रविवार, 31 मार्च 2013


रात का राक्षस

एक वार और गर्दन धड़ से अलग! खून करना उसका शौक है! वह खुद कहता है, 20 साल की उम्र में अब तक 5 कत्ल कर चुका है! 13 और लोगों की हत्या करने का इरादा है! हिट लिस्ट बना रखी है शैतान ने! खून देखकर अफसोस नहीं आनंद आता है उसे! दहशत में हैं इलाके के लोग। कांप उठती हैं औरतें उसका नाम सुनकर। पुलिस साइको किलर मानती है! कौन है यह नरपिशाच?

-जितेन्द्र बच्चन
इंसान की शक्ल में नरपिशाच! नाम है राकेश राज और काम, कत्ल करना! करीब बारह वर्षों में शायद ही गोरखपुर के किसी इंसान ने इस शैतान को दिन के उजाले में देखा हो, लेकिन शाम ढलते ही वह अपनी शैतानी सत्ता का शहंशाह होता है। जिस दिन वह जेल से छूटकर आया, आठ-10 किलोमीटर के इलाके में खौफनाक मंजर था। दहशत और महज सन्नाटा, गोया शहर में कफर््यू लगा हो। आखिर चुन-चुनकर लोगों का कत्ल करने का उसके सिर पर जुनून जो सवार है। हिट लिस्ट बना रखी है उसने। डुमरी गांव और आस-पास के 18 लोगों के नाम थे उसकी सूची में, जिनमें से दो लोगों की लाश पुलिस बरामद कर चुकी है और तीन लापता हैं। अब उस •ोड़िए की खूनी नजर बाकी बचे 13 लोगों पर है। पुलिस के अनुसार, आरोपी के खिलाफ हत्या, जान से मारने का प्रयास और एनडीपीएस एक्ट के तहत कई मामले दर्ज हैं। राकेश खुद कहता है कि अब तक वह पांच लोगों को मौत के घाट उतार चुका है और बहता खून देखना उसे अच्छा लगता है। सूरज डूबते ही वह निकल पड़ता है अपने गड़ासे की प्यास बुझाने।
10 मार्च, 2013 की रात भी राकेश राज ने डुमरी गांव के चौकीदार पाले (80) की गंडासे के एक वार से ही हत्या कर दी। इसके बाद 11 और 12 मार्च की रात सुनील गौड़ और अशोक गौड़ की हत्या करने के इरादे से उनके घरों में हमला किया, लेकिन वे दोनों बच गए। अपने मकसद में कामयाब न होने पर राकेश ने खीझकर अशोक के घर पथराव भी किया। घटना से सदमे में आया अशोक का आठ साल का बेटा रवि गौड़ आज भी उस रात का खौफनाक मंजर यादकर सिहर उठता है। थाना सहजनवां पुलिस की जीना भी हराम हो गया। संगीन वारदात की खबर मिलते ही थानाध्यक्ष रामकार यादव मयफोर्स खूनी दरिंदे की तलाश में रवाना हो गए। पुलिस की कई टुकड़ी रात-रात भर गांव-गली की खाक छानती रही, तब जाकर 14 मार्च की सुबह सफलता मिली। राकेश राज को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उसके हौंसले में कोई कमी नहीं आई। उसने पुलिस के सामने अपना गुनाह कबूल करते हुए उसने कहा कि उस रात वह खाना खाकर सोने जा रहा था, तभी याद आया कि पाले का काम तमाम करना है और उसने जाकर उसकी हत्या कर दी।
शाम होते ही घरों में दुबक जाते हैं लोग
राकेश की संगत अच्छी नहीं थी। बचपन से ही वह गांव के नशेड़ियों के साथ रहने लगा था। कोई कभी रोकने-टोकने की कोशिश करता, तो राकेश उसे ही उल्टा धमकाने लगता। आरोपी के पिता राजेंद्र राज भी गांजा पीते थे। गांव के बाज़ार में बने मंदिर पर अक्सर दो-चार लोगों के साथ उनकी महफिल जमी रहती। कभी बेटे को सुधारने की उन्होंने कोशिश नहीं की। कभी राकेश पकड़ा जाता, तो मां थाने-पुलिस में जाकर किसी तरह उसे छुड़ा लाती। उसकी मां के हाथ-पैर जोड़ने पर कई बार इलाके के कुछ नेताओं ने भी राकेश को छोड़ने के लिए स्थानीय पुलिस से सिफारिश की है, तब किसी को क्या पता था कि आगे चलकर राकेश राज लोगों की जान से खेलने लगेगा। नतीजतन आज उसके आतंक से गोरखपुर के छह गांव पूरी तरह से दहशत में जी रहे हैं। डुमरी, सोनचार, शहरी, गोविंदपुर, घघसरा, पतेड़ आदि गांवों के लोग सूरज ढलते ही घरों में दुबकने लगते हैं।
रात के सन्नाटे में करता है शिकार
मुल्जिम का कत्ल करने का तरीका, औजार और समय करीब-करीब एक-सा ही होता है। चौकीदार पाले की हत्या भी उसने उसी तरह से की जैसे इसने अपने पिछले शिकारों को अंजाम दिया था। रात 11 बजे के बाद अपने बरामदे में गहरी नींद में डूबे पाले की गर्दन गड़ासे के वार से उसने धड़ से अलग कर दी। आधी रात के आसपास पूरा गांव सोया होता है। गर्मी में कुछ लोग घर के बाहर सोते हैं, जिससे राकेश को अपने शिकार पर वार करने में आसानी होती है। वह हमेशा गंड़ासे से ही कत्ल करता है। शिकार का सिर, चेहरा और गर्दन उसके निशाने पर होते हैं। उसकी पूरी कोशिश होती है कि एक ही वार में काम तमाम हो जाए। न कोई आवाज और न ही बचने का मौका।
अदालत की परवाह नहीं
इस घटना से करीब एक महीने पहले अपने ही गांव के नरेंद्र राज की हत्या के मामले में जेल से जमानत पर रिहा हुआ था राकेश, लेकिन सीखचों के बाहर आते ही एक बार फिर उसने अपना खूनी शौक पूरा करते हुए चौकीदार पाले की हत्या कर दी। राकेश को अदालत और जज से भी डर नहीं लगता। उसका कहना है, ‘क्या करेगा जज? मैं किसी अदालत से नहीं डरता। मुझे जिसे मारना था, मार दिया। एक नहीं मैंने कई खून किए हैं मैने। मुझे खून देखकर बहुत मजा आता है। मेरी फाइल जो आगे बढ़ाएगा, मैं उसे भी मार दूंगा।’ थाने में भी आरोपी की हेकड़ी कम नहीं हुई। जेल जाने से वह कतई नहीं डरता। कहता है, ‘क्या होगा, वहां भी सबकुछ चलता रहेगा। सीधे या फिर टेढ़े।’ कुछ लोग राकेश को सनकी कहते हैं। सच्चाई जो भी हो, लेकिन आरोपी के दावे और उसके साइको होने के तथ्य ने पुलिस का सिरदर्द बढ़ा दिया है। पुलिस हत्या के उन मामलों की जांच में जुटी है, जिनमें हत्या का तरीका राकेश के शिकार बने लोगों की तरह ही था।
चोरी की तहरीर से शुरू हुई बगावत
पुलिस के अनुसार, 2011 में डुमरी निवास नरेश मिश्रा ने राकेश के खिलाफ चोरी की तहरीर दी थी। पुलिस ने इस मामले की तहकीकात क्या शुरू की, राकेश राज बागी बन गया। उसने नरेश मिश्रा के चेहरे और सिर पर घातक वार किए, लेकिन लंबे इलाज के बाद नरेश बच गए। पीड़ित का कहना है कि जब वह अस्पताल में था और उसके बचने की खबर राकेश को मिली, तो गुस्से में उसने दूसरे दिन उसके घर में आग लगा दी। उनका पूरा घर खाक हो गया। आरोपी के दूसरे शिकार बने गांव के ही प्रहलाद यादव। उस पर भी राकेश ने रात में ही हमला किया था। सिर एवं चेहरे पर गहरे जख्म हैं। एक आंख की रोशनी चली गई। प्रहलाद की महज इतनी गलती थी कि उन्होंने नरेश मिश्रा का साथ दिया था। राकेश जमानत पर जेल से बाहर आया, तो प्रहलाद डर के मारे दिन भर नजरबंद रहते और रात पड़ोसी बाबूलाल चौबे के घर में सोते थे।
घात लगाकर देता है वारदात को अंजाम
राकेश का तीसरा शिकार बना बाबूलाल का 18 वर्षीय बेटा गौतम चौबे। पहले राकेश से उसकी दोस्ती थी। गांव के कुछ लोगों का कहना है कि गौतम और राकेश में चोरी के माल के बंटवारे को लेकर विवाद हुआ था। इसी के चलते गौतम ने एक दिन उसे गांव में सबके सामने थप्पड़ मार दिया था। अपने अपमान से क्षुब्ध राकेश तिलमिला उठा। मौका पाते ही एक रात उसने बरामदे में सोते हुए गौतम पर हमला कर दिया, लेकिन भगवान की कृपा से वह बच गया। अब भजन-कीर्तन की टोली में शामिल गौतम रामचरित मानस का पाठ करता है। उसकी मां मंजू चौबे आज भी उस दिन के खूनी मंजर को याद कर सिहर उठती हैं। कहती हैं, अगर इलाके की पुलिस अगर पहले ही मामले में कड़ी कार्रवाई करती, तो आज गांव में दहशत का यह माहौल न होता। फिलहाल, राकेश राज के हौसले बुलंद रहे। दिसंबर, 2012 में उसने गांव के ही नरेंद्र राज की हत्या कर दी... और अब चौकीदार पाले का कत्ल का मामला सामने आया है।
जेल जाने के बाद भी कम नहीं हुआ डर
पुलिस अधिकारियों की गहन पूछताछ के बाद आरोपी राकेश राज को गोरखपुर की सक्षम अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भ•ोज दिया गया। इससे डुमरी गांव के लोगों ने राहत की सांस ली है, लेकिन उनकी आंखों में दहशत कम नहीं हुई है। आरोपी राकेश के माकन में ताला बंद था, लेकिन पड़ोसी इतने खौफजदा हैं कि उसके बारे में कुछ पूछने पर वे तुरंत अपना दरवाजा बंद कर देते हैं। एक बुजुर्ग ने कहा, भ‘•ौया हम उसके बारे में कुछ नहीं कह सकते। अगर उसे पता चल गया, तो वह हमारी भी हत्या कर देगा।’
आरोपी से 16 लोगों की लिस्ट बरामद
उत्तर प्रदेश के आर्थिक रूप से पिछड़े जनपद गोरखपुर के थाना सहजनवां के डुमरी नेवास गांव के आरोपी राकेश ने यहां के लोगों का जीना हराम कर रखा है। मुख्यालय से महज 25 किमी़ दूर स्थित डुमरी निवास गांव में कोई रात में घर से बाहर नहीं निकलता। राकेश देर रात ही लोगों पर घात लगाकर वार करता है। अब तक इस गांव के निवासी नरेश, गौतम, प्रह्लाद और नरेंद्र उसके गड़ासे के वार से घायल हो चुके हैं। बाद में नरेश की मौत हो गई। कुछ दिन तो गांव के लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर वह कौन सनकी है, जो एक के बाद एक संगीन वारदात को अंजाम दे रहा है। अब बुजुर्ग पाले की हत्या के बाद राकेश की गिरफ्तारी से पुलिस ने आरोपी का पर्दाफाश कर दिया है। थानाध्यक्ष (सहजनवां) रमाकर यादव ने बताया कि आरोपी को जेल भ•ोज दिया गया है। उसने बदला लेने के लिए गांव के चार लोगों पर वार किया था। राकेश के पास से 16 लोगों की एक लिस्ट भी बरामद हुई है। आगे मामले की जांच की जा रही है।
गोरखपुर से- प्रिंस पांडेय
जमानत का विरोध करेगी पुलिस
आरोपी राकेश राज के बारे में मिली जानकारी बहुत चिंताजनक है। वह समाज के लिए खतरा बन चुका है। उसकी केस हिस्ट्री खोली जा रही है। हमारा प्रयास है कि जेल में उसकी मेडिकल और सायिकोलोजिकल काउंसलिंग कराई जाए, ताकि उसकी हिंसक प्रवृत्ति पर काबू पाया जा सके। अदालत में हम आरोपी की जमानत का पुरजोर विरोध करेंगे। इसके बावजूद वह जमानत पर जेल से बाहर आने में कामयाब हो जाता है, तो उसकी गतिविधियों को पुलिस मॉनिटर करेगी। साथ ही मुल्जिम के उस बयान की जांच भी कराई जाएगी, जिसमें उसने अब तक कई हत्याएं करने की बात कही है।
शलभ माथुर
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, गोरखपुर

सोमवार, 11 मार्च 2013


  यूपी के दबंग, ठेंगे पर कानून

उनके एक इशारे पर डीएसपी को गोली मार दी जाती है, प्रधान को अगवा कर लिया जाता है, औरत की इज्जत नीलम कर दी जाती है। सरकार कुछ नहीं कर पाती। क्योंकि सरकार से वे नहीं, उनसे सरकार चलती है और वो राज करते हैं! गुंडाराज! यूपी के दबंग! पूर्वांचल के बाहुबली! कानून को रखैल समझते हैं और पुलिस को नपुंसक!
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कलेंडर बदला, तारीख बदली। नहीं बदली तो यूपी की तकदीर और तस्वीर! 15 मार्च, 2012 को अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 15 मार्च, 2013 को उनकी सरकार के एक साल पूरे हो जाएंगे। सूबे में न जुर्म कम हुआ और न ही गुनहगारों को बचाने की सियासत! जनवरी, 2012 से जून 2012 तक उत्तर प्रदेश में 1164 मर्डर, 920 लूट और 326 रेप की वारदात हो चुकी है। क्योंकि राज्य में सरकार से ज्यादा दबंगों की चलती है। सत्ता इनकी मुट्ठी में होती है! मुख्यमंत्री इनके इशारे पर चलते हैं। कानून से खेलना बाहुबलियों का पेशा है। जेल में रहें या रेल में, गुनाह का खेल खेलना कभी नहीं चूकते। जो दाउद से नहीं डरते, वो राजा भैया का नाम सुनते ही कांप उठते हैं। एफआईआर में उनका नाम है, लेकिन वो आजाद हैं। क्योंकि वो ‘राजा भैया’ हैं! इलाके में उनकी हुकूमत चलती है। रियासत चली गई, ठसक बाकी है! ताल ठोंककर कहते हैं, ‘मर्डर करने की क्या जरूरत है! सरकार अपनी है, ट्रांसफर करवा देते।’
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। मुल्क की सियासत भी इसी राज्य के रहमोकरम पर चलती है। यहां हमेशा कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है, जो देश ही नहीं दुनिया की मीडिया में सुर्खियां बनता है। समय बदला, समाज बदला, लेकिन नहीं बदला उत्तर प्रदेश। कहा जाता है कि राजनीति के अपराधीकरण की शुरुआत भी यहीं से हुई। कल तक जो दबंग और बाहुबली राजनेताओं के संरक्षण में काम करते थे, आज वे बिना किसी मुखौटे के राजनीति में हैं... और तो और इनमें से कुछ मंत्री पद का सुख भ•ाोग चुके हैं, तो कुछ भ•ाोग रहे हैं। इन बाहुबलियों की दबंगई ऐसी है कि मुख्यमंत्री भी जब-तब इनके सामने नतमस्तक नजर आते हैं। इनकी ‘साजिश’ और ‘चाल’ से प्रदेश की धरती कांप उठती है और जब इन्हें गुस्सा आता है, तो सूबें की सरकारें हिल जाती हैं, लेकिन इनका जलवा न कल कम था और न ही आज।
हरिशंकर तिवारी : माफिया के पितामह
दाउद जैसे अपराधी जिस समय गुनाह का ए, बी, सी, डी सीख रहे थे, उस समय उत्तर प्रदेश में हरिशंकर तिवारी अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके थे। हरिशंकर के बाहुबल का डंका विदेशों तक बजता था। स्व. वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी के बीच होने वाली गैंगवार अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में छाई रहती थी। तिवारी ने उत्तर प्रदेश, बिहार और पड़ोसी देश नेपाल तक अपना साम्राज्य बढ़ा लिया था। गोरखपुर के बुजुर्ग बताते हैं कि तिवारी ने ऐसे लोगों की टीम बना रखी थी, जो उनके एक इशारे पर बिना कुछ सोचे-समझे कुछ भी करने पर उतारू रहते थे। आज भी उनका जलवा कम नहीं हुआ है। आम आदमी हो या फिर माफिया, दोनों ही इनसे बचकर रहना पसंद करते हैं।
76 साल के तिवारी छात्र जीवन में गोरखपुर शहर में किराए के एक कमरे में रहते थे, लेकिन आज जटाशंकर मुहल्ले में उनके किलेनुमा निवास को ‘हाता’ के नाम से जाना जाता है। वे 3 बार निर्दलीय विधायक रहे। 2 बार कांग्रेस के टिकट पर जीते और एक बार तिवारी कांग्रेस से भी जीते। अब पूरी तरह राजनीति को समिर्पत हैं। एक बेटा कुशल उर्फ भीष्म तिवारी खलीलाबाद से बसपा सांसद हैं। दूसरा विनय तिवारी अभी राजनीतिक पारी आरंभ होने का इंतजार कर रहा है। भ•ाांजा गणेश शंकर विधान परिषद् अध्यक्ष है, लेकिन दूसरा बेटा विनय तिवारी विधानसभ•ाा और लोकसभ•ाा चुनाव हार चुका है। वहीं तिवारी जब से राजनीति में आए, उनका रसूख हमेशा बरकरार रहा। सरकार किसी की भी बने, मंत्री पद मिलना तय रहता। एकाध बार माफिया मंत्री के नाम पर काफी हो हल्ला भी मचा, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। तिवारी मंत्री की कुर्सी पर कायम रहे। सन 1998 में कल्याण सिंह द्वारा बसपा को तोड़कर बनाई सरकार में साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री रहे। वर्ष 2000 में राम प्रकाश गुप्त की भ•ााजपा सरकार में स्टांप रजिस्ट्रेशन मंत्री बने। इसके बाद 2001 में राजनाथ सिंह की भजपा सरकार बनी, तब भी हरिशंकर तिवारी की मंत्री की कुर्सी कायम रही। 2002 में मायावती की बसपा सरकार में भी वे मंत्रिमंडल के सदस्य बने रहे। उसके बाद 2003-07 तक मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी तिवारी मंत्री रहे। उनका कोई बाल नहीं बांका कर सका और आज भी यूपी में तिवारी माफिया के पितामाह कहे जाते हैं।
अतीक अहमद : अपराध में अव्वल
पढ़ाई में फिसड्डी, क्र ाइम में अव्वल! अतीक अहमद की आज यही पहचान बन चुकी है। आतंक इतना कि इलाहाबाद में दहशत का दूसरा नाम अतीक अहमद माना जाता है। जुर्म की दुनिया में अपने नाम का डंका बजाने के बाद अतीक प्रदेश की राजनीति में ढोल बजाने लगे। इलाहाबाद में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप लगा और वह जेल पहुंच गए। इनके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी के करीब 35 मामले दर्ज हैं। इलाहाबाद की नगर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक रहे अतीक ने आपने छोटे भ•ााई अशरफ को समाजवादी पार्टी की साइकिल पर चढ़ाकर यह सीट उसे दे दी और खुद फूलपुर संसदीय सीट से लोकसभ चुनाव लड़ा। ज्ञात रहे कि इसी सीट से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सांसद थे। अतीक भी सांसद बन गए।
लेकिन अतीक के आतंक से ऊबे मतदाताओं ने नवंबर 2004 में हुए प्रदेश विधानसभी चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी प्रवृत्ति का था। जनता को लगा कि अतीक से अच्छा है छोटे अपराधी को जिता दिया जाए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि अतीक क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और उसके छोटे भ•ााई अशरफ ने मिलकर साजिश रची और राजू पाल की हत्या करवा दी। सपा के शासन में ही यह घटना हुई थी। ऐसे में पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भ•ााई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। बसपा सरकार बनी, तो माया ने अतीक को उसकी हैसियत याद दिला दी। ़फिलहाल आज भी अतीक के रसूख में कोई कमी नहीं आई है।
ब्रजेश सिंह : अपराध सुप्रीमो
उड़ीसा में गिरफ्तार ब्रजेश सिंह को पूर्वांचल ही नहीं देश के कई राज्यों में संगठित अपराध का सुप्रीमो माना जाता है। भ•ाुवनेश्वर में पहचान छिपाकर रियल स्टेट का कारोबार चलाता था यह डॉन। वहीं के बिग बाजार के बाहर से गिरफ्तार हुए ब्रजेश सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच लाख रु पये का इनाम घोषित कर रखा था। हैरानी इस बात की है कि करीब 20 वर्षों तक किसी ने भी इसकी शक्ल नहीं देखी। इस डॉन की गिरफ़्तारी भी बड़े नाटकीय ढंग से हुई और उसमें भी सियासत की बू आती है, लेकिन गायब रहकर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्रजेश सिंह का आतंक इतना रहा कि पूरे इलाके में रेलवे और दूसरे सरकारी ठेकों से लेकर कोयले तक की दलाली में इसका सिक्का चलता था। गायब रहते हुए भी ब्रजेश ने राजनीतिक संरक्षण के रास्ते तलाश लिए थे। भ•ााई चुलबुल सिंह को बीजेपी में लगाया। भ•ातीजा विधायक बन चुका है, लेकिन वर्तमान समय में ब्रजेश गैंग के अधिकतर बड़े अपराधियों की या तो हत्या हो चुकी है या फिर वो किसी न किसी नेता के संरक्षण में अपना काम चला रहे हैं।
ब्रजेश को सबसे बड़ा आघात तब लगा, जब उसके सबसे खास अवधेश राय का मर्डर हो गया। अवधेश के छोटे भ•ााई अजय राय ने विधायक बनने के बाद शांति धारण कर ली। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय को ब्रजेश का मुंशी कहा जाता था और वही अघोषित तौर पर ब्रजेश गिरोह को चलाते थे। बाद में आरोप है कि पूर्वांचल के एक और माफिया मुख्तार अंसारी ने अपने शूटर मुन्ना बजरंगी से कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी। ब्रजेश के अपराधी जीवन का आरंभ आजमगढ़ की बाजार में पिता की हत्या होने के बाद हुआ। इलाके के दबंग ठाकुरों ने ब्रजेश के पिता का शरीर चाकू और गोलियों से छलनी कर दिया था। ब्रजेश ने पहले पिता की हत्या का बदला लिया, फिर बिहार में ब्रजेश सिंह और वीरेंद्र टाटा ने अपना कॉकस बना लिया। चंदौसी से बोकारो और जमशेदपुर तक इसकी तूती बोलती थी। कोयले की उगाही के साथ ही रेलवे, पीडब्ल्यूडी और दूसरे सरकारी विभ•ाागों की ठेकेदारी इन लोगों की कमाई का मुख्य जरिया था। ब्रजेश ने जेजे अस्पताल मुंबई में दाउद इब्रहिम के बहनोई पारकर की हत्या का बदला इस तरह लिया कि देश कांप उठा था। ब्रजेश के सबसे खास साथी वीरेंद्र टाटा की हत्या बनारस से मीरजापुर के रास्ते में श्रीप्रकाश शुक्ल गैंग ने कर दी थी। उसके बाद से यह माफिया अंडरग्राउंड हो अपनी गतिविधियां चला रहा था। अब जेल में है।
धनंजय सिंह : जेल से चलता है खेल
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे धनंजय सिंह वर्तमान में बसपा से जौनपुर से सांसद हैं। इनके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी जैसे कई मामले दर्ज हैं। लखनऊ के इलाकाई माफिया अरुण शंकर शुक्ल उर्फअन्ना और अंबेडकर नगर के माफिया अभय सिंह के दोस्त रहे हैं धनंजय सिंह। बाद में ये तीनों अलग हो गए। धनंजय की दोनों दोस्तों से आगे निकलने की भी रोचक दास्तान है। एक पुलिस मुठभ•ोड़ के बाद पुलिस ने दावा किया कि धनंजय सिंह मारा गया, लेकिन कुछ दिन बाद धनंजय सामने आया और आरोप लगाया कि उप्र पुलिस उसे जान से मार देना चाहती है। इसके बाद धनंजय सिंह नेताओं का दुलारा बन गया। विधानसभ•ाा चुनाव में उतरा और जीत गया।
लेकिन विधायक बनने के बाद भी धनंजय सिंह का आचरण नहीं बदला। उस पर अपने परम मित्र अरुण उपाध्याय के भ•ााई की हत्या का आरोप लगा, जिसका शव मीरजापुर से बरामद हुआ था। उसी समय अरुण ने कसम खाई कि जब तक इस हत्या का बदला नहीं ले लिया जाएगा, वह अपने भ•ााई की तेरहवीं नहीं करेगा। पिछले लोकसभ•ाा चुनाव में इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रत्याशी की लाश एक पेड़ से लटकी मिली। इस मामले का भी आरोपी रहा धनंजय। बाद में अदालत से वह इस मामले में बरी कर दिया गया। एक और दोस्त अतुल सिंह के साथ भी धनंजय का विवाद हुआ। इलाके के लोग आज भी इतना डरते हैं कि कोई धनंजय सिंह के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पुलिस भी जो कभी इनका पीछा करती थी, आज सलाम करती है। आखिर वह माननीय संसद सदस्य हैं।
मुख्तार अंसारी : सत्ता की रही सरपरस्ती
कौमी एकता दल से मऊ विधानसभ•ाा से विधायक हैं मुख्तार अंसारी। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप है। 1989 में मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में मुख्तार को सत्ता का संरक्षण मिला। उसके बाद अंसारी के विरु द्ध सारे मामलों में सीबीसीआईडी की जांच लगवा दी गई। कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनी, तो मुख्तार के खिलाफ टाडा लगा दिया गया। बसपा और बीजेपी की पहली साझा सरकार में मायावती ने मुख्तार को जेड प्लस श्रेणी सुरक्षा मुहैया कराई थी। इसके बाद मुख्तार का कद इतना बढ़ गया कि वह माफिया से पूर्वांचल के मुसलमानों का रहनुमा कहा जाने लगा। तीसरी बार मुलायम सिंह की सरकार बनी, तो मुख्तार अपने चरम पर थे। ये वो दौर था जब मुख्तार की तूती बोलती थी। उसके यहां बाहर के सूबों के अपराधियों को भी संरक्षण मिलने लगा था।
उन दिनों के एक धाकड़ डीएसपी शैलेन्द्र सिंह ने एक एलएमजी पकड़ी, जो मुख्तार के पास पहुंचनी थी। मुख्तार का तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन डीएसपी साहब को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। कहा जाता है, एक बड़े नेता ने मुख्तार को बचाने में अपनी सारी ताकत झोंक दी थी। इसी दौरान मऊ दंगों में मुख्तार का दंगाई रूप भी देखने को मिला और मुलायम की पूर्व सरकार में गाजीपुर में दो दर्जन से अधिक मुख्तार के विरोधियों की हत्या हुई, लेकिन मुख्तार का कुछ नहीं बिगड़ा। यहां तक कि 22 फरवरी 2009 को करंडा में एक सपा समर्थक ठेकेदार की हत्या का आरोप भी मुख्तार पर लगा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनकी आन-बान शान कायम रही। वर्ष 2007 में विधानसभ•ाा चुनाव के बाद मायावती की सरकार बनी। मुख्तार असांरी को मायावती का पूर्ण संरक्षण मिलने लगा। लोकसभ•ाा चुनाव में मुख्तार को वाराणसी और उसके भ•ााई अफजाल को गाजीपुर का टिकट थमा दिया गया। अब मुख्तार अंसरी जेल में हैं।
धर्मंपाल उर्फ डीपी यादव : संगीन आरोप
यादव पर दर्जनों संगीन आरोप हैं। दिल्ली, उत्तराखंड और हरियाणा तक रसूख का फैला है साम्राज्य। पश्चिम उत्तर प्रदेश का इन्हें शराब माफिया कहा जाता है। बेटा विकास तिहाड़ जेल में बंद है। उसे देश के चर्चित नीतीश कटारा हत्याकांड में सजा हो चुकी है। खुद डीपी यादव पर पहला मामला सन 1989 में गाजियाबाद जिले के कविनगर थाने में दर्ज हुआ। इसके बाद कत्ल और डकैती के 2-दो और अपहरण, गैंगस्टर और टाडा जैसे मामले मुकदमों की फेहरिस्त में शामिल होते गए। इसके साथ ही जेसिका लाल हत्याकांड में भी यादव और उसके बेटे विकास का नाम आरोपियों में शामिल हुआ।
डीपी यादव ने राष्ट्रीय परिवर्तन दल बनाया। पत्नी उर्मिलेश विधायक चुनी गर्इं। बाद में पत्नी सहित यादव ने बसपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। उसके बाद डीपी तब चर्चा में आए, जब विधानसभ•ाा चुनाव में अखिलेश यादव ने इनकी छवि के चलते सपा में लेने से इंकार कर दिया। वैसे तो हमेशा ही कोई न कोई विवाद साथ जुड़ा रहता है, लेकिन बदायूं जिले की बिसौली तहसील के गांव रानेट के पास यादव की हाल ही में स्थापित यदु शुगर मिल की बात करें, तो मिल की स्थापना दबंगई और बेईमानी से ही की गई है। मिल के डायरेक्टर छोटे पुत्र कुणाल यादव को बनाया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये मिल जबरन लिखाई गई जमीनों पर बनी है।
राजा भैया : कुंडा का गुंडा
न थाना न कचहरी, आॅन स्पाट फैसला! इलाके में राजा भैया की तत्काल न्याय दिलाने वाले युवराज की छवि है। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया (40) को उनके विरोधी ‘कुंडा का गुंडा’ कहते हैं। इनके पिता उदय प्रताप सिंह प्रतापगढ़ जिले की तहसील कुंडा के थाना हथिगवां स्थित बेंती और भदरी स्टेट के राजा हुआ करते थे। बेंती कोठी पूरे इलाके में मशहूर है। कुंडा (प्रतापगढ़) विधानसभ•ाा क्षेत्र से ही राजा भैया विधायक हैं। वर्ष 1993 से अब तक हुए पांच बार चुनाव में उन्हें कोई हरा नहीं पाया है। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1989 में स्नातक इस राजा पर तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। आठ आपराधिक मुकदमों में न्यायालय ने संज्ञान लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पोटा लगाया, बाद में बरी हो गए। वर्ष 2010 में निकाय चुनाव के दौरान एक नेता की हत्या के प्रयास का मुकदमा भी चल रहा है, जिसमें राजा भैया समेत 13 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 2002 में विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने राजा के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया, जो अब भी अदालत में विचाराधीन है, लेकिन चुनाव में उन्हें कोई शिकश्त नहीं दे सका।
राजा भैया वर्ष 1996 में पहली बार कल्याण सरकार में मंत्री बने। इसके बाद 1999 में राम प्रकाश गुप्ता की सरकार, 2000 में राजनाथ सिंह और 2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी राजा भैया को मंत्री पद से नवाजा गया। दिसंबर, 2010 में एक इलाकाई नेता ने स्थानीय निकाय चुनावों के समय राजा भैया सहित एक सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य समेत 13 लोगों के विरु द्ध जान से मारने के प्रयास का मामला दर्ज कराया था। इस मामले में राजा भैया को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया। इससे पहले साल 2002 में बीजेपी विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने अपने अपहरण करने का आरोप लगाया था, 2004 में राजा के घर से एके-47 बरामद हुई, लेकिन वर्ष 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार बनी, तो राजा भैया को कारागार मंत्री बनाया गया। जेल मंत्री रहे राजा भैया जेल में सजा भी काट चुके हैं। ताजा मामला डीएसपी हत्याकांड की सीबीआई जांच कर रही है। राजा भैया पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है, लेकिन उनके रुतबे में कोई कमी नहीं आई। इलाके में आज भी उनकी तूती बोलती है।

-जितेन्द्र बच्चन

रविवार, 3 मार्च 2013


कातिल चेहरा


माफिया का चेहरा बदल गया, लेकिन चेहरा बदलने के बावजूद अपराध तो अपराध ही है. उसके निशाने पर पहले भी बेगुनाह थे और आज भी बेगुनाह हैं। हां, दहशत की वजह इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि कातिल का चेहरा पहले से भोला, दिमाग पहले से शातिर और तकनीक पहले से एडवांस हो गई है।
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बेहमई 2 किलोमीटर! मील का यह पत्थर आते ही कानपुर देहात जिले का भूगोल और इतिहास करवट लेने लगता है। हरे-भरे खेतों वाले मैदान पीछे छूट जाते हैं। बीहड़ से होकर आहिस्ता-आहिस्ता रास्ता यमुना किनारे की आखिरी बस्ती की ओर बढ़ता है। सरकारी इंटर कॉलेज की एक अधबनी इमारत, ताला बंद प्राइमरी पाठशाला और खाट पर लंबी तान कर पड़े पुलिसवालों की चौकी पार करने के बाद आप खुद को जिस जगह पाते हैं, वह है बेहमई। वही गांव, जहां आज से 31 साल पहले 14 फरवरी, 1981 को देश के आपराधिक इतिहास की सबसे दुस्साहसिक इबारत लिखी गर्ई थी। तब बुरी तरह सताई गई फूलन देवी बदले की आग में जल रही थी। 23 साल की उस युवती ने 20 लोगों को गोलियों से छलनी कर अपराध की दुनिया की सारी परिभाषाएं बदल दीं।
इस एक पीढ़ी पुरानी स्मृति में अपराध और अपराधी की तस्वीर बहुत कुछ फिल्मी है। फूलन देवी और बाबा मुस्तकीम की अगुवाई में 40 डकैत नाव से नदी पार कर जालौन की सीमा से बेहमई में घुसते हैं। सबने पुलिस की वर्दी पहन रखी है और फूलन तो एसपी की ड्रेस में है। कंधे पर बंदूकें और जुबान पर गालियां। जिन्हें मारना है, उन्हें दिनदहाड़े घर से खींचा और फिर एक लाइन में खड़ाकर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। तीन भाई, चाचा और एक भतीजे को खोने वाले 73 वर्षीय ठाकुर श्रीराम सिंह इस वाकये को याद करते हैं, ''मेरे भाई ने मेरे बेटे को अपनी पीठ के पीछे छुपा लिया था। डकैतों ने गोली चलाई। भाई मर गया, बेटा बच गया, लेकिन डकैतों ने बेटे को फिर पकड़ा और उसके पेट में गोली मार दी, लेकिन भगवान ने मेंटर को उमर दी थी, वह बच गया। तब 18 साल के रहे मेंटर सिंह आज तहसील में कर्मचारी हैं। इस घटना की याद आज भी शहीद स्मारक के तौर पर घटनास्थल पर मौजूद है। स्मारक ही गांव का नया मंदिर है।
''इन 21 वर्षों में बेहमई बहुत नहीं बदला। यहां आज भी न तो बिजली है और न टीवी, जिनको दहेज में फ्रिज मिल गए वे आलमारी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जालौन जाने के लिए आज भी यमुना का कछार है। इसी भुरभुरी मिट्टी से होकर टूटे पीपे के पुल से लोग मोटर साइकिल खींच ले जाते हैं।'' पहलवानी कदकाठी के 35 वर्षीय संजय सिंह बातों-बातों में जैसे दार्शनिक हुए जा रहे हैं। वे कहते हैं, ''हां, तब से गांव में कोई बड़ी वारदात नहीं हुई। नेता और अफसर तो यहां पहले भी नहीं आते थे, चार-छह साल से तो डाकुओं का आना भी बिल्कुल बंद हो गया है। वैसे भी डकैती के धंधे में रखा क्या है।''
क्या वाकई डकैती का धंधा घाटे का सौदा है? इसका जवाब देते हैं सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह, ''बड़ी से बड़ी डकैती में कोई गैंग 20 लाख रु. हासिल कर लेगा। ऊपर से बीहड़ में कष्ट सहने का जोखिम, वहीं एक अपहरण में घर बैठे एक-दो करोड़ रु. फिरौती में वसूल लो। अपराध के और भी सॉफिस्टिकेटेड तरीके हैं, इसलिए अब आपको पुराने किस्म के डकैत नजर नहीं आएंगे। अपराधी बदल रहे हैं।
तो फिर गब्बर सिंह और चाइना गेट के जगीरा जैसे फिल्मी पात्रों की जगह कौन ले रहा है! कहीं कहानी फिल्म का वह भोंदू-सा बीमा एजेंट बॉब बिस्वास तो नहीं जो सब के शक से तो परे है, लेकिन है खामोश हत्यारा या बाजीगर फिल्म का वह शाहरुख खान जो कब मोहब्बत करता है और कब कातिल बन जाता है, पता लगाना मुश्किल है। वैसे जो बातें फिल्में नहीं कह पाती हैं, वह सामने आ जाती हैं। हत्या के उन चर्चित कांडों से जिन्होंने पिछले कुछ साल में मीडिया में भूचाल लाकर रख दिया। जिन हत्याकांडों ने पिछले कुछ साल में सनसनी मचार्ई है, उसमें दो चीजें खास थीं। पहली कातिल उनका पुराना परिचित था और दूसरी वे महिलाएं मौत के घाट उतार दी गईं, जिन्होंने अपने आकाओं को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
जून, 2008 में नोएडा का आरुषि-हेमराज हत्याकांड एक ऐसी ही मिसाल के तौर पर उभरता है। 13 साल की एक लड़की पॉश इलाके के अपने घर में मार दी जाती है। पहली रपट यह कहती है कि नौकर हेमराज लड़की को मारकर फरार हो गया। पुलिस की एक टीम उसकी तलाश में नेपाल रवाना हो जाती है, लेकिन अगले दिन नौकर की लाश छत पर मिलती है। उसके माता-पिता लगातार गहराई से जांच करने की मांग कर रहे हैं। टेलिविजन कैमरों के सामने दहाड़ रहे हैं। मासूम को न्याय दिलाने के लिए कैंडल मार्र्च कर रहे हैं। हत्याकांड के बाद तलवार दंपती ने अपने परिवार की छवि एक हंसते खेलते परिवार की बताई थी। मौत के आठ दिन बाद नूपुर तलवार ने टेलिविजन इंटरव्यू में कहा, ''कितना हंसता खेलता परिवार था हमारा। मैं हमेशा सोचा करती थी कि मैंने पिछले जन्म में जरूर कुछ अच्छे कर्म किए होंगे, तभी मुझे इतना अच्छा परिवार मिला है।'' उन्होंने अपने पति की ऐसी छवि पेश की जो बेटी पर जान छिड़कते थे। वे कहती हैं, ''हम उसका जन्मदिन मनाने वाले थे। राजेश ने आरुषि से कहा था कि वह जितने चाहे दोस्त बुला सकती है।'' उनकी ये मासूम दलीलें सभी ने हाथों हाथ ली। पुलिस और सीबीआइ हाथ-पैर मारकर थक गईं और सीबीआइ ने तो एक बारगी मामले में क्लोजर रिपोर्ट ही फाइल कर दी, लेकिन आज की तारीख में तलवार दंपती ही नए आरोपी बनकर उभरते हैं। अदालत का आखिरी फैसला जो भी आए, लेकिन इतना तो साफ है कि आरुषि का हत्यारा उसके करीब का शख्स था और उसे मारने भाड़े का कोई सुपारी किलर नहीं आया था।
वहीं दिसंबर 2006 में नोएडा के ही निठारी कांड ने खामोश कातिल को नरपिशाच की श्रेणी तक ला दिया। जिस सुरेंद्र कोली को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, वह आदमखोर अपने आस-पड़ोस से बच्चे अगवा कर उन्हें खा जाता था। कोली कई साल तक यह काम करता रहा। बंगले के नीचे नाले में नर कंकालों का ढेर लग गया और कोली के एंप्लायर मोहिंदर सिंह पंढेर को खबर तक नहीं हुई। और पुलिस कहां थी? प्रकाश सिंह कहते हैं, ''पुलिस में ताकत नहीं बची है। पुलिस को नेताओं ने पूरी तरह चूस लिया है। वे अपनी जान बचा लें और नेताजी की ड्योढ़ी पर हाजिरी बजा लें, इतना ही बहुत है।'' निठारी कांड ने देश को हिलाकर रख दिया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घटना के बाद बच्चों के गुमशुदा होने के मामलों को दर्ज करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इस घटना ने शहरों के अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा को लेकर सदमे में ला दिया।
उधर मुंबई में 2011 में फिल्म अभिनेत्री लैला खान की हत्या का मामला भी एक उलझ मामला है। यह हत्याकांड भी मौत के दो साल बाद जाकर सुर्खियों में आया और तब पुलिस के कान खड़े हुए। हल्ला मचा तो पुलिस ने कश्मीर से लैला की कार और पुणे के पास फार्महाउस में दफन छह लाशें भी निकाल लीं और यहां भी हत्यारा निकला लैला की मां का दूसरा शौहर। घर में छिपे कातिल का ही शिकार मई 2006 में बीजेपी नेता प्रमोद महाजन भी बने थे।
इन सब मामलों में न सिर्फ हत्यारे आस-पास के लोग थे बल्कि उनका हत्या करने का तरीका भी नृशंष था। आरुषि हत्याकांड के साक्ष्य इशारा करते हैं कि हत्या ठंडे दिमाग से की गई। लैला खान की हत्या में संकेत मिले कि गड्ढे में सिर्फ लाशें ही नहीं फेंकी गई थीं, बल्कि कई लोग जिंदा ही दफन कर दिए गए थे। निठारी कांड की नृशंषता के बारे में अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। इस कांड में क्रूरता की हर हद पार कर दी गई, जिसकी कल्पना एक आम दिमाग कर सकता है। विशेषज्ञ इस क्रूरता की सड़ांध को घरों के बेडरूम तक महसूस कर रहे हैं। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फॉरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर टी.डी. डोगरा लाशों के अंदरूनी रहस्यों और वीभत्सता से हैरान हैं। इससे पहले उनका अनुभव था कि हत्याएं आम तौर पर पेशेवर हत्यारे करते हैं, मगर इन दिनों पुलिस जो लाशें अस्पताल पहुंचाती है; उनमें लाशों की आंतों में घरेलू रसायनों की मौजूदगी, क्रूर हिंसा से आई चोट और धब्बे अक्सर नजर आते हैं। वे बताते हैं, ''यह कहते हुए मुझे दुख होता है, लेकिन घरेलू हत्याएं प्रमुख प्रवृत्ति के तौर पर उभर रही हैं।''
दूसरी तरफ वे घटनाएं हैं, जहां राजनैतिक रसूख वाले लोगों के फेर में महत्वाकांक्षी लड़कियां मारी गईं। मई 2003 में लखनऊ में कवि मधुमिता शुक्ला मार दी जाती है और खून के छींटे तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी के दामन पर उछलते हैं। 2011 में भोपाल में एक लड़की शेहला मसूद अण्णा के आंदोलन में भाग लेने के लिए कार में सवार होती है और कोई उसकी कनपटी पर गोली दाग देता है। यहां भी कातिल की तलाश लंबे समय तक अंधेरे में भटकती है। कई सियासी, नौकरशाह और ब्लैकमेलिंग के कोने खंगाले जाते हैं, तब कहीं जाकर शक की सुई उसकी अपनी सहेली जाहिदा परवेज पर आकर टिकती है। राज खोलती हैं तकिए के नीचे रखी डायरियां। राजस्थान में एक मामूली-सी नर्स भंवरी देवी कुछ ही साल में सियासत के गलियारों में अपनी हनक महसूस कराती है। उसकी लोकगीतों की सीडी बाजार में पहुंच जाती हैं, लेकिन अचानक वह औरत गायब हो जाती है। फिर सामने आती है एक और सीडी। इस सीडी में भंवरी और राजस्थान सरकार के तत्कालीन मंत्री महिपाल मदेरणा आपत्तिजनक स्थिति में नजर आते हैं। इस सब के बाद मदेरणा के पुलिस जांच के दायरे में आने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। राजनीतिक दबाव के बीच मामला जब सीबीआइ के पास पहुंचा, तो नहर से भंवरी का कंकाल भी मिल जाता है। भंवरी हत्याकांड की अब तक की जांच यह बताने के लिए काफी है कि यहां कत्ल बहुत ठंडे दिमाग से किया गया। हत्या कराने वालों और सुपारी लेकर कत्ल करने वालों ने अपनी तरफ से कोई सुबूत नहीं छोड़ा और बड़ी सफाई से रास्ते का कांटा दूर किया।
नेताओं को अपने रास्ते का कांटा दूर करने के लिए हमेशा कत्ल करना या कराना पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार उनकी घाघ चालें वह माहौल बना देती हैं, जहां लड़की के पास जिंदगी को तौबा करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। नहीं तो क्या वजह है कि 2012 में गीतिका शर्मा जैसी लड़की 23 साल की उम्र में एक सुसाइड नोट छोड़कर फांसी पर लटक जाती है! हरियाणा के मंत्री गोपाल गोयल कांडा तक कानून का हाथ तभी पहुंच पाता है, जब एक मासूम की बलि चढ़ जाती है। लेकिन नेताओं का हौसला देखिए कि इस आत्महत्या के तीन दिन बाद तक कांडा टीवी चैनलों पर न सिर्फ अपनी बेगुनाही की दलीलें पेश करते रहे, बल्कि यह भी कहते रहे कि गीतिका उनके लिए बेटी की तरह थी, लेकिन गीतिका ने अपने सुसाइड नोट में एक ऐसा वाक्य ''गोपाल गोयल कांडा अच्छा आदमी नहीं है।'' लिख छोड़ा था जो कांडा को सलाखों के पीछे ले गया। उनका राजनैतिक कद उन्हें पुलिस की गिरफ्त से बचाने में बौना साबित हुआ।
खामोश अपराधों का यह कौन-सा दौर है? अपराधी घर के इतने नजदीक कैसे आ गए? इन सवालों पर मध्य प्रदेश क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के पुलिस महानिरीक्षक संजय कुमार झा मानते हैं कि महिलाओं के खिलाफ न सिर्फ अपराध बढ़े हैं, बल्कि इन अपराधों के दर्ज होने की संख्या भी बढ़ी है। चंबल से डकैतों का सफाया करने में अहम भूमिका निभाने वाले पुलिस अफसर ने कहा, ''महिलाओं के बीच से वह कलंक खत्म हो रहा है, जो उन्हें खुद पर हो रहे अत्याचारों को समाज के सामने लाने से रोकता था। आज औरत अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को पुलिस में दर्ज कराने में सकुचाती नहीं है।'' झा मानते हैं कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को मीडिया भी पर्याप्त जगह देने लगा है, इससे भी ये अपराध ज्यादा दिखने लगे हैं।
इन दो दशक में बेडरूम के भीतर से जहां अपराधी पनपे, वहीं सड़कों पर अपराधी गैंगों के बीच होने वाला खूनी खेल काफी हद तक इतिहास के पन्नों में दब गया। एक दशक पहले तक बिहार में जहां जातीय तनाव को लेकर नरसंहार हो रहे थे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में माफिया गिरोह एक दूसरे से खुलेआम सड़कों पर भिड़ रहे थे। मुंबई के गैंगवार हालांकि अभी तक फिल्म निर्माताओं की पसंद बने हुए हैं, लेकिन मुंबई में गैंगवार की आखिरी बड़ी झलक अगस्त, 1997 फिल्म निर्माता गुलशन कुमार की हत्या में मिली थी। छिटपुट वारदातें होती रहीं।
बिहार में 1987 से 1997 के बीच नौ बड़े नरसंहार हुए। रणवीर सेना, भाकपा माले और एमसीसी जैसे संगठनों के इस खूनी खेल में सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। 1987 में दलेलचक-बघौर में एमसीसी ने 54 लोगों की हत्या की। इसके बाद साल-दर-साल तिसखोरा, देव सहियारा, बारा, बथानी टोला, हैबसपुर, जलपुरा, कोडरमा और 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार सामने आए। इस जातीय हिंसा ने पूरे देश में बिहार की छवि एक अराजक राज्य के रूप में पेश की। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों स्वीकार किया, ''बिहारी कहलाना शर्म की बात हो गई थी, लेकिन अब विकास का काम शुरू हुआ है तो लोग बिहारी कहलाने में फख्र महसूस करने लगे हैं।'' बिहार में इस जातीय हिंसा का अंतिम अध्याय इस साल तब समाप्त हुआ जब रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया की हत्या कर दी गई। मुखिया उस खूनी युद्ध के आखिरी गवाहों में से था।
उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश में शराब माफिया और अन्य ठेकों से जुड़े माफिया की गैंगवार भी अब गुजरे कल का हिस्सा है। खासकर पिछले शासनकाल में जिस तरह उत्तर प्रदेश में एक ही शख्स को शराब का सारा कारोबार दे दिया गया, उससे शराब ठेकों को लेकर चलने वाली गैंगवार पर खुद-ब-खुद अंकुश लग गया।
इन दोनों इलाकों से इस तरह के खूनी इतिहास की विदाई का विश्लेषण करते हुए अपराधशास्त्री और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के प्रो. जी.एस. वाजपेयी ने कहा, ''ये अपराध इस तरह के थे कि जिन का एक सिरा व्यक्तियों में दिखाई देता था तो दूसरा सिरा समाज और राजनैतिक व्यवस्था में छिपा हुआ था। बिहार में राजनैतिक वातावरण में आए बदलाव ने जातीय हिंसा को हतोत्साहित किया।'' दरअसल बिहार में पिछले एक दशक में बहुत सारी चीजें बदली हैं, जिनमें खास चीज है नए किस्म के जातीय समीकरणों का उभार। इसके अलावा राजनीतिक दलों का जो संरक्षण रणवीर सेना या एमसीसी जैसे संगठनों को मिल रहा था, वह भी समय के साथ खत्म हुआ। वहीं उत्तर प्रदेश में जब माफिया इस हद तक ताकतवर हो गया कि उससे सत्ता के शीर्ष को ही खतरा होने लगा तो पुलिस को उसके सफाए के लिए मजबूर होना पड़ा।
वाजपेयी की मानें तो ''माफिया के खात्मे और अपराधियों के सीधे तौर पर राजनीति में आने का समय तकरीबन एक ही है।'' दरअसल यहां से उस दौर की शुरुआत हुई जब पुराने माफिया ने खादी पहन ली और सत्ता में बैठकर दूसरे तरीकों से वे आर्थिक हित साधे जिसके लिए पहले उसे खूनी गैंगवार करनी पड़ती थी। वहीं मुंबई में गैंगवार की समाप्ति की शुरुआत 1993 के बम धमाकों के साथ ही हुई। दाऊद इब्राहिम और बाकी सरगनाओं के देश से फरार होने के बाद मुंबई में माफिया का चेहरा बदल गया, लेकिन चेहरा बदलने के बावजूद अपराध तो अपराध ही है. उसके निशाने पर पहले भी बेगुनाह थे और आज भी बेगुनाह हैं। हां, दहशत की वजह इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि कातिल का चेहरा पहले से भोला, दिमाग पहले से शातिर और तकनीक पहले से एडवांस हो गई है।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013


जेबतराशों का जाल

करोड़ों का काला कारोबार! मुल्क के कई महानगरों में फैला है जेबतराशों का जाल! कुछ राज्यों में खूबसूरत लड़कियों का भी होता है इस्तेमाल! जितना बड़ा शहर, उतना बड़ा गिरोह! विदेशी पर्यटक भी होते हैं निशाने पर! कौन है इसका जिम्मेदार?

नई दिल्ली। मुल्क का हर बड़ा शहर उनके निशाने पर है! रेलवे स्टेशन हो या बस अड्डा। अस्पताल हो या कोर्ट-कचहरी। मंदिर हो या भीड़भ1ड़ वाली सड़क अथवा कोई बाजार, हर जगह इनका फैला है जाल! आप चूक सकते हैं, इनकी नजर नहीं चूकती। पलक झपकते आपकी जेब पर हाथ साफ कर देते हैं। जितना बड़ा शहर, उतना बड़ा गिरोह। दिल्ली में जेबतराशों के तकरीबन 50 गिरोह सक्रिय हैं, जिनके गुर्गे पूरे एनसीआर में फैले हुए हैं। पश्चिम बंगाल में 40, बिहार में 22, झारखंड में 20, उत्तर प्रदेश में 25, मध्य प्रदेश में 17, मुंबई में 10, चंडीगढ़ में 11, पंजाब में 14, चेन्नई में 9 और हरियाणा में 7 जेबतराश गिरोह काम कर रहे हैं। इन पाकेटमार गिरोहों का भले ही अलग-अलग राज्य और शहर-नगर में जाल बिछा हो, लेकिन इनके काम करने का तरीका और कूटभ•ााषा करीब-करीब एक-सी होती है। जेबतराशों की दुनिया में सौ के नोट को ‘गांधी’, पांच सौ के नोट को ‘नोटबुक’ और एक हजार के नोट को ‘किताब’ बोलते हैं। गिरोह को ‘कंपनी’ और सरगना को ‘गुरु’ कहते हैं। शिकार को ‘मुद्दा’ और मुहिम को ‘फूल’ बोलते हैं। गिरोह की सदस्य संख्या सात से कम नहीं होती। पुलिस की तरह इनके ‘गुरुओं’ (सरगना) का भी इलाका (हलका) होता है और जेबकतरों को ‘बीट’ बंटी होती है। ‘कंपनी’ अक्सर उसी नाम से जानी जाती है, जो गिरोह का सरगना होता है। जेबकतरे को ‘मशीन’ कहते हैं और उसके सहयोगी को ‘ठेकबाज’। मिशन कामयाब होते ही ‘मशीन’ नकदी या पर्स ‘ठेकबाज’ के हवाले कर देता है। इस काम को ‘मैनेजर’ कहा जाता है। महिला शिकार को ‘केटी’ कहते हैं। ‘मुद्दा’ या ‘केटी’ को अपने आसपास खड़े ‘मशीन’ या ‘ठेकबाज’ पर शक हो जाता है, तो गिरोह के लोग आपस में एक-दूसरे को होशियार करने के लिए ‘मुद्दा-विला’ कहकर अलग हो जाते हैं।
‘मशीन’ और ‘ठेकबाज’ में बंटती है रकम
मिशन को अंजाम देने से पहले गिरोह के सदस्य एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होते हैं, जिसे ‘फूल’ कहते हैं। जेबकतरा जब बस में चढ़ता है, तो उसे ‘डंडा लेना’ और ट्रेन में सवार होने को ‘छड़ी लेना’ बोलते हैं। बस या ट्रेन से उतरना है, तो ‘कलटी करना’ शब्द का प्रयोग होता है। पुलिस को जेबतराशों का गिरोह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से आपस में संबोधित करता है। दिल्ली में पुलिस को गिरोह के सदस्य ‘बिल्ला’, उत्तर प्रदेश में ‘ठुल्ला’, बिहार में ‘मामा’, पश्चिम बंगाल में ‘दल्ला’, चेन्नई में ‘बुकी’ कहते हैं। पुलिस का अगर कोई बड़ा अफसर है, तो उसे ‘बोगी’ कहते हैं। शिकार को घेरकर खड़े होने को ‘जूट में चलना’ कहा जाता है। हर महीने की पांच से 10 तारीख के बीच के समय को ‘सीजन’ बोला जाता है। दिन भ•ार की कमाई का हिसाब-किताब रखने वाले को ‘मैनेजर’ और कमाई का जो हिस्सा मिलता है, उसे ‘पूड़ी’ कहते हैं। जेबतराशी की रकम का आधा ‘मशीन’ और आधे को ‘ठेकबाजों’ में बांट दिया जाता है।
एनसीआर में धन्नी गिरोह का आतंक
दिल्ली के जेबतराशों में धनराज उर्फ धन्नी का गिरोह ‘डी कंपनी’ के नाम से कुख्यात रहा है। धन्नी ने सात शादियां की थीं। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, पटना, हैदराबाद और भ•ोपाल की जिस लड़की से धन्नी ने शादी की, उसी महानगर में ‘डी कंपनी’ का अड्डा खोल दिया। कंपनी में करीब 11 सौ लोग काम करते थे। वर्ष 2002 में गाजियाबाद पुलिस की एक मुठभ•ोड़ में धन्नी मारा गया, लेकिन उसकी औरतें धन्नी के शागिर्दों के साथ मिलकर आज भी ‘डी कंपनी’ का संचालन करती हैं। खासकर इस गिरोह का एनसीआर में आतंक है।
सारा काम तर्जनी का
जेबतराश के दाएं हाथ की तरजनी अंगुली का नाखून आधा इंच लंबा होता है। ‘मशीन’ नाखून में एक छोटा ब्लेड छिपाकर रखता है। ‘मुद्दा’ की जेब पर हाथ साफ करते समय नाखून से धारदार ब्लेड निकालकर जेब पर चला देता है। जेबतराशी को तालीम देने वाले को ‘मास्टर’ कहते हैं। दिल्ली के मंगोलपुरी की एक स्लम बस्ती में बाबर, सीमापुरी में हाजी, सीलमपुर में बाबू, वेलकम इलाके में अजीज और नंदनगरी में लाला गूजर (70) पाकेटमारों की पाठशाला चलाता है। लाला का नाम एनसीआर के जेबकतरों में कुख्यात है। उसका ‘मशीन’ नंबर एक माना जाता है। हर सरगना लाला की ‘मशीनों’ को मुंहमांगा पैसा देने को तैयार रहता है, लेकिन ‘ठेकबाज’ को ‘कंपनी’ में भर्ती होने के लिए जेबतराशी की दो वारदात में कामयाब होना जरूरी होता है।
बागी को मिलती है क्रूर सजा
जेबतराशी का धंधा भले ही गैरकानूनी है, लेकिन गिरोह का जो सदस्य कंपनी का उसूल नहीं मानता, उसे कंपनी का सरगना कू्रर से क्रूर सजा देता है। कई बार बागी को सिगरेट से दागने की भी खबरें मिली हैं। मिशन पर जाने से पहले ‘शकुन’ विचार होता है। जेबतराशी के बड़े गिरोह का ‘मशीन’ जिस बस में चढ़ता है, उसका सरगना उस बस के पीछे-पीछे कार से चलता है। एक-दो लोग और उसके साथ होते हैं। अगर जेबकतरा पकड़ा गया, तो सरगना ‘शरीफ आदमी’ बनकर बस के अंदर से ‘मशीन’ को पुलिस को सौंपने के नाम पर अपने साथ ले जाता (बचा लेता) है।
हिंसा का सहारा
जेबतराशी में शिकार को खरोंच नहीं आती और उसकी जेब साफ हो जाती है। पकड़े जाने पर भी कोई जेबकतरा हिंसा का सहारा नहीं लेता, लेकिन जेबतराशी के जुर्म के इस पेशे में अब काफी बदलाव आ चुका है। कुछ जेबतराश जान-माल बचाने के लिए शिकार का खून करने से भी नहीं चूकते। दिल्ली में ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं। कुछ आरोपियों को पुलिस गिरफ्तार कर जेल भ•ोज चुकी है।
सदस्यों को मिलती है तरक्की और सेवानिवृत्ति
पाकेटमार की जमानत ‘कंपनी’ अपने खर्च पर कराती है। जो ‘मशीन’ पुराने हो जाते हैं, स्वास्थ्य और शरीर साथ नहीं देता, उनका भी गिरोह का सरगना पूरा ख्याल रखता है। सदस्यों को तरक्की और सेवानिवृत्ति भी मिलती है। ‘ठेकबाज’ प्रमोशन पाकर ‘मशीन’ बन जाता है। इस अवसर पर पुरानी ‘मशीन’ नई ‘मशीन’ को पगड़ी बांधता है और इस खुशी में जश्न मनाया जाता है।
जेबतराशी में बच्चों का इस्तेमाल
मुल्क में कई ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो देश भर से गायब हुए मासूम बच्चों को जुर्म की दुनिया में काफी समय से धकेल रहे हैं। इनमें से कुछ लड़के-लड़कियों को जरायम का पाठ पढ़ाकर बाकायदा जेबतराश बनाया जाता है। पिछले दिनों थाना प्रसाद नगर (दिल्ली) पुलिस ने ऐसे ही एक गिरोह के सात सदस्यों को पकड़ा था, जिनमें रैगरपुरा का विनोद बुची, टैंक रोड का दीपक, देवनगर का मनीष और शिखा, मुल्तानी ढांडा का कालू और राजकुमारी तथा पंजाबी बस्ती की राधा शामिल थे। आरोपी देवनगर करोलबाग के खंडहरों में खेलने वाले गरीब बच्चों को अगवा कर उन्हें बुरी तरह मार-पीटकर उनसे राजधानी के अलावा देहरादून, मसूरी और वैष्णो देवी की यात्रा में जेबतराशी कराते थे। 20 जून को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) पुलिस द्वारा पकड़ी गई किरण ने भी खुलासा किया था कि गुनाह के ऐसे स्कूल महानगरों की झुग्गी-झोपाड़ियों, स्लम बस्तियों, खंडहरों और शहर से दूर-दराज के जंगलों में चलते हैं। आरोपी किरण के मुताबिक, गाजियाबाद में भी रेल ट्रैक के आसपास बच्चों को जेबतराशी की तालीम दी जाती है। इस संबंध में गाजियाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रशांत कुमार ने मामले की जांच कराने के लिए कहा है।
जेबकतरों का कारपोरेट कारोबार
जेबतराशों के कुछ ऐसे भी गिरोह हैं, जो सिर्फ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई यानि देश के महानगरों में शिकार तलाशते हैं। करोड़ों के इस काले कारोबार में कमउम्र और खूबसूरत लड़कियों का भी इस्तेमाल होने लगा है। कुछ ऐसी युवतियां मोटे कमीशन पर काम करती हैं। सारा धंधा मोबाइल और इंटरनेट के जरिए अंजाम दिया जाता है। कारपोरेट बिजनेस! अंतर्राज्जीय गिरोहों का गठजोड़! देश के कई पर्यटन स्थल पर इन गिरोहों के मुखबिर नियुक्त होते हैं और पर्यटक होते हैं निशाने पर। एक्सप्रेस ट्रेनों या एयरपोर्ट पर यात्री बनते हैं शिकार। गिरोह का मुखबिर शिकार की पहचान कर जेबकतरे को मोबाइल पर कूटभ•ााषा में बता देता है। किन्हीं कारणों से ‘मशीन’ मिशन को अंजाम नहीं दे पाता, तो प्रथम गिरोह अगले गिरोह के हाथों ‘मुद्दा’ बेच देता है। कामयाबी की रकम फर्जी बैंक खातों के जरिए अदा की जाती है। पुलिस को भनक तक नहीं लगती और जेबतराशों का सरगना मालामाल!
पुलिस की साठगांठ
सूत्र बताते हैं कि अधिकांश थानेदारों को अपने इलाके के जेबतराशों की पूरी जानकारी होती है। कुछ थानेदार तो जेबतराशों से मुखबिर का भी काम लेते हैं। जेबतराशी की वारदात कब और कहां अंजाम दी जानी है, पुलिस को पहले से गिरोह सरगना सूचित कर देता है। पुलिस ‘मशीन’ को बचा लेती है। रकम का बंटवारा पुलिस और सरगना के बीच बराबर का होता है। कभी संयोग से कोई शिकार पुलिस के घर का हुआ, तो स्थानीय थानेदार के दबाव में रकम वापस करनी पड़ती है। अगले रोज खबर छपती है- दुनिया में अभी ईमानदारी बची है!
कायदा-कानून
दिल्ली के क्रिमिनल लॉयर कमल चौधरी के मुताबिक जेबतराशी का जुर्म भ•ाारतीय दंड विधान की धारा 379 के तहत दंडनीय अपराध है। जुर्म साबित होने पर कम से कम तीन साल की सजा या पांच हजार रुपये का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।
राजधानी में बढ़ अपराध
आईपीएस नीरज कुमार ने 30 जून को दिल्ली पुलिस आयुक्त का चार्ज संभ•ाालने के बाद कहा था कि आतंकवाद रोकना उनकी पहली प्राथमिकता है। कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाना और आम लोगों से पुलिस के अच्छे संबंध बने, इस पर खासा जोर रहेगा। स्ट्रीट क्राइम पर लगाम कसी जाएगी, लेकिन पुलिस इनमें से किसी भी मामले में कमी नहीं ला पाई। यहां अपराध का ग्राफ और बढ़ा है। झपटमारी की घटनाओं में दोगुना बढ़ोतरी हुई है। बाइकर्स का आतंक बढ़ा है। बलात्कार के मामलों में भी कमी नहीं आई है। लूट, सेंधमारी और वाहन चोरी की वारदात को अंजाम देने में भी बदमाशों के हौसले बुलंद हुए हैं।
1 जनवरी से 30 जून के बीच बलात्कार की 327, लूट की 267, हत्या का प्रयास 201, फिरौती के लिए किडनैप 14, सेंधमारी 824, वाहन चोरी 6918, हाउस थेफ्ट 797, रंगदारी 56, हर्ट 856, हत्या 262, डकैती 16 और दंगे की 32 घटनाएं हुर्इं, जबकि 1 जुलाई से 3 सितंबर के बीच स्नौचिंग की 368, बलात्कार की 127, लूट की 125, हत्या का प्रयास 84, फिरौती के लिए किडनैप 2, सेंधमारी 323, वाहन चोरी 2690,   हाउस थेफ्ट 315, रंगदारी 28, हर्ट 344, हत्या 86, डकैती की 4 और दंगों की 12 वारदात हो चुकी हैं।

-जितेन्द्र बच्चन

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

पुलिस प्रताड़ना

पुलिस का एक और खौफनाक चेहरा! एक महिला शिक्षक को बना दिया नक्सली! पहले माओवादियों ने कहर बरपा। अब पुलिस ने उसे अपने शिकंजे में ले लिया है। टार्चर करने का तरीका सुनकर दिल दहल जाता है। क्यों कर रही है पुलिस अत्याचार? क्या है महिला और उसके पति की हकीकत?
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35 साल की सोढ़ी कल तक मुल्क के नौनिहालों को अंधेरे से उजाले की राह दिखाती थी, लेकिन आज उसका अपना खुद का वजूद दांव पर लग चुका है। जिंदा लाश बनकर रह गई है। उस पर किए गए पुलिस के अत्याचार को सुनकर दिल दहल जाता है। कोई सोच भी नहीं सकता कि पुलिस इतनी क्रूर होती है। बेइंतहा मारा-पीटा, फिर गुप्तांग में पत्थर डालने जैसा दुस्साहस भी पुलिस ने कर दिखाया। ठीक से खड़ी नहीं हो पाती सोढ़ी। इलाज के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, तब कहीं जाकर उसे दिल्ली के एम्स में दाखिल किया गया। सोढ़ी के माता-पिता को माओवादियों ने गोली मारकर जख्मी कर दिया था। उनका जगदलपुर के हास्पिटल में इलाज हुआ। उजड़ गया घर, बिखर गए सपने। पति माओवादी होने के आरोप में जेल में है। पांच से 12 साल के तीन बच्चे रिश्तेदारों और होस्टल के सहारे जी रहे हैं। भ•तीजा लिंगाराम नक्सलियों के लिए चौथ वसूली करने के इल्जाम में सीखचों के पीछे कैद है।
सोढ़ी मूलत : छत्तीसगढ़ के जिला दंतेवाड़ा स्थित पालनार थाना अंतर्गत बडेÞ बेडमा की रहने वाली है। पिता का नाम मुंडरा है, जो दंतेवाड़ा के पूर्व विधायक नंदाराम के भ•ााई हैं। सोढ़ी की लोगों की मदद करना शुरू से आदत रही है। उसकी गिनती बेबाक और तेज-तर्रार महिलाओं में होती है। गीदम के एक गैर आदिवासी युवक अनिल पुटानी के साथ सोढ़ी की शादी हुई। दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी छत्तीसगढ़ से बाहर दूसरे राज्य में पढ़ती है और बाकी के दोनों बच्चे नाना-नानी के पास रहते हैं। भतीजा लिंगाराम कोडोपी सोढ़ी के साथ ही रहता था। खुद सोढ़ी मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर दंतेवाड़ा के समेली के सरकारी स्कूल में पढ़ा रही थी। घर-गृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी। करीब पांच साल पहले सोढ़ी को जबेली के बालिका आश्रम में बतौर अधीक्षिका नियुक्त कर दिया गया। वह बडेÞ बेडमा से समेली में आकर रहने लगी, तभी जैसे एक तूफान आया और सबकुछ एक झटके में तबाह कर गया। माओवादियों ने 15 जून, 2011 को सोढ़ी के घर पर धावा बोल दिया। जमकर लूटपाट की। पिता मुंडरा को गोली मार दी। जाते-जाते घर के बाहर खड़े ट्रैक्टर को आग के हवाले कर दिया। आतताईयों के फरार होने के बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई। आनन-फानन में मुंडरा को महारानी अस्पताल ले जाया गया, जहां उसका लंबा इलाज चला।
सोढ़ी ने घटना के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की, तो नक्सली और खफा हो गए। पुलिस ने भी सोढ़ी की मदद नहीं की, बल्कि उसी को नक्सलियों की मददगार कहने-बताने लगी। इधर कुआं उधर खाई, कहां जाए सोढ़ी? पुलिस का अत्याचार लगातार बढ़ता गया। नकुलनार के कांग्रेसी नेता अवधेश सिंह गौतम के घर हुए माओवादी हमले के मामले में पुलिस ने सोढ़ी के पति अनिल को गिरफ्तार कर लिया। उसने लाख अपनी बेगुनाही की सफाई दी, लेकिन पुलिस एक नहीं मानी। करीब एक साल से अनिल दंतेवाड़ा जेल में बंद है। इसके बाद 9 सितंबर को दंतेवाडा पुलिस ने एक घटनाक्रम में ‘एस्सार’ कंपनी के किरंदुल इकाई के महाप्रबंधक डीवीसीएस वर्मा और ठेकेदार बीके लाला को नक्सली समर्थक लिंगाराम कोडोपी को 15 लाख रु पये देते हुए दबोचा लिया। दोनों इस समय जगदलपुर जेल में कैद हैं। पुलिस का कहना है कि इस मामले में सोढ़ी भी आरोपी है। माओवादियों को आर्थिक मदद पहुंचाने (अवैध वसूली) का काम करती थी वह। उस रोज लिंगाराम के साथ सोढ़ी भी मौजूद थी, लेकिन पुलिस के आते ही भ•ाग निकली। एस्सार कांड से नाम जुड़ते ही सोढ़ी को छात्रावास की अधीक्षिक पद से निलिंबत कर दिया गया। पुलिस उसे तेजी से तलाशने लगी।
पुलिस अधीक्षक (दंतेवाड़ा) अंकित गर्ग के अनुसार,आरोपी लिंगाराम कोडोपी सोढ़ी के रिश्ते में भतीजा है। खुद कोडोपी ने दिल्ली से पत्रकारिता कर रखी है और स्वामी अिग्नवेश सहित दिल्ली के कई बुद्धिजीवियों से उसके मधुर संबंध हैं। पुलिस ने इलेक्ट्रानिक सर्विलेंस की मदद से सोढ़ी पर नजर रखना शुरू कर दिया। पता चला, सोढ़ी जयपुर स्थित बरकतनगर में पीयूसीएल की महासचिव कविता श्रीवास्तव के घर छिपी है। दो अक्टूबर की सुबह छत्तीसगढ़ और राजस्थान पुलिस ने मिलकर कविता के घर छापा मारा, लेकिन सोढ़ी नहीं मिली। हां, राजस्थान की सुरक्षा एजेंसियों और इंटेलीजेंस में जरूर हड़कंप मच गया। दंतेवाड़ा पुलिस ने सोढ़ी का पता लगाने के लिए जय जोहार सेवा संस्थान के सचिव नरेंद्र दुबे से भी पूछताछ की। बाद में 4 अक्टूबर को दक्षिण दिल्ली के कटवारिया सराय इलाके के बस स्टैंड से दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने सोढ़ी को गिरफ्तार कर लिया।
दिल्ली पुलिस के तत्कालीन डीसीपी (क्र ाइम ब्रांच) अशोक चांद के अनुसार, 5 अक्टूबर को सोढ़ी को साकेत कोर्ट में पेश किया गया। अदालत में सोढ़ी ने बताया कि वह और उसका पति इलाके के सर्वोदय कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के संपर्क में थे और उनके मजदूरी बढ़ाने के लिए किए गए आंदोलन में शामिल होने की बात पुलिस डायरी में भी दर्ज है। छत्तीसगढ़ पुलिस का यह इल्जाम कि वे दोनों पति-पत्नी नक्सलियों की आर्थिक मदद के लिए एस्सार कंपनी से चौथ वसूली करते थे, गलत है। लेकिन अदालत ने सोढ़ी को एक दिन की ज्यूडिशियल कस्टडी में तिहाड़ जेल भज दिया। बाद में छत्तीसगढ़ पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर सोढ़ी को छत्तीसगढ़ ले गई। कहते हैं यहां उस पर आरोप स्वीकारने के लिए यातनाओं का दौर चलाया गया। उसके पैर जंजीर से जकड़ दिए गए। सोढ़ी के सिर में गंभीर चोट आई है। बेहोशी की हालत में पुलिस उसे अस्पताल ले गई, जहां जंजीर बांधे जाने के विरोध में सोढ़ी ने अनशन शुरू कर दिया।
दो दिन बाद पुलिस ने सोढ़ी को प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी योगिता वासनिक की अदालत में पेश किया। वहां से उसे 17 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में जगदलपुर सेंट्रल जेल भ•ोज दिया गया। इस बीच पुलिस की ज्यादती के चलते सोढ़ी की तबियत और खराब हो गई। इलाज के लिए उसे जगदलपुर के महारानी अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो रायपुर के भीमराव अंबेडकर अस्पताल में ले जाया गया। वहां सोढ़ी ने पुलिस ज्यादती के विरोध में भ•ाूख हड़ताल शुरु कर दी। उसका कहना है कि थाना किरंदुल में पदस्थ आरक्षक मंकार का इस घटना से पहले उससे संपर्क था। माओवादी को इस बात को लेकर शक हो गया कि मैं पुलिस के लिए काम करती हूं और उन्होंने हमें तबाह करना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस झूठे आरोप लगाकर हमें परेशान करने लगी।
अस्पताल में सोढ़ी के पैरों की बेड़ियां खोल दीं गर्इं, लेकिन दूसरी तरह के पुलिसिया कहर कम नहीं हुए। वह बस्तर जेल में बंद है, लेकिन तबियत में सुधार न होने के कारण उसे इस समय अदालत की दखल पर एम्स में भ•ार्ती कराया गया है। मामले की जांच अब सीआइडी के आइजी पीएन तिवारी की अगुआई में गठित एसआइटी को सौंपी दी गई है। इस चार सदस्यीय टीम में पहले से इस मामले की जांच कर रहे किरंदुल के एसडीओ (पुलिस)अंशुमान सिंह भी शामिल हैं। सोनी और उसका परिवार नक्सलवादी हैं या नहीं, यह पुलिस जांच और न्यायालय के फैसले से ही तय होगा, मगर सोढ़ी की हालत को देखते हुए हमारी व्यवस्था पर जो सवाल उठता है, उनका क्या होगा?
पुलिस की खुली पोल
दंतेवाड़ा पुलिस का कहना है कि एस्सार से पैसा लेकर बीके लाला, लिंगाराम कोडोपी और सोढ़ी सोरी नक्सलियों को देने वाले थे। इस बात की भनक मिलते ही पुलिस ने पालनार गांव के साप्ताहिक बाजार से बीके लाला और लिंगाराम कोडोपी को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन मौके पर मौजूद सोढ़ी फरार हो गई। उसे बाद में दिल्ली अपराध शाखा की पुलिस ने पकड़ा। सोढ़ी लोगों की हमदर्दी बटोरने के लिए मीडिया और अदालत को गुमराह कर रही है, लेकिन जब इस घटना की जांच हुई, तो रहस्योद्घाटन हुआ कि दंतेवाड़ा पुलिस ने आरोपी बीके लाला और लिंगाराम कोड़ोपी को उनके घर से उठाया था और उन्हें नाटकीय तरीके से पालनार बाजार में पकड़े जाने की बात कही थी।
लिंगाराम को इससे पहले भी अक्टूबर 2009 में 40 दिनों तक एसपीओ बनने का दबाव देकर थाने में रखा गया था, जिसे उच्च न्यायालय के दखल के बाद छोड़ा गया। बाद में दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई करने के दौरान भी अप्रैल 2010 में उस पर नक्सल हमले में शामिल होने का आरोप लगाया गया था, वहीं नक्सलियों ने जून 2011 में सोढ़ी के पिता के पैर में गोली मार दी थी। इससे यह सवाल खड़ा होना लाजमी है कि जिस परिवार पर नक्सली हमले कर रहे हैं, उसी की बेटी को पुलिस कैसे नक्सली समर्थक बता सकती है?
दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक बयान जारी कर कहा है कि सोढ़ी और लिंगाराम कोडोपी को राजनीतिक कारणों से फंसाया गया है। इन दोनों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद हैं। सोढ़ी के भतीजे कोडोपी ने सीआरपीएफ द्वारा तीन आदिवासियों की हत्या के मामले को उजागर किया था। उसी खुन्नस में लिंगाराम को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी का सोढ़ी ने विरोध किया, तो पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया। एमनेस्टी ने मांग की है कि सोढ़ी और लिंगाराम कोडोपी के खिलाफ राजनीति से प्रेरित तमाम मामले वापस लिए जाएं और उन्हें बिना शर्त तत्काल रिहा किया जाय। साथ ही पुलिस प्रताड़ना और लापरवाही पूर्वक इलाज के मुद्दे पर एक त्वरित, निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभवशाली जांच सुनिश्चित की जाए। मामले में जो भी पुलिसकर्मी दोषी पाए जाते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
बस्तर में कैद है आरोपी
बस्तर (छत्तीसगढ़) के पुलिस अधिक्षक मयंक श्रीवास्तव के अनुसार, सोनी सोढ़ी पर नक्सलियों को आर्थिक मदद पहुंचाने का आरोप है। उसने एस्सार कंपनी से वसूली की थी। यह मामला दंतेवाड़ा पुलिस ने दर्ज किया है, जो न्यायालय में विचारााधीन है। आरोपी सोढ़ी इस समय सेंट्रल जेल बस्तर में बंद है।

-जितेन्द्र बच्चन

एक रात चार कत्ल

जुर्म की कोई उम्र नहीं होती। कानून के हाथ अपराधी की गर्दन तक एक न एक दिन पहुंच ही जाते हैं। जयभन ने खजाना हथियाने के लिए पहले उस परिवार की बहू को अपने प्रेमजाल में फंसाया, उसके बाद एक-एक कर चार लोगों को मौत के घाट उतार दिया। देह-दौलत से जुड़ी लोमहर्षक दास्तां!
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बेहद हसीन थी सुनीता। जो ही देखता, पहली नजर में उसका दीवाना हो जाता, लेकिन जयभन पर वह खुद ही फिदा हुई थी। आंखों के रास्ते दिल में उतर गई। जय•ाान ने हल्का-सा इशारा क्या किया, सुनीता उफनाई नदी की तरह सागर में समा गई। हुस्न को मजबूत जिस्म का सहारा मिल गया, लेकिन जयभान को सुनीता की देह से ज्यादा उसकी दौलत की ख्वाहिश थी। हर वक्त वह इसी उधेड़बुन में लगा रहता कि इस परिवार के पास इतनी दौलत कहां से आई? सुनीता के सास-ससुर खेती-बारी में लगे रहते। सुनीता का पति राजू होटल चलाता था। दिन-रात उसे अपने काम-धंधे से फुर्सत न मिलती, इसके बावजूद इतनी कमाई नहीं थी कि बीवी ऐश करे। वह पति सुख के लिए दिन-रात सुलगती रहती। उन्हीं दिनों एक रोज जयभान से नजर मिली और फिर दोनों के बीच अवैध संबंधों का सिलसिला चल पड़ा।
13 वर्षीय बेटी को भी नहीं छोड़ा
27 दिसंबर, 2012 की सुबह थाना सरई के प्रभारी निरीक्षक मलखान सिंह प्रांगण में बैठे धूप ले रहे थे, तभी भारसेड़ी गांव के राजू साहू ने आकर बताया कि उसके माता-पिता, पत्नी सुनीता और 13 वर्षीय बेटी पूजा की हत्या कर दी गई। एक ही परिवार के चार लोगों के कत्ल की खबर सुनते ही मलखान सिंह के होश उड़ गए। उन्होंने फौरन इस लोमहर्षक घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक (सिंगरौली) इरशाद अली, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजीव सिन्हा और एसडीओपी पीएल कुर्वे को दी। जो ही सुनता, दांतों तले अंगुली दबा लेता। पूरे सिंगरौली जिले में हड़कंप मच गया। पुलिस अधिकारियों की सायरन बजाती गाड़ियां राजू के घर पहुंचने लगीं। दरवाजे पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।
शक यकीन में बदला
अजीब भयानक वाकया था। मौके पर खून ही खून बिखरा था। सवाल पर सवाल उठने लगे- कौन है हत्यारा? क्यों किया चार-चार लोगों का कत्ल? प्रभारी निरीक्षक मलखान सिंह ने मौके पर मौजूद कुछ लोगों से पूछताछ की, तो पता चला कि जयभान सिंह का राजू के घर आना-जाना है। वह राजू के पड़ोसी राम आश्रय यादव का रिश्तेदार था और लामी गांव (सिंगरौली, मध्य प्रदेश) का रहने वाला था। सुनीता उसे बहुत चाहती थी। खुद राजू ने भी जयभान सिंह पर शक जाहिर किया था, लेकिन सवाल उठता था कि जयभान सुनीता को चाहता था, तो वह उसकी हत्या क्यों करेगा?
टीआई मलखान सिंह चारों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भजवाकर जयभान के गांव लामी जा पहुंचे। वह घर में नहीं था। उसकी औरत ने भी नहीं बताया कि वह कहां है, तब तो मलखान का माथा ठनका। उनका शक यकीन में बदलने लगा। उन्होंने मुखबिरों को सचेत कर दिया। पुलिस की मेहनत रंग लाई, 5 फरवरी, 2013 की शाम एक मुखबिर ने सूचना दी कि जयभान इस समय घर में मौजूद है। टीआई मलखान सिंह आधी रात के वक्त मयफोर्स आरोपी के घर जा धमके। जयभान ने घर से भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे दौड़ाकर दबोच लिया। पूछताछ में आरोपी ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। पता चला कि इस सामूहिक नरसंहार का कारण छत्रधारी साहू को कुछ दिन पहले उसके खेत में मिले दफीना को लूटना था। घटना में जयभान के दो और साथी शामिल हैं।
फलित नहीं हुआ लूट का माल
दफीना यानी खजाना! गांव वालों के मुताबिक, पूरा इलाका डकैतों से •ारा पड़ा था। पुलिस से बचने के लिए वे अक्सर लूट का माल किसी पहचान के सहारे खेतों में दबा देते थे। बाद में कई बार डकैतों के मारे जाने, पकड़े जाने या फिर उनके जेल से छूटकर वापस आने तक वह धन किसी दूसरे के हाथ लग जाता है या खेत की पहचान का चिह्न ही उस समय तक नष्ट हो जाता। सारा धन जमीन में ही गड़ा रह जाता। ऐसा ही एक दफीना छत्रधारी साहू के हाथ लग गया, लेकिन गांव वालों की मान्यता है कि इस प्रकार की दौलत हर किसी को नहीं फलती। छत्रधारी साहू के परिवार के लिए भ खजाना काल बन गया। घर में अकूत दौलत आते ही सुनीता की चाल-ढाल बदल गई। वह पहले से अब कहीं ज्यादा सजने-संवरने लगी थी। उन्हीं दिनों सुनीता का संपर्क जयभान सिंह से हुआ। दोनों जल्द ही एक-दूसरे से प्रेम करने लगे। पति राजू पास के गांव में होटल चलाता है। सास-ससुर खेती-किसानी में लगे रहते। एक बेटी थी पूजा, सुनीता उसे सहेलियों के साथ खेलने भज देती। इसके बाद जयभान के साथ खुलकर वासना का खेल खेलती। सुनीता को क्या पता था कि उसके जिस्म की आग एक दिन पूरे घर को जलाकर राख कर देगी। जयभान को जल्द ही छत्रधारी साहू को मिले खजाने का पता चल गया। खुद सुनीता ने उसकी बाहों में मचलते हुए बताया था, ‘जानते हो, मेरे ससुर को अपने खेत में सोने का घड़ा मिला है।’ जयभान की आंखों में चमक आ गई। अब उसकी दसों अंगुलियां घी में थी। पहलू गर्म करने के लिए प्रेमिका और खर्च करने के लिए लाखों की दौलत।
साजिश में दो और लोग शामिल
जयभान अब किसी भी कीमत पर उस दफीना को हासिल करना चाहता था। इसके लिए सबसे पहले उसने सुनीता को उसके ससुर के खिलाफ •ाड़काते हुए उसे अपने भ•ारोसे में लिया, ‘छत्रधारी बहुत कंजूस है। वह तुम्हें उस खजाने में से एक पाई नहीं देगा। मेरा कहा मानो, तो छोड़ो उस खजाने को। तुम मेरे साथ निकल चलो। मैं तुम्हें अपनी रानी बनाकर रखूंगा।’ सुनीता तो पहले से उस पर मरती थी। उसने फौरन जयभान सिंह का प्रस्ताव मान लिया। अब महज जयभान को यह पता करना था कि सोने का घड़ा छत्रधारी ने कहां छिपा रखा है? सुनीता से पूछा तो उसने नहीं बताया। इस पर जयभान का पारा आसमान पर चढ़ गया। उसने खजाना लूटने की साजिश रचनी शुरू कर दी। योजना को अंजाम देने के लिए जयभान ने गांव के ही दो बदमाशों बब्बू सिंह और सत्य नारायण तिवारी से संपर्क किया। वे दोनों भी तैयार हो गए।
प्रेमिका के सीने में उतारा खंजर
घटना की रात तीनों आरोपी भरखेड़ी रेलवे स्टेशन के पास मिले, फिर छत्रधारी साहू के घर पहुंच गए। अंदर प्रवेश करते ही आंगन में सबसे पहले छत्रधारी से सामना हुआ। जयभान ने उससे खजाने के बारे में पूछा, तो उसने नहीं बताया। गुस्से में बदमाशों ने उसे मारना-पीटना शुरू कर दिया, तभी छत्रधारी की पत्नी आ गई। बचाव में उसने शोर मचाना शुरू कर दिया। आरोपियों ने पकड़े जाने के •ाय से छत्रधारी और उसकी पत्नी की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी। इस बीच सुनीता अपने कमरे से निकल आई। उसने हिम्मत दिखाते हुए तीनों बदमाशों का विरोध शुरू कर दिया। उसे यह नहीं पता था कि जिसे वह चाहती है, वही आज उसकी छाती में खंजर उतार देगा। बब्बू और सत्य नारायण ने लपककर सुनीता को दबोच लिया। तब भी उसने खजाने के बारे में नहीं बताया, तो बदमाशों ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद तीनों आरोपी खुद ही पूरे घर में सोने का घड़ा खोजने लगे। इस बीच अपने कमरे से निकलकर पूजा आ गई। उसने जयभान को पहचान लिया। वह उन तीनों का राज फाश कर सकती थी, इसलिए तीनों ने मिलकर पूजा को भी मौत के घाट उतार दिया। इसके बावजूद बदमाशों को दफीना हाथ नहीं लगा। घर में जो धन-दौलत थी, उसी को समेट कर वे भाग निकले। पुलिस ने इस मामले के दोनों अन्य आरोपियों को भ•ाी गिरफ्तार कर तीनों को जेल भ•ोज दिया है।
मुठभ•ोड़ में सरगना की मौत
गांव के लोगों का कहना है कि छत्रधारी साहू को अपने खेत में जो घड़ा मिला था, उसमें सोने-चांदी के लाखों रुपये के आभ•ाूषण थे। डाकू सरगना ने उसे पहचान बनाकर खेत में मिट्टी के नीचे गाड़ दिया था। बाद में दस्यु सरदार की एक दूसरे मामले के दौरान पुलिस मुठभ•ोड़ में मौत हो गई। खजाने के बारे में सरगना ने अपने साथियों को भी कुछ नहीं बताया था। चारों हत्याओं के बाद पुलिस ने छत्रधारी साहू के घर की बहुत छानबीन की, लेकिन उस खजाने का कुछ पता नहीं चला। आरोपियों को भी वह खजाना हाथ नहीं लगा।

- जितेंद्र बच्चन

सोमवार, 28 जनवरी 2013

सलाखों के पीछे पहुंचा महाठग

शख्स एक, नाम कई और हर नाम के साथ जुड़ा है एक नया फरेब! गुनाह की बिसात पर लगाया दौलत का अंबार! कभी डॉन बनने का शौक, तो कभी कलाई में 19 लाख की घड़ी! जितने नाम, उतने चेहरे और हर चेहरे के पीछे छिपा है गुनाहों का नायाब तरीका! एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की कर चुका है ठगी! करीब ढाई लाख लोगों को लगाया चूना और उसके इस गुनाह में शामिल है उसकी खूबसूरत बीवी!

करोलबाग, रामा रोड, दिल्ली में स्टॉक गुरु  इंडिया कंपनी खुलने के सप्ताह भर बाद ही निवेशकों की लाइन लगने लगी। स्कीम ही ऐसी थी, 10 हजार रु पये छह महीने तक डिपॉजिट करो। बदले में छह महीने तक हर माह 20 पर्सेंट रिटर्न और सातवें महीने पूरी रकम वापस। लोगों ने फायदा उठाने के लिए जमकर पैसा लगाया। दो-तीन महीने में ही कंपनी के पास करोड़ों रु पये इकट्ठा हो गए। देश भर के लोग स्टॉक गुरु कंपनी में निवेश करने लगे। कंपनी का निदेशक उल्हास प्रभाकर लग्जरी गाड़ी में आॅफिस आता। उसके आगे-पीछे महंगी गाड़ियों का काफिला चलता और साथ में बॉडीगार्ड भी रहते। जो भी मिलता, उसकी बातों और व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रहता। प्रभाकर कभी फिल्म निर्माण की बात करता, तो कभी लोगों के सामने अल्प आय वर्ग के लिए कॉलोनी बनाने की स्कीम पेश कर निवेश करने की सलाह देता। कभी किसी को उस पर शक नहीं हुआ। मोतीनगर दिल्ली के अमरजीत सिंह ने भी करीब सात लाख रुपये निवेश कर दिए। उन्हें कंपनी ने पांच अप्रैल, 2010 को लाभांश के चेक देने के लिए बुलाया था, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया। अमरजीत सिंह कंपनी के दफ्तर पहुंचे, तो आॅफिस में ताला लटक रहा था। पता चला कि कंपनी फर्जी थी। न निदेशक का पता है न मैनेजर का। लोगों के करोड़Þों रुपये लेकर फरार हो गई कंपनी। लोगों के होश उड़ गए। दिल्ली एनसीआर के अब तक हजारों लोग लाखों रुपये का निवेश कर चुके थे। अमरजीत सिंह के साथ पचासों लोग थाना मोतीनगर जाकर हंगामा करना शुरू कर दिया। पुलिस के बड़े अधिकारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने कंपनी के खिलाफ मामला दर्ज कर शीघ्र कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।

पत्नी ने दिया हर जुर्म में साथ
दो महीने बाद सात जून को सोनीपत और गुड़गांव के भी कुछ निवेशकों ने दिल्ली आकर हंगामा किया। पुलिस लोगों को जांच के नाम पर टहलाती रही। धीरे-धीरे एक साल बीत गए। इस बीच न प्रभाकर का पता चला और न ही निवेशकों को उनकी रकम मिलने की कोई संभावना बनी। जुलाई, 2011 में सैकड़ों निवेशकों ने पुलिस और ठगी के विरोध में सड़क पर संघर्ष करने का ऐलान कर दिया, तब मोतीनगर थाना में दर्ज मामले की जांच क्र ाइम ब्रांच (ईओडब्ल्यू) को सौंप दी गई। इकनॉमिक आॅफेंस विंग के जॉइंट कमिश्नर संदीप गोयल के नेतृत्व में कई टीमें पूरे देश में फैल गई। पता चला, प्रभाकर के इस गुनाह के खेल में उसकी पत्नी साक्षी भी शामिल है। प्रभाकर बहुत शातिर दिमाग है। पुलिस से बचने के लिए वह प्लास्टिक सर्जरी का सहारा ले सकता है। उसके गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। पुलिस ने दोनों आरोपियों को विदेश भागने से रोकने के लिए एलओसी ओपन करा दी, तभी एक रोज खबर मिली की प्रभाकर उसकी पत्नी साक्षी नाम बदलकर रत्नागिरी (महाराष्ट्र) में रह रहे हैं। जांच टीम में शामिल इंस्पेक्टर राजकुमार शाह और हवलदार हबीब खान 11 नवंबर, 2012 को रत्नागिरी जा पहुंचे। आरोपियों की पहचान हो गई और दोनों आरोपियों को पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में गिरफ्तार कर लिया गया।

बढ़ सकती है ठगी की रकम
जॉइंट कमिश्नर संदीप गोयल के मुताबिक, उल्हास प्रभाकर खेर (33) उर्फ सिद्धार्थ जे. मराठे उर्फ लोकेश्वर देव उर्फ लोकेश्वर वीर उर्फ देव साहब उर्फ रोहित मूलत: नागपुर महारष्ट्र का निवासी है। पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगा। मुश्किल से 11वीं पास किया। उसके बाद करोड़ों में खेलने का सपना देखने लगा। प्रभाकर की पत्नी साक्षी (30) उर्फ माया उर्फ रक्षा जे. उर्स उर्फ प्रियंका सारस्वत देव ने जर्निलज्म में बीए सेकंड इयर तक पढ़ाई की है। पांच साल का एक बेटा और तीन साल तथा आठ महीने की दो बेटियां हैं। दोनों आरोपियों ने जनवरी, 2010 में दिल्ली के रामा रोड स्थित लीजा कॉम्प्लेक्स में स्टॉक गुरु  इंडिया के नाम से कंपनी खोली थी। लुभावनी स्कीम बताकर कुछ ही महीनों में देशभर के 2,05,062 लोगों से करोड़ों रुपये जमा करा लिए। ईओडब्ल्यू को इनके खिलाफ अब तक 14 हजार से ज्यादा निवेशकों की शिकायतें मिली हैं। इनमें दिल्ली-एनसीआर के लोग भी शामिल हैं। जांच-पड़ताल में अभी तक आरोपियों के नाम से 83 करोड़ रु पये से ज्यादा की संपित्त का पता चला है। साथ ही करीब 500 करोड़ रुपये की ठगी का खुलासा हो चुका है, लेकिन असल रकम एक हजार करोड़ रु पये से कहीं ज्यादा होने की आशंका है।

पहचान बदलकर बचते रहे दोनों
अडिशनल डीसीपी एसडी मिश्रा के अनुसार, आरोपी प्रभाकर को इससे पहले 2004 में नागपुर (महाराष्ट्र) पुलिस ने करीब एक लाख रु पये की चीटिंग के एक मामले   में गिरफ्तार किया था। प्रभाकर ने इस मामले से कोई सबक नहीं लिया, बल्कि उसने पुलिस, लोगों की कार्यप्रणाली और उनकी सोच पर गहरी नजर रखी। जमानत पर छूटने के बाद 2005 में वह बेंगलुरु  चला गया। यहां उसकी मुलाकात साक्षी से हुई, जो बेंगलुरु की एक कंपनी में रिसेप्शिनस्ट थी। दोनों जल्द ही एक-दूसरे से प्रेम करने लगे और फिर इन्होंने लव मैरेज कर ली। इसके बाद निकल पड़े ठगी के रास्ते पर। शुरू में ये दोनों फर्जी नाम-पते पर क्र ेडिट कार्ड लेते। जमकर खरीदारी करते और फरार हो जाते। घरवालों से बहुत कम संपर्क रखते थे। जब भी पता बदलते, नाम और रंग-रूप भी बदल लेते। जिस शहर में रहते, वहां के टॉप के हेयर स्टाइलिस्ट के यहां जाते। मोबाइल फोन का प्रभाकर इस्तेमाल कम करता था। एक सिम से एक बार ही बात करता, वह भी अपने रिहायशी इलाके से करीब 10 किलोमीटर दूर जाकर। अब तक वह करीब 200 सिमकार्डों का इस्तेमाल कर चुका है, जिससे पुलिस को उसकी सही लोकेशन नहीं मिल पाती थी और कानून की पकड़ से दूर बना रहता।

रत्नागिरी में बड़ा घोटला करने का था इरादा
आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों ने बताया कि 2010 में प्रभाकर दिल्ली आ गया और यहां स्टॉक गुरु  इंडिया नाम से फर्जी कंपनी खोलकर लोगों को चूना लगाना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि वह ऊंचा रिटर्न देकर नागरिकों का पैसा निकलवाता था और उसे शेयर बाजार में लगाता था। दिल्ली में जब लोगों को शक हो गया, तो दोनों आरोपी फरार हो गए। इसके बाद रत्नागिरी चले गए। वहां भी दोनों दूसरी स्टॉक गुरु इंडिया जैसी धोखाधड़ी कर बड़ा घोटाला करने की फिराक में थे। इसके लिए आरोपी रत्नागिरी के कई बैंकों में 50 से अधिक अकाउंट खोल चुके थे। पुलिस को इनके नाम से रत्नागिरी इंडस्ट्रियल एरिया में 750 स्क्वायर यार्ड का एक प्लॉट भी मिला है। 15 लाख रु पये की गोल्ड जूलरी, 7 कार और दो बाइक की रिकवरी हुई। रत्नागिरी में गिरफ्तारी के समय प्रभाकर के पास से फर्जी राशन कार्ड, 18 पैन कार्ड, 2 इंटरनेशनल डेबिट कार्ड, 75 क्र ेडिट व डेबिट कार्ड, 20 पेयर कॉन्टेक्ट लेंस, 30 मोबाइल सिम कार्ड,131 चेक बुक, पांच टॉय पिस्टल और रिवॉल्वर, 400 बुलेट , दो एयर गन और एक मोबाइल जैमर बरामद हुआ है।

दिल्ली से भी करोड़ों की बरामदगी
अपराध शाखा की जांच में अभी तक दोनों आरोपियों के नाम से 83 करोड़ रु पये की संपत्ति का पता लगा है। इनमें विभिन्न बैंकों में 23 करोड़ रु पये, 50 लाख की 60 कलाई घड़ियां, 20 करोड़ रु पये से अधिक का अन्य माल, दिल्ली और बाहर करीब 6 करोड़ रु पये की प्रॉपर्टी, 20.45 करोड़ रु पये के अनपेड डीडी आदि शामिल हैं। प्रभाकर ने दिल्ली में 13 फर्जी नाम-पते पर 20 से अधिक बैंकों में 94 खाते खोल रखे थे। द्वारका में 8 फ्लैट, भिवानी, अलवर और मुरादाबाद में एक-एक फ्लैट और गोवा में एक विला खरीद रखा था। लैंड क्रूजर, मिर्सडीज़ और पजेरो जैसी महंगी 12 कारें भी पुलिस ने बरामद की हैं। इनकी कीमत 60 करोड़ रु पये बताई गई है। जानकारी के मुताबिक, प्रभाकर निवेशकों को लूटने के लिए हर बार अपना चेहरा बदल लेता। उसके पास से 20 कॉन्टेक्ट लेंस भी पुलिस ने बरामद किए हैं। जिस शहर में पति-पत्नी रहते, वहां के टॉप हेयर ड्रेसर के पास दोनों जाते थे। प्रभाकर के शातिर दिमाग का इसी से पता चलता है कि जिंदा रहते हुए भी उसने खुद को मृत घोषित कर रखा था। मार्च, 2004 में उसके कहने पर साक्षी ने प्रभाकर के परिवार को एक ई-मेल कर सूचना दी थी कि प्रभाकर की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। इसीलिए पुलिस ने जब प्रभाकर की गिरफ्तारी की सूचना उसकी मां श्रीमती कमल को फोन पर दी, तो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था।

अपने किए पर कोई पछतावा नहीं
प्रभाकर की ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद स्टॉक और फाइनेंस पर अच्छी पकड़ है। पुलिस भी उस पर हाथ नहीं डाल पा रही थी, इसलिए उसके हौसले बढ़ते गए। वह ठगी का नया-नया तरीका अपनाता रहा। इसमें उसका पूरा साथ उसकी पत्नी साक्षी ने दिया। दोनों का मकसद लोगों को ठगकर दौलत का अंबार लगाना था। खुद प्रभाकर 19 लाख रु पये की सोने कीरोलेक्स घड़ी बांधता था। सोचा था, कभी पकड़े नहीं जाएंगे, पर यह भूल गए कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। वह दो पैर से भागता है, तो पुलिस हजार पैरों से उसका पीछा करती है। दिल्ली पुलिस ने आरोपी प्रभाकर और साक्षी को गिरफ्तार कर लिया। मुंबई में भी प्रभाकर की कुछ प्रॉपर्टी का पता चला है। वहां की पुलिस जांच में लगी है, लेकिन आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों ने बताया कि सलाखों के पीछे पहुंचने पर भी इन दोनों आरोपियों को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है।

फाइव स्टार होटल में पार्टी देता
प्रभाकर निवेशकों को फिल्म वर्ल्ड में काम करने की ट्रेनिंग भी देता था और उसके लिए एक मराठी मूवी की पटकथा भी लिख डाली थी। उसने इस फिल्म के लिए हीरो - हीरोइन की जरु रत का विज्ञापन भी दिया था, वहीं करोलबाग, दिल्ली निवासी अंकुर (पीड़ित) के अनुसार प्रभाकर सप्ताह में दो बार फाइव स्टार होटल या फिर फार्महाउस पार्टी करता था। उसमें बॉलिवुड और टीवी की सिलेब्रिटीज को भी बुलाया जाता था। फ्री में शराब पिलाई जाती थी। लोगों से आमने-सामने पिब्लसिटी के जरिए या फिर फेसबुक या एसएमएस से संपर्क किया जाता था।
पुलिस का कहना है कि आरोपी पति-पत्नी नाम और पहचान बदलकर काम करते थे। रत्नागिरी में 11 नवंबर को जब इन्हें गिरफ्तार किया गया, तो ये दोनों सिद्धार्थ जे. मराठे   और माया मराठे के नाम से वहां रह रहे थे। आरोपी प्रभाकर दिल्ली में लोकेश्वर देव, गोवा में लोकेश्वर वीर देव उर्फ देव साहब, बेंगलुरु  में उल्हास उर्फ रोहित और मुंबई में सिद्धार्थ मराठे के नाम से लोगों को चूना लगा चुका है।

-जितेन्द्र बच्चन

छत्तीसगढ़ में फैल रही लाल मुसीबत - जितेन्द्र बच्चन


केंद्र और राज्य सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ मोर्चे पर सुरक्षा बलों के 30 हजार जवानों को झोंक रखा है। बीते चार साल में इस लाल आतंक पर लगाम कसने के लिए 3,975 करोड़ रुपये •ाी फंूके जा चुके हैं। बावजूद इसके नक्सलियों के खौफ के कारोबार में लगातार इजाफा हो रहा है। कहीं सुरक्षाबलों की रणनीति में कोई सुराख तो नहीं?

लाल आतंक को जड़ से उखाड़ फेंकने के अनिगनत वादों, ढेरों रणनीतियों और •ाारी-•ारकम रकम खर्च करने के बावजूद नतीजा सिफर है। नक्सलियों से निपटने के लिए तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल, •ाारत-तिब्बत सीमा पुलिस की दो दर्जन से ज्यादा बटालियन और छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल की 20 बटालियन के पास नहीं है ठोस रणनीति। राज्य के जांजगीर को छोड़ बाकी17 जिले माओवादियों की गतिविधियों से प्र•ाावित हैं। जबकि केंद्र और राज्य सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ मोर्चे पर सुरक्षा बलों के 30 हजार जवानों को झोंक रखा है। बीते चार साल में लाल आतंक पर लगाम कसने के लिए 3,975 करोड़ रुपये •ाी फंूके जा चुके हैं। बावजूद इसके राज्य में माओवादियों के खौफ के कारोबार में लगातार इजाफा हो रहा है। उनकी ताकत में •ाी बढ़ोतरी हुई है। दरअसल, इसके पीछे माओवादियों की ठोस रणनीति है। फरवरी, 2007 में झारखंड में हुई अपनी 9वीं कांग्रेस में माओवादियों ने सुरक्षा बलों पर छापामार हमले के बजाए चलायमान युद्ध का ऐलान किया था। इस युद्ध को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के साथ पीएलजीए (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) को पीएलए (पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी) में और गुरिल्ला जोन को बेस एरिया में तब्दील कर दिया गया। साथ ही लड़ाकों को नए सिरे से लामबंद करने के लिए उनकी माली हालत •ाी दुरु स्त करने की कवायद शुरू की। उनकी इस राणनीति ने माओवादियों में नई जान फूंक दी, जिसका नतीजा यह रहा कि 28-29 मार्च की रात पश्चिम बस्तर के रानीबोदली पोस्ट पर अपने पहले चलायमान हमले का नमूना देते हुए उन्होंने सुरक्षा बलों के 55 जवानों को मौत के घाट उतार दिया... और यह सिलिसला आज •ाी जारी है।
सैटेलाइट फोन होने का •ाी खुलासा
साढेÞ चार वर्षों में माओवादी हमले में 1,277 लोगों ने जान गंवाई है, जिसमें 632 पुलिसवाले और बाकी सुरक्षा बलों के जवान हैं। इसी अविध में पुलिस ने •ाी 353 माओवादियों को मार गिराने का दावा किया है, लेकिन बस्तर को आधार बनाकर राज्य के दीगर हिस्सों में विस्तार के लिए माओवादियों ने यहां अपनी लेवी (जबरिया वसूली) करीब 70 करोड़ रुपये से बढांकर 200 करोड़ रुपये कर ली है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति तो मजबूत हुई ही, नक्सलियों की ताकत में •ाी इजाफा हुआ है। 1968 में माओवादियों ने 15 लड़ाकों के साथ पश्चिमी बस्तर के बीजापुर जिले में मद्देडदलम का गठन किया था, जबकि आज यहां माओवादियों की 7 डिवीजनल कमेटी, लड़ाकों की दो बटालियन, 11 कंपनी और 30 प्लाटून हैं। अपनी इसी मजबूत माली हालत के चलते माओवादी सुरक्षा बलों के साथ लंबी लड़ाई को तैयार हैं। लड़ाकों की बेतहाशा बढ़ोतरी के साथ ही उन्होंने असलहा और गोला-बारूद •ाी •ाारी तादाद में जमा कर लिया है। पुलिस के यूबीजीएल (अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर) के जवाब में माओवादी अमेरिकन एम16 सीरीज के घातक हथियार, जिनमें ग्रेनेड लांचर लगता है, के जुगाड़ में हैं। पिछले हफ्ते ही माओवादियों के पास सैटेलाइट फोन होने का •ाी खुलासा हुआ है, जिसके जरिए वे बीजापुर के रानीबोदली क्षेत्र से अपने किसी कमांडर से हमले का आदेश ले रहे थे।
केशकाल को बनाया मुख्य जंक्शन
दंडकारण्य विमुक्त प्रांत के लिए बस्तर तक ही दायरा रखने वाले नक्सलियों की निगाहें अब समूचे राज्य पर है। रंगदारी बढ़ाने के लिए उनका अगला निशाना रायगढ़ और कोरबा है। बीते साल माओवादी धमतरी और महासमुंद में नए रंगरूटों के दम पर ठीक से पैठ नहीं जमा पाए थे, इसलिए अबकी उन्होंने दंतेवाड़ा के चिंतलनार इलाके से धुरंधर लड़ाकों की एक हथियारबंद कंपनी नए रास्ते कांगेर घाटी, माचकोट सघन वन क्षेत्रों से होते हुए करपावंड की ओर से केशकाल होते हुए सीतानदी अ•ायारण्य की ओर रवाना की, जिसने वहां पहुंचकर एक शिविर •ाी लगा लिया है। बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक टी.जे. लांगकुमेर के अनुसार, माओवादी पहले सीमावर्ती आंध्र प्रदेश और दक्षिण बस्तर से स्टेट हाइवे क्र मांक-5 से उत्तर बस्तर के राजनांदगांव और प्रदेश की अन्य जगहों पर जाते थे। अब नक्सलियों ने दर•ाा और ईस्ट बस्तर डिवीजनल कमेटी खड़ी कर कई छोटे मार्ग विकिसत कर लिए हैं। केशकाल उनका मुख्य जंक्शन है, इसलिए पिछले कई साल से उन्होंने यहां कोई बड़ी वारदात नहीं की है।
धमतरी के कई इलाकों में •ाी गतिविधियां बढ़ीं
7 अक्टूबर, 2012 को नक्सलियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-63 पर गीदम और बास्तानार के बीच बारूदी सुरंग विस्फोट कर सीमा सशस्त्र बल के एक वाहन को उड़ा दिया था, जिसमें तीन जवान शहीद हो गए थे और एक जवान गं•ाीर रु प से घायल हो गया था। इससे पहले तक इस राजमार्ग को गीदम से जगदलपुर तक सुरिक्षत माना जाता था। अब जगदलपुर से 25 किमी दूर नानगुर इलाके में नक्सलियों की   एक छोटी टुकड़ी तैनात होने की खबर है। बकावंड और करपावंड क्षेत्र में उनका सर्वे चल रहा है और कांकेर के कोरर क्षेत्र और धमतरी के सिंहपुर, मगरलोड में •ाी नक्सल गतिविधियां बढ़ी हैं। रायगढ़ से करीब 50 किमी दूर गोगारडा अ•ायारण्य साल •ार से नक्सलियों का ठिकाना बना हुआ है। नवंबर, 2012 में यहां बड़ी संख्या में माओवादियों का जमावड़ा हुआ था, वहीं कोरबा से 70 किमी दूर जंगल और पहाड़ियों से घिरे स्यांग और लेमरु  में बीते दो साल से माओवादियों की आमदरफ्त है। बिलासपुर के अचानकमार अ•ायारण्य में •ाी पिछले कुछ समय से इनकी गतिविधियों की खबर है। हाल ही में यहां माओवादियों के पर्चे •ाी मिले थे।
सरकार के दावे की खुली पोल
छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि नक्सली घटनाओं में कमी आई है और इसका कारण राज्य के नक्सल प्र•ाावित क्षेत्रों में पुलिस का बढ़ता दबाव है। राज्य के गृह मंत्री ननकी राम कंवर का कहना है, वर्ष 2006 की तुलना में वर्ष 2012 में नक्सली घटनाएं लग•ाग आधी हो गई हैं और आम नागरिकों की हत्या की घटनाएं महज 20 फीसदी रह गई, पर हकीकत सरकार के दावे की कलई खोलती है। राज्य में नक्सलियों की ताकत घटी नहीं, बल्कि लगातार बढ़ी है। रमन सरकार द्वारा जारी ग्राम सुराज अ•िायान के दौरान सुकमा जिले के केरलापाल क्षेत्र से 21 अप्रैल, 2012 की दोपहर कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का अपहरण कर लिया गया। माओवादियों ने मेनन के दो अंगरक्षकों की गोली मारकर हत्या कर दी। इस अप्रत्याशित घटना से हड़बड़ाई राज्य सरकार ने मेनन को छुड़ाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, तब •ाी माओवादियों ने 13 दिन बाद तीन मई को मेनन को रिहा किया और देश-दुनिया को नक्सली यह •ाी बताने में कामयाब रहे कि वह वाकई सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती हैं।
मई, 2012 में राज्य के दंतेवाड़ा जिले में माओवादियों ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के वाहन पर हमला किया, जिसमें छह पुलिसकर्मी समेत सात लोग मारे गए। इस घटना से करीब 10 दिन पहले माओवादियों ने सुकमा जिले में दो पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। मार्च, 2012 में राज्य के कांकेर जिले में विस्फोट कर सीमा सुरक्षा बल की गाड़ी को उड़ा दिया, जिसमें तीन जवान शहीद हो गए। बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा क्षेत्र में पुलिस ने 29 जून को मुठ•ोड़ में 19 नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया था। राज्य सरकार ने •ाी कहा कि पुलिस ने नक्सलियों को ही मारा है और उसमें दंतेवाड़ा जेल ब्रेक मामले का मास्टर माइंड •ाी शामिल था, लेकिन पुलिस अपनी कामयाबी का जश्न मनाती, उससे पहले ही राज्य के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस घटना में बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों के मारे जाने का आरोप लगाते हुए सीबीआई जांच की मांग की। अंतत: घटना को लेकर विवाद बढ़ता देख राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच की घोषणा कर दी। नक्सलियों के निशाने पर नक्सल विरोधी नेता (पूर्व नेता प्रतिपक्ष) महेंद्र कर्मा •ाी रहे। आठ नवंबर को हुए हमले में महेंद्र कर्मा बाल-बाल बचे। सरकार की रणनीति को और कामयाब बनाने के लिए नक्सली मामलों के जानकार राम निवास नए पुलिस महानिदेशक बनाए गए। पद ग्रहण करते समय उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता नक्सली समस्या का निबटारा है, लेकिन नक्सलियों ने उन्हें चुनौती देते हुए तीन दिसंबर, 2012 को सुकमा जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर नीलावरन के पंचायत •ावन को विस्फोट से उड़ा दिया।
नक्सली कैंप ध्वस्त, दो नक्सली गिरफ्तार
नारायणपुर के एसपी मयंक श्रीवास्तव के अनुसार, 31 दिसंबर, 2012 की सुबह मुखिबर से सूचना मिली थी कि केशकाल दलम कमांडर कमलेश एवं माड दलम की सरिता ग्रामीणों की बैठक कर संघम सदस्यों को विशेष ट्रेनिंग दे रहे हैं। डीआरजी एवं एसटीएफ की पार्टी ने जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर स्थित मचानार एवं परलमेटा के जंगलों में दबिश दी, तो पुलिस नक्सली मुठ•ोड़ में पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी। पुलिस ने नक्सलियों के कैंप को धवस्त कर मौके से दो नक्सलियों को गिरफ्तार कर •ाारी मात्रा में नक्सलियों का सामान बरामद किया है। करीब एक घंटे तक चली मुठ•ोड़ के बाद बाकी के नक्सली घने जंगल का सहारा लेते हुए वहां से •ााग खडे हुए।
छह गुना बजट बढ़ने के बाद •ाी पुलिस असफल
सरकार नक्सलियों से निबटने के लिए अब तक तमाम संसाधन झोंक चुकी है। गत छह साल में पुलिस का बजट 6 गुना बढ़ा दिया गया। वर्ष 2005-06 में 350 करोड़ रुपये बजट था, जो 2010-11 में 1,100 करोड़ रुपये हो गया और 2011-12 में यह 1,500 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसका 70 फीसदी से अधिक नक्सल प्र•ाावित क्षेत्रों में खर्च हो रहा है, जबकि पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए मिलने वाली राशि अलग है। इसके अलावा इस मद में पिछले तीन साल में केंद्र से करीब 400 करोड़ रुपये मिले हैं। केंद्रीय सुरक्षा बलों के वेतन का •ाुगतान •ाी राज्य सरकार करती है, जो राशि करीब 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। कुल खर्च 3,975 करोड़ रुपये बनता है। राज्य के गृह मंत्री ननकीराम कंवर मानते हैं कि राज्य में माओवादियों की ताकत बढ़ी है। यही वजह है कि वे कई मौकों पर बस्तर को सेना के हवाले करने की हिमायत कर चुके हैं।
अतिरिक्त महानिदेशक ने जताई अन•िाज्ञता
23 मई, 2012 को माओवादियों ने रायपुर से सटे ओडीशा के सोनाबेडा में गरियाबंद के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश पवार समेत 9 लोगों की हत्या कर दी थी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के काफिले तक को वे निशाना बना चुके हैं। रायपुर जिले के 8 थाना   क्षेत्रों में माओवादियों की गतिविधियां हैं। हालांकि, पुलिस महानिदेशक अनिल नवानी और अतिरिक्त महानिदेशक (नक्सल आॅपरेशन) राम निवास राज्य के 18 में से 15 जिलों के नक्सल प्र•ाावित होने से अनि•ाज्ञता जताते हैं। सरकार की ओर से विधानस•ाा में दी गई इस जानकारी के बारे में राम निवास कहते हैं कि नक्सली प्र•ााव के कई मापदंड होते हैं और एकाध मापदंड की वजह से किसी इलाके को नक्सल प्र•ाावित नहीं कहा जा सकता। वे कहते हैं, ‘बस्तर के पांच जिले नक्सल प्र•ाावित हैं, लेकिन सरगुजा फिलहाल नक्सल मुक्त हो चुका है। जबकि सरकार सरगुजा के 29 थानों को नक्सल प्र•ाावित मानती है।’
जितेन्द्र बच्चन

रविवार, 27 जनवरी 2013

खूनी साजिश



पहले एक खुशहाल परिवार को उजाड़ा, फिर खुद किसी और की हो गई। कुछ ऐसी ही है रेखा सेन से रेखा मिश्रा और फिर शबनम बनने की कहानी। इस औरत का खेल यहीं नहीं थमा, बल्कि यहीं से शुरू होती है इसके इश्क, फरेब और खूनी साजिश की रोंगटे खड़ी कर देनी वाली कहानी।

 खंडवा का बहुचर्चित प्रसन्न मिश्रा हत्याकांड
रेखा मिश्रा ने पुलिस को जो बताया, उसे सुनकर स•ाी हैरान रह गए। उसका कहना था कि 11 जुलाई की रात करीब नौ बजे एसडीओ साहब के मोबाइल पर किसी का फोन आया था। इसके बाद वह तैयार होने लगे, फिर रात 9.30 बजे एक व्यक्ति आॅटो लेकर आया और प्रसन्न मिश्रा उसके साथ चले गए। तब से आज 12 दिन बीत गए, उनका कुछ पता नहीं है। उनका मोबाइल •ाी नहीं लग रहा है। प्रसन्न एनवीडीए कॉलोनी में रहते थे और एसडीओ थे। उनके गुम होने की खबर से पुलिस में हड़कंप मच गया- कहां गए प्रसन्न मिश्रा? किसने किया था उन्हें फोन? आॅटो में कौन आया था? किसके साथ गए और रेखा ने बारह दिन बाद इस मामले की सूचना क्यों दी? 23 जुलाई को थाना कोतवाली (खंडवा) पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी। इसके बाद मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर दी। खुद रेखा •ाी पति को तलाशती रही।
रेखा सेन (38) मूल रूप से खिरकिया की रहने वाली है। उसने प्रसन्न मिश्रा से प्रेम विवाह किया था। पति-पत्नी दोनों एकसाथ एनवीडीए कॉलोनी (खंडवा) में हंसी-खुशी के साथ रह रहे थे। प्रसन्न मिश्रा की यह दूसरी शादी थी। पहली पत्नी का नाम मधु है। मधु मिश्रा के साथ प्रसन्न की शादी 1986 में हुई थी। उससे एक बेटी है प्रज्ञा मिश्रा। चार साल तक मधु के साथ उनका पारिवारिक जीवन बहुत अच्छा बीता। इसके बाद प्रसन्न की जिंदगी में रेखा सेन आ गई। प्रेमिका के आते पत्नी जहर लगने लगी। जल्द ही रेखा और प्रसन्न ने शादी करने का फैसला कर लिया। इस ऐलान से मधु का वजूद हिल गया। गुस्से में उन्होंने पूरा आसमान सिर पर उठा लिया, ‘प्रसन्न! एम म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती। इस घर में अब मैं रहूंगी या फिर वह चुड़ैल!’ घर में कलह शुरू हो गई। प्रसन्न रेखा को छोड़ने को तैयार नहीं थे और मधु सौतन को बर्दास्त नहीं कर पा रही थी। आखिर तंग आकर मधु मिश्रा ने पति का घर छोड़ दिया। वह मायके में जाकर रहने लगी।
रेखा को इसी मौके की तलाश थी। प्रसन्न के साथ अब वह पत्नी की हैसियत से खुलेआम रहने लगी। मधु मिश्रा के •ााई ने थोड़ा-बहुत विरोध किया, लेकिन उनकी •ाी एक नहीं चली। प्रसन्न रेखा के साथ बड़ी हंसी-खुशी के साथ रहने लगे, त•ाी अचानक एक रोज वह गायब हो गए। पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रसन्न मिश्रा का पता नहीं चला, तो मामले की जांच सीआईडी को सौंप दी गई। वह •ाी एसडीओ साहब को नहीं ढूंढ पाई। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि प्रसन्न को जमीन निगल गई या आसमान?
14 जुलाई, 2010 को पुलिस इसी उधेड़बुन में लगी थी, त•ाी एक मुखबिर ने चौंकाने वाली खबर दी। उसका कहना था, ‘एसडीओ साहब 11 जुलाई, 2003 को गायब नहीं हुए थे, बल्कि उनकी हत्या की गई है और इस खूनी साजिश की सूत्रधार है खुद उनकी पत्नी रेखा!’ इंसपेक्टर •ाूपेंद्र •ादौरिया चौंक पड़े, ‘बताओ, और क्या जानते हो मिश्रा के बारे में?’ मुखबिर ने बताया, ‘सर, रेखा ने प्रसन्न से शादी जरूर की थी, लेकिन अब वह उनसे ऊब चुकी थी। वह एक नए आशिक के इश्क में गिरफ्तार हो चुकी थी। उसका नाम सैयद साहेब अली पुत्र सैयद अहमद है। वह कहारवाड़ी खंडवा का रहने वाला है। सैयद और उसका •ााई सैयद करामात अली •ाी इस मामले में शामिल है। एसडीओ साहब के शव को ये दोनों बाइक (एमपी04 आर-1862) से ले जाकर शहर से करीब 28 किमी दूर खेड़ी गांव के आगे रोड पर बन रही पुलिया के पास एक गड्ढे में दफना दिया था।’
प्रसन्न मिश्रा की गुमशुदगी का राज खुलते ही इंस्पेक्टर •ाौदरिया ने मामले की सूचना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को दी। इसके बाद रेखा को हिरासत में ले लिया। उसका कहना था कि वह किसी साहेब अली को नहीं जानती और वह अंतिम सांस तक प्रसन्न मिश्रा की ही पत्नी है। पुलिस ने तफ्तीश तेज कर दी। गहन जांच-पड़ताल में मामले के विवेचनाधिकारी के हाथ एक ऐसा नॉमिनेशन फार्म हाथ लग गया, जिस पर प्रॉविडेंट फंड के वि•ााजन का उल्लेख था। जिला सहकारी बैंक होशंगाबाद की एक पासबुक मिली, जिसमें 21 जून 03 तक 1 लाख 29 हजार 250 रुपये शेष थे। इसके अलावा एक पासबुक •ाारतीय स्टेट बैंक शाखा सिविल लाइन खंडवा की मिली, जिसमें 9 अगस्त, 03 को 36,841 रु पये जमा थे। ये स•ाी दस्तावेज शबनम के नाम थे, लेकिन फोटो रेखा का लगा था। •ादौरिया चौंक पड़े, यह कैसे हो सकता है? जरूर दाल में कुल काला है! रेखा मिश्रा ने साहेब अली को 24 सितंबर, 04 और 24 सितंबर, 07 को ग्रीटिंग कार्ड •ोजा था। उससे •ाी यह बात सबित हो गई कि रेखा झूठ बोल रही है। वह साहेब अली को अच्छी तरह जानती है। थोड़ी और गहन जांच में खंडवा से बना राशन कार्ड और मतदाता परिचय पत्र •ाी बरामद हुआ, जिसमें फोटो रेखा मिश्रा का लगा था, लेकिन नाम की जगह शबनम पति सैयद साहेब अली लिखा था।
विवेचनाधिकरी ने इन सारे सुबूतों   को रेखा के सामने रखा, तो उसने घुटने टेक दिए। इसके बाद पुलिस ने साहेब अली और करामत अली को •ाी गिरफ्तार कर लिया। साहेब अली की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त बाइक •ाी बरामद कर ली। इन दोनों आरोपियों ने •ाी पुलिस पूछताछ में अपना-अपना गुनाह कबूल कर लिया। पुलिस ने 15 जुलाई, 2010 को नायब तहसीलदार विजय प्रकाश सक्सेना की मौजूदगी में आरोपियों की निशानदेही पर जेसीबी से खुदाई की, तो सड़क के करीब 20 फीट नीचे प्रसन्न का कंकाल बरामद हो गया। डीएनए टेस्ट के लिए उसे पहले सागर, फिर इंदौर •ोजा गया। रिपोर्ट से यह बात तय हो गई कि वह नरकंकाल प्रसन्न मिश्रा का ही था। दरअसल, प्रसन्न मिश्रा रेखा के साथ रह जरूर रहे थे, लेकिन कुछ दिन बाद ही उन्हें अपनी पत्नी मधु की याद आने लगी थी। उन्हें अपनी गलती का अहसास होने लगा था। वह मधु को खोने के गम में शराब पीने लगे, फिर शराब जैसे उनकी दवा बन गई। रेखा परेशान रहने लगी। उसके आगोश में अब प्रसन्न खुश नहीं रहते थे। उनकी शराब की लत छुड़ाने के लिए शासकीय लोक अ•िायोजक दीपक कुरे के मुताबिक, रेखा ने साहेब अली का सहारा लिया। वह पेशे से तांत्रिक था, लेकिन जब उसे पता चला कि प्रसन्न एसडीओ हैं और उनके पास लाखों की दौलत है तो उस तांत्रिक के मन में लालच समा गया। उसने रेखा को अपने प्रेम-जाल में फंसाना शुरू कर दिया। कुछ दिन बाद ही दोनों के बीच अवैध संबंध हो गए।
रेखा अब तक जिसे दिल की गहराईयों से चाहती थी, उसी प्रसन्न मिश्रा को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल दिया। साहेब अली और रेखा ने शादी करने का फैसला कर लिया। साहेब अली ने इससे पहले रेखा को समझाया कि अगर प्रसन्न की हत्या कर दी जाए, तो सारी दौलत की तुम इकलौती वारिस हो जाओगी। धन के लो•ा में औरत का विवेक जाता रहा। जर-जोरू और जमीन हड़पने के लिए साहेब अली की साजिश कामयाब हो गई। उसने अपने •ााई करामात अली और रेखा की मदद से प्रसन्न मिश्रा की एक रस्सी से गला घोटकर हत्या कर दी। शव घर से बहुत दूर हरसूद रोड स्थित खेड़ी के पास ले जाकर दफना दिया। प्रसन्न मिश्रा के कपड़े, उनका मोबाइल और गला घोटने वाली रस्सी खेड़ी के पास ही नदी में फेंक दिया। कुछ दिन बाद जहां प्रसन्न मिश्रा का शव दफन था, उस पर सड़क बन गई। आरोपियों ने सोचा, अब कोई डर नहीं है। रेखा ने धर्म बदलकर साहेब अली के साथ शादी कर ली। रेखा मिश्रा से वह शबनम बन गई। लड़की वि•ाूति का नाम बदलकर मुस्कान अली रख दिया। बच्ची के अनुसार, रेखा उस पर दबाव डालती थी कि वह साहेब अली को ही अपना पिता कहे। वि•ाूति जब विरोध करती तो साहेब अली तंत्र-मंत्र कर उसे जिंदा जलाने की धमकी •ाी देता। घटना के तीन साल बाद रेखा ने मकान •ाी बदल दिया। अब स•ाी इंदौर की ग्रीन पार्क कॉलोनी में रहने लगे थे। इन स•ाी को अब प्रसन्न मिश्रा की सिविल मौत का इंतजार था। कानून के मुताबिक, किसी •ाी व्यक्ति के गायब होने के सात साल बाद उसकी सिविल मौत मान ली जाती है। ऐसे में उसकी सारी संपत्ति और धन रेखा मिश्रा और उसके बच्चों को हो जाती, लेकिन पाप क•ाी नहीं छिपता। पुलिस ने तीनों आरोपियों रेखा मिश्रा, साहेब अली और करामत को गिरफ्तार कर जेल •ोज दिया। अदालत में मामले की सुनवाई होती रही। पुलिस ने कुल 20 लोगों को इस बीच बतौर गवाह पेश किया। अंतत: 22 जनवरी, 2013 को न्यायालय ने अपने 42 पेज के फैसले में रेखा उर्फ शबनम, साहेब अली और करामत को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।


पुलिस ने दिखाई लापरवाही
प्र्रसन्न मिश्रा के •ााई अनुराग मिश्रा का कहना है कि उन्होंने •ौया के मामले में तांत्रिक साहेब अली और रेखा मिश्रा के हाथ होने की आशंका पहले ही पुलिस से व्यक्त की थी। पुलिस अगर लापरवाही न करती तो मामले की गुत्थी बहुत पहले सुलझ जाती। अदालत के सजा सुनाए जाने के बाद अनुराग कोर्ट से बाहर निकलकर •ााई की याद में रो पड़े। उनका कहना था, ‘मेरे •ााई की आत्मा को अब शांति मिलेगी।’



जितेन्द्र बच्चन