गुरुवार, 25 जुलाई 2013

शोहरत और मुसीबत


सलमान खान आज करियर के सबसे सुनहरे दौर से गुज़र रहे हैं। मिट्टी को भी छू कर सोना बना देने वाले वो सलमान खान जिसने सौ करोड़ से ज्यादा की कमाई करने वाली फिल्मों की झड़ी-सी लगा दी है, मगर मुकद्दर के इस सिकंदर की तकदीर कभी एक जैसी नहीं रही। शोहरत और मुसीबत दोनों सलमान के साथ जुड़वां की तरह चिपके रहे। ऐसी ही एक मुसीबत है, जो पिछले 11 साल से सलमान का पीछा कर रही है। इन ग्यारह सालों में गवाह, सबूत, सुनवाई ने कई बार रुख पलटा। कभी सलमान को राहत मिलती नज़र आई, तो कभी मुसबीत और बढ़ती दिखी। इस दौरान सलमान और मुंबई पुलिस पर ये इल्जाम भी लगे कि वो केस और गवाह दोनों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और इन्हीं सबके बीच 24 को मुंबई सेशन कोर्ट ने सलमान की मौजूदगी में फैसले से पहले वो फैसला सुनाया कि सलमान की वो रात एक बार फिर जाग उठी।
22 सितंबर 2002 की रात, जूहू का एक पांच सितारा होटल
सलमान का कद तब भी उस 70 एमएम की स्क्रीन से कहीं ज्यादा बड़ा था, जिसके बड़े पर्दे के वो बड़े सितारे थे पर बड़ा सितारा होने के साथ-साथ बॉलीवुड के बड़े बिगड़ैल का भी खिताब तब तक वो हासिल कर चुके थे। 'हम दिल दे चुके सनम' की सुपरहिट कामयाबी और मोहब्बत और नफरत के बीच ऐश्वर्या राय के नाम तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही। अलाप के दरम्यान 22 सितंबर की रात सलमान जूहू के एक फाइव स्टार होटल में पार्टी की जान बने हुए थे। देर रात तक पार्टी उनका शगल था। रात तीन बजे के बाद सलमान पार्टी से बाहर निकलते है। नशे में पूरी तरह चूर। घर जाने के लिए उनके पास उस रात सफेद रंग की टोयटा लैंड क्रूजर गाड़ी थी। गाड़ी चलाने के लिए साथ में बॉडीगार्ड कम ड्राइवर भी, मगर नशे में चूर होने के बाद भी सलमान खुद ड्राइविंग सीट पर जा बैठे। बॉडीगर्ड मना करता रहा पर शायद तब भी सलमान एक बार जो कमिटमेंट कर लेते थे, तो फिर खुद की भी नहीं सुनते थे।
अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी, हिल रोड, बांद्रा
नशे में चूर सलमान की गाड़ी रात के अंधेरे में ठीक तीन बज कर चालीस मिनट पर बांद्रा के हिल रोड पर पहुंचती है। गाड़ी की रफ्तार बेहद तेज थी और ड्राइवर नशे में। हिल रोड पर अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी से कुछ पहले ही अचानक ड्राइवर गाड़ी का संतुलन खो बैठता है और पल भर में गाड़ी बाईं तरफ से सड़क छोड़कर फुटपाथ पर दौड़ने लगती है। बदनसीबी से उस वक्त उसी फुटपाथ पर अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी में काम करने वाले पांच कर्मचारी सो रहे थे। तेज रफ्तार लैंड क्रूजर पांचों को रौदते हुए आगे निकलती है और फिर दुकान के शटर से टकरा कर गाड़ी रुक जाती है। हादसे में एक मज़दूर करीब-करीब मौके पर ही दम तोड़ देता है, जबकि चार मजदूर बुरी तरह से जख्मी हो जाते हैं। चारों में से ज्यादातर के पैर को गाड़ी ने रौंद डाला था।
हादसे के बाद सलमान खान अचानक घबरा जाते हैं। वो ड्राइविंगं सीट से नीचे उतरते हैं, तब तक गाड़ी के फुटपाथ से टकराने और घायलों की चीख-पुकार सुनकर आसपास सो रहे बाकी लोग भी जाग जात हैं और मौके पर पहुंचते हैं। लोग गाड़ी के नीचे फंसे लोगों को बाहर निकलाते हैं और उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है। सलमान गाड़ी मौके पर ही छोड़कर तब तक गायब हो चो चुके थे पर 70 एमएम की स्क्रीन से भी जिसका कद बडा हो, उसकी एक झलक उसे पहचानने के लिए काफी होती है। भागने से पहले सलमान को सब पहचान चुके थे। सुबह होते-होते पूरी मुंबई में खबर फैल चुकी थी। सलमान खान के दामन पर एक और दाग लग चुका था, लेकिन हादसे के बाद से खुद सलमान गायब थे और गाड़ी का नंबर और चश्मदीद सलमान के खिलाफ चुगली खा चुके थे, लिहाज़ा सुबह-सुबह पुलिस सलमान के घर पहुंचती है। पर सलमान घर पर नहीं थे।
गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज
सलमान खान कानूनी खेल के लिए कुछ वक्त चाहते थे। इसीलिए वो गायब थे पर उन्हें पता था कि ज्यादा देर भागने से मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जमानत मिलने में दिक्कत आएगी, लिहाजा हादसे के करीब आठ घंटे बाद वो खुद सामने आते हैं और पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेती है। इसके बाद उन्हें जेजे अस्पातल ले जाया जाता है, जहां जांच के बाद ये साबित हो जाता है कि उन्होंने अल्कोहल लिया था। सलमान के खिलाफ पुलिस लापरवाही और खतरनाक ढंग से गाड़ी चलाने का मामला तो दर्ज कर लेती है, लेकिन गिरफ्तारी के कुछ देर बाद ही उन्हें महज 950 रुपए के जुर्माने के साथ जमानत पर रिहा कर देती है। सलमान की इतनी आसानी रिहाई का कुछ सामाजिक संगठन विरेध करते हैं और पांच अक्तूबर 2002 को अदालत पहुंच जाते हैं। वो अदालत में सलमान के खिलाफ एक जनहित याचिका दाखिल कर सलमान पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग करते हैं। अदालत न सिर्फ याचिका मंजूर कर लेती है बल्कि सात अक्तूबर 2002 को अदालती आदेश पर गैर इरादन हत्या के जुर्म में सलमान को गिरफ्तार कर लिया जाता है। सलमान जेल चले जाते हैं। पूरे 18 दिन जेल में रहते हैं। इस दौरान चार बार जमानत की अर्जी देते हैं, मगर चारों बार जमानत अर्जी खारिज हो जाती है, फिर 18 दिन बाद 24 अक्तूबर 2002 को सलमान को जमानत मिलती है और रिहा हो जाते हैं।
बॉडीगार्ड ने दिया झटका
मामला कोर्ट में चलता रहता है। इस दौरान केस में कई मोड़ आते हैं। सबसे पहले सलमान की तरफ से कहा जाता है कि उस रात वो गाड़ी चला ही नहीं रहे थे, बल्कि गाड़ी कोई और चला रहा था, फिर हादसे के चार साल बाद एक रोज अचानक केस का एक अहम गवाह अब्दुल्ला रऊफ शेख भी अपनी गवाही से पलट जाता है। अब्दुल्ला मामला का चश्मदीद था और हादसे में घायल हुआ था। शुरू में उसने पुलिस को कहा था कि उसने हादसे के बाद सलमान को गाड़ी की ड्राइविंग सीट से नीचे उतरता देखा था, मगर चार साल बाद 2006 में वो अदालत को बताता है कि उसने सलमान को मौके पर देखा ही नहीं था, लेकिन इस गवाही से सलमान को राहत मिलती उससे पहले ही खुद सलमान के पूर्व बॉडीगार्ड रवींद्र पाटिल ने सलमान को झटका दे दिया। रवींद्र पाटिल हादसे वाली रात सलमान के साथ उसी गाड़ी में मौजूद था। उसने अदालत को बताया कि उस रात सलमान नशे में चूर थे और उसके मना करने के बाद भी वही गाड़ी चला रहे थे, जबकि हादसे के शिकार बाकी कुछ गवाह भी गवाही पर कायम थे।
गुनाह साबित होने पर दस साल की जेल
अलग-अलग गवाहों और बयानों में उलझते-उलझते केस को 11 साल बीत गए और अब आखिरकार अदालत ने लापरवाही से गाड़ी चलाने की बजाए गैर इरादतन हत्या के तहत सलमान के खिलाफ मुकदमा चलाने का फैसला सुना दिया है। सलमान पर आईपीसी की धारा 304(2) के तहत गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया, वहीं धारा 279 के तहत नशे में ड्राइविंग और लापरवाही से गाड़ी चलाने का आरोप तय हुआ। जबकि धारा 337 और 338 के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का आरोप लगा। इसके अलावा धारा 427 के तहत भी आरोप लगाए गए। यानी आगे की डगर अब मुश्किल हो गई है। गुनाह साबित होने पर सलमान दस साल तक के लिए जेल जा सकते हैं। हालांकि, सलमान खान को इतनी राहत जरूर मिली कि अब उन्हें हर सुनवाई पर कोर्ट का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा, लेकिन अदालत ने ये भी साफ कर दिया है कि आगे जब भी जरूरत होगी, सलमान को बगैर किसी हील-हवाले के अदालत में आना होगा।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

 तीन गोली, एक मौत!



गुड़गांव के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की पत्नी की हत्या का रहस्य गहराता जा रहा है। कौन है गीतांजलि का कातिल? जज साहब या फिर कोई और? पुलिस तलाश रही है सुराग। वहीं, गीतांजलि के घर वालों ने जज और उनके परिजनों पर ही कत्ल का इल्जाम लगाया है और वजह बताई है बेटे की चाहत! क्या है गीतांजलि मर्डर मिस्ट्री का सच?


गुड़गांव के सीजेएम रवनीत गर्ग की पत्नी गीतांजलि की मौत की गुत्थी और उलझती जा रही है। मूल रु प से अंबाला की रहने वाली गीतांजलि ने बीकॉम कर रखा था और बेहद खुशमिजाज दिल की थी। करीब छह साल पहले 2007 में जज रवनीत गर्ग के साथ उसकी शादी हुई थी। उसी गीतांजलि की 17 जुलाई, 2013 को गुड़गांव पुलिस लाइंस के पास एक पार्क में रक्तरंजित लाश मिली, तो शहर में सनसनी फैल गई। पुलिस के तमाम आला अधिकारी मौके पर आ पहुंचे। शव के पास ही सीजेएम गर्ग का लाइसेंसी रिवॉल्वर पड़ा था। प्रथम दृष्टि में मामला आत्महत्या का लग रहा था। खुद जज साहब का भी यही नजरिया था, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आते ही सभी हैरान रह गए। गीतांजलि को एक नहीं,  तीन गोलियां लगी थीं और सिर पर भी किसी डंडे से वार किया गया था। सवाल उठता है, आत्महत्या करने वाला खुद को  तीन- तीन गोलियां कैसे मार सकता है? उसके सिर पर डंडा किसने मारा? जितने लोग, उतनी बात! जज साहब का भी बयान बदल गया- गीतांजलि की हत्या दो लोग कर सकते हैं, लेकिन वे दोनों कौन हैं? जज साहब के शक का आधार क्या है? इन तमाम बातों का खुलासा उन्होंने नहीं किया। रही बात पुलिस की, तो वह अब भी जज साहब को बुलाकर पूछताछ करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। अपराधी को सिखचों के पीछे पहुंचाने के लिए गीतांजलि के पिता और उनके अन्य नाते-रिश्तेदारों को ही आगे आना पड़ा।
20 जुलाई को गीतांजलि के भाई प्रदीप अग्रवाल, जीजा राजीव बंसल, अमित जिंदल और मामा राजकुमार अग्रवाल थाना सिविल लाइंस पहुंचे। शहर के तमाम लोग भी उनके साथ थे। सभी ने एकसाथ जज के खिलाफ नारे लगाते हुए हंगामा करना शुरू कर दिया- सीजेएम रवनीत बीवी का कातिल है! उसे गिरफ्तार करो! थाना प्रभारी इंस्पेक्टर नरेश कुमार के हाथ-पैर फूल गए। उन्होंने तत्काल मामले की सूचना पुलिस कमिश्नर आलोक मित्तल को दी। मित्तल ने गीतांजलि के भाई प्रदीप अग्रवाल से बात की। उसने बताया कि गीतांजलि की दो बेटियां हैं। एक पांच साल की और दूसरी दो साल की। रवनीत को बेटा चाहिए था। वह पत्नी पर लगातार तीसरे बच्चे के लिए दबाव डाल रहा था। जब नहीं मानी, तो उसकी हत्या कर दी गई। प्रदीप गीतांजलि की मौत के बाद उसकी बेटियों से मिलने उसके घर भी गया था, लेकिन रवनीत के घरवालों ने बच्चियों से मिलने नहीं दिया। मुलाकात हो जाती तो गीतांजलि की हत्या किसने और क्यों की, इसका शायद खुलासा हो जाता।
कमिश्नर आलोक मित्तल ने प्रदीप अग्रवाल की तहरीर के आधार पर सीजेएम रवनीत गर्ग और उसके माता-पिता केखिलाफ यह मामला 501/13 दर्ज करवा दिया। तफ्तीश सब इंस्पेक्टर राम अवतार को सौंप दी, लेकिन आरोपियों को गिरफ्तार करने को कौन कहे, पुलिस उनसे पूछताछ तक नहीं कर रही थी। पीड़ित परिवार समझ गया कि पुलिस दबाव में है। प्रदीप अग्रवाल पुलिस कमिश्नर आलोक मित्तल से दोबारा मिले। मित्तल ने मामले की जांच के लिए एसीपी अशोक बख्शी के नेतृत्व में एक एसआईटी टीम का गठन कर दिया। टीम में एसीपी पंखुड़ी कुमार, इंस्पेक्टर नरेश कुमार, सब इंस्पेक्टर जयपाल और सरोज बाला शामिल हैं। थाना सिविल लाइन पुलिस टीम का पूरा सहयोग कर रही है। मौके से मिले रिवाल्वर व कारतूस को सील कर पुलिस ने बैलेस्टिक एक्सपर्ट के सपुर्द कर दिया और गीतांजलि के हाथ से लिए गए गन पाउडर के सेंपल को जांच के लिए करनाल स्थित मधुबन लैब भेज दिया।
चश्मदीदों के मुताबिक, 17 जुलाई की शाम करीब चार बजे गीतांजलि को पड़ोसियों ने आखिरी बार देखा था। वह दोनों बेटियों को घर में छोड़कर बाहर निकली थी। सीजेएम साहब तब कोर्ट में थे। शाम करीब पांच बजे के बाद पार्क में टहलने आए एक चश्मदीद ने झाड़ी के करीब गीतांजलि को लहूलुहान पड़ी देखकर फौरन पुलिस को खबर दी। पुलिस लाइंस के अंदर ही कत्ल की खबर सुनकर खुद पुलिस वाले हैरान रह गए। चौंकाने वाली बात यह भी है कि कुरु क्षेत्र विश्वद्यिालय की एमबीए टॉपर गीतांजलि का गुड़गांव की जिस पुलिस लाइंस में कत्ल हुआ, वह शहर की सबसे ज्यादा महफूज जगह है। पुलिस लाइंस के अंदर एक तरफ परेड ग्राउंड है और दूसरी तरफ पुलिस और सरकारी अफसरों के मकान। गुड़गांव पुलिस कमिश्नर आलोक मित्तल भी यहीं रहते हैं पर कमाल है,  तीन-तीन गोलियां चलने के बाद भी किसी को फायर की आवाज सुनाई नहीं दी! लिहाजा पुलिस इस संभावना से भी इंकार नहीं कर रही कि कत्ल कहीं और हुआ हो और लाश बाद में लाकर यहां फेंक दी गई!
गीतांजलि के घर वालों का कहना है कि सीजेएम और उनके घरवाले कुछ दिनों से गीतांजलि को परेशान कर रहे थे। मौत से कुछ दिन पहले अपनी बहन से गीतांजलि ने तनाव में रहने की बात कही थी, लेकिन इस मामले में जज की ओर से अभी कोई बयान नहीं आया है। पुलिस बराबर मामले की निष्पक्ष जांच करने का भरोसा देती रही, लेकिन परजिनों को भरोसा नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा से मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है। इसके बाद इस मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम 21 जुलाई को एक बार फिर मौके पर गई और फॉरेंसिक जांच के लिए जरूरी वस्तुएं जुटाने में लगी रही। साथ ही देर रात तक कमिश्नर ऑफिस में इस मामले को लेकर पुलिस अधिकारियों की बैठक चलती रही। हाई प्रोफाइल मामला होने के कारण पुलिस फूंक-फूंककर कदम रख रही है।
गीतांजलि के कजिन रमन गुप्ता के मुताबिक, गीतांजलि की दोनों बेटियां गुड्डू और पूनम मौत के बारे में कुछ न कुछ राज की बात जानती हैं। उनको अपने पिता और मां के रिश्ते के बारे में अनसुनी बातों का पता है। इसी कारण उन्हें दोनों बेटियों से मिलने नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि गीतांजलि की हत्या में उसकी ससुरालवालों की मिलीभगत है, तभी तो गीतांजलि के अंतिम संस्कार के मौके पर ससुराल पक्ष की ओर से कुछ ही लोग आए थे। उनके मुताबिक सीजेएम रवनीत गर्ग और गीतांजलि की छह साल पहले हुई शादी के बाद घर में छोटे-मोटे झगड़े हुए थे। गीतांजलि के शरीर पर कई जगहों पर चोट के निशान भी पाए गए हैं। गीतांजलि के पिता ओम प्रकाश और रवनीत के पिता केके गर्ग 20 जुलाई की सुबह मनीमाजरा श्मशान घाट में फूल चुनने आए थे। ओम प्रकाश ने गर्ग से दोनों पोतियों से मिलने की इच्छा जताई। गर्ग ने कहा कि हरिद्वार से लौट आऊं, फिर बात करेंगे। ओम प्रकाश ने कहा कि दोनों बेटियों को कुछ न कुछ पता है, तभी उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा है।
ओम प्रकाश का कहना है कि गीतांजलि के शव के पास .32 बोर का रिवाल्वर पड़ा था, जो रवनीत गर्ग का लाइसेंसी रिवॉल्वर है। पुलिस इसे पहले खुदकुशी का केस मान रही थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद मामला रहस्मय हो गया। पुलिस की थ्योरी पर सवाल खड़े हो गए। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गीतांजलि के सीने, जांघ और गले के पास ठोढ़ी में गोली के जख्म मिले हैं। सीने और ठोढ़ी पर लगी गोली ने ही गीतांजलि की जान ले ली। उसके सिर पर पीछे की तरफ चोट के निशान भी हैं। डॉक्टरों के मुताबिक हो सकता है कि उस पर पीछे से वार किया गया हो। कुल मिलाकर गीतांजलि के कत्ल के बाद से ही गीतांजलि के घरवाले सीजेएम और उनके परिवार पर तमाम इल्जाम लगा रहे हैं, मगर सीजेएम के परिजनों ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। यह अलग बात है कि गीतांजलि मर्डर मिस्ट्री कई अनसुलझे सवालों में लिपटी हुई है। मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस कई कोणों से जांच कर रही है।

पुलिस कमिश्नर (गुड़गांव) आलोक मित्तल के मुताबिक, 21 जुलाई को पुलिस की एसआईटी टीम ने सीजेएम रवनीत गर्ग से गुड़गांव स्थित सिविल लाइन के उनके सरकारी आवास कोठी नंबर 10 में करीब चार घंटे तक उनसे पूछताछ की। उस समय गीतांजलि के परिजन भी मौजूद थे और गर्ग के कई रिश्तेदार भी।
सवाले थे- कत्ल के वक्त यानी शाम पांच से सात बजे के बीच जज साहब कहां और किसके साथ थे? इस दौरान उन्होंने फोन पर किससे-किससे बातें कीं? वह अपना रिवाल्वर कहां रखते थे? क्या गीतांजलि रोज रिवाल्वर लेकर टहलने जाती थी? बेटियों के होने से क्या वे नाखुश थे? क्या उन्होंने कभी गीतांजलि से बेटे की इच्छा जाहिर की थी? क्या इस बात को लेकर उन दोनों (पति-पत्नी) के बीच अक्सर अनबन बनी रहती थी? वे दो लोग कौन हैं, जिन पर जज साहब ने कत्ल का शक जाहिर किया है? उनकी गीतांजलि से क्या दुश्मनी हो सकती है? क्या गीतांजिल हर रोज अपना मोबाइल लेकर नहीं जाती थी? कत्ल के दिन उसका मोबाइल कहां था? रिवाल्वर हमेशा लोडेड रखते थे या फिर कारतूस घर में अलग रखते थे? क्या गीतांजलि ने कभी किसी से दुश्मनी का जिक्र  किया था? अदालत का कोई ऐसा फैसला, जिसके चलते रंजिशन किसी ने उनकी पत्नी की हत्या कर दी?
कुल मिलाकर अपनी कविताओं के जरिए नारी के हक और वजूद का सवाल उठाने वाली गीतांजलि की मौत सवालों के कफन में लिपटी है। उसकी हत्या पूरे परिवार के लिए जिंदगी भर का नासूर बन चुकी है। पुलिस गीतांजलि और रवनीत गर्ग दोनों के फोन कॉल्स डिटेल की जांच कर रही है। मुमिकन है कि फोन कॉल में ही छिपा हो इस वारदात के कातिल का राज। जबकि, गीतांजलि के परिवारवाले मान रहे हैं कि गीतांजलि की मौत के पीछे जज रवनीत का हाथ है, लेकिन जज का परिवार सिरे से इन आरोपों को खारिज कर रहा है। अब कत्ल का ये मामला थाने की दहलीज से निकलकर कोर्ट की चौखट पर जाने वाला है। इंसाफ की देवी तय करेंगी कि आधी आबादी को ताकतवर बनाने के दौर में इस गीतांजलि का कत्ल किसने किया और क्यों?
-जितेन्द्र बच्चन

बुधवार, 10 जुलाई 2013

फंदे में फंसा
करोड़पति कंपाउंडर












एक अदना-सा कंपाउंडर और करोड़ों की मिल्कियत! अपना अस्पताल! अजमेर से पाली और उदयपुर से जयपुर तक फैला है इसके जमीन का जाल! दर्जनों नर्सिंग कॉलेजों में है हिस्सेदारी। पूरे राज्य में चल रहा था करप्शन का नेटवर्क। कौन है यह कंपाउंडर? कैसे बना 200 करोड़ का मालिक? और कौन-कौन शामिल हैं उसके गिरोह में? 


                                                                   
एंटी करप्शन ब्यूरो ने सवाई मान सिंह अस्पताल जयपुर के एक कंपाउंडर महेश चंद्र शर्मा के घर छापा क्या मारा, जैसे कुबेर का खजाना खुल गया। अफसरों की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। नोट गिनते-गिनते हाथ थक गए और प्रॉपर्टी इतनी कि कोई धन्ना सेठ झक मारे। अपना अस्पताल, कई शहरों में रिसार्ट, दर्जनों नर्सिंग कॉलेजों में हिस्सेदारी और राजस्थान में करोड़ों का फार्महाउस। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने शर्मा को सलाहकार बना रखा था। इंडियन नर्सिंग काउंसिल (भारतीय नर्सिंग परिषद) का सदस्य भी था वह। इसी ओहदे और रुतबे की आंड़ में यह आरोपी नर्सिंग कॉलेजों से लाखों रुपये की उगाही करता था। दो महीने में 55 नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता को लेकर नोटिस दे चुका था। सीट बढ़वाने और उनकी गड़बड़ियां दबा देने के नाम पर 15 से 25 लाख रु पये तक लेता था। जो न देते, उनके यहां निरीक्षण के दौरान कमी निकालकर मान्यता रद करने की धमकी देता। 29 जून की रात भी अग्रवाल फार्म स्थित आरएजी अस्पताल में शर्मा एक नर्सिंग कॉलेज का आईएनसी की वेबसाइट पर नाम जुड़वाने और कॉलेज में दो कोर्स बढ़ाने के नाम पर पांच लाख रुपये की रिश्वत ले रहा था, तभी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की टीम ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया। उसके साथ उसके निजी सहयोगी राजेंद्र सैनी को भी गिरफ्तार किया गया है। तलाशी में ब्यूरो को महेश शर्मा और उसके परिवार के नाम से 200 करोड़ से अधिक की संपत्ति के दस्तावेज मिले हैं। ऐसे में सवाल उठता है, कौन है महेश चंद्र शर्मा? वह कंपाउंडर से दो सौ करोड़ का मालिक कैसे बन गया? क्या उसके गुनाह में नेता और मंत्री भी शामिल हैं? किन-किन अधिकारियों से इसकी साठ-गांठ है?
महेश चंद्र शर्मा (52) जयपुर के विद्युतनगर का रहने वाला है। यहां उसका 800 स्क्वेयर यार्ड में बंगला है। खुद शर्मा सवाई मान सिंह अस्पताल में सेकंड ग्रेड कंपाउंडर था। 1984-85 में उसे यह नौकरी मिली थी, लेकिन नौकरी कम, असर-रसूखदारों वालों से संपर्क बनाने में ज्यादा मशगूल रहता। एक झटके में लाखों-करोड़ों बटोर लेने का सपना था। 2003-2004 में आखिर शर्मा का फरेबी हुनर काम कर गया। एक नर्सिंग कॉलेज में असिस्टेंट लेक्चरर बन गया। तनख्वाह करीब 50 हजार हो गई। इसके बाद शर्मा नर्सिंग कॉलेजों के निरीक्षण आदि कार्यों से जुड़ गया। इसी दौरान उसकी मुलाकात इंडियन नर्सिंग काउंसिल के पदाधिकारियों से हुई। उन पर ऐसा जादू चलाया कि 2007 में इंडियन नर्सिंग काउंसिल ने उसे राजस्थान का आब्जर्वर बना दिया। इसके बाद 2008 में अच्छे काम के लिए शर्मा को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। हौंसले और बुलंद हो गए। 2011 तक आब्जर्वर पद पर बना रहा। फरवरी 2012 में महेश शर्मा ने वीआरएस के लिए आवेदन किया। नहीं मिला, तो उसने नौकरी पर आना ही बंद कर दिया। अब शर्मा राजस्थान के सभी नर्सिंग कॉलेजों को आईएनसी से एनओसी दिलाने का ठेका लेने लगा। अन्य काम भी वही करवाता। बदले में लाखों रुपये लेता। देखते ही देखते शर्मा की दलाली का धंधा चल निकला। दौलत का अंबार लगाता रहा। बाद में कानूनी शिकंजा कसने लगा, तो 2011 में शर्मा स्टेट आब्जर्वर के पद से हट गया, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। अलबत्ता शर्मा को स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपना सलाहकार जरूर बना दिया।
दरअसल, कॉलेज संचालक संस्था का गठन कर चिकित्सा विभाग ग्रुप-3 कार्यालय में विभिन्न कोर्स के लिए आवेदन करते थे। संस्था की फाइल राजस्थान नर्सिंग काउंसिल (आरएनसी) को जांच-पड़ताल के लिए भेजी जाती थी। महेश शर्मा संबंधित संस्था से संपर्क कर उन्हें एनओसी दिलाने का ठेका ले लेता। शर्मा ही आरएनसी के अधिकारियों की मिलीभगत से संस्थाओं के यहां निरीक्षण करने जाता और सारी रिपोर्ट संस्था के पक्ष में लगा देता। इन संस्थाओं में कई नेताओं और उच्च अधिकारियों के नर्सिंग कॉलेज भी शामिल हैं। शर्मा सारे नियम-कानून ताक पर रखकर संस्था की फाइल का सत्यापन कर देता और निरीक्षक फाइल को आरएनसी को सौंप देते। इसके बाद आरएनसी के अधिकारी संस्था की फाइल ग्रुप-3 दफ्तर भेज देते। वहां से कॉलेजों को कोर्स चलाने के लिए एनओसी जारी कर दी जाती। इसके बाद संस्था को आईएनसी से भी विभिन्न कोर्स के लिए एनओसी लेनी पड़ती थी। इसके लिए काउंसिल ने शर्मा को स्टेट आब्जर्वर बना रखा था। शर्मा की रिपोर्ट के आधार पर एनओसी जारी कर दी जाती थी, लेकिन जिस संस्था को कुछ दिन तक एनओसी नहीं मिलती थी, वह महेश शर्मा से संपर्क करती थी। शर्मा उनसे रिश्वत की रकम लेकर संबंधित संस्था को एनओसी देने के लिए आईएनसी को रिपोर्ट भेज देता। तत्पश्चात आईएनसी चेयरमैन उस संस्था को भी एनओसी जारी कर देते।
महेश शर्मा का यह गोरखधंधा कई साल से चल रहा था। बड़े अफसरों और सत्ता में बैठे नेताओं-मंत्रियों तक से उसकी साठगांठ थी। इसीलिए वह अभी तक बचता रहा। एसीबी के अधिकारियों की मानें, तो शर्मा की गिरफ्तारी के समय भी कुछ नेताओं के फोन आए थे। इनमें से कईयों के नर्सिंग कॉलेज चल रहे हैं। उनकी मान्यता से लेकर एनओसी रिन्यू कराने तक का सारा काम महेश शर्मा ही देखता रहा है। लेकिन एक न एक दिन तो इस मामले का पर्दाफाश होना ही था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की महानिरीक्षक स्मिता श्रीवास्तव के अनुसार, वीटी रोड निवासी डॉ. आरपी सैनी का जयपुर के अग्रवाल फार्म स्थित ज्ञानाराम जमनालाल नर्सिंग कॉलेज है। सैनी अपने कॉलेज का नाम आईएनसी की वेबसाइट पर जुड़वाना चाहते थे और दो कोर्स भी शुरू करवाने का इरादा था। इसके लिए महेश शर्मा उनसे 5 लाख रुपये मांग रहा था। डॉ. सैनी ने एसीबी से संपर्क किया। उनकी शिकायत थी कि 2008 से अब तक शर्मा उनसे एक करोड़ रुपये ले चुका है। फरवरी में वेबसाइट पर नाम जुड़वाया था, लेकिन मई में हटवा दिया। अब कॉलेज का नाम फिर से जुड़वाने के लिए पांच लाख रुपये की मांग कर रहा है। स्मिता श्रीवास्तव को यकीन नहीं आ रहा था। उन्होंने मामले की तहकीकात करने के लिए एक टीम बना दी।
योजना के अनुसार, डॉ. सैनी ने महेश चंद्र के मोबाइल पर फोन कर कहा, ‘हमारे पास पांच लाख रुपये की व्यवस्था हो गई है। आप शनिवार की शाम किसी भी समय आकर ले सकते हैं।’ शर्मा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई- तुम्हें तो देना ही था, बेटा! नहीं दोगे तो जाओगे कहां? और 29 जून की रात वह अग्रवाल फार्म स्थित आरएजी अस्पताल पहुंच गया, जहां पांच लाख रुपये लेते समय एसीबी टीम ने उसे रंगे हाथ दबोच लिया। लेकिन अभी इस मामले के कुछ अन्य आरोपियों और तमाम बरामदगी करनी बाकी थी, इसलिए 30 जून की सुबह महेश शर्मा को एसीबी ने अदालत में पेश कर पांच दिन की रिमांड पर ले लिया। उसी रोज महानिरीक्षक स्मिता श्रीवास्तव के आदेश पर इस मामले के तहत राज्य के 10 नर्सिंग कॉलेजों में भी छापे मारे गए। उदयपुर के कांग्रेस नेता पंकज शर्मा के नर्सिंग कॉलेज को ब्यूरो ने सीज कर दिया है।
महेश शर्मा ने तीन-चार महीने पहले अग्रवाल फार्म शिप्रापथ स्थित आरएजी अस्पताल को 22 करोड़ रुपये में खरीदा था। इसके अलावा जयपुर, अजमेर, पाली, उदयपुर सहित अन्य जगहों पर 25 नर्सिंग कॉलेजो में शर्मा की हिस्सेदारी है और छह नर्सिंग कॉलेज उसके खुद के हैं। इनमें से कई कॉलेजों में शर्मा की पत्नी भी हिस्सेदार है। 2 जुलाई को शर्मा के तीन बैंक लॉकरों को एसीबी ने खंगाला, तो करीब 40 लाख रुपये की ज्वेलरी मिली। इनमें से एसबीबीजे बैंक की सी स्कीम स्थित शाखा के लॉकर से टीम को करीब 15 लाख रुपये की ज्वेलरी मिली है। बाकी दो लॉकर आईसीआईसीआई बैंक की शाखाओं के हैं। एसीबी अधिकारियों के मुताबिक, शर्मा के कुल 12 बैंक खातों की जानकारी अब तक सामने आ चुकी है। सभी की जांच की जा रही है। वहीं, जो दस्तावेज बरामद हुए हैं, उनसे करोड़ों की संपत्ति का पता चला है। इनमें कई कॉलोनियों में प्लॉट, फ्लैट और पेट्रोल पंप शामिल हैं। डीआईजी पुरोहित के अनुसार, प्रदेश के जिन नर्सिंग कॉलेजों की रिपोर्ट निगेटिव थी, उन्हें भी काउंसिल ने एनओसी जारी कर दी। कोटा के दो और दौसा के एक कॉलेज का तीन बार निरीक्षण किया गया। हर बार टीम ने यहां की रिपोर्ट निगेटिव ही बताई। इसके बावजूद कॉलेजों को एनओसी जारी हुई है। जयपुर स्थित एक कॉलेज को बिना प्रोफेसर की नियुक्ति किए ही एमएससी नर्सिंग की मान्यता प्रदान कर दी गई। जोधपुर में दो कमरे में पूरा कॉलेज चल रहा था, तब भी उसे काउंसिल ने एनओसी दे रखी है। इसके अलावा शर्मा से एक डायरी और कुछ कागजात बरामद हुए हैं, जिनमें कई नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के नाम शामिल हैं।
इस गिरफ्तारी से इंडियन नर्सिंग काउंसिल के अंदर करप्शन का बड़ा रैकेट भी उजागर हुआ है। एसीबी के अधिकारी अगर दबाव में नहीं आए, तो कई सफेदपोश बेनकाब हो सकते हैं। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह का कहना है कि महेश के भारतीय नर्सिंग परिषद के अध्यक्ष टी दिलीप कुमार से नजदीकी रिश्ते होने का पता चला है। मामले की जांच डीआइजी जीएन पुरोहित कर रहे हैं। दरअसल, महेश भारतीय नर्सिंग परिषद का अध्यक्ष बनना चाहता था। इसके लिए वह लंबे समय से प्रयासरत रहा। पिछले दिनों शिमला में हुई परिषद की बैठक में शर्मा ने एक करोड़ रुपये खर्च किए, तब भी नहीं बना। दिलीप कुमार अध्यक्ष बन गए। शर्मा अब उनकी दलाली कर रहा था। ऐसे में दिलीप भी टीम के हत्थे चढ़ सकते हैं।

कहां-कहां कर रखे हैं निवेश
मानसरोवर में आरएजी हॉस्पिटल के अलावा महेश चंद शर्मा ने अपने पैसों को कई जगह निवेश कर रखा है। टोंक रोड पर एक नामी मोटर्स में साझेदारी है। कॉलोनाइजर व बिल्डर्स के साथ करोड़ों रु पये निवेश कर रखे हैं। जयपुर में इस्कॉन रोड स्थित गणेशनगर व पटेलनगर में कई प्लाट हैं और आगरा रोड पर प्रॉपर्टी कारोबारी राजेन्द्र सैनी के साझेदारी में पेट्रोल पंप व एक टाउनशिप भी है। कई बीघा जमीन भी ले रखी है। साथ ही प्रदेश के करीब 10 कॉलेजों में महेश की 50 फीसदी से अधिक की साझेदारी है या उसके खुद के हैं। इनमें से सूर्यांश स्कूल ऑफ नर्सिंग जयपुर, साकेत कॉलेज ऑफ नर्सिंग, पद्मश्री स्कूल ऑफ नर्सिंग, पूजा स्कूल ऑफ नर्सिंग, स्टार कॉलेज ऑफ नर्सिंग, आदि कॉलेज ऑफ नर्सिंग, मेवाड़ कॉलेज ऑफ नर्सिंग, रामी देवी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, इरशाद स्कूल ऑफ नर्सिंग, पिंकसिटी स्कूल एंड कॉलेज आफ नर्सिंग शामिल हैं। इसके अलावा प्रदेश की करीब 25 कॉलेज ऐसे हैं, जिनमें दस से लेकर 30 फीसदी तक शर्मा की साझेदारी है।

बुधवार, 3 जुलाई 2013

आत्महत्या के मामले में जबलपुर अव्वल



एक भयावह सच! एक अनचाही और अनपेक्षति मौत! हंसते-खेलते जीवन का त्रासद अंत। चौंकाने वाले आंकड़े और आंकड़ों से उठती चीख! जबलपुर में साल भर में 572 लोगों ने खत्म कर ली जिंदगी। 63 फीसदी का इजाफा! क्यों बढ़ रही है यहां खुद को खत्म करने की खौफनाक प्रवृत्ति?


जितेन्द्र बच्चन
-ओमती थाना के चौथा पुल स्थित माता गुजरी महाविद्यालय के छात्रावास में बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा जेसिका केल्स ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। इसी थाने के होटल अरिहंत में ठहरी युवती मनीषा दास (31) ने आत्महत्या कर लिया।
-मझौली थाना क्षेत्र में एक महिला ने दांत दर्द से निजात पाने के लिए आत्मदाह कर लिया।
-गढ़ा थाना क्षेत्र के बदनपुर निवासी महारानी लक्ष्मी कन्याशाला की 12वीं की छात्रा गायत्री कोल (17) ने खुद पर कैरोसिन डालकर आग लगा ली।
-साइंस कॉलेज के चौकीदार ने फांसी लगाकर जान दे दी।
-केंद्रीय कारागार जबलपुर में एक कैदी ने चादर को फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली।

ये घटनाएं रोंगटे खड़ी करने वाली हैं। फांसी, जहर, आग और भी न जाने क्या-क्या नए-पुराने तरीके जबलपुर में मौत को गले लगाने के लिए आजमाएं जा रहे हैं। खुदकुशी की खबरों की जिले में बाढ़-सी आ गई है। कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब कहीं न कहीं से आत्महत्या की खबर न मिलती हो। शहर ही नहीं, गांव और कस्बों में भी लोग अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली है। देश के 53 प्रमुख शहरों में आत्महत्या के मामले में जबलपुर सबसे आगे है। वर्ष 2012 में यहां 572 लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। जबकि 2011 में 351 लोगों ने आत्महत्या की थी। यानी 63 फीसदी का इजाफा। कारण आर्थिक तंगी, बीमारी, कर्ज का बढ़ता बोझ, एकल परिवार और हताशा है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन ये घटनाएं सोचने को मजबूर करती हैं कि कहीं हमारा सामाजिक ताना-बाना बिखर तो नहीं गया? क्या इनके लिए उम्मीद की छोटी-सी लौ भी नहीं बची थी कि इतने लोगों ने जिंदगी से इस तरह मुंह मोड़ लिया?

दरअसल, जीवन के बदले तौर-तरीकों ने भी बच्चों और युवाओं में सहनशीलता कम कर दी है। अभिभावकों ने कहीं जाने से रोका या कभी पैसे देने से इंकार कर दिया या फिर उनकी किसी मांग को पूरा करने में असमर्थता जताई, तो अक्सर ऐसे बच्चे गुस्से में आत्महत्या जैसे भयानक कदम उठा लेते हैं। इस मामले में प्रेमी भी पीछे नहीं रहते। प्रेमी या प्रेमिका ने ठुकरा दिया या धोखा दिया, तो इसका समाधान अक्सर वे जीवन से मुंह मोड़ने में ही पाते हैं। सोचने की बात तो यह है कि आत्महत्या एक इंसान की नहीं होती, बल्कि उसके साथ जुड़े परिवार की भी होती है जो जीते जी मर जाते हैं। मौत को गले लगाने से कोई समस्या नहीं सुलझती, बल्कि अचानक कुदरत का नियम तोड़ने से हो सकता है कि आप और आपका परिवार पहले से अधिक अंजानी और अजीब समस्याओं के भवरजाल में उलझ जाए। जरूरत है सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझते महिलाओं और बच्चों को एक सही दिशा की। क्योंकि कानून बनाना ही काफी नहीं, संवेदनशीलता का होना भी जरूरी है। 
विलुप्त हो रही सहनशक्ति
भारतीय मानस पहले इतना कमजोर कभी नहीं था, जितना अब दिखाई पड़ रहा है। कम सुविधा व सीमति संसाधन में भी संतोष और सुख से रहने का गुण इस देश की संस्कृति में रचा-बसा है। इसका सबसे बड़ा आधार हमारी आध्यात्मिकता रही है। आम भारतीय की सोच ईश्वर में विश्वास कर हर परिस्थिति में हिम्मत और धैर्य रखने की है। जैसे-जैसे लक्जरी ने जरूरतों का रूप धारण करना आरंभ किया है। आर्थिक उदारीकरण और टेक्नोलॉजी ने चारों दिशाओं में पंख पसारे हैं, वैसे-वैसे तेजी से एकसाथ सब कुछ हासिल करने की लालसा भी तीव्रतर हुई है। साधन और सुविधा पर सबका समान हक है, मगर उस हक को पाने में क्यों कुछ लोगों को सबकुछ दांव पर लगा देना पड़ता है और क्यों कुछ लोगों के लिए वह मात्र इशारों पर हाजिर है? जीवन स्तर की यह असमानता ही सोच और व्यक्तित्व को कुंठित बना रही है। जबकि सोच की दिशा यह होनी चाहिए कि मेहनत और लगन से सबकुछ हासिल करना संभव है, बशर्ते धैर्य बना रहे। लेकिन विडंबना यह है कि समय के साथ सहनशिक्त और समझदारी विलुप्त हो रही है। 
बेमानी लगते हैं नाते-रिश्ते
बदलते दौर में टीवी-संस्कृति ने परस्पर संवाद को कमतर किया है। परिणामस्वरूप माता-पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं बचा है। यह स्थिति दोनों तरफ है। आज का किशोर और युवा भी व्यस्तता से त्रस्त है। कंप्यूटर-टीवी ने खेल संस्कृति को डसा है। आउटडोर गेम्स के नाम पर बस क्रि केट बचा है। टीम भवना विकिसत करने वाले, शरीर में स्फूर्ति प्रदान करने वाले और खुशी-उत्साह बढ़ाने वाले खेल अब विलुप्त हो रहे हैं। यही वजह है कि न बाहरी रिश्तों में सुकून है न घर के रिश्तों में शांति। दोस्ती और संबंधों का सुगठित ताना-बाना अब उलझता नजर आ रहा है। कल तक जो संबल और सहारा हुआ करते थे, वे आज बोझ और बेमानी लगने लगे हैं।
अपने आपमें सिमटते युवा
देश की युवा शक्ति आज के हांफते-भागते दौर में अस्त-व्यस्त और त्रस्त है या फिर अपनी ही दुनिया में मस्त है। आत्मकेंद्रित युवा अपने सिवा किसी को देख ही नहीं रहा है। जब उसे पता ही नहीं है कि दुनिया में उससे अधिक दुखी और लाचार भी हैं, तो वह अपने दुख-तकलीफों को ही बहुत बड़ा मान लेता है। घर आने पर कोई उससे यह पूछने वाला नहीं है कि उसके भीतर क्या चल रहा है। हर कोई टीवी की तरह   अपनी दिनचर्या निर्धारित करने में लगा है। किसे फुरसत है अपने ही आसपास टूटते-बिखरते अपने ही घर के युवाओं को जानने-समझने की। उनकी भावनात्मक जरूरतों और वैचारिक दिशाओं की जांच-पड़ताल करने की? ऐसे में एक दिन जब वह आत्मघाती कदम उठा लेता है, तो पता चलता है कि ऊपर से शांत और समझदार दिखने वाला युवा भीतर कितना आंधी-तूफान लिए जी रहा था। वास्तव में माता-पिता को समय के साथ बदलना होगा। कब तक सारी की सारी अपेक्षाएं संतान से ही की जाती रहेंगी। ढेर सारे सामाजिक दबाव, सारी जिम्मेदारियां उसी की क्यों? सारे समझौते वही क्यों करें? दबाव की इस स्थिति को मां-बाप, निकट के रिश्तेदार और मित्र ही अगर चाहें, तो बड़ी कुशलता से निपटा सकते हैं।
जिंदगी से बड़ी कोई तकलीफ नहीं
समाधान कहीं और से नहीं हमारे ही भीतर से आएगा। खुद को खत्म कर देने की बात जब आती है, तो दूसरों को दोष देने में थोड़ा संकोच होता है। वास्तव में हम स्वयं ही हमारे लिए जिम्मेदार होते हैं। कोई भी दु:ख या तकलीफ जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा दौर आता है जब सबकुछ समाप्त-सा लगने लगता है, लेकिन इसका यही तो सार नहीं कि खुद ही खत्म हो जाएं। हर आत्महत्या करने वाले को एक बार, सिर्फ एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या उसकी जिंदगी सिर्फ उसी की है? इस जिंदगी पर कितने लोगों का कितना-कितना अधिकार है? क्या वह जानता है कि उसकी मौत के बाद उसका परिवार कितनी-कितनी बार मरेगा? जिस पर इतने सारे लोगों का हक है, उसे खत्म करने का हमें कोई हक नहीं है। वैसे भी रोशनी की एक महीन लकीर जब अंधेरे को चीर सकती है। एक तिनका डूबते का सहारा बन सकता है और एक आशा भरी मुस्कान निराशा के दलदल से बाहर निकाल सकती है, तो फिर भला मौत को वक्त से पहले क्यों बुलाया जाए? जिंदगी परीक्षा लेती है तो उसे लेने दीजिए, हौसलों से आप हर बाजी जीतने का दम रखते हैं, यह विश्वास हर मन में होना चाहिए।
10 हजार 861 किसानों ने लगाया मौत को गले
भाजपा के आठ साल के शासन में 10 हजार 861 से अधिक किसानों ने की खुदकुशी। देश के किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्य प्रदेश चौथे नंबर पर पहुंच गया है। किसी भी सरकार के लिए इससे अधिक शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता है कि उसके नागरिक राज्य की नीतियों के कारण आत्महत्या को मजबूर हों। मध्य प्रदेश की सरकार ‘थोथा चना बाजे घना’ की तर्ज पर राज कर रही है। राज्य अब दूसरा विदर्भ बनने के कगार पर है। मुख्य वजह किसानों की आर्थिक तंगी, कर्ज का बढ़ता बोझ और परिवार है। रोजगार के सीमित साधन,बढ़ती महंगाई,घटती आय लोगों का सुख-चैन छीन रहे हैं। ऐसे में बढ़ती महत्वकांक्षाएं, पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों के निर्वहन पर भारी साबित हो रही है। ये तमाम हालात व्यक्ति को तनाव व अवासादग्रस्त बनाते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में हर रोज 18 लोग आत्मघाती कदम उठा कर मौत को गले लगा रहे हैं। बीते साढेÞ चार माह में 2541 लोगों ने आत्महत्याएं की हैं, जिनमें 205 किसान व 95 खेतिहर मजदूर हैं। राज्य विधानसभा के मौजूदा पावस सत्र में कांग्रेस विधायक राम निवास रावत के सवाल के जवाब में गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने समाज की इस हकीकत का बयान करते हुए कहा कि एक मार्च 2012 से 15 जुलाई तक राज्य में 2541 लोगों ने आत्महत्याएं की हैं। इस तरह 135 दिनों में हर रोज औसतन 18 लोगों ने मौत को गले लगाया है। गृहमंत्री के जवाब के मुताबिक, इस अवधि में सागर जिले में सबसे ज्यादा 172 लोगों ने मौत को गले लगाया। दूसरे स्थान पर इंदौर है, जहां 158 लोगों ने जान दी। सतना में 153, भापाल में 130 और जबलपुर में 113 आत्महत्या के प्रकरण सामने आए हैं।
खतरनाक रूप से बढ़ रही इस नकारात्मकता ने अचानक सभी को चिंता में डाल दिया है। आखिर क्यों बढ़ रही है खुद को खत्म करने की यह खौफनाक प्रवृत्ति? क्यों होती जा रही है स्थिति विकराल? किसानों के मामले में समस्याएं बेहद स्पष्ट लेकिन ढेर सारी हैं। यूं तो परेशानी और पीड़ा की वजह गरीबी अपने आप में एक अहम वजह है, लेकिन आए दिन किसानों को फसल चौपट होने से लेकर कर्ज न चुका पाने जैसी भीषण दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कभी योजनाओं के नाम पर सरकारी छल-कपट के शिकार होते हैं किसान, तो कभी अनाज के खरीद-बिबिक्री में हुए घोटालों के कारण व्यथित होते हैं। ऐसे में उन्हें एक ही रास्ता आसान लगता है- मौत का।
मध्य प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रु पये का कर्ज है। वहीं प्रदेश में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या 32,11,000 है। म.प्र. के कर्जदार किसानों में 23 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि है और 4 हेक्टेयर भूमि वाले कृषकों पर 23,456 रु पये कर्ज चढ़ा हुआ है। कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश के 50 फीसदी से अधिक किसानों पर संस्थागत कर्ज चढ़ा हुआ है। किसानों के कर्ज का यह प्रतिशत सरकारी आंकड़ों के अनुसार है, जबकि किसान नाते-रिश्तेदारों, व्यवसायिक साहूकारों, व्यापारियों और नौकरीपेशा से भी कर्ज लेते हैं। इस आधार पर राज्य के 80 से 90 फीसदी किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि समर्थन मूल्य मूल उत्पादन की औसत लागत से 50 फीसदी अधिक होना चाहिए। प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के किसानों से 50 हजार रुपये कर्ज माफी का वादा किया था, लेकिन प्रदेश सरकार ने उसे भुला दिया। यदि समय रहते खेती-किसान दोनों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं और बढेंÞगी और मध्य प्रदेश भी विदर्भ की तरह मुंह ताकता रह जाएगा।

खुदकुशी पर सियासत नहीं होनी चाहिए 
आत्महत्या किसी की भी हो, तकलीफदेह होती है। यह एक प्रदेश की समस्या नहीं है। जापान, कोरिया सहित देश के अन्य प्रांतों में भी इस तरह की घटनाएं होती हैं। कुछ राज्यों में तो इसके आंकडेÞ यहां से ज्यादा हैं। इस विषय को राजनीतिक रूप देने की कोशिश की जा रही है, जो ठीक नहीं है। आत्महत्या के कारण मनोवैज्ञानिक होते हैं। उन्हें दूर करने के प्रयत्न किए जाएंगे।
-शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री

मुख्य कारण पारिवारिक कलह
जबलपुर में इधर हुई अधिकतर आत्महत्याओं की खास वजह पारिवारिक कलह रही है। दरअसल, संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। पति-पत्नी के बीच विवाद होने पर उनमें बीच-बचाव करने वाला कोई नहीं होता। कलह बढ़ते ही लोग खुदकुशी करने तक के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरा कारण एकल परिवार है, जिसके चलते लोग खुदकुशी करने को मजबूर हो जाते हैं।
-हरिनारायणचारी मिश्र, पुलिस अधीक्षक, जबलपुर

बुधवार, 19 जून 2013

मिली खाक में मोहब्बत


महविश ने मोहब्बत क्या की, जमाना दुश्मन बन गया। शौहर को गोलियों से भून डाला। ससुर को पेड़ से लटका कर मार डाला। जेठ जिंदा जल गया। सितम पर सितम होता रहा उस पर। कोई सामने नहीं आया। न परिवार, न समाज और न ही सरकार! आखिर प्यार करने की सजा कब तक भूगतेगी महविश? समाज के ठेकेदार उसे कब तक देते रहेंगे मोहब्बत की सजा? पहले कटघरे में परिवार और खाप पंचायत थी। अब पुलिस है!



जितेन्द्र बच्चन
उत्तर प्रदेश पुलिस का एक और कारनामा! बुलंदशहर कोतवाली के इंस्पेक्टर पर लगा महविश और उसके परिवार को आत्मदाह करने के लिए उकसाने का आरोप! वाकया 12 जून 2013 का है। शौहर के कातिलों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष कर रही महविश और उसके परिवार के सात सदस्यों ने पुलिस की मौजूदगी में मिट्टी का तेल छिड़ककर आत्मदाह करने की कोशिश की। महविश का जेठ यूसुफ 98 फीसदी जल गया। बाकी के सदस्य बचा लिए गए, लेकिन यूसुफ को डॉक्टर नहीं बचा पाए। दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में 14 जून को उसकी मौत हो गई। महविश और उसके परिवार का आरोप है कि थाना कोतवाली (देहात) बुलंदशहर के इंस्पेक्टर आरबी यादव ने परिजनों को धमकाते हुए महविश पर ही पति की हत्या का आरोप लगाया। यह इल्जाम महविश और उसके परिजन सह नहीं पाए। न्याय पाने की उम्मीद टूट गई, तो सामूहिक रूप से मौत को गले लगाना ही अच्छा समझा। इस पर इंस्पेक्टर को तरस नहीं आया। उसने यूसुफ को माचिस देते हुए कहा, ‘लो, लगा लो आग। तुम लोगों के मरने से ही पुलिस और सरकार को राहत मिलेगी।’

बड़ी दर्दनाक दास्तां है महविश की। करीब 11 साल की उम्र में पड़ोस के लड़के अब्दुल हकीम से दिल लगा बैठी। नादान थी, अल्हड़ बाला। उसे क्या पता था कि उसकी मोहब्बत का एक रोज यह जमाना दुश्मन बन जाएगा। छठीं में पढ़ती थी महविश और हकीम 8वीं क्लाश में था। प्यार का ढाई अक्षर कब उनके दिल में अंकुरित हो गया, पता ही नहीं चला। मन ही मन चाहने लगे दोनों एक-दूसरे को। कोई ऐसा लम्हा नहीं था जब महविश ने हकीम को महसूस न किया हो। एक रोज दिल की बात होंठों पर आ गई। महविश ने अपनी चाहत का इजहार कर दिया। हकीम ने भी धीरे से उसके अधरों को छूकर कबूल कर लिया। दोनों का इश्क परवान चढ़ने लगा, लेकिन महविश के वालिदानों को यह रिश्ता किसी कीमत पर मंजूर नहीं था। अम्मी ने तालीम बंद करवाकर बेटी को घर में कैद कर दिया। तब महविश आठवीं में थी। उसके इश्क पर पहरा बिठा दिया गया और प्यार पर तमाम बंदिशें लगाई जाने लगीं।

हकीम उन दिनों बुलंदशहर के एक इंटर कॉलेज में दाखिला ले चुका था। दोनों का मिलना-जुलना बंद हो गया। करीब पांच साल गुजर गए, लेकिन उनके दिलों की धड़कन एक-दूसरे के लिए जारी थी। अम्मी को भनक लगी, तो उनकी सलाह पर महविश की खाला के लड़के के साथ वालिदानों ने उसका रिश्ता पक्का कर दिया। महविश को तब पता चला, जब गली-मोहल्ले में भी शादी के कार्ड बंटने लगे। उसकी पेशानी पर बल पड़ गए। भवे तन गई, यह तो जोर-जर्बदस्ती है! हकीम से मिलने के लिए छटपटाने लगी महविश। शादी से चंद दिनों पहले 28 अक्टूबर 2010 की रात दो बजे बड़ी मुश्किल से उससे मिलने का मौका मिला। हकीम ने महविश को देखते ही अपनी बाहों में समेट लिया, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता महविश। मैं अपनी जान दे दूंगा या फिर तुम्हें कत्ल कर दूंगा।’ महविश का आंखें भर आर्इं, ‘नहीं हकीम, मोहब्बत में खून-कत्ल कायर करते हैं। चलो, यहां से कहीं दूर चलते हैं। हम अपना एक नया आशियाना बसाएंगे।’

और 29 अक्टूबर की रात साढ़े आठ बजे महविश और हकीम घर-गांव छोड़कर भाग गए। दोनों अलीगढ़ पहुंचे। वहां हकीम का एक दोस्त रहता था। उसकी मदद से 7 नवंबर, 2010 को दोनों ने अलीगढ़ में कोर्ट मैरिज कर ली। इसके बाद 15-20 रोज वहीं रहे, फिर रोजी-रोजगार की तलाश में मेरठ चले गए। वहां तालपुरी के एक मोहल्ले में 11 नवंबर को काजी ने महविश और हकीम का निकाह करवा दिया। अब सामाजिक तौर पर भी उन्हें पति-पत्नी की तरह जिंदगी गुजारने की इजाजत मिल गई थी। जिंदगी हसीन हो उठी, लेकिन नौकरी-चाकरी न मिलने के कारण परेशानी अभी कम न हुई थी। मेरठ में थोड़े दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद फरवरी 2011 में दोनों दिल्ली चले गए। वहां सीलमपुर इलाके में किराए पर एक छोटा-सा कमरा लेकर रहने लगे। पास में जो जमा-पूंजी थी, वह पहले ही खर्च हो चुकी थी। दो जून की रोटी के जुगाड़ में हकीम ने अपनी मोटरसाइकिल भी बेच दी। उसके बाद 100 रुपये रोजाना पर आॅटो चलाना शुरू किया।

उधर अड़ौली गांव में महविश की हकीकत का पता परिजनों को चला, तो पैरों तले से जमीन सरक गई। दोनों के घरवाले एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। 31 अक्टूबर को महविश की बारात आनी थी। नाते-रिश्तेदारों से घर भरने लगा। जाति-विरादरी के लोगों का भी आना-जाना बढ़ गया। अंत में शादी की भीड़ ने पंचायत का रुख अख्तियार कर लिया। महविश के घरवालों ने हकीम के परिवार पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। हकीम और उसके परिजनों के खिलाफ महविश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस हकीम को कुत्ते की तरह खोजने लगी। परेशान होकर महविश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली। उच्च न्यायालय ने बुलंदशहर पुलिस को महविश, उसके पति और परिवार को सुरक्षा देने का आदेश दिया, लेकिन पुलिस ने हाईकोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं की और इन दोनों को थाना कोतवाली से भगा दिया। इससे महविश के परिजनों के हौसले बुलंद हो गए। अड़ौली गांव के दो दर्जन लोगों ने पंचायत कर हकीम के पिता मोहम्मद लतीफ को पेड़ से उलटा लटका दिया और उन्हें खूब मारा-पीटा। उनकी मौत हो गई। इसके बाद खाप पंचायत ने फरमान जारी कर दिया कि हकीम को जो भी गोली से मारेगा, उसे 50 हजार रुपये का नकद इनाम दिया जाएगा। तब भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि पेड़ से लटकाने व मार-पीट के कारण हुई लतीफ की मौत को साधरण मौत बताकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

21 जुलाई, 2011 को महविश ने एक बेटी को जन्म दिया। उसका नाम मनतशा है। इसी दौरान हकीम के एक दोस्त ने उसे पहाड़गंज के एक एनजीओ ‘लव कमांडो’ के चेयरमैन संजय सचदेव से मिलवाया। महविश ने उन्हें सारी कहानी बताकर मदद की फरियाद की। सचदेव ने बुलंदशहर के तत्कालीन एसएसपी राजेश कुमार राठौर से बात की। राठौर ने थाना कोतवाली (देहात) पुलिस को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने का सख्त आदेश दिया। साथ ही खाप पंचायत के फरमान से लड़ने के लिए उस समय चल रहे अभीनेता आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ के पांचवें एपिसोड में महविश की कहानी बताकर उसकी सुरक्षा की मांग की गई।

14 जुलाई, 2012 को महविश बुलंदशहर के पुलिस अधीक्षक (देहात) विजय गौतम से मिली और शौहर तथा परिवार की सुरक्षा के लिए गुहार लगाई। महविश इसी दौरान दोबारा मां बनने वाली थी। पुलिस ने उसके साथ सहानुभूति दिखाई। हकीम को भी यकीन हो गया कि अब परिस्थितियां बदलेंगी। वह 18 जुलाई को महविश को लेकर घर (भाटगढ़ी) लौट आया। उस समय तक हकीम कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियरिंग का कोर्स कर दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा था, इसलिए महविश को घर छोड़कर वह फिर दिल्ली चला गया। बाद में नवंबर 2012 में आया।

22 नवंबर की शाम चार बजे महविश के सिर में दर्द हो रहा था। हकीम उसे घर के पास ही एक डॉक्टर के यहां ले गया। वहां से दवा लेकर दोनों जैसे ही बाहर निकले, आधा दर्जन लोगों ने हकीम को घेरकर उस पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। उसकी मौके पर ही मौत हो गई। महविश कुछ नहीं कर सकी। जिसे इतना चाहा, उसे अपने ही परिवार को लोग भून डालेंगे, उसने सपने में भी नहीं सोचा था। पुलिस ने भी कोई सुनवाई नहीं की। अपनी और हकीम की सुरक्षा के लिए वह कुल 48 अर्जियां दे चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अंत में हकीम की हत्या कर दी गई। महविश की तहरीर पर थाना कोतवाली (देहात) के तत्कालीन कोतवाल राकेश कुमार ने हत्या के इस मामले को पांच आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाकर घटना की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गुलाब सिंह को दी। उनके निर्देश पर दो टीमें बनाई गर्इं और पुलिस ने तीन आरोपियों गुल्लू, आसिफ और सरवर को गिरफ्तार कर लिया।

आॅनर किलिंग के इस मामले की गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ी। नेताओं और महिला संगठनों की महविश की ससुराल में आने-जाने का दौर शुरू हो गया। दो अभिनेताओं ने आर्थिक मदद देने की घोषणा की। कुछ बड़े नेता जो झोझा समाज से ताल्लुक रखते हैं, वे भी सहानुभूति जताने लगे। मुख्यमंत्री की ओर से पांच लाख रुपये की मदद दी गई। साथ ही कुछ अन्य मदद की घोषणा महविश के बच्चों के भविष्य को देखते हुए की गई। यह अलग बात है कि वक्त के साथ वे सारी घोषणाएं भी ठंडे बस्ते में चली गर्इं। सरकार ने महविश को आवास, गैस एजेंसी, सरकारी पट्टे की जमीन और उसके परिवार की सुरक्षा के लिए हथियार के लाइसेंस देने की घोषणा भी की थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। पुलिस जरूर जांच करने के नाम पर परेशान करती रहती है। ताजा घटनाक्रम भी उसी का एक हिस्सा है।

9 जून, 2013 को महविश के शौहर अब्दुल हकीम के कथित हत्यारोपी गुल्लू की मां ने अपनी आठ साल की बेटी की पिटाई को लेकर थाना कोतवाली देहात में महविश, उसके जेठ यूसुफ समेत 6 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। यूसुफ को पता चला, तो उसने 12 मई को एसपी (सिटी) से मुलाकात कर थाना कोतवाली (देहात) के इंस्पेक्टर आरबी यादव की उनसे शिकायत की, ‘कोतवाल यादव आरोपियों के साथ मिलकर जबरन एक साजिश रच रहे हैं...।’ एसपी ने इंस्पेक्टर यादव को बुलाकर इस मामले में झाड़ लगाई। महविश के मुताबिक, एसपी की फटकार से इंस्पेक्टर यादव का पारा आसमान छूने लगा। वह पुलिस बल के साथ महविश के घर जा धमके। वहां उन्होंने काफी गाली-गलौज की। साथ आए पुलिसकर्मियों का गुस्सा उनसे भी ज्यादा नजर आ रहा था। धमकाते हुए कहा,‘पुलिस से उलझने की कोशिश मत करो, वरना दो-चार ऐसे मामले लाद (फर्जी मामले में फंसा) दूंगा कि जमानत के लिए तरस जाओगे। पूरा परिवार जेल में सड़ता नजर आएगा।’ महविश पुलिसवालों का फरेब सुनकर सन्न रह गई। यूसुफ ने हाथ जोड़कर कहा, ‘देखिए साहब, हमें धमकाने की कोशिश मत करिए। आप लोग भी कानून से ऊपर नहीं हैं। हमें न्याय नहीं मिलेगा तो हम आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन सितम पर सितम अब नहीं सहेंगे।’

इंस्पेक्टर यादव तिलमिला उठे। बताया जाता है, उन्होंने जीप से माचिस निकाली और यूसुफ के ऊपर फेंकते हुए कहा, ‘जान देना इतना आसान नहीं है। ये लो माचिस, लगा लो आग! है हिम्मत... मर जाओगे तो जान छूटेगी।’ और वे चले गए, लेकिन महविश और उसके परिवार को खुदकुशी के लिए उकसा गया। थोड़ी देर बाद ही महविश और उसके परिवार के सात अन्य लोगों ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाल लिया। यूसुफ के हाथ में माचिस थी, उसने खुद को आग के हवाले कर दिया। वह धू-धूकर जलने लगा। पूरे गांव में हड़कंप मच गया। महविश और उसकी बेटियों को बड़ी मुश्किल से बचाया गया, लेकिन यूसुफ 98 फीसदी जल चुका है। वह दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। पहले हकीम और अब यूसुफ की इस हालत पर महविश और उसका पूरा परिवार दहशत में है। महविश ने कोतवाल आरबी यादव को बर्खास्तग करने और एक स्थानीय नेता अमजद अली गुड्डू के खिलाफ इस मामले में कार्रवाई रकने की मांग की है।
वहीं, भटगढ़ी में एक बार फिर से अधिकारियों और नेताओं के आने-जाने का दौर शुरू हो गया है। ठीक वैसा ही नजारा बनता जा रहा है, जैसा साढ़े छह महीना पहले हाकिम की हत्या के बाद बना था। इधर जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ रहा है, मीडिया की मौजूदगी भी बढ़ती जा रही है। 14 जून, 2013 को पुलिस अधीक्षक (नगर) अजय साहनी और एएसपी वैभव कृष्ण भटगढ़ी पहुंचे और पीड़ित परिवार से मिले। पुलिस अधिकारियों ने महविश से मुलाकात कर उसे भरोसा दिलाया कि पुलिस उनके साथ कुछ भी गलत नहीं होने देगी।

जारी है जिंदगी की जद्दोजहद
मेरे शौहर हकीम की हत्या का कारण हम दोनों की विरादरी रही है। मैं बुलंदशहर की झोझा विरादरी से ताल्लुक रखती हूं मेरे पति की विरादरी अल्वी (फकीर) है। मुस्लिम समाज में अल्वी विरादरी को झोझा विरादरी से कमतर आंका जाता है। चूंकि मैं झोझा विरादरी से ताल्लुक रखती थी और अल्वी विरादरी के लड़के के साथ भागकर निकाह कर लिया था, इसलिए मेरे पति को मौत के घाट उतार दिया गया। मेरा प्यार जरूर छीन लिया गया, लेकिन उसी प्यार के सहारे मैं अपनी दोनों बेटियों मनतशा और जोया के साथ जिंदगी जीने की जद्दोजहद कर रही हूं। गांव भटगढ़ी में कोई स्कूल नहीं है। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर मैं अपना खर्च चलाती हूं और बच्चों को शिक्षित भी कर रही हूं। यदि मुझे न्याय नहीं मिला, तो मैं प्रदेश सरकार द्वारा प्रदान की गई आर्थिक मदद लौटाने पर विचार कर सकती हूं।
-महविश (अब्दुल हकीम की बेवा)

एसएसपी से मांगी रिपोर्ट
मुझे घटना की जानकारी मिल गई है। एसएसपी से तत्काल रिपोर्ट मांगी गई है। देहात कोतवाली प्र•ाारी के आचरण की जांच की जाएगी और दोषी पाए जाने पर निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी।
-भवेश कुमार सिंह, आईजी, मेरठ जोन

परिजनों पर दर्ज होगा मामला?
घटनाक्रम के अुनसार इंस्पेक्टर आरबी यादव हत्यारोपी की शिकायत के एक मामले की जांच-पड़ताल करने महविश के घर गए, तो महविश और उसके जेठ यूसुफ ने इंस्पेक्टर से उल्टे अभद्रता की और इसके बाद परिवार के लोगों ने आत्मदाह करने की कोशिश की। इस पूरे प्रकरण की जांच चल रही है। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए चाहे आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज करना पड़े या फिर अंटेप्ट-टू-सुसाइड की रिपोर्ट लिखनी पड़े।
-गुलाब सिंह, एसएसपी, बुलंदशहर

गुरुवार, 6 जून 2013

भैया राजा को उम्रकैद


बुंदेलखंड का बाहुबली और इलाके में आतंक का पर्याय रहे रतनगढ़ी के भैया राजा पर 38 से ज्यादा संगीन आरोप हैं! उनमें से एक फैशन डिजाइनर वसुंधरा हत्याकांड में अदालत ने पवई के पूर्व विधायक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कौन है भैया राजा? क्या है उसके पापों की काली कहानी?


नब्बे के दशक में बुंदेलखंड में अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा की तूती बोलती थी। उन दिनों वह पवई विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहा था। चुनाव चिह्न हाथी था। भैया ने नारा दिया था- ‘मोहर लगेगी हाथी पर, नहीं तो गोली चलेगी छाती पर! लाश मिलेगी घाटी पर!’ बड़े-बड़े तुर्रम खां भैया राजा के नाम से कांपते थे। जिसने की हुक्मअदूली, उसे खिला दिया जिंदा मगरमच्छों को। चुनाव में जीत हुई। अकूत धन-संपदा के मालिक तो हैं ही, विधायक बनते ही इलाके में सरकार भी अपनी चलने लगी। पुलिस दारोगा की बात छोड़िए, केंद्र और राज्य के मंत्रियों में दम नहीं होता था कि भैया राजा के मुंह से निकली बात को पलट दें। कर्नल हो कैप्टन, हर कोई उसके खिलाफ जाने में सौ बार सोचता। रियासत नहीं रही तो क्या हुआ, राजाओं और नवाबों वाला रुतबा तो बरकरार ही था। उनकी हैसियत की समाजवादी पार्टी के मुखिया भी कायल रहे। 1993 में पवई (जिला पन्ना) से भैया राजा सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और विजयी रहे। उनकी पत्नी आशा रानी सिंह छतरपुर जिले के बिजावर विधासभा सीट से भाजपा की विधायक हैं, लेकिन कानून और अदालत के आगे किसी की नहीं चलती। कहावत भी है, देर से ही सही पर अत्याचार का अंत जरूर होता है। 30 मई को छतरपुर जिला के नवम अपर सत्र न्यायाधीश संजीव कालगांवकर ने इस बाहुबली और पूर्व विधायक भैया राजा को वसुंधरा हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। छतरपुर जिले के गहरवार में बनी भैया राजा की रतनगढ़ी हवेली में अब सन्नाटा पसर चुका है और परिजन मायूस हैं।

भैया राजा पर फैशन डिजाइनर व अपनी ही नातिन वसुंधरा का यौन-शोषण और उसकी हत्या करने का आरोप था। पुलिस ने इस मामले में कुल 36 गवाह अदालत में पेश किए। अदालत ने अपने 124 पृष्ठों के फैसले में भैया राजा, भूपेंद्र सिंह उर्फ हल्के, राम किशन उर्फ छोटू लोधी, अभमन्यु उर्फ अब्बू और पंकज शुक्ला उर्फ मरतंड शुक्ला को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद के साथ पांच-पांच सौ रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। जबकि इसी मामले की एक अन्य आरोपी रोहणी शुक्ला उर्फ रंपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
वसुंधरा उर्फ निशि बुंदेला (20) उन दिनों भोपाल में रहकर फैशन डिजायनिंग की पढ़ाई पूरी कर रही थी। भैया राजा के रिश्ते में वह उसकी भाजी लगती थी। उसी लिहाज से जब भी भैया राजा भोपाल जाते, वसुंधरा से जरूर मिलते। ऐसे में ही कहते हैं कि एक रोज उनकी नजर उस पर खराब हो गई। उसने वसुंधरा को तरह-तरह के उपहार आदि देकर उसे जल्द ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कभी-कभी छुट्टियों में अब वसुंधरा भी भैया राजा की छतरपुर वाली हवेली में आने लगी थी। मौका देखकर एक रोज वह शैतान बन गया। उसने अपनी भाजी को ही खराब कर डाला। न उम्र की परवाह की और न ही मान-मर्यादा के बारे में सोचा। भाजी के साथ भैया राजा के अवैध संबंधों का सिलसिला चल पड़ा। जब भी मौका मिलता, वह दबोच लेते। बेचारी लाज-भयवश किसी से कुछ कह नहीं पा रही थी। इसका भी भैया राजा ने बहुत फायदा उठाया। होश तब उड़ गए, जब एक रोज पता चला कि वसुंधरा गर्भवती है।

भैया राजा ने वसुंधरा से अबॉर्शन कराने को कहा, तो वह तिलमिला उठी, ‘कभी नहीं! तुमने जो पाप किया है, उसे अब मैं पूरी दुनिया के सामने लाकर रहुंगी। तुम्हारी यह झूठी आन-बान और शान मैं मिट्टी में मिला दूंगी। मैं तुम्हें समाज के सामने नंगा कर दूंगी।’ वसुंधरा का गुस्सा देखकर भैया राजा के पैरों तले से जमीन सरक गई। वह समझ गया कि अगर अभी इसका इलाज नहीं किया गया, तो वह वाकई बदनाम हो जाएगा। उसने जबरन वसुंधरा का गर्भवती करवा दिया, फिर उसकी हत्या की साजिश रचनी शुरू कर दी। भैया राजा के इस खूनी खेल में भूपेंद्र उर्फ हल्के, पंकज शुक्ला, राम किशन उर्फ छोटू, रंपी उर्फ रोहिणी और अ•िामन्यु शामिल थे। भूपेंद्र, अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा का जीप चालक था। रोहिणी भैया राजा के दत्तक पुत्र राम अवतार की बेटी है और वसुंधरा की सहेली थी। पंकज शुक्ला रोहिणी का पति है और अभिमन्यु भाई।
वसुंधरा को भैया राजा के इस संगीन षड्यंत्र की भनक तक नहीं लगी। योजना के अनुसार 10 दिसंबर, 2009 को रोहिणी भोपाल गई। वसुंधरा को फोन कर शॉपिंग करने के बहाने 10 नंबर मार्केट में बुलाया। वहां कुछ देर दोनों सहेलियां बाजार में घूमती-फिरती रहीं, फिर उसे बहला-फुसलाकर रोहिणी छतरपुर ले आई। यहां से वसुंधरा को रतनगढ़ी कोठी में पहुंचा दिया गया। पर कटे पंक्षी को फड़फड़ाते देखकर भैया राजा के होंठों पर मुस्कान फैल गई। उसके एक इशारे पर ड्राइवर भूपेंद्र ने उन्हीं की पिस्टल से वसुंधरा को गोली मार दी। बेचारी तड़पकर ठंडी पड़ गई, फिर सभी ने मिलकर वसुंधरा की रक्तरंजित लाश जीप में डाली और ठिकाने लगाने के लिए रात के अंधेरे में निकल पड़े।

11 दिसंबर की सुबह थाना मिसरोद पुलिस को किसी ने फोन कर सूचना दी कि गुदरी घाट स्थित रतन सिंह रोड के किनारे झाड़ियों के पास एक युवती का शव पड़ा है। पुलिस ने उसे बरामद कर शिनाख्त करवाई, तो हड़कंप मच गया। वह लाश निशि उर्फ वसुंधरा की थी। पुलिस की सूचना पर वसुंधरा के पिता मृगेंन्द्र सिंह और मां भारती भी आ गए, लेकिन यह कत्ल किसने और कहां किया? कातिल कौन है? उसका मकसद क्या था आदि के संबंध में पुलिस को कोई सुराग नहीं लगा। सभी हैरान-परेशान थे। पोस्टमार्टम के बाद वसुंधरा के अंतिम संस्कार के समय भी उसकी मां भारती इसी उधेड़बुन में लगी रही कि कातिल का चेहरा कैसे बेनकाब हो। उन्हें रोती-विलखती देखकर रोहिणी के भाई अभिमन्यु से नहीं रहा गया। उसने उनके कान में बता दिया कि भूपेंद्र ने अपने आका के कहने पर वसुंधरा को गोली मारी थी। इतना सुबूत बहुत था। पुलिस ने गहन छानबीन के बाद 20 दिसंबर को भैया राजा और इस कत्ल की साजिश में शामिल अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद वसुंधरा हत्या कांड का राज फाश होते देर नहीं लगी।

भैया राजा और अन्य आरोपियों ने लाख कोशिश की, लेकिन जमानत नहीं हुई। भैया राजा ने हाई कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया, तब भी सीखचों से बाहर नहीं आ सका। दरअसल, भैया राजा के गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। उस पर तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह के भतीजे सिद्धार्थ राव की हत्या करने का भी आरोप है। इस घटना को नैनीताल में अकबर अहमद डम्पी के बंगले में अंजाम दिया गया था। भैया राजा इस मामले में कई साल उत्तर प्रदेश की जेल में बंद भी रहा। उसी दौरान एमपी की सुंदर लाल पटवा सरकार ने भैया राजा की झील को नेस्तनाबूद कर दिया था। बताया जाता है कि भैया राजा अपने दुश्मनों को अपनी झील में फेंक देता था। उसमें मगरमच्छ पाल रखे थे, जो मिनटों में जिंदा आदमी की हड्डियां तक चट कर जाते थे। इसी वजह से तत्कालीन सुंदर लाल पटवा सरकार को उसकी झील को नेस्तनाबूद करना पड़ा था। इसके बाद मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती बनीं, तो उनके आदेश पर भी भैया राजा की झील और बंगले पर पुलिस अधिकारियों ने बड़ी कार्रवाई की थी। अपराध के आरोपों के मामले में भैया राजा की पत्नी और भाजपा विधायक आशा रानी सिंह भी पीछे नहीं हैं। उन पर अपनी नौकरानी तिज्जी बाई को मई 2007 में आत्महत्या के लिए विवश करने का आरोप है, जिसके चलते वह महीनों जेल में भी बंद रही हैं। अब जमानत पर हैं।

लेकिन भैया राजा एक ऐसा शातिर रहा है, जिसे गिरफ्तार करने में बड़े-बड़े पुलिस अफसर भी कांप जाते थे। दर्जनों अपराधों का इल्जाम है उस पर, किंतु कोई टीआई अपने थाने में उसकी फोटो गुंडा लिस्ट में लगाने की हिम्मत नहीं कर सका था। इसी मामले की विवेचना में लगे टीआई भूपेंद्र सिंह का अब तबादला हो चुका है, तब भी वह अदालत में भैया राजा के खिलाफ कुछ खास नहीं बोले। 18 मार्च 2010 को इस मामले की चार्जशीट पुलिस ने अदालत में पेश की थी। घटना के करीब चार साल बाद अदालत ने मामले का अब फैसला सुनाते हुए कहा है कि भैया राजा ने छतरपुर जिला स्थित रतनगढ़ी में वसुंधरा की हत्या की साजिश रची थी। उसकी लाश ठिकाने लगाने के लिए एक बोलेरो जीप का इस्तेमाल किया गया था। जीप से न केवल वसुंधरा के कानों के टाप्स बरामद हुए बल्किउसकी सीट के नीचे से कई और भी सुबूत मिले हैं। इस मामले के सभी आरोपियों को दोषसिद्ध होने के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है।

रतनगढ़ी हवेली में पसरा सन्नाटा
30 मई को अदालत का फैसला आने के बाद भैया राजा की रतनगढ़ी वाली हवेली में सन्नाटा पसर गया। जबकि छतरपुर अदालत परिसर छावनी में तब्दील हो चुका था। सुरक्षा-व्यवस्था के मद्देनजर यहां तीन सीएसपी और पांच थाना प्र•ाारियों के अलावा सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। फैसला सुनने के बाद विधायक आशा रानी सिंह बहुत मयूस दिखीं। बेटी रश्मि, दीप्ति और कंचन ने उन्हें सहारा दे रखा था। मां और तीनों बेटियों की आंखें भर आई थीं। दोनों बेटे भी अदालत में मौजूद थे, लेकिन सभी के चेहरे उतरे हुए थे। उप संचालक अभियोजन राजेश रायकवार ने बताया कि अभियोजन पक्ष इस मामले में आरोपी रंपी उर्फ रोहिणी को सजा दिलाने के लिए भी हाई कोर्ट में अपील करेगा।

उसके पाप की सजा कम
वसुंधरा के पिता मृगेंद्र सिंह का कहना है कि भैया राजा की साजिश ये थी कि वसुंधरा की लाश कलियासोत में फेंक दी जाए, ताकि उसकी शिनाख्त न हो सके। लेकिन आरोपी रास्ता •ाूल गए और सुबह होने के फेर में वे गुडारी घाट के पास झाड़ियों में लाश फेंक गए। वहीं मां भारती ने बताया कि हत्या से ठीक पांच दिन पहले उन्हें पता चला था कि भैया राजा मेरी बेटी का देह-शोषण करता रहा है। एक बार इंदौर ले जाकर उसका गर्भवती भी करवाया था, फिर जब उसे डर लगने लगा कि वसुंधरा उसे बेनकाब कर देगी, तो बदनामी के डर से भैया राजा ने उसकी हत्या करवा दी। उसने जो पाप किया है, उसके लिए उम्रकैद की सजा बहुत कम है।
-जितेन्द्र बच्चन

शनिवार, 1 जून 2013

                             शातिर हसीना

साउथ की मशहूर अदाकारा ने जिस्म को बनाया तरक्की का जरिया। एक साल में देश को लगा चुकी है कई सौ करोड़ का चूना। उसकी मादक अदाओं पर लिव-इन पार्टनर भी झाड़ता था रोब। लाल बत्ती लगी गाड़ी में बैठकर खुद को बताता था आईएएस। आलीशान कारों का जखीरा और 81 महंगी घड़ियां बरामद। कौन है यह अय्याश अभिनेत्री? क्या है उसके फरेब का फन?


एक हसीना, तो दूसरा शैतान! एक हीरोइन, तो दूसरा ठगी का कप्तान! एक के पास दिलकश अंदाज, तो दूसरा सबसे बड़ा दगाबाज़! बस फिर क्या था मिल बैठे दो यार और बन गई जोड़ी 420! इनके चक्कर में जो भी आया, बर्बाद ही हुआ! बात हो रही है साउथ की हीरोइन लीना मारिया और उसके बॉयफ्रेंड बालाजी उर्फ चंद्रशेखर रेड्डी की। फाइव स्टार में रहना बालाजी का शौक था, तो करोड़ों की गाड़ियों में घूमना लीना का शौक! यही शौक दोनों को करीब ले आई, क्योंकि शौक बड़ी चीज है... और बड़ी चीजें दोनों बुरी चीजों से पूरी कर रहे थे। एक छलावा, तो दूसरी मायाजाल। एक फरेबी, तो दूसरी धोखेबाज। एक अपनी बातों से लूट लेता, तो दूसरी अपनी अदाओं से। दोनों ने दिमाग और हुस्न का ऐसा खतरनाक कॉकटेल तैयार किया कि लोग अपनी मर्जी से इनकी झोली में करोड़ों डालते चले गए। दोनों ने मिलकर आधे साउथ इंडिया के न मालूम कितने अमीरों को गरीबी के मुहाने पर पहुंचा दिया।

पुलिस के मुताबिक बेंगलुरु में बालाजी के खिलाफ जालसाजी और ठगी के कई मामले दर्ज हैं। वह सरकारी अधिकारी बनकर कई लोगों को अपने जाल में फंसाकर उन्हें लूट चुका है। बालाजी बड़े ही शातिराना तरीके से लोगों को अपना शिकार बनाता था। आईएएस या बड़ा सरकारी अफसर बनकर  लोगों से मिलता और फिर किसी सरकारी प्लान का सपना दिखाकर उसे एक बैंक अकाउंट नंबर देता। जब उसका शिकार उस बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर देता, तो वह अकाउंट से पैसे निकालकर वहां से रफ्फूचक्कर हो जाता। एक बार जेल भी जा चुका है, लेकिन तब भी बालाजी नहीं सुधरा। बस अपना ठिकाना बदल लेता। चेन्नई में बालाजी की मुलाकात दुबई से आई लीना मारिया पॉल से हुई। महंगी गाड़ियों में घूमना, महंगे कपड़े पहनना और फाइव स्टार रहन-सहन जल्दी ही मारिया को बालाजी के करीब ले आई। दोनों में प्यार हो गया। चेन्नई में मारिया को बालाजी की मदद से कई फिल्मों में हीरोइन का लीड रोल मिला और वह देखते ही देखते टॉलीवुड में मशहूर हो गई। साथ वक्त गुजारने के दौरान ही मारिया को पता चला कि बालाजी की सारी कमाई का जरिया धोखाधड़ी है। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला बालाजी खुद को आईएएस अफसर बताकर नए-नए प्रोजेक्ट पास कराने को लेकर आम बिजनेसमैन से पैसे लेता या फिर बैंक से लोन। पैसा हाथ आते ही वह गायब हो जाता। बाद में इस काम के लिए उसने मारिया को अपना पार्टनर बना लिया और उसकी मदद से चेन्नई की केनरा बैंक से 19 करोड़ 47 लाख की जालसाजी की और चेन्नई छोड़कर दोनों दिल्ली आ गए।

लीना मारिया पॉल (25) मूलत: कोच्चि केरल की रहने वाली है और बीडीएस से स्नातक है यानी दांतों का डॉक्टर बनने की पढ़ाई पूरी कर रखी है। लीना के पिता इंजीनियर हैं और पूरे परिवार के साथ दुबई में ही रहते हैं। लीना दुबई में ही पली-बढ़ी और 2011 में शिक्षा पूरी करने के बाद चेन्नई आ गई। यहां  हुस्न और जिस्म की बदौलत पहले मॉडलिंग शुरू की, फिर बालाजी ने उसे हीरोइन बनवा दिया। इसके बाद तो खूबसूरत जिस्म को जरिया बनाकर वह कामयाबी की बुलंदी छूने लगी। मलयालम और तमिल के कई बड़े बैनरों की फिल्मों में उसे अच्छा पैसा मिला। ‘थाउजैंड्स इन गोवा’, ‘कोबरा’ और ‘रेड चिलीज’ उसकी प्रमुख फिल्में हैं। मलयालम कॉमेडी फिल्म ‘हसबैंड्स इव गोवा’ भी हिट रही है। साउथ में उसके चाहने वालों की एक बड़ी तादाद है। वहां हिट होने के बाद लीना ने हिंदी फिल्मों में किस्मत आजमाना शुरू किया। बॉलीवुड स्टार जॉन अब्राहम की प्रोडक्शन कंपनी की एक हिंदी ़फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में लीना को साइन कर लिया गया। यह फिल्म शीघ्र ही रिजीज होने वाली है, लेकिन इसके बाद लीना की किस्मत ने साथ नहीं दिया। अपने महंगे शौक पूरे करने के लिए उसने बालाजी के माध्यम से ‘समझौता’ करना शुरू कर दिया।

बेंगलुरु निवासी बालाजी रंगीनमिजाज और अपराधी प्रवृति का बताया जाता है। लोगों को ठगना उसका पेशा रहा है। लाखों की काली कमाई करने के लिए खुद को आईएएस अधिकारी बताता था। कई बार किसी बड़े अधिकारी को प्रभावित करने के लिए खुद को कभी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि का पोता बताता, तो कभी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पुत्र निखिल गौड़ा का नजदीकी दोस्त। लीना ने भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बालाजी के साथ मिलकर ठगी करनी शुरू कर दी। वह बकरा तलाशता और लीना उसका शिकार कर लेती। ईश्वर ने हुश्न और जिस्म दिया ही है। उसकी एक अदा पर लाखों रुपये निछावर करने वालों की कमी नहीं है। कभी मुंबई, कभी चेन्नई, तो कभी दिल्ली में दोनों की रात रंगीन होने लगी। फिल्म अभिनेत्री से लीना ‘लेडी नटवार लाल’ बन गई।

सूत्रों के मुताबिक, बालाजी और लीना अब लाखों से करोड़ों कमाने के चक्कर में थे। योजना के तहत बालाजी ने चेन्नई के एक फाइव स्टार होटल में केनारा बैंक के एक बड़े अधिकारी से मुलाकात की। उसके साथ अदाकारा लीना भी थी। उसे देखकर अधिकारी के मुंह में पानी आ गया। बालाजी ने उससे खुद को आईएस अफसर बताया   था। लीना हीरोइन थी, उन दोनों से अधिकारी को प्रभावित होते देर नहीं लगी। उसी समय अगली मीटिंग कहां और कब होनी है, तय हो गई। बालाजी ने मौके का लाभ उठाते हुए जाली दस्तावेज के आधार पर एक फर्म खोलने का बड़ा प्रोजेक्ट पेश कर दिया और केनरा बैंक के उस अधिकारी से 30 करोड़ों रुपये लोन देने की गुजारिश की। इस मिशन में लीना ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जहां, जब और जैसे जरूरत पड़ी, उसे बैंक के बड़े अधिकारियों के पास जाने में गुरेज नहीं रहा। नतीजतन केनरा बैंक ने अगले सप्ताह ही 19 करोड़ 47 लाख रुपये का लोन बालाजी के नाम पास कर दिया। इससे पहले लीना और बालाजी मिलकर कुछ अन्य लोगों को भी कई करोड़ का चूना लगा चुके हैं। ऐसे में अब चेन्नई में ज्यादा दिन रहना उनके लिए खतरे से खाली नहीं था। दोनों दिल्ली भाग आए। भूल गए कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। जुर्म करने वाला कभी नहीं बचता। चेन्नई केनरा बैंक को इस बीच पता चला कि बालाजी कोई आईएएस अफसर नहीं बल्कि एक जालसाज है। लीना के साथ मिलकर उसने बैंक को ठगा है, तो अधिकारी सन्न रह गए। 12 मार्च 2013 को लीना और बालाजी उर्फ चंद्रशेखर रेड्डी के खिलाफ चेन्नई थाना कोतवाली में धारा 420 (धोखाधड़ी), 120 बी (आपराधिक साजिश) और 406 (विश्वासघात) के तहत मामला दर्ज करा दिया गया। पुलिस दो महीने तक बालाजी और लीना की तलाश करती रही। इस बीच इसी मामले में एक बैंक मैनेजर को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ की गई, तो फरेब का रहस्य और गहराने लगा। मई, 2013 के प्रथम सप्ताह में पता चला कि लीना अपने बॉयफ्रेंड के साथ दिल्ली के एक फार्म हाउस में छिपकर रह रही है। चेन्नई पुलिस ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त नीरज कुमार से संपर्क किया। उन्होंने डीसीपी (साउथ) भोला शंकर जायसवाल को मामले में कार्रवाई करने का आदेश दिया। मामला बड़ा और करोड़ों के घोटाले से जुड़ा था, इसलिए क्राइम ब्रांच के तेज-तर्रार अफसरों की एक टीम बनाई गई।

27 मई की शाम क्राइम ब्रांच की टीम को पता चला कि लीना साउथ दिल्ली के असोला स्थित खारी फार्महाउस में रहती है। बालाजी भी वहीं मौजूद है। पुलिस ने रात में ही फार्म हाउस पर छापा मारा, लेकिन लीना वहां नहीं थी। पता चला कि वह अपनी अगली पार्टी के लिए वसंत विहार के एक शॉपिंग मॉल में शॉपिंग करने गई है। इस बीच डीसीपी के मुताबिक, बालाजी पुलिस को देखते ही अपनी लैंड क्रूजर कार से फरार हो गया। उसकी गाड़ी पर महाराष्ट्र के रजिस्ट्रेशन नंबर की प्लेट लगी थी। फार्महाउस असोला गांव के महेंद्र सिंह का है। आरोपियों ने साढ़े चार लाख रुपये महीने के किराए पर लिया हुआ था। दोनों यहां करीब एक महीने से नौ लग्जरी गाड़ियों के बेड़े के साथ रह रहे थे। फार्म हाउस के अंदर खड़ी आधा दर्जन से ज्यादा लग्ज़री गाड़ियों को देखकर पुलिस की आंखें फटी की फटी रह गर्इं। आधा दर्जन बाउंसर भी वहां तैनात थे। चार निजी सुरक्षार्मियों को गिरफ्तार कर उनके पास से चार हथियार बरामद किए गए हैं, जिनका हरियाणा और जम्मू से लिया गया अखिल भारतीय लाइसेंस था, लेकिन दिल्ली लाइसेंसिंग शाखा से अनुमोदित नहीं था। फतेहपुर बेरी थाना पुलिस शस्त्र अधिनियम के तहत यह मामला दर्ज कर जांच कर रही है। इसके बाद पुलिस ने वसंत विहार के एक शॉपिंग मॉल से लीना को गिरफ्तार कर लिया।

डीसीपी जायसवाल के मुताबिक, बालाजी के खिलाफ चेन्नई में चीटिंग के दो मामले दर्ज हैं। केनरा बैंक से 19 करोड़ रुपये की चीटिंग की गई है। दूसरे केस में बालाजी ने खुद को आईएएस अफसर बताकर लीना की मदद से कुछ लोगों के साथ 76 लाख रु पये ठग लिए हैं। दोनों मामलों में चेन्नई पुलिस की सेंट्रल क्र ाइम ब्रांच उनकी तलाश कर रही थी, जबकि वे 12 मई से फार्म हाउस में छिपे हुए थे। चेन्नई पुलिस 29 मई को ट्रांजिट रिमांड पर लीना को चेन्नई ले गई। बालाजी की तलाश की जा रही है। दोनों आरोपियों के खिलाफ चेन्नई में एक सौ ठगी के मामले दर्ज हैं। यहां दिल्ली में लीना जिस फार्म हाउस में रह रही थी, वहां से 9 महंगी कारें लैंड क्रूजर, लैंड रोवर, बीएमडब्ल्यू, रॉल्स रॉयस, हमर, एस्टन मार्टिन, जीटीआर, आॅडी और 81 महंगी कलाई घड़ियां भी बरामद हुई हैं। ये महंगी कारें करोड़ों की हैं। पुलिस अब यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर इतनी महंगी गाड़ियों का मालिक कौन है? लीना के पास कहां से आई? कुछ गाड़ियों पर लाल बत्ती और राज्यसभा का स्टिकर भी लगा हुआ है। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि कहीं लाल बत्ती और स्टिकर का मिसयूज तो नहीं हो रहा था या फिर वह गाड़ी सचमुच किसी सांसद की है?

अय्याशी देखकर पुलिस भी हैरान
टॉप मॉडल और एक्ट्रेस लीना पॉल की हरकतों से पता चलता है कि उसका बस चलता, तो वह ताजमहल खरीद लेती। लीना और उसके लिव इन पार्टनर बालाजी उर्फ चंद्रशेखर रेड्डी की कहानी बंटी और बबली से एकदम मिलती-जुलती है। दोनों ने 20 करोड़ रु पये से भी ज्यादा की रकम बैंकों व अन्य लोगों से ठग लिए। इनकी अय्याशी देखकर पुलिस अधिकारी भी अचंभित रह गए। दरअसल, जब भी किसी को ठगना होता था तो खुद को आईएएस बताने वाला बालाजी लीना की सुंदरता और अपनी वाकपटुता का इस्तेमाल करता था। बालाजी लोगों से खुद को आईएएस अधिकारी बताता था और लालबत्ती लगी गाड़ी से चलता था। कई पुलिसकर्मी उसे सलाम करते थे। इतना ही नहीं, कई लोगों को वह खुद का परिचय मंत्री टीआर बालू और करुणाकर रेड्डी के पुत्र के रूप में   देता था। झूठ के बल पर वह बाकायदा हवाई प्रोजेक्ट तैयार करता था और लोगों से उस प्रोजेक्ट में पैसे लगवाता। लीना उसके हर मामले में साथ देती थी। बालाजी ने बंगलुरु  में अपने मकान मालिक से भी एक करोड़ रुपये ठगे हैं। इनके पास से जो महंगी विदेशी कारें बरामद हुई हैं, उनका प्रयोग भी ये लोगों को ठगने में ही करते थे।
-जितेन्द्र बच्चन

सोमवार, 27 मई 2013

गाजियाबाद का दिल दहला देने वाला सामूहिक हत्याकांड

किसकी साजिश कौन सूत्रधार?

22 साल के युवक ने एक ही परिवार के सात लोगों को मार डाला! हो सकता है कि यह घटना उसी ने की हो, लेकिन पुलिस, एसटीएफ और उनके तमाम विशेषज्ञों ने मिलकर इस मामले के खुलासे की जो कहानी बताई, वह किसी के गले नहीं उतर रही है। आखिर किसने रची साजिश? कौन है असली सूत्रधार और किसे बचा रही है पुलिस?

एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या से पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गई। बेरहम कातिल ने माता-पिता के साथ बेटे-बहू और पोते-पोतियों को भी नहीं छोड़ा। घर के भीतर जो भी मिला, बड़ी बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार दिया। घटना 21 मई, 2013 की है। गाजियाबाद के सतीश चंद्र गोयल थाना कोतवाली स्थित नई बस्ती के रहने वाले थे। परिवार में पत्नी मंजू (62), पुत्र सचिन (40), बहू रेखा (38) और उसके तीन बच्चों- मेघा (13), नेहा (10) और अमन (7) को लेकर कुल सात लोग थे। सतीश को किडनी की समस्या थी। डॉक्टर की सलाह पर कंपाउंडर रोज उन्हें इंसुलिन का इंजेक्शन लगाने आता था, लेकिन 22 मई की सुबह करीब 8 बजे वह आया, तो उसके होश उड़ गए। दरवाजा खुला हुआ था और घर के अंदर खून ही खून ही फैला था। ऊपर-नीचे पूरे परिवार की रक्तरंजित लाशें पड़ी थीं। कंपाउंडर ने पड़ोसियों को बताया, फिर मामले की सूचना पुलिस को दी गई। शहर में कोहराम मच गया। एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या से पुलिस महकमे के भी हाथ-पैर फूल आए। थाना कोतवाली पुलिस और एसएसपी नितिन तिवारी मौके पर आ पहुंचे। पुलिस के स्पेशल आॅपरेशन ग्रुप और क्र ाइम टीम ने जांच-पड़ताल शुरू कर दी। दो शव घर की प्रथम मंजिल और बाकी पांच शव दूसरी मंजिल पर पड़े थे।
सतीश गोयल बताशेवाला उर्फ गैंडा (65) तीन भाई थे। उनका आढ़त का पुश्तैनी काम था। तीनों भाई साझे में रहते थे। बाद में सतीश दोनों भाइयों से अलग हो गए। अनाज मंडी गाजियाबाद में खल-चूरी का थोक व्यवसाय शुरू कर दिया, फिर करीब 15 साल पहले उन्होंने प्रॉपर्टी के काम में हाथ आजमाया, तो देखते ही देखते शहर के बड़े बिल्डरों में उनकी गिनती होने लगी। उन्होंने नई बस्ती, घंटाघर और पुराने शहर में तमाम प्रॉपर्टियों की खरीद-फरोख्त की। कुछ विवादित प्रॉपर्टी को लेकर उनका लोगों से विवाद भी हुआ, लेकिन सतीश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लाखों से करोड़ों में खेलने का क्रम जारी रहा। इधर कुछ दिनों से सतीश का स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। किडनी का आॅपरेशन कराना था। उसके लिए एक करोड़ रुपये घर में रखे थे। इसके अलावा ज्वेलरी भी अच्छी-खासी थी। ऊपर-नीचे घर का सारा सामान बिखरा हुआ था। पुलिस ने अनुमान लगाया कि हो सकता है कि लूटपाट की इरादे से इस घटना को अंजाम दिया गया है।

सतीश गोयल के मकान के आगे की सड़क महज 10 फुट चौड़ी है। नजदीक ही चोपड़ा मेडिकल स्टोर है। एक-दूसरे के मकानों की छतें आपस में सटी हुई हैं। कहीं भी आवाज हो और सामने वाले को पता न चले, इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन पुलिस पूछताछ में किसी पड़ोसी ने कोई खास जानकारी नहीं दी। सभी का यही कहना था कि आमतौर पर सतीश गोयल और सचिन रात साढ़े 10 बजे तक दुकान से घर लौट आते थे, लेकिन उस रात सतीश और सचिन दोनों पौने नौ बजे ही आ गए थे। 22 मई को पड़ोसी के यहां शादी थी। उसके यहां डीजे बज रहा था। ऐसे में गोयल परिवार के लोग चीखे-चिल्लाए भी होंगे, तो उनकी आवाज सुनाई नहीं पड़ी। नौकरों के बारे में पूछने पर पता चला कि सतीश गोयल ने अपने पुराने कार चालक राहुल को नौकरी से निकाल दिया है। इस बीच पुलिस टीम को मौके पर जांच में जूते के कुछ निशान मिले, जो आठ नंबर के थे। वह छुरा भी मिल गया, जिससे कत्ल किया गया था। जूते के नंबर और खंजर पर मिले फिंगर प्रिंट्स के आधार पर पुलिस का पूरा शक राहुल पर आकर टिक गया।

12वीं पास राहुल वर्मा (22) थाना कोतवाली (नगर) गाजियाबाद के मोहल्ला बजरिया का रहने वाला है। दो छोटे भाई हैं, लेकिन घरवालों से मनमुटाव के कारण इन दिनों राहुल इंदिरापुरम में अपने कजन के साथ रह रहा था। राहुल के दादा उत्तर प्रदेश पुलिस में दारोगा रहे। पुलिस ने राहुल की खोजबीन में कई जगह दबिश दी, लेकिन उसका सुराग नहीं मिला। इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह गाजियाबाद आए। पीड़ित परिवार से मिले। इससे राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई। एसएसपी नितिन तिवारी और उनके मताहतों को आईजी ने सख्त निर्देश दिए। 23 मई को मुखबिर से पता चला कि राहुल ने अभी 10-12 दिन पहले ही एक महंगा मोबाइल फोन खरीद कर अपनी गर्लफ्रेंड को गिफ्ट किया है। पुलिस ने उस युवती को एक घंटे बाद हिरासत में ले लिया, तभी राहुल का युवती के मोबाइल पर फोन आ गया। लोकेशन मिलते ही स्पेशल आॅपरेशन ग्रुप और क्राइम टीम ने राहुल को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, राहुल इंटर पास करने के बाद दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में एनिमेशन का कोर्स कर रहा था। इस बीच उसे नशे की लत पड़ गई। वह आवारागर्दी करने लगा। नहीं सुधरा, तो माता-पिता ने बेटे को घर से निकाल दिया। राहुल भटक गया। उसकी एक युवती से दोस्ती हो गई, फिर दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे। राहुल के खर्चे बढ़ गए। प्रेमिका के शौक और खर्चे पूरे करने की उधेड़बुन में एक रोज राहुल की मुलाकात सतीश गोयल के ड्राइवर मोनू से हुई। मोनू की सिफारिश पर सतीश ने राहुल को भी अपने यहां पांच हजार की मासिक तनख्वाह पर कार चालक रख लिया। उन्हें क्या पता था कि वह आस्तीन का सांप निकलेगा। घटना से करीब 12 दिन पहले राहुल ने सतीश गोयल के घर से साढ़े चार लाख रुपये चुरा लिए। उसमें से एक लाख रुपये राहुल ने अपने दोस्त जुगनू जैकब को दे दिए। बाकी जो बचा, उसमें प्रेमिका को मोबाइल गिफ्ट किया और कई दिन दोस्त-यारों के साथ शराब-शबाब की मौज-मस्ती में डूबा रहा। उसकी हरकतों से तंग आकर गोयल को इस बात का पता चलते देर नहीं लगी कि रुपये की चोरी राहुल ने ही की है। उन्होंने उसे नौकरी से निकाल दिया। राहुल अब पूरी तरह से सड़क पर आ चुका था। बेरोजगार होते ही गर्लफ्रेंड भी कन्नी काटने लगी। इस सब का जिम्मेदार राहुल सतीश गोयल को मानने लगा।

उनके प्रति उसकी नफरत बढ़ने लगी। वह जानता था कि गोयल करोड़पति है। कब कितना पैसा कहां से आ-जा रहा है, यह भी पता था। राहुल ने लूट की साजिश रचनी शुरू कर दी। दो-तीन दोस्तों से भी इस सिलसिले में बात की। प्रशांत नामक मित्र को अपनी साजिश में शामिल होने को भी कहा। राहुल के अनुसार, उसका इरादा किसी को कत्ल करना नहीं था। सोचा था, घर में घुसेगा और किसी एक बच्चे को चाकू की नोक पर लेकर मोटी रकम हासिल कर लेगा। पुलिस के अनुसार, 20 मई को उसने मालीवाड़ा से 100 रु पये का छुरा और एक रस्सी खरीदा, फिर 21 मई की रात करीब साढ़े सात बजे गोयल के घर के पीछे बनी सीढ़ियों से एक दूसरे मकान की छत पर जा पहुंचा। वहां से दो-तीन छतों से होता हुआ सतीश गोयल की छत पर आ गया। यहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। राहुल ने उन्हीं के पास बैठकर दो सिगरेट पी। बच्चे खेलकर चले गए, तो राहुल मुंह पर गमछा बांधकर करीब 10 फीट ऊंची छत से रस्सी के सहारे नीचे प्रथम तल पर कूद पड़ा। उसके पैर में फैक्चर हो गया। मुंह से गमछा भी खुल गया। इस बीच पुलिस के अनुसार, धड़ाम की आवाज सुनकर मेघा ने राहुल को देख लिया। पहचाने जाने के डर से वह घबरा गया। उसने मेघा के पेट में छुरा घोंप दिया, फिर उसका गला रेतकर कत्ल कर डाला। बच्ची की आवाज सुनकर उसकी मां रेखा आई, तो राहुल ने उसे भी लपककर छुरे से गोद डाला। दो लोगों की हत्या करने के बाद राहुल को लगा कि पैर में चोट लगने के कारण वह वापस छत के रास्ते नहीं लौट सकता, इसलिए उसे मेन गेट से ही निकलना होगा।

ऐसे में उसका पकड़ा जाना तय है। राहुल के इरादे और खूंखार हो गए। वह नीचे आया और सतीश के बेटे सचिन को सामने देखते ही उसके पेट में छुरा घोंप दिया। वह जमीन पर गिर पड़ा, राहुल ने उसका गला रेत दिया। सतीश और उनकी पत्नी मंजू ने यह मंजर देखा, तो सदमे से बेहोश हो गए। सचिन ने बेहोशी की हालत में ही सतीश और मंजू का भी गला रेत दिया। अब मासूम अमन और नेहा बचे थे। खून-खराबा देख दोनों रोने लगे। राहुल ने उन दोनों की भी बड़ी बेरहमी से गला रेतकर हत्या कर दी। पास के मकान में डीजे बज रहा था, जिसमें पूरे परिवार की चीख-पुकार दबकर रह गई।
पुलिस के मुताबिक, हत्याओं के बाद राहुल ने अलमारी खोली और उसमें रखी जूलरी और 10 हजार रुपये चुरा लिए। जिस लॉकर में एक करोड़ की नकदी रखी थी, उसे तोड़ नहीं पाया। परेशान होकर राहुल मेन गेट से निकल गया, लेकिन पुलिस, एसटीएफ और उनके तमाम विशेषज्ञों ने मिलकर इस मामले का यह जो खुलासा किया है, वह किसी के गले नहीं उतर रही है। एसएसपी ने आरोपी के पास से खून से सने कपड़े व लूटे गए जेवर और नकदी बरामद करने का भी दावा किया है, लेकिन पुलिस की इस कहानी में कई पेंच हैं, जिससे कई सवाल खड़े होते हैं। 21-22 साल का एक दुबला-पतला लड़का सात लोगों की हत्या भला कैसे कर सकता है? वह भी जख्मी-टूटे पैर के बाद तो कतई नहीं? जरूर इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश है। कौन है असली सूत्रधार? किसे बचा रही है पुलिस?

सीबीआई जांच की मांग
सतीश गोयल की पुत्री शैली और दामाद सचिन का कहना है कि इस हत्याकांड में राहुल के अलावा भी कुछ लोग शामिल हैं, लेकिन पुलिस की कार्रवाई से लग रहा है कि वह किसी को बचाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें राहुल की कमीज और गमछा दिखाया। उस पर खून के थोड़े से निशान हैं और दोनों कपड़े सही-सलामत हैं। ऐसा कैसे हो सकता है? उसने सात लोगों को कत्ल कर डाला और उसकी कमीज के बटन तक नहीं टूटे और न जेब फटी? यहां तक कि खून से भी कमीज पूरी तरह नहीं रंगी? शैली ने एक और सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पुलिस कत्ल का जो समय बता रही है, वह भी गलत है। रात्रि 8.39 बजे मेरी अपने भाई सचिन से दो मिनट मोबाइल फोन पर बात हुई है। वहीं, भाजपा (गाजियाबाद) के उपाध्यक्ष अजय शर्मा ने मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।

विरोध के चलते मुख्यमंत्री नहीं आए

26 मई को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का गाजियाबाद आने का प्रोग्राम था। यहां और गौतमबुद्धनगर के करीब आठ हजार छात्र-छात्राओं को लैपटॉप वितरित करना था। इसके अलावा जीडीए के करीब चार हजार करोड़ की लागत के विकास कार्यों का लोकार्पण व शिलान्यास भी करना है, लेकिन गोयल परिवार हत्याकांड को लेकर व्यापारियों और राजनीतिक दलों के तीखे विरोध के चलते मुख्यमंत्री का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। जिलाधिकारी (गाजियाबाद) एसवीएस रंगा राव के अनुसार अब मुख्यमंत्री शायद 3 जून को गाजियाबाद आएंगे।
थाना प्रभारी निलंबित
कोतवाली थाना प्रभारी लालू सिंह मौर्य को निलंबित कर दिया गया है। सतीश गोयल ने पुलिस से कुछ दिन पहले सुरक्षा मांगी थी, लेकिन इंस्पेक्टर मौर्य ने उन्हें सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई थी। मामले की जांच-पड़ताल की जा रही है।    
-भावेश कुमार, आईजी (मेरठ जोन)

दो दिन की रिमांड में उगले कई राज
पुलिस ने आरोपी राहुल वर्मा को दो दिन (24-25 मई) की रिमांड पर लेकर पूछताछ की, तो कई और सनसनीखेज जानकारियां दी हैं। उसके बयान के आधार पर इस मामले में तीन और लोगों जुगनू जैकब, मोनू और प्रशांत का नाम सामने आया है। जुगनू शातिर अपराधी है। वह 2008 में मुरादनगर में हुई करीब 20 लाख की लूट में जेल भी जा चुका है। पुलिस ने उसे 24 मई 2013 को कोटगांव फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया। वह गाजियाबाद के मोहल्ला आर्यनगर का निवासी है। राहुल का दोस्त है। राहुल ने जब सतीश गोयल के घर से साढ़े चार लाख रुपये चुराए थे, तो उसमें से एक लाख रुपये उसने जुगनू को दे दिए थे। पुलिस जुगनू के साथ-साथ मोनू से भी पूछताछ कर रही है। 25 मई को प्रशांत भी पकड़ में आ गया। राहुल की साजिश का इन तीनों को पता था, लेकिन प्रशांत का कहना है कि वह राहुल की साजिश में शामिल नहीं है।
-नितिन तिवारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक
-जितेंद्र बच्चन

बुधवार, 22 मई 2013

                           किले में सेंध!

सोनिया-राहुल के गढ़ में वरुण गांधी की दस्तक।भाजपा में वरु ण का कद बढ़ा। पार्टी ने तय की उनके लिए बड़ी भूमिका। खासकर युवाओं को पार्टी से जोड़ने की है कोशिश। खास फोकस है उत्तर प्रदेश, क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।


जितेंद्र बच्चन
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, सीटों की संख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में नए-नए राजनीतिक समीकरण उभरने लगे हैं। भाजपा की रणनीति बड़े चेहरों को मैदान में उतारने की है। उसी कड़ी में वरुण गांधी अगला लोकसभा चुनाव सुलतानपुर से लड़ने की तैयारी में हैं। इसके संकेत पहले से भी मिलते रहे हैं, लेकिन 16 मई को वरुण ने सुलतानपुर के खुर्शीद क्लब मैदान में स्वाभिमान रैली कर के अपने चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत कर दी। भाजपा ‘अपने गांधी’ के लिए बड़ी भूमिका तय कर चुकी है। खासतौर पर वरुण के जरिए युवाओं को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, तभी तो रैली में पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने वरुण को युवा हृदय सम्राट बताया। उत्तर प्रदेश पर पार्टी का खास फोकस रहा, क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।
वरुण की उम्मीदवारी से राजनीतिक हलचल तेज :
परिवार के दूसरे खेमे के राहुल गांधी के अमेठी से सटी सुलतानपुर सीट से वरुण की उम्मीदवारी ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। यह तय माना जा रहा है कि सुलतानपुर, अमेठी, रायबरेली में गांधी परिवार की त्रिमूर्ति (वरु ण-राहुल-सोनिया) की मौजूदगी की राजनीतिक गूंज दूर तक सुनी जाएगी। 16 मई को शहर के खुर्शीद क्लब में हुई भाजपा की स्वाभिमान रैली में भारी भीड़ जुटी। आसपास के कई जिलों के लोग वरु ण को देखने-सुनने पहुंचे। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी सहित प्रदेश के तमाम पदाधिकारी, नेता और अनेक विधायक वरुण का हौसला बढ़ाने और अपना चेहरा दिखाने की होड़ में लगे रहे। वरु ण ने अपने भाषण में अमेठी, रायबरेली या फिर सोनिया गांधी का जिक्र करने से परहेज किया। हालांकि भाषण की शुरुआत उसी अंदाज में की जैसे परिवार के अन्य सदस्य ‘अमेठी या रायबरेली को अपना बताने के लिए’ करते रहे हैं। वरुण ने कहा, ‘अपने घर आया हूं। यहां के लोगों ने हमेशा मेरे पिता का हाथ थामे रखा।’ इस उल्लेख के साथ वरु ण काफी भावुक हो गए। उन्होंने कहा, ‘मेरा परिवार कुछ महीनों से काफी दु:खी है। 19 मार्च को मेरे बेटी पैदा हुई थी। परिवार में बेहद खुशी थी, लेकिन 19 अप्रैल को वह गुजर गई। जो माता-पिता हैं वे इस दर्द को समझ सकते हैं। लोगों को लगता है कि जो मंच पर बैठते हैं। मुकुट पहनते हैं। वे बहुत सुखी और ऐशोआराम से हैं पर उनके भी दु:ख हैं।’ ये सब बताते हुए भावुक वरु ण कुछ पल को ठहर गए। सामने जोश में उमड़ती भीड़ के बीच भी सन्नाटा पसर गया, लेकिन जब उन्होंने कहा कि यहां के हजारों बच्चे भी तो मेरे बच्चे हैं, तो अगले ही क्षण उनके लिए तालियां बजाते हुए लोगों ने नारे बुलंद करने शुरू कर दिए।
भाजपा में वरु ण को पहली बार तरजीह :
भौगोलिक व जातिगत समीकरणों के आधार पर देखें, तो तीनों लोकसभा सीटों सुलतानपुर, अमेठी और रायबरेली में काफी समानता है। 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में इन तीनों जगहों पर कांग्रेस का पत्ता लगभग साफ हो चुका है। इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी पार्टी की उम्मीदों के केंद्र हैं और भाजपा वरु ण को पहली बार तरजीह दे रही है। पार्टी में उनका कद बढ़ा है। वहीं, विरोधी खेमों में रहते हुए भी गांधी परिवार के सदस्य अब तक चुनाव प्रचार में एक-दूसरे के क्षेत्रों में जाने से परहेज करते रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में यह परंपरा टूटेगी? दरअसल, वरुण का सुलतानपुर से चुनाव लड़ने का फैसला अचानक नहीं है। वे पिछले साढेÞ तीन साल से इसकी तैयारी कर रहे हैं। 20 दिसंबर, 2009 को उन्होंने सुलतानपुर में एक बड़ी सभा कर पहली बार इसका संकेत दिया था। इस सभा की सफलता के लिए उनके प्रतिनिधियों ने यहां महीनों मशक्कत की थी। तब वरु ण ने सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ‘हम बचपन से सुलतानपुर-अमेठी के विषय में सुनते-जानते रहे हैं। मेरे पिता संजय गांधी को यहां के लोगों ने बहुत प्यार दिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार मैं यहां आया था, तब जल्दी-जल्दी आने का वादा किया था, लेकिन नहीं आया तो इसकी वजह थी कि मैं अपने को पूरी तरह तैयार करना चाहता था। अब तैयार हूं।’
राजनीतिक कर्मभूमि :
वरुण गांधी पिछली बार पीलीभीत से सांसद चुने गए थे और अच्छे बहुमत से जीते थे, लेकिन चुने जाने के चंद महीनों के भीतर ही उन्होंने सुलतानपुर में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। शायद इस क्षेत्र को वे अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाना चाहते हैं। इसीलिए दिल्ली में रहते हुए भी वह सुलतानपुर के लोगों से संपर्क बढ़ाते रहे हैं। मेल-मुलाकात में सुलतानपुर के लोगों को प्राथमिकता दी है। पिछले कुछ महीनों में इस काम में और तेजी आई है। अपने प्रतिनिधियों और सर्वेक्षण एजंसियों के जरिए उन्होंने सुलतानपुर में संभावनाएं टटोलीं। अब  उनके स्टाफ के करीब डेढ़ दर्जन लोगों ने यहां डेरा डाल रखा है और पूरी तरह से चुनाव प्रचार में लग गए हैं। सुलतानपुर जिला मुख्यालय पर वरुण गांधी के नाम के पोस्टर और होर्डिंग लगा दिए गए हैं। स्टाफ वालों ने स्थानीय इकाई के नेताओं के साथ बराबर संपर्क बना रखा है। 16 मई की रैली में भी स्थानीय नेताओं की अच्छी खासी जमात मौजूद रही। इनमें एमएलसी डॉ. महेंद्र सिंह, विधायक उपेंद्र   तिवारी, विधायक सावित्री फूले, सीमा द्विवेदी, रामनाथ कोरी, रामपति त्रिपाठी, देवेंद्र सिंह चौहान, लक्ष्मण आचार्य, मोती सिंह, ओम प्रकाश पांडेय, डॉ. आरए वर्मा, नगर पालिका अध्यक्ष प्रवीण कुमार वर्मा, अर्जुन सिंह, विजय बहादुर पाठक, मनीष शुक्ला, जगजीत सिंह छंगू, अखिलेश जायसवाल, लोकसभा प्रत्याशी अमेठी प्रदीप सिंह, थौरी धीरज पांडेय, दिलीप पांडेय, श्रीप्रकाश सिंह, वीरेंद्र बहादुर सिंह, संजय सिंह सोमवंशी, जिला मीडिया प्रभारी विनय सिंह आदि शामिल रहे।   
विरासत के पीछे संघर्ष की पृष्ठभूमि :
सुलतानपुर के एक ओर अयोध्या है, तो दूसरी ओर अमेठी। वरुण ने 2009 के चुनाव में हिंदुत्व के मुद्दे को उभारने की कोशिश की थी। अयोध्या से इसकी संगत बैठती है। जबकि इसी जिले की अमेठी गांधी परिवार की उस विरासत का प्रतीक है, जहां से परिवार के रिश्तों की बुनियाद वरु ण के पिता दिवंगत संजय गांधी ने डाली थी। इस विरासत के पीछे वरु ण से पहले की पीढ़ी के संघर्ष की पृष्ठभूमि भी है। संजय गांधी ने 1977 में अमेठी से पहला चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में वे हार गए थे। 1980 में वे अमेठी से ही जीते, लेकिन जल्दी ही एक हवाई दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। इसके बाद संजय गांधी की पत्नी अमेठी में पति की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की इच्छुक थीं, लेकिन सास इंदिरा गांधी ने विधवा बहू मेनका गांधी के दावे को दरिकनार कर विमानन कंपनी की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अपने बडेÞ बेटे राजीव गांधी को अमेठी में उपचुनाव लड़ाया। वे 1981 का यह उपचुनाव आसानी से जीत भी गए। विद्रोह पर उतारू मेनका ने अपनी सास का घर छोड़ने के बाद अमेठी का रु ख कर लिया। 1984 के चुनाव में उन्होंने यहां आकर अपने जेठ राजीव गांधी को असफल चुनौती दी थी। पराजय की पीड़ा इतनी गहरी थी कि मेनका फिर कभी सुलतानपुर-अमेठी नहीं आर्इं।
आक्रमण की धार तेज : ढाई दशक बाद मेनका के बेटे वरु ण ने 2009 में भी सुलतानपुर के उसी खुर्शीद क्लब में सभा की, जहां उनकी मां मेनका ने अपने परिवार को चुनौती देते हुए पहली सभा की थी। अपने परिवार से नाराज मेनका के स्वर और आरोप बेहद तीखे हुआ करते थे, लेकिन वरु ण ने पिछली बार जब यहां सभा की थी, तो वे संतुलित और संयमति थे। इसके बावजूद राहुल-सोनिया का नाम लिए बिना उन पर कटाक्ष करने से नहीं चूके, ‘वीआईपी इलाकों में वैसे विकास कार्य नहीं हुए हैं जैसे होने चाहिए थे। प्रतिनिधि जनता के सेवक हैं और उनसे काम का हिसाब लिया जाना चाहिए।’ वरु ण अब सुलतानपुर से लडेंÞगे, तो आक्र मण की धार और तेज हो सकती है। वे अपनी मां द्वारा बीच में छोड़ी लड़ाई का अगला चरण शुरू कर रहे हैं। पड़ाव भले सुलतानपुर है, लेकिन निशाने पर अमेठी-रायबरेली है। पिछले लोकसभा चुनाव 2012 में सुलतानपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार की हैसियत से अमेठी के युवराज संजय सिंह जीते थे। आजकल पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। उनका मानना है कि कांग्रेसियों ने जान-बूझकर अमिता सिंह को हराया है। कांग्रेस व संजय सिंह के बीच पनपी इस खटास का फायदा भाजपा वरुण को सुलतानपुर लोकसभा क्षेत्र से उतार कर उठाना चाहती है।
अंधा कानून या वरुण की दबंगई? 
चार साल पहले 2009 के चुनाव में भाजपा नेता वरुण गांधी के एक भाषण ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया था। उन पर सात और आठ मार्च 2009 को पीलीभीत जिले के डालचंद और बरखेड़ा में भड़काऊ भाषण देने का केस दर्ज हुआ। कई दिनों तक वे सलाखों के पीछे भी रहे। अब चार साल बाद 33 साल के वरु ण गांधी बेदाग हैं। लेकिन कोर्ट में जो गवाह पलट गए थे, उन्हीं गवाहों ने एक स्टिंग आॅपरेशन में यू-टर्न लेते हुए खुलासा किया है कि कैसे केस का गला घोंटा गया और वरु ण सबूत के अभाव में बेदाग बरी हो गए।
कोर्ट में बेशक इस आरोप का कोई गवाह नहीं मिला कि वरु ण गांधी ने वाकई 2009 में डालचंद और बरखेड़ा में नफरत फैलाने वाला भाषण दिया, लेकिन स्टिंग आॅपरेशन में साफ हो चुका है कि न सिर्फ वरु ण ने जहर उगलने वाला भाषण दिया था, बल्किमुकदमे से बेदाग बचने के लिए पूरी न्याय प्रक्रि या को तोड़-मरोड़ डाला। वरु ण ने न्याय प्रक्रि या को इस हद तक प्रभावित किया कि इन दोनों केस   के अलावा दूसरे कुछ मामलों के सभी 88 गवाह मुकर गए। गवाहों के मुताबिक बयान बदलवाने में एसपी अमति वर्मा की अहम भूमिका रही। स्टिंग आॅपरेशन से यह भी जाहिर हुआ है कि खुद को बेदाग बचाने के लिए वरु ण ने यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हरवा दिया, ताकि समाजवादी पार्टी का नेता चुनाव जीत सके और केस से बचने में उनकी मदद कर सके। यह अंधा कानून है या फिर वरुण की दबंगई, जो साम-दाम-दंड-भेद तमाम हथकंडे अपनाकर केस से बेदाग बरी हो गया?
चरम पर है गुटबाजी



भाजपा ने 2014 का चुनाव जीतने के लिए एक खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। पूरे प्रदेश को पूर्वांचल, मध्य भाग, पश्चिम और बुंदेलखंड सहित कई हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से से पार्टी अपने कम-से-कम एक ऐसे चेहरे को लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहती है, जिसके नाम पर उस सीट पर तो वोट मिले ही, आस-पास की सीटों पर भी वे दूसरे भाजपा प्रत्याशियों को जिताने में मदद कर सकें। लेकिन 2014 के चुनाव के लिए भाजपा जहां एक ओर उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत लगा रही है, वहीं आपसी गुटबाजी पार्टी की पूरी कवायद पर पानी फेरने को तैयार बैठी है। राजनाथ सिंह की अगुवाई में घोषित कार्यकारिणी को एक धड़ा चाटुकारों की फौज, कमजोर व परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली करार दे रहा है। कार्यकारिणी में राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, लाल जी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह और प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार को पद मिलने से भी बहुत लोग नाराज हैं। प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के समय कार्यकारिणी में जो लोग शामिल थे, उनमें से अधिकांश को इस कार्यकारिणी में जगह नहीं मिली है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं है, जो थोड़ी-बहुत नाराजगी है, चुनाव से पहले वह ठीक हो जाएगी।’

                                क़ैदी का खत


सलाम! हम भी इंसान हैं और देशभक्त शहरी भी जो नापाक साजिशों के तहत दहशतगर्दी के आरोप में ज़बरदस्ती फंसाए गए बेकसूर हैं. आज हम लोग बेइन्तहां जुल्म से परेशान होकर आपस में आत्महत्या और उसकी जायज गुंजाइश के बारे में एक दूसरे से पूछने लगे हैं. हमारे खिलाफ़ होने वाली अमानवीयता (जो जेल अधिकारियों की आपराधिक मानसिकता के कारण है) ने हमें इस क़दर मायूस कर दिया है कि आत्महत्या ही आखिरी विकल्प लगने लगा है.
हममें से सभी को अपने-अपने घरों, बाजारों, खेतों से, राह चलते हुए गैर-कानूनी कैद कर अगवा करके, गैर कानूनी हिरासत में रखकर भयानक हिंसा के ज़रिए कहानियां गढ़कर लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव या फिर अन्य दूसरी जगहों से कई-कई दिन बाद गैरकानूनी सामानों के साथ गिरफ्तारियां दिखाकर लंबी-लंबी पुलिस हिरासत में लेकर सुबूत गढ़ने के बाद सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया. सुरक्षा के नाम पर हाई-सेक्योरिटी के नाम पर बने कमरों में ठूंसकर बेपनाह उत्पीड़न पहले भी किया गया और आज भी इरादतन साम्प्रदायिक तौर पर जारी है.
सीलन भरी अंधेरी, बेरोशनदान वाली आठ गुणे बारह की छोटी सी सेल में लगातार बंद रखा जाता, एक मिनट के लिए भी न खोला जाता. तेरह जून 2008 दिन शुक्रवार को जुल्म का नंगा नाच करते हुए हमें चमड़े के हंटरों और लाठियों से हमारे जिस्मों को फाड़ा और तोड़ा गया. पवित्र कुरान को अपवित्र किया गया, उसके पन्ने फाड़कर शौचालय में फेंका गया.
हमारे सारे कपड़े, चादर, किताबें जप्त कर ली गईं, बल्कि शुरु के ही दिनों में कपड़ों पर पाबन्दी लगा दी गई कि सिर्फ दो जोड़े कपड़े, एक लुंगी, एक तौलिया यहां तक की अण्डरवियर भी दो से ज्यादा रखने की इजाज़त न दी जाती थी. तंग होकर हमने लंबी भूख हड़ताल, खाने-पीने का मुकम्मल बाईकाट विरोध के बतौर किया. तब 27 जनवरी 2009 से आधा घंटा के लिए पत्थर की ऊंची दीवारों वाले इतने छोटे से बरामदे में खोला जाने लगा जिसमें से 12 बजे के बाद से ही धूप गायब हो जाती और हरियाली का तो नामों निशान तक नज़र नहीं आता.
दिसम्बर 2011 से बहुत दरख्वास्त करने पर एक घंटे के लिए खोला जाने लगा. पता होना चाहिए कि जेल के रजिस्टर में हमें बाकी कैदियों की तरह मैनुवल के लिहाज से खुला ही दिखाया जाता है, जबकि हम यहां लगातार बंद रखे जाते हैं. लगातार बंद रहने की वजह से यहां लोग बीमार रहने लगे हैं. जबकि कई तो डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं, याददाश्त प्रभावित हो चुकी है. और कईयों की आंखे कमजोर होने लगी हैं.
कई साल से ऊपर हो गए होंगे जेल मुआयना पर आने वाले मजिस्ट्रेट को हाई-सेक्योरिटी तशरीफ लाए हुए. बड़े अफसरान और ऑथोरिटीज को हाई सेक्योरिटी नहीं लाया जाता कि हम शिकायत न कर दें. हमारी दरख्वास्तें ऑथोरिटीज को नहीं फॉरवर्ड की जाती कि कहीं हमें इंसानी हुकूक देने को न कह दिया जाय. सुप्रीम कोर्ट की बकायदा हिदायत है कि किसी भी अण्टर ट्रायल को कैद कर तनहाई में न रखा जाय. सजायाफ्ता को भी सिर्फ तीन माह तनहाई में रखे जाने की गुंजाइश है. हमारे साथ गैरकानूनी, गैरइंसानी और आपराधिक बर्ताव क्यों रखा जाता है, जबकि हम साजिशन फंसाए गए बेकसूर नागरिक हैं.
साथियों ऐसे में अधिकारियों की तंग नजरी, बड़े ऑथोरिटीज तक पहुंच न हो पाने, मुक़दमों का जल्द फैसला न हो पाने और ज़रुरत की दवाओं के न मिल पाने की वजह ने बहुतों को बहुत मायूस कर दिया है. जिसकी वजह से कुंठा व बेचैनी से मजबूर होकर आत्महत्या के जायज़ होने या गुंजाइश होने का मसला अक्सर होने वाली बातचीत में मुझसे पूछा जाता है. साजिशों में फंसाए गए इन लोगों को कैसे समझाया जा सकता है. जबकि ये परेशान कैदी जब थोड़ी देर खुले में ताजा हवा या धूप खाने और बीमारियों के सही इलाज की दरख्वासत करते हैं कि सर ऐसे तो हम मर जाएंगे तो हंसी उड़ाते हुए कहा जाता है कि मर जाओ हमें क्या फर्क पड़ता है, सुसाइड कर लो. हम जवाब दे लेंगे और जहां चाहे शिकायत कर लो हमें फर्क नहीं पड़ता.
यहां के लोगों और खुद अपनी बेबसी देखकर, प्रशासन का रवैया देखकर दिल हिल जाता है. रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हम हिन्दोस्तान की जेल में हैं या अंग्रेजों की. हम किसी सेकूलर स्टेट में हैं या कम्यूनल स्टेट में. हम आपसे मदद के प्रार्थी हैं. हुकूमती सतह पर या बड़ी अदालतों और ऑथोरिटीज के ज़रिए इन्सानी हुकूक़ के खिलाफ़ हो रहे कार्यवाइयों पर लगाम लगाया जा सकता है. मेहरबानी करके नफ़रत की इस भट्टी में सिसकती, बिलखती इंसानियत को बचाने के खातिर देश की मज़बूती व तरक्की के खातिर हम बेबसों की तरफ ध्यान दीजिए. क्योंकि इंसाफ़ से मुल्क व हुकूमत को मज़बूती मिला करती है.
द्वारा-
मोहम्मद तारिक कासमी
कैदी हाई सेक्योरिटी,
सी ब्लाक जिला जेल
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
22 सितम्बर 2012
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