हैं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत में मौत का छठा सबसे बड़ा कारण सडक़ हादसे को मानता है। शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रेडियो संदेश ‘मन की बात’ में इस पर चिंता जताते हुए लोगों की जान बचाने के लिए कदम उठाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार सडक़ परिवहन और सुरक्षा कानून बनाएगी और दुर्घटना के शिकार को बिना पैसा चुकाए तुरंत चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराएगी। प्रधानमंत्री की चिंता वाजिब है, ताकि किसी का सफर आखिरी न हो।
‘मन की बात’:
बढ़ते सडक़ हादसों को रोकने के लिए सरकार सडक़ परिवहन और सुरक्षा कानून बनाएगी और दुर्घटना के शिकार को बिना पैसा चुकाए तुरंत चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराएगी।
-नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
 हादसों को कम करने में नाकाम रहा
हमारा मंत्रालय सडक़ हादसों को कम करने में नाकाम रहा है। इस दिशा में जो भी कदम उन्होंने उठाए हैं, उसका फिलहाल कोई असर नहीं हुआ है। हमें अफसोस है कि सडक़ हादसे में देश के जितने लोगों की जान जा रही है, उतने लोग किसी युद्ध और आतंकी घटना में भी नहीं मरते।
-नितिन गडकरी, केंद्रीय परिवहन मंत्री
कम हो सकता है मौत का आंकड़ा
बच्चों को सडक़ सुरक्षा संबंधी शिक्षा देने से कम हो सकता है मौत का आंकड़ा। बच्चों का व्यवहार उनके परिवार और दोस्तों के बीच ‘प्रहरी’ का काम कर सकता है।
-आलोक कुमार वर्मा, पुलिस आयुक्त, दिल्ली
 कानून का डर नहीं
सडक़ पर गाडी चलाने वाले अक्सर खुद को राजा समझते हैं। उन्हें कानून का डर नहीं होता। उनके इस रवैये से सडक़ पर चलने वाले लोग खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। दूसरों की जिंदगी को लेकर लापरवाह ये लोग कभी नशे में होते हैं, तो कभी महज रोमांच के लिए सडक़ पर गाड़ी गलत तरीके से चलाते हैं। ऐसे लोगों में कानून का डर होना चाहिए। उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि वो हल्की सजा या जुर्माना देकर बच जाएंगे। हर जिंदगी अमूल्य है।
- सर्वोच्च न्यायालय
सडक़ हादसे का बड़ा कारण:
तेज गति, नशे में वाहन चलाना, फुटपाथों पर कब्जे होने से संकीर्ण होते सडक़ मार्ग, लापरवाही, खराब मौसम, रेड लाइट क्रॉस करना, किशोर चालक, सडक़ों में दिए गए सिगनल को नजरअंदाज करना आदि।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

1साल, 520 बलात्कार : पुलिस की खुलती पोल


हरियाणा में हर साल होती हैं 520 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार। राजधानी दिल्ली को भी इसमें जोड़ लें तो दोनों राज्यों को मिलाकर यह आंकड़ा 3380 पहुंच जाता है। जबकि 151 युवतियों के साथ रेप की कोशिश की गई और यौन शोषण में करीब 60 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

जितेन्द्र बच्चन, नई दिल्ली
14 साल की लड़की के साथ हैवानियत! दहल उठा फरीदाबाद! सदमे में हैं शहर की महिलाएं! कांप उठा मां का कलेजा। हिल गए लोग, लेकिन दुष्कर्मियों के न हाथ कांपे और न ही दिल पसीजा। बहते रहे आंसू, सिसकती रही मासूम। तब भी जालिमों को तरस नहीं आया, दबोच लिया भूखे भेड़िए की तरह। रौंद डाली सारी इंसानियत। तोड़ते रहे कहर। ढाते रहे सितम। लहूलुहान हो गई मानवता! बेहोश हो गई बच्ची! भूखी-प्यासी सारी रात वह जंगल में पड़ी रही। उफ! कितना दर्द बर्दाश्त किया होगा उसने। वह भी महज 14 साल की उम्र में। सुबह बड़ी मुश्किल से मां का सामना हुआ तो खून से लथपथ थी बच्ची। जिस्म का अंग-अंग जख्मी था उसका। पर हाय-री पुलिस, इस पर भी उसका रवैया हैरान करने वाला रहा। इस बात का एहसास होते ही कि मामला मीडिया में जा सकता है और फिर होगी पुलिस की छीछालेदर, बच्ची को शहर के एक कोने में बने छोटे से अस्पताल में ले जाकर दाखिल करा दिया, ताकि पता न चले किसी को। एक पुलिसकर्मी ने लड़की के पिता को दो हजार रुपये देने की कोशिश की। उसका कहना था, खर्चा-पानी दे रहा हूं। किसी से कुछ बताओगे तो मुफ्त में बदनाम हो जाओगे। चुप रहने में ही बेहतरी है।
हरियाणा पुलिस का बेरहम चेहरा! पिता की आंखें भर आईं। आत्मा चित्कार उठी- ‘क्या तुम्हारी बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म करता, तब भी तुम मामला रफा-दफा करने की कोशिश करते? कितनी शूरमा है पुलिस! हैवानों के आगे घुटने टेक देती है, लेकिन पीड़ित से सौदा करने में कभी नहीं चूकती! इतना भी नहीं सोचा कि अगर पुलिस ही इंसाफ  के दरवाजे पर ताला लगाकर बैठ जाएगी तो कैसे बचेगी लोकतंत्र की इज्जत? बेदिल ही नहीं, कभी-कभी बेदर्द भी होती है पुलिस।’
हरियाणा की हकीकत! बढ़ता अपराध, घटती साख! पुलिस की खुलती पोल। खट्टर सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है सबकुछ। उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद हरियाणा में महिलाओं और बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही, लेकिन मुख्यमंत्री का दावा है कि राज्य की स्थिति देश के कई अन्य हिस्सों की तुलना में बेहतर है। जबकि बेटियों की सुरक्षा के लिहाज से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) सबसे असुरक्षित क्षेत्र बन चुका है। एनसीआर में बड़ा हिस्सा दिल्ली और हरियाणा का है। दोनों ही राज्यों में बीते तीन वर्षों में बलात्कार और गैंगरेप की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। बीते साल हरियाणा और दिल्ली में 3380 लड़कियां और महिलाएं रेप का शिकार हुईं। करीब 150 महिलाओं के साथ बलात्कार की कोशिश की गई। दिल्ली में तो रेप के मामले 60 फीसद बढ़ चुके हैं। यहां बलात्कार की घटनाएं औसतन 400 रेप प्रति वर्ष की दर से बढ़ती जा रही हैं।
एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) के अनुसार, सामूहिक बलात्कार के मामलों में हरियाणा देश में पहले नंबर पर है। पौने दो करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से राज्य में बीते साल गैंग रेप के 204 मामले सामने आए हैं। आंकड़ों की बात प्रतिशत में करें तो यहां 10 लाख महिलाओं की आबादी पर 16 गैंगरेप की शिकार हुई हैं। इसके बाद देश की राजधानी दिल्ली का नंबर है, लेकिन एक अन्य सर्वे रिपोर्ट की मानें तो छोटा-सा राज्य होने के बावजूद हरियाणा गैंगरेप के कुल केसों के मामले में भी चौथे नंबर पर है। शायद यही कारण है कि हरियाणा एवं पंजाब हाईकोर्ट भी गैंगरेप को लेकर हरियाणा सरकार को लगातार कटघरे में खड़ा करती रही है। इतना ही नहीं पीएम नरेंद्र मोदी ने हरियाणा से ही ‘बेटी बचाओ’ अभियान का आह्वान किया था।
एनसीआरबी का कहना है, दिल्ली के उत्तर में छह राज्यों में हरियाणा ही ऐसा राज्य है, जहां की बहू-बेटियां सबसे ज्यादा जुल्म का शिकार हुईं। यहां 5 सितंबर 2016 तक बलात्कार के 1070 केस दर्ज किए गए, जबकि इससे बड़े राज्य पंजाब में रेप के 886 केस दर्ज हुए। उत्तराखंड में 283, हिमाचल प्रदेश में 250, और जम्मू कश्मीर में 296 रेप के केस दर्ज हुए हैं। हरियाणा के विपक्षी नेताओं का भी कहना है कि खट्टर सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में बलात्कार की घटनाओं में कमी नहीं आई है। पुलिस की निष्क्रियता जगजाहिर है। खुद डीजीपी डॉ. केपी सिंह की ओर से जारी एक आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में हर रोज एक महिला बलात्कार की शिकार होती है। यद्यपि हरियाणा पुलिस का कहना है कि पहले से राज्य में होने वाले अपराध में कमी आई है। बीते एक साल (30 जून 2015 से 30 जून 2016 तक) में बलात्कार के महज 520 मामले दर्ज हुए हैं। जबकि अपहरण के 801 और छेड़छाड़ के 863 मामले सामने आए हैं।
रोहतक में खुलेआम घूम रहा आरोपी
लेकिन यह सरकार आंकड़ा है। अन्य सूत्रों की बात करें तो और चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं, जो पुलिस को कटघरे में खड़ा करती हैं। रोहतक जिले की बात करते हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अपराध पर अंकुश लगाने की बात करने वाली रोहतक पुलिस एक मंदबुद्धि बेटी को एक साल बाद भी इंसाफ  नहीं दिला पाई है। जिस युवक ने दुष्कर्म किया, वह अब भी खुलेआम घूम रहा है। वहीं दुष्कर्म के बाद लड़की गर्भवती हो गई, जिसका जिला प्रशासन की अनुमति के बाद गर्भपात कराया गया था। अब मंदबुद्धि लड़की की बहन न्याय के लिए कभी एसपी के पास तो कभी आईजी के दफ्तर का चक्कर काट रही है। लेकिन आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए कोई तैयार नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, मामले की जांच कर रही डीएसपी पुष्पा खत्री किसी को इंसाफ  दिलाना तो दूर, वह पीड़िता का फोन तक नहीं उठातीं।
दिसंबर 2015 का वाकया है। पीड़ित लड़की की बहन एएनएम स्टूडेंट है। उसका कहना है, उसकी बहन अचानक एक रोज बीमार हो गई। उसे पीजीआई में भर्ती कराया गया, तब पता चला कि वह गर्भवती है। बहन के पैरों तले से जमीन सरक गई। गांव का ही मंजीत उसकी बहन के साथ पिछले नौ महीने से बलात्कार कर रहा था। दरिन्दे ने धमकी दी थी कि यदि किसी से कुछ बताया तो वह उसके पूरे परिवार को खत्म कर देगा। मंदबुद्धि लड़की भय से कांप उठी। पीजीआई न जाती तो अभी न जाने कब तक उसका शारीरिक शोषण होता रहता। फिलहाल, थाना महम पुलिस ने 8 नवंबर 2015 को पीड़िता की बहन के बयान पर 376 और एससीएसटी एक्ट के तहत मामला तो दर्ज कर लिया, लेकिन एक साल बाद भी आरोपी मंजीत गिरफ्तार नहीं हुआ। परिजनों का कहना है, पुलिस क्या कार्रवाई कर रही है, कुछ नहीं बताती। आरोप है कि पुलिस आरोपी पक्ष से मिली हुई है। वहीं एसपी राकेश आर्य का कहना है, यह मामला मेरी जानकारी में नहीं है। यदि आरोपी अभी तक गिरफ्तार नहीं हुआ है तो यह गंभीर मामला है। आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। डीएसपी से बात करके इस केस की स्टेट्स रिपोर्ट मंगाई जाएगी। इसके बाद जो भी कानूनी कार्यवाही होगी, अवश्य की जाएगी।

अपहरण के बाद सामूहिक दुष्कर्म
फरीदाबाद की स्थिति और खराब है। 6 नवंबर 2016 को फतेहपुर बिल्लौच गांव में आधा दर्जन बदमाशों ने एक मकान पर धाबा बोल दिया। परिवार को बंधक बनाकर बदमाशों ने पहले लूटपाट की, फिर घर की 14 वर्षीया एक लड़की और उसकी भाभी का अपहरण कर ले गए। बदमाशों ने जंगल में ले जाकर दोनों के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और फरार हो गए। किसी ने मामले की सूचना थाना सदर बल्लभगढ़ पुलिस को दी तो थाना प्रभारी राजदीप मोर क्राइम ब्रांच की टीम के साथ मौके पर पहुंचे। अब पुलिस का कहना है, पीड़ित महिला ने बताया है कि बदमाशों में शामिल एक युवक नरहावली निवासी एक रिश्तेदार सुशील के छोटे भाई जैसी सूरत का था। सुशील के छोटे भाई और उसके पांच साथियों के खिलाफ  मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है। यह तलाश कब तब जारी रहेगी, कुछ नहीं पता। दुखद स्थिति यह है कि फरीदाबाद में लगातार बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं।
लोगों का दहल गया दिल
देश की राजधानी दिल्ली से करीब 60 किलोमीटर दूर हरियाणा के रोहतक में दिल दहला देने वाली घटना में गैंगरेप के पांच आरोपियों ने तीन साल बाद फिर उसी दलित छात्रा (21) को अगवा कर उसके साथ गैंगरेप किया और मरने के लिए सुखपुरा चौक इलाके की झाड़ियों में फेंककर भाग गए। पीड़ित युवती के परिजनों के अनुसार, सभी आरोपी युवक जमानत पर जेल से बाहर हैं। ये सभी वर्ष 2013 में किए गैंगरेप मामले को लेकर छात्रा पर 50 लाख रुपये लेकर समझौता करने का दबाव डाल रहे थे। वह नहीं मानी तो धमकी दी। उसके बाद फिर से रौंद डाला। पीड़ित का कहना है, पांचों आरोपी कार से आए थे। वह जैसे कॉलेज से बाहर निकली, तीन युवक कार में बैठे थे और दो बाहर खड़े थे। उन्होंने उसे कार में खींच लिया। जबरन कोई नशीली दवा पिला दी और उसकी बेहोशी की हालत में उसके साथ बलात्कार किया। बाद में झाड़ियों के पास फेंककर चले गए।
बलात्कार की बढ़ती ये घटनाएं हरियाणा पुलिस की पोल खोलती हैं। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कमलेश पांचाल भी मानती हैं कि हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ  वारदात बढ़ रही है। वह व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं, ‘महिला आयोग सफेद हाथी नहीं है। बहुत कुछ कर सकता है। प्रदेश के 11 जिलों में मॉनिटरिंग की गई है हमने। कार्यस्थलों उद्योगों में महिला सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे इन घटनाओं पर अंकुश लगेगा?’ शायद सच कहती हैं। कौन है इन घटनाओं का जिम्मेदार? आखिर कब हरियाणा की महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी?

सरकारी अस्पताल भी सुरक्षित नहीं 
यमुनानगर जिले में एक सरकारी अस्पताल के अंदर मानसिक रूप से विक्षिप्त एक लड़की से एक कर्मचारी ने कथित तौर पर बलात्कार किया। घटना 7 जुलाई 2016 की है। पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। यमुनानगर के डीसएपी (मुख्यालय) आदर्शदीप सिंह ने बताया कि रेप की शिकार युवती मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वहीं महिला थाना यमुनानगर की एसएचओ कुलबीर कौर ने बताया कि लड़की का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया है, जिसमें उसके यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है। आरोपी विजय कुमार (22) को गिरफ्तार कर लिया गया है।

इस वर्ष नवंबर 2016 राज्य में हुए रेप के बहुचर्चित मामले
2 नवंबर: फतेहाबाद थाना टोहाना अंतर्गत तीन लोगों ने चलती कार में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया। नरवाना-टाहाना मार्ग से रात करीब आठ बजे महिला को गाड़ी में बिठाया था।
23 अक्टूबर: फरीदाबाद जिले में एक महिला को बंधक बनाकर दो लोगों ने दुष्कर्म किया। पति से किसी बात पर महिला की लड़ाई हो गई थी। उसके बाद वह मायके जा रही थी। आरोपी उसे राजस्थान ले गए, जहां से वह बड़ी मुश्किल से छूटी।
31 जुलाई : गुड़गांव जिले के थाना सदर अंतर्गत सोहना में एक तांत्रिक ने 19 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया। आरोपी पंचायत समिति का पूर्व अध्यक्ष भी है।
21 जुलाई: करनाल में तीन युवकों ने शादीशुदा एक महिला के साथ एक होटल में सामूहिक बलात्कार किया। डीसीपी जितेन्द्र गहलावत के अनुसार, तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।
18 जुलाई: गैंगरेप के पांच आरोपियों ने तीन साल बाद फिर से 21 वर्षीय छात्रा को अगवा कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस मामले की जांच अब एसआईटी कर रही है।
17 जुलाई: फरीदाबाद के त्रिखा कालोनी में पड़ोस में रहने वाले दो युवकों ने सात साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया। थाना प्रभारी योगेंद्र सिंह के अनुसार,  इस मामले के दोनों आरोपी बबलू (32) और बिरजू (28) को गिरफ्तार कर लिया गया है।
7 जुलाई : यमुनानगर के एक सरकारी अस्पताल के अंदर मानसिक रूप से विक्षिप्त एक लड़की से एक कर्मचारी ने बलात्कार किया। पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
7 फरवरी : गुड़गांव में 9 साल की छात्रा से दुष्कर्म। बच्ची की मां की शिकायत पर इस मामले में एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल को गिरफ्तार किया गया है।
19 जनवरी : कुरुक्षेत्र की विवाहित महिला को शादी का झांसा देकर बंधक बनाकर किया दुष्कर्म। महिला थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर शुरू की जांच।
9 जनवरी : रोहतक में गोहाना-दिल्ली मार्ग पर एक नाबालिग लड़के ने ट्यूशन के लिए जा रही 15 वर्षीय एक लड़की को अगवा कर कार के अंदर बलात्कार किया।

अपराध के आंकड़े में कमी आई 
पिछले 10 साल की बात करें तो अपराध के आंकड़े में कमी आई है। सरकार की पहल पर हर जिले में महिला पुलिस थाना खुलने से महिलाओं के प्रति अपराध का ग्राफ  नीचे आया है। आगे भी हम क्राइम कंट्रोल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
-डॉ. केपी सिंह, डीजीपी, हरियाणा

महिला थाने ही काफी नहीं 

मैंने 11 जिलों में मॉनिटरिंग की है। महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए महिला थाने ही काफी नहीं हैं। दूसरे प्रयास भी जरूरी हैं। आयोग सदस्यों को कुछ मदद मिले तो वे भी आगे आकर काम कर पाएंगी।
- कमलेश पांचाल, अध्यक्ष, राज्य महिला आयोग, हरियाणा
सरकार पूरी तरह कटिबद्ध
अपराध पर लगाम लगाने के लिए सरकार पूरी तरह कटिबद्ध है। अगर कहीं पुलिस की कमी नजर आती है तो उसे भी दुरुस्त किया जाएगा।
मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री, हरियाणा
गंभीर मामला 
मामला मेरी जानकारी में नहीं है। यदि आरोपी अभी तक गिरफ्तार नहीं हुआ है तो यह गंभीर मामला है। दोषी जो भी होगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
-राकेश आर्य, एसपी, यमुनानगर
किसी भी राज्य की पुलिस सरकार का चेहरा होती है
जन्म लेने के बाद से ही बेटी को अपने अस्तित्व के लिए लडऩा पड़ता है। बड़ी होकर घर से निकलती है तो यहां भी बड़ी जद्दोजहद के साथ अपना रास्ता बनाना पड़ता है। ऐसे में महिलाओं को बलात्कार, घरेलू हिंसा, ट्रैफिकिंग और उत्पीड़न जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। देश की आधी आबादी के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने देश में महिला सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता में रखा और औज प्रदेश के सभी 21 जिलों में महिला पुलिस थाने काम कर रहे हैं। महिलाएं शारीरिक, मानसिक और योन उत्पीड़न चुपचाप सहन करने की बजाए अपनी रिपोर्ट दर्ज करवाने में संकोच महसूस न करें।
-कविता जैन, महिला एवं बाल विकास मंत्री, हरियाणा

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

शिप्रा, सस्पेंश और साजिश


जितेन्द्र बच्चन
नोएडा। फैशन डिजाइनर शिप्रा मलिक ने खुद के अपहरण की रची साजिश, लेकिन कैसे? यह सस्पेंश अभी बरकरार है। सात सेकेंड की पीसीआर कॉल जरूर साजिश का हिस्सा बन गई। पिता और भाई के साजिश में शामिल होने का गहराया शक। कर्ज और प्रापर्टी के विवाद से पेरशान थी शिप्रा। बैंक की सेक्टर-18 शाखा से मिला सबसे बड़ा सुराग। 29 फरवरी की दोपहर 1.30 बजे लॉकर आप्ररेट करने गई थी शिप्रा। फिर 2.56 पर दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को की थी 7 सेकेंड की आखिरी कॉल। इसके बाद नहीं हुआ किसी से कोई संपर्क।
नोएडा के बीच शहर से दिन-दहाड़े गायब हुई 29 साल की शिप्रा मलिक की घटना से दिल्ली-एनसीआर में सनसनी फैल गई। शिप्रा के पति चेतन मलिक की तहरीर पर नोएडा पुलिस ने मामले की गुमशुदगी दर्ज कर जांच-पड़ताल शुरू कर दी। शिप्रा की कार लावारिस हालत में मिली थी, इसलिए हर कोई यही समझने लगा कि उसका किसी ने अपहरण कर लिया है। हाई प्रोफाइल मामला होने के कारण मामला मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक जा पहुंचा। आईजी सुजीत पांडेय ने नोएडा आकर डेरा डाल दिया। गुरुवार को नोएडा पहुंची डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने केस की शुरुआती जांच में लापरवाही बरतने पर जांच बैठा दी है। जांच गाजियाबाद के एसपी क्राइम श्रवण कुमार कर रहे हैं।
29 साल की शिप्रा दिल्ली की पर्ल एकेडेमी से 2005 में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स पूरा कर के नोएडा में बूटीक चलाती थी। वह सोमवार को अपने घर से चांदनी चौक के लिए निकली थी। रास्ते में वह अपने पति से मिली। इसके बाद शिप्रा चांदनी चौक नहीं पहुंची और न ही घर लौटी। शिप्रा की गाड़ी नोएडा में ही लावारिस पड़ी मिली। चाबी कार के अंदर थी। पति चेतन ने कॉल किया तो शिप्रा का फोन ऑफ  था। पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि शिप्रा को जमीन निगल गई या आसमान।
मंगलवार यानी पहली मार्च 2016 की शाम सेक्टर- 29 विजया एंक्लेव के पास शिप्रा की स्विफ्ट कार जहां मिली थी, पुलिस ने वहां घटना का नाट्य रूपांतरण किया। तब भी कोई सुराग नहीं हाथ लगा। आईजी सुजीत पांडेय ने एसटीएफ, क्राइम ब्रांच समेत कुल आठ टीमें गठित कर दीं। इसके अलावा मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए साउथ दिल्ली पुलिस, नोएडा पुलिस और यूपी एसटीएफ  के डीसीपी, एसपी, एडिशनल एसपी और डीएसपी लेवल के 18 अधिकारी तथा 90 पुलिसकर्मी अलग से दिन-रात एक करने लगे। एसपी सिटी दिनेश यादव और उनके मातहतों ने चेतन मलिक, शिप्रा के पिता सतीश कटारिया, शिप्रा के निवास सेक्टर-37 के सभी गेटों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों सहित 50 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की। ब्रह्मपुत्र मार्केट, सेक्टर-29 स्थित विजया एंक्लेव और सेक्टर-37 के सभी गेटों पर लगे सीसीटीवी खंगाले गए। कई स्थानों पर शिप्रा के पोस्टर लगाए गए। उसके फोटो दिखाकर लोगों से पूछा गया।
मंगलवार की रात ही पता चला कि फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद शिप्रा ने ब्रह्मपुत्र मार्केट में जो शोरूम बनाया था, उसे लाजपत नगर दिल्ली निवासी राहुल तनेजा और उसके भाई गुलशन तनेजा से किराए पर लिया गया था। कुछ दिन बाद शिप्रा का दोनों भाईयों से विवाद हो गया था। उसके बाद शिप्रा ने थाना सेक्टर-20 में दोनों भाईयों के खिलाफ डकैती का मामला दर्ज कराया था और दोनों भाइयों ने शॉप खाली करवा ली थी। एसपी सिटी यादव सोचने लगे, कहीं उसी का नतीजा तो नहीं है शिप्रा का अपहरण? और उन्होंने रात में ही गुमशुदगी के इस मामले को (परिजनों की तहरीर पर) अपहरण के केस में तरमीम करवा दिया। राहुल और गुलशन को पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी।एसएसपी किरन एस ने मंगलवार रात करीब तीन बजे आला अधिकारियों केसाथ एक बैठक की। एएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर और डीएसपी डॉ. अनूप कुमार को दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को की गई कॉल रिकार्डिंग निकलवाने की जिम्मेदारी दी गई। उससे अहम सुराग मिलने की उमीद बढ़ गई। चांदनी चौक की जिस दुकान से शिप्रा बुटीक के लिए कपड़े लाती थी, वहां लगे कैमरों की फुटेज भी खंगाली गई। बुधवार की सुबह आईजी सुजीत पांडेय ने डीएनडी फ्लाई ओवर पहुंचकर सीसीटीवी कैमरों की जांच की।
3 मार्च को सेक्टर-18 स्थित आईएनजी वैश्य बैंक की शाखा से पुलिस को सीसीटीवी की एक ऐसी फुटेज मिली, जिससे अधिकारियों की आंखों में चमक आ गई। उससे यह पता चला कि अगवा होने से पहले शिप्रा ने बैंक आकर लॉकर ऑपरेट किया था। इसके बाद पुलिस ने फेसबुक, ट्वीटर और ह्वाट्सेप को खंगालना शुरू किया। परिवार के सभी मोबाइलों पर पहले से निगरानी रख रही थी, लेकिन तीन दिन बाद भी अभी तक फिरौती के लिए किसी ने कहीं से कोई कंटेक्ट नहीं किया था। ऐसे सवाल उठने लगा कि आखिर शिप्रा को अगवा करने का मकसद क्या है?
लेकिन गुरुवार की रात करीब डेढ़ बजे चेतन मलिक के मोबाइल पर आए एक फोन ने सभी को चौंका दिया। आईजी सुजीत पांंडेय, डीआईडी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी किरन एस और एसपी सिटी दिनेश यादव तुरंत हरकत में आ गए। दरअसल वह फोन हरियाणा स्थित गुडग़ांव के सुल्तानपुर गांव के सरपंच के मोबाइल नंबर से किया गया था और खुद शिप्रा ने किया था। वह बहुत घबराई हुई थी। कॉल से सुराग मिलते ही एसएसपी किरन एस एक टीम के साथ गुडग़ांव जा पहुंचे और वहां से शिप्रा को बरामद कर लिया।
शिप्रा का कहना था, सोमवार को चार-पांच बदमाशों ने नोएडा से उसे अगवा करके अपनी कार में डाल लिया था। डीएनडी होते हुए अपहरणकर्ता लाजपत नगर पहुंचे तो वहां उसे मौका मिल गया और उसने दिल्ली पुलिस को 100 नंबर पर फोन कर दिया, लेकिन हैलो कहते ही बदमाशों ने उसका मोबाइल छीन लिया और उसके हाथ-पैर बांध दिए। ऊपर से एक बोरा डाल दिया। राजस्थान में कहां रखा, मुझे नहीं पता। बाद में वीरवार की रात बदमाश मुझे स्कॉर्पियो से फार्रुखनगर के सुल्तानपुर इलाके में फेककर चले गए। उसने पास के ग्रामीणों से मदद मांगी। ग्रामीणों ने सरपंच की सहायता से पुलिस से संपर्क किया। पहले गुडग़ांव पुलिस से कॉन्टेक्ट किया गया। उसके बाद चेतन को बताया।
शिप्रा ने अपहरण की कहानी तो बता दी, लेकिन उसके शरीर पर कहीं कोई चोट या खरोंच के निशान नहीं मिले। यह भला कैसे हो सकता था? बस यहीं पुलिस को शिप्रा की बयान में शक होने लगा। डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने खुद पूछताछ शुरू की। अंत में थोड़ी सख्ती करते ही शिप्रा टूट गई। उसने कहा कि वह कर्ज को लेकर बहुत परेशान है। परिवारिक कलह के चलते वह घर से चली गई थी। अपहरण का नाटक इसलिए किया कि किसी को उसका कुछ पता न चला। वह बहुत डिप्रेशन में आ चुकी है।
एसपी सिटी दिनेश यादव के अनुसार, शुक्रवार की भोर यानी 4 मार्च की सुबह पुलिस ने शिप्रा का मेडिकल कराया गया। इसके बाद दोबारा उससे पूछताछ की गई। तत्पश्चात मेरठ रेंज की डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने इस मामले का खुलासा करते हुए बताया कि पारिवारिक विवाद के चलते शिप्रा अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई थी। टीवी पर अपने परेशान बच्चे और परिवार को दुखी देखकर वह वापस आ गई। अभी तक अपहरण की कोई बात सामने नहीं आई है।
शक का गहराता संकट:
हकीकत जो भी हो, लकिन शिप्रा के एक बेहद नजदीकी पर उसकी किडनैपिंग में भूमिका होने का संदेह है। पूछताछ के दौरान उसने पुलिस के सामने कई बार अपने बयान बदले हैं। पुलिस को शक है कि कहीं न कहीं इस केस में उसका हाथ जरूर है। खासतौर पर तब, जब अगवा होने से पहले शिप्रा ने बैंक लॉकर ऑपरेट किया हो। डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने भी कहा है कि इस शख्स ने लगातार अपने बयान बदले हैं और उसकी भूमिका संदिग्ध है। उससे भी पूछताछ की जा रही है।
अभी तक नहीं मिले इन सवालों के जवाब:
-शिप्रा बैंक में फोन पर बात करते हुए दाखिल हुईं। उनकी भाई से बात हो रही थी। क्या भाई को उनके लॉकर खोलने की जानकारी थी?
-डीएनडी पर शिप्रा के मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल हुआ और उनकी गाड़ी वहां से नहीं गुजरी, फिर उनकी स्विफ्ट कार सेक्टर-29 में किसने खड़ी की?
-शिप्रा के मोबाइल फोन का डीएनडी से लेकर लाजपतनगर तक इस्तेमाल किया गया है। इस दौरान करीब 15 मिनट तक इंटरनेट का यूज किया गया। आखिर वह किसके संपर्क में थी?

गहराता जा रहा है रहस्य
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, शिप्रा जयपुर के पास एक आश्रम में रुकी थी। वह अपनी दुकान के विवाद और लोन को लेकर परेशान चल रही थी। साजिश में उसके भाई के शामिल होने का शक भी जताया जा रहा है। सात सेकेंड की पीसीआर कॉल भी इसी साजिश का हिस्सा थी, ताकि किसी को शक न हो।
बाक्स:
शिप्रा ने टीवी शो क्राइम पेट्रोल देखकर यह साजिश रची थी। मेडिकल जांच के दौरान उसे किसी प्रकार की कोई चोट नहीं आई है, लेकिन पुलिस शिप्रा के बयान की जांच कर रही है।
-लक्ष्मी सिंह, डीआईजी, मेरठ रेंज

सूबे में शानदार जीत हासिल करेगी सपा



आमने-सामने
59 वर्षीय मदन चौहान का पैतृक गांव मदारपुर जिला मेरठ है। गढ़मुक्तेश्वर उनका कार्यक्षेत्र रहा। इधर करीब 25 साल से नोएडा की राजनीति में भी सक्रिय हैं। उनकी जनसेवा देखकर और वेस्ट यूपी में बढ़ती मदन चौहान की लोकप्रियता को सपा सुप्रीमो भी नजरअंदाज नहीं कर पाए। पार्टी हाईकमान ने 31 अक्टूबर को मनोरंजन कर राज्य मंत्री के रूप में शपथ दिलवाकर इनका कद और बढ़ा दिया। सपा को इससे दो फायदे होंगे, पहला यह कि पार्टी की ठाकुर वोट बैंक पर पकड़ मजबूत होगी और दूसरा युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जानते हैं कि मिशन-2017 को सफल बनाने के लिए वेस्ट यूपी में मदन चौहान से बेहतर और कोई दूसरा प्रतिनिधि नहीं हो सकता है।


मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाले गढ़ के विधायक मदन चौहान करीब 25 साल पहले नोएडा आए थे। अब यहां के सेक्टर-26 के निवासी हैं। प्रॉपर्टी और ट्रांसपोर्ट के कारोबार से भी जुड़े रहे। सामाजिक कार्यों में सक्रियता 
बढ़ती गई, फिर कांग्रेस से जुड़ गए। 1996 में वह पहली बार गढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े, लेकिन 2002 में समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। विधानसभा क्षेत्र गढ़ ही रहा और चुनाव में शानदार विजय हासिल की। इसके बाद मदन चौहान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जनसेवा के साथ लगातार वर्ष 2002, 2007 और 2012 में जीत की हैट्रिक लगाई। अब सरकार में मनोरंजन कर राज्य मंत्री हैं। सामने मिशन-2017 की चुनौती है तो पीछे पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों ने उनसे बहुत-सी उम्मीदें लगा रखी हैं। क्या जनता और सपा सुप्रीमो की कसौटी पर वे खरा उतर पाएंगे? क्या क्षेत्र के विकास को रफ्तार मिलेगी? कार्यकर्ताओं में बढ़ती गुटबाजी को विराम मिलेगा आदि जैसे कई मुद्दों पर मनोरंजन कर राज्य मंत्री मदन चौहान से जितेन्द्र बच्चन ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश:

-वेस्ट यूपी में सपा की नजर ठाकुर वोट बैंक पर है। क्या यही वजह है कि सीएम अखिलेश यादव ने आपको मंत्रिमंडल में शामिल किया है?
मुख्यमंत्री जी का अपना अधिकार है। वे कब क्या निर्णय लेते हैं, वही जानें। हम तो महज इतना जानते हैं कि समाजवादी पार्टी कभी धर्म और जाति की राजनीति में यकीन नहीं करती। समाज का कोई भी वर्ग हो, कोई भी जाति हो, सभी का उत्थान होना चाहिए। प्रदेश के हर कोने का विकास होना चाहिए। गरीबी, अशिक्षा और जहालत खत्म करना पार्टी और सरकार दोनों का मुख्य मिशन है ...और करीब साढ़े चार दशक बाद गंगानगरी को मंत्री पद मिला है तो इसमें गलत क्या है। सियासत का चश्मा उतारकर देखिए तो इसमें वेस्ट यूपी का ही लाभ है। स्वतंत्र प्रभार देने के लिए क्षेत्र के लोगों ने सीएम का आभार भी जताया है।

-अपनी राजनीतिक समझ और सूझबूझ से पार्टी में पकड़ बरकरार रखने में तो आप कामयाब रहे, लेकिन मंत्री बनने के बाद आपके समर्थकों और क्षेत्र के लोगों की अपेक्षा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में पार्टी हाईकमान की कसौटी पर खरा उतरना एक चुनौती नहीं है?
जनता की अपेक्षा और पार्टी हाईकमान की कसौटी पर खरा उतरना वाकई एक चुनौती है, लेकिन जनता का सहयोग करना और क्षमता के अनुसार उनके लिए लड़ाई लडऩा ही हमारा प्रथम कर्तव्य है। आखिर जनहित के लिए हमें मंत्री पद नवाजा गया है। नि:संदेह हम पार्टी और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करेंगे। क्योंकि मैं पार्टी का सच्चा सिपाही हूं और जनता से जुड़कर काम करने में यकीन रखता हूं।

-ब्रजघाट का विकास होगा?
हमने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूं कि ब्रजघाट का हरिद्वार की तर्ज पर विकास करना हमारी प्राथमिकता में शामिल है। इसके अलावा स्वच्छता अभियान को गति दिलाना, उच्च शिक्षा के संसाधन मुहैया कराना, बेहतर चिकित्सा सेवा और युवाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध कराने का भी हम पूरा प्रयास कर रहे हैं। एक बात और हम कहना चाहते हैं- हर काम समय के मुताबिक ही होता है। पार्टी के लिए पूरी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से काम करना हमारा पहला दायित्व है। पार्टी हाईकमान की ओर से जो भी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, हम उसे बखूबी निभाने का प्रयत्न करेंगे।

-वेस्ट यूपी में कद्दावर नेता की जरूरत और ठाकुर समुदाय के प्रतिनिधित्व को देखते हुए मदन चौहान को मंत्रिमंडल में जगह तो मिल गई, लेकिन प्रदेश में हुए दंगे और बढ़ती दबंगई की घटनाओं से लगता नहीं कि मिशन-2017 में सपा को फिर सफलता मिलेगी?
दंगे कौन कराता है, सभी जानते हैं। बेनकाब हो चुकी हैं पार्टियां और उनके सांसद-विधायक। अब उत्तर प्रदेश में पूरी तरह अमन-चैन है। सपा के शासनकाल में प्रदेश दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में मंत्रिमंडल उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की दिशा में अग्रसर है। प्रदेश में फिरकापरस्त ताकतों को मुंह की खानी पड़ी है। सरकार, समाज के सभी वर्गों के लिए कार्य कर रही है। प्रदेश की अवाम जनहित कार्यों से इत्तेफाक जताते हुए सपा के पक्ष में अपनी राय जता रही है। मिशन-2017 के चुनावों में सपा को भारी सफलता मिलेगी। सूबे में शानदार जीत हासिल करेगी समाजवादी पार्टी और प्रदेश को देश के सभी सूबों से विकासशील राज्य का दर्जा प्राप्त होगा।

-पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष है? सपाईयों के बीच चल रही आपसी गुटबाजी के चलते सरकार की सुविधाओं का पूरा लाभ वहां तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिन्हें जरूरत है?
कोई गुटबाजी नहीं है। सपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसमें सभी कार्यकर्ताओं को बराबरी का दर्जा मिलता है। नेताजी (मुलायम सिंह यादव) और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पार्टी के साथ-साथ प्रदेश को भी एकता के सूत्र में पिरोए हुए हैं। उनकी कुशल कार्यशैली के बूते उत्तर प्रदेश में अमन-चैन का माहौल है तथा दबे-कुचले, पिछड़ों को सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ पहुंच रहा है। जिनकी जमीनी पकड़ नहीं है और वे धर्म-जाति की राजनीति करने में यकीन रखते हैं, वही हमारे कार्यकर्ताओं को भी तोडऩे की कोशिश करते हैं। असंतोष की बात फैलाते हैं। हमारे सभी कार्यकर्ता हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। पूरी एकता के साथ हम लोग पार्टी और सरकार की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

-क्या मंत्री बनवाने में सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह का आशीर्वाद प्राप्त है?
अमर सिंह जी से हमारा नाम जोडऩा गलत है। पिछले चार साल में न तो हम अमर सिंह से मिले हैं और न ही हमारी इस बीच कभी फोन पर कोई बात हुई है। हमें पार्टी से टिकट हमेशा सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और सांसद प्रोफेसर राम गोपाल यादव की मेहरबानी से मिला है। अमर सिंह से हमारी उतनी ही दूरी है जितना पार्टी की है।

-मनोरंजन कर की वसूली में लापरवाही बरती जाती है। अधिकारियों के बीच भ्रष्टाचार व्याप्त है?
हमारे बीच भ्रष्टाचार की कोई जगह नहीं है। हमने सख्त आदेश कर रखा है कि प्रदेश में मनोरंजन कर की वसूली में सक्रियता लाई जाए। तीन दिन पहले भी अधिकारियों के साथ बैठक कर वसूली में सक्रियता लाने के साथ 
निष्ठापूर्वक काम करने का निर्देश दिया है। हम इस तरह का प्लान तैयार कर रहे हैं कि लोगों को सस्ता मनोरंजन भी मुहैय्या हो और सरकार को अच्छा राजस्व भी मिले।

20 हजार का लग सकता है अर्थदंड
उत्तर प्रदेश में अब नए साल का जश्न मनाना आसान नहीं होगा। घर में जश्न मना रहे हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि आप नववर्ष की पूर्व संध्या पर होटलों, क्लबों, वाटर पार्कों, रिर्सोटस, मनोरंजन पार्कों, रेजीडेंट कॉलोनियों या अन्य स्थानों पर मनोरंजन के कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं तो आप पर मनोरंजन विभाग की नजर रहेगी। इसके लिए उत्तर प्रदेश के मनोरंजन कर राज्य मंत्री मदन चौहान ने विभाग के समस्त अधिकारियों तथा जिलाधिकारियों को इस संबन्ध में निर्देश दे दिए हैं। उन्होंने आयोजकों को ऐसे मनोरंजक 
कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए पूर्व अनुमति प्राप्त करने के निर्देश दिए हैं। बिना अनुमति के आयोजित कार्यक्रमों के आयोजकों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जाएगी। करीब 20 हजार रुपये का अर्थदंड भी वसूला जा सकता है।

मजबूती के पीछे बड़ा संघर्ष
वर्तमान में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर, हापुड़, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर और गाजियाबाद आदि की 42 विधानसभा सीटों में से छह ही पार्टी के विधायक हैं और मदन चौहान पहली बार सबसे मजबूत स्थिति में पहुंचे हैं। इसके पीछे उनका संघर्ष भी रहा है। गढ़ विधानसभा सीट किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जनाधार वाली सीट थी। बाद में राम मंदिर लहर चली तो बीजेपी की टॉप टेन सीटों में शामिल हो गई, लेकिन सपा प्रत्याशी के तौर पर मदन चौहान ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के राम नरेश रावत को पराजित कर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। उस दौरान उन्हें 43,808 वोट मिले थे, जबकि भाजपा को महज 36,364 मत हासिल हुए। इसके बाद पिछले चुनावों में बसपा प्रत्याशी हाजी शब्बन को हराकर चौहान ने शानदार जीत दर्ज कराई। 

मुख्यमंत्री ने निभाया वादा
मदन चौहान गढ़ सीट पर तीसरी बार जीते तो 25 फरवरी 2012 को एक जनसभा में राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि वे अब इस क्षेत्र को जल्द ही लाल बत्ती से नवाजेंगे। मदन चौहान कहते हैं, देर से ही सही पर सीएम ने अपना वादा पूरा किया।

शनिवार, 15 नवंबर 2014

बैंक रॉबरी, करोड़ों की लूट

हरियाणा के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी बैंक रॉबरी। लुटेरों ने ढाई फुट चौड़ी और 100 फुट लंबी खोदी सुरंग। 86 लॉकर्स से लूटे करोड़ों के जेवरात और दूसरे कीमती सामान। कहां हुई बैंक से चूक? कौन है इस मामले का मास्‍टर माइंड?